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धनोल्टी , सहस्त्रधारा ,ऋषिकेश और फिर हरिद्वार

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रात की नीरवता मे गंगा की लहरो की तट की पैकडियो से टकराने की आवाज आ रही थी. इसी बीच मेरी श्रीमती जी ढुढती हुई आ गयी. आते ही बोली यहाँ कहाँ लेटे हो, मै बोला क्या करू यहाँ पर ठंडक है इसलिये इन सबके साथ यहीं लेट गया हूँ पर नींद तो आ नही रही है. बोली चलो बस मे ही आरम करना. यहाँ के ठंडे फर्श पर लेटे रहे तो कमर अकड जायगी. अब मुझे लगा, इससे तो अच्छा वापस दिल्ली चलते हैं, यहाँ परेशन होने से क्या फायदा. इतनी रात मे भी कई लोग गंगा नहा रहे थे. मैने गंगा का जल अपने उपर छिड़का और बस मे पहुंचकर जब सबसे वापस दिल्ली चलने के लिये कहा तो कुछ लोग बोले जब इतना परेशान हो ही चुके हैं तो अब कल गंगा नहाकर ही चलेंगे. मैने कहा ठीक है जैसी तुम सबकी मर्जी. बस मे बैठे हुए पता नही कब नींद लग गयी. दिन निकल आने के बाद ही नींद खुली.

अब सभी हर की पोड़ी पर चल दिये. तभी हमारे साथ के मनोज जी हर की पोड़ी के सामने बने धर्मशाला मे दो कमरे तय कर आये. बोले 500-500 रुपये मे मिल रहे हैं लेना है. मैने कहा ले लो भई थोड़ी देर के लिये ही सही बरसात के करण गंगा का पानी मटमैला था कुछ लोग नखरे करने लगे. पर बाकी सभी ने तो गंगा मे ढंग से स्नान किया. . नहा कर तैयार होने मे ही सभी को दस बज गये. अब भी कुछ एक तैयार नही हुए थे, मैने कहा मै तो नाश्ता कर के बस मे बैठने जा रहा हूँ तुम सब लोग भी जल्दी से आ जाओ. जब इतने सारे लोग होते हैं तब सारे अपनी- अपनी मर्जी चलाते हैं. करीब 12 बजे बस मे पहुंचे. अब वापस दिल्ली लौटना था.

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हरमंदिर साहब, अकाल तख्त और जलियांवाला बाग दर्शन

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घंटाघर के प्रवेश द्वार से पुनः अंदर कदम रखा तो सिक्ख संग्रहालय नज़र आया।  सोचा कि चलो, इसे भी देख लिया जाये।  हॉल में प्रवेश करते ही दाईं ओर ऊपर जाने के लिये सीढ़ियां थीं ।  ऊपर पहुंचा तो लिखा मिला, “फोटो खींचना मना है जी।“ पहले तो बड़े ध्यान से एक – एक चित्र को देखना और उसके नीचे दिये गये विवरण को पढ़ना शुरु किया पर फिर लगा कि इतने शहीदों का वर्णन पढ़ते-पढ़ते मैं भी जल्दी ही शहीदों की लिस्ट में अपना नाम लिखवा लूंगा।  हे भगवान !  इतने शहीद यहां और इनके अलावा उन्नीस सौ के करीब जलियांवाला बाग में!  अब मुझे इस बात का कोई आश्चर्य नहीं हो रहा था कि अमृतसर में हर सड़क का नाम किसी न किसी शहीद के नाम पर ही क्यों है?

शहीदों के चित्र देखते देखते अंतिम कक्ष में पहुंचा तो देखा कि नवीनतम शहीदों की पंक्ति में बेअंत सिंह और सतवंत सिंह के भी बड़े – बड़े तैल चित्र लगे हुए हैं। पहचाने आप?  बेअंत सिंह और सतवंत सिंह वे दोनों अंगरक्षक थे जिन्होंने अंगरक्षक के रूप में प्रधानमंत्री की सुरक्षा की जिम्मेदारी अपने सिर पर लेकर भी निहत्थी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या की थी।  मन में सहसा विद्रोह की भावना ने सर उठाया।  फिर देखा कि एक तैल चित्र और लगा हुआ है जिसमें गोलों – बारूद की मार से क्षत-विक्षत लगभग खंडहर अवस्था में अकाल तख्त का चित्र था।  अकाल तख्त की यह दर्दनाक स्थिति आपरेशन ब्लू स्टार के समय आतंकवादियों को अकाल तख्त से बाहर निकलने के लिये विवश करने के दौरान हुई थी।  एक आम भारतीय की तरह मेरा भी मानना है कि अकाल तख्त की ऐसी कष्टकर, वेदनाजनक स्थिति के लिये यदि भारतीय सेना को दोषी माना जाता है तो वे लोग भी कम से कम उतने ही दोषी अवश्य हैं जिन्होंने भिंडरवाले को अकाल तख्त में छिप कर बैठने और वहां से भारतीय सेना पर वार करने की अनुमति प्रदान की थी।  अकाल तख्त की पवित्रता तो उसी क्षण भंग हो गई थी जब उसमें हथियार, गोले और बारूद लेकर भिंडरवाले और उसके अन्य साथियों ने प्रवेश किया और इस बेपनाह खूबसूरत और पवित्र भवन को शिखंडी की तरह इस्तेमाल किया।  वैसे जो लोग राजनीति की गहराइयों से परिचित हैं उनका कहना है कि भिंडरवाले भी तो कांग्रेस का ही तैयार किया हुआ भस्मासुर था जिसे कांग्रेस ने अकाली दल की काट करने के लिये संत के रूप में सजाया था।  अस्तु !

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Ladakh: Nature’s Eloquent SIlence

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A trip to Ladakh leaves many a visitors breathless and not just because of its high altitude location. In an ephemeral moment of truce, when the cool breeze lets you rejuvenate your thoughts long lost to the battles of daily routine, a perchance to dream, a sense of being afloat on wings of imagination and suddenly you realize you need to breathe too. It’s just like in songs, ‘a flight of fancy on the windswept fields’ when you are standing alone and your senses reel. The attraction in Ladakh can be fatal especially when emotions are involved. When you are in Ladakh all you wish for is to capture its reality and here in the overwhelming vastness even reality turns out to be abstract.

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Kinnaur-The land of apples (Part 2)

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After about two and a half hours we reached Reckong Peo,or Peo, as it is popularly known. Peo is situated at an altitude of around 2200 metres above sea level and is at the base of the Kinner Kailash massif. From here, Kalpa was a short 20 minute drive and by lunch time we reached Kalpa. Our plan was to halt at the PWD rest house, which turned out to be a cottage with an excellent view of the mountains. Staying in Kalpa can be compared to living in the lap of nature. Overlooking the Kinner Kailash range, this is one of the most picturesque  hill stations one can ever visit. This quaint town was once the headquarters of Kinnaur district before it was replaced  by Reckong Peo. The collector’s office has now been taken over by the HP Irrigation Department while the old SP office is now a small police outpost. The old building of the District Hospital is visible behind the new building of a recently constructed Primary Health Centre.  From Kalpa, one can spot the famous Shiva Linga, nestled in the middle of the Kinner Kailash massif. It is a 2 day trek from Kalpa for the strong and sturdy.

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Qutub Shahi Tombs-An Empire Rests Here

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The Qutub Shahi tombs have a unique place in the history of Deccan and India as buried here are the rulers of Deccan from 1518, till Aurangzeb captured the Golconda fort by deceit and took the last emperor prisoner and shifted him to Daulatabad. So except for the seventh king Tana Shah (Abdul Hasan Qutub Shah), the previous 6 rulers and other members of the royal family are resting here. F

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यादगार मसूरी – धनोल्टी की यात्रा

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जन्माष्टमी का दिन होने के करण मेरी श्रीमती जी ने व्रत रखा था. शाम ढल चुकी थी मैने सोंचा कुछ फल वगैरह ला दू. होटेल से बाहर आकर पूछने पर पता लगा थोड़ा सा आगे बस स्टॅंड है वहां पर फल मिल सकते हैं. थोड़ा सा आगे जाने पर भी दुकाने नही नजर आई फिर वहां से गुजरते पहाड़ी लोगो से पूछा, उनका वही जबाव , बस थोड़ा सा आगे चले जाओ. हमारे जैसे लोगो के लिये पहाड़ो पर 100-200 गज चलना ही काफी दूर हो जाता है पर पहाड़ी लोग एक किलोमीटर की दूरी भी थोड़ा सा आगे ही बताते है. जैसे-तैसे बस स्टॅंड पहुँचा. यहाँ पर केवल 2-3 दुकाने ही थी जिसमे से एक मे थोड़ी सी सब्जी, फल रखे थे. फल खरीद कर वापस लौटते समय तक शाम काफी गहरी हो गयी थी. बरसात का मौसम होने के कारण बादलो ने आस-पास का वातावरण ढक दिया था. दूर का साफ नही दिख रहा था. इस समय सड़क पर कोई चहलकदमी नही हो रही थी. मेरे आगे – आगे दो लड़के बाते करते हुए जा रहे थे अन्यथा वातावरण मे नीरवता छाई हुई थी. मै तेज कदमो से होटेल की तरफ बढ रहा था. ऐसे समय पर पुरानी बाते याद आ जाती हैं. इससे पिछले वर्ष मै मुक्तेश्वर गया था. मुक्तेश्वर उत्तराखंड मे ही एक हिल स्टेशन है. यहाँ से नेपाल की तरफ का हिमालय दिखता है. तो बात कर रहा था मुक्तेश्वर की ( बताना आवश्यक हो गया था , कई लोग मुक्तेश्वर के नाम से ग़ह्र मुक्तेश्वर समझने लगते हैं.) यहाँ मै रेड रूफ रिज़ॉर्ट मे ठहरा था. रिज़ॉर्ट के मलिक मिस्टर. प्रदीप विष्ट से बातो ही बातो मे पता लगा की शाम के समय कभी-कभी रिज़ॉर्ट के सामने ही बाघ आ जाता है. उन्होने एक बाघ की फोटो भी अपने रिज़ॉर्ट मे लगा रखी थी जो कि जाड़े के समय उनके रिज़ॉर्ट के सामने बैठा हुआ धूप सेक रहा था. उनके रिज़ॉर्ट के पास ही एक महिला को होटेल है. बताने लगे कि एक दिन शाम का अंधेरा ढल गया था, वह अपनी कार से मेरे रिज़ॉर्ट के सामने से गुजर रही थी कि तभी अचनक बाघ उनकी कार के सामने आकर खड़ा हो गया. उन्होने ने कार के ब्रेक लगाये, बाघ थोड़ी देर तक खड़ा कार को घूरता रहा फिर छलांग मार कर दूसरी तरफ चला गया. इस समय मुझे वही बात याद आ रही थी कि कहीं यहाँ पर भी अचनक बाघ आ गया तब क्या करेंगे. चलते समय होटेल वाले से पूछना भूल गया था कि इस इलाके मे बाघ तो, वह नही है. खैर रास्ते मे बाघ तो नही मिला, सकुशल होटेल पहुंच गया. अगर मिल जाता तो गया था श्रीमती जी के खाने का इंतजाम करने और बाघ के खाने का इंतजाम कर बैठता. वापस आकर पहले होटेल वाले से पूछा पता लगा यहाँ पर बाघ नहीं है.

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माता वैष्णोदेवी यात्रा – भाग ३ (चरणपादुका से माता का भवन)

माता वैष्णोदेवी यात्रा – भाग ३ (चरणपादुका से माता का भवन)

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धीरे धीरे चलते हुए, रुकते हुए, बैठते हुए, हम लोग उस दो राहे पर आ गए थे, जंहा से एक रास्ता  अर्ध कुंवारी की और जाता हैं. और बांये से एक रास्ता नीचे की और से माता के भवन की और जाता हैं. अर्ध कुंवारी की और से माता के भवन पर जाने के लिए हाथी मत्था की कठिन चढाई चढनी पड़ती हैं. और इधर से दूरी करीब साढ़े छह  किलो मीटर पड़ती हैं. जबकि नीचे वाले रास्ते से चढाई बहुत  कम पड़ती हैं. और इधर से माता के भवन की दूरी  करीब पांच किलो मीटर पड़ती हैं.  अर्ध कुंवारी माता के भवन की यात्रा में ठीक मध्य में पड़ता हैं. यंहा पर माता का एक मंदिर, गर्भ जून गुफा, और बहुत से रेस्टोरेंट, भोजनालय, डोर मेट्री आदि बने हुए हैं. यंहा पर यात्री गण थोड़ी देर विश्राम करके, गर्भ जून की गुफा, व माता के दर्शन करते हैं, फिर आगे की यात्रा करते हैं. पर हम लोग नीचे के रास्ते से जाते हैं, और वापिस आते हुए माता के दर्शन करते हैं. ये कंहा जाता हैं की माता वैष्णो देवी इस गुफा में नो महीने रही थी, और गुफा के द्वार पर हनुमान जी पहरा देते रहे थे. भैरो नाथ माता को ढूँढता घूम रहा था, और माता इस गुफा से निकल कर आगे बढ़ गयी थी.

हम लोग नीचे वाले रास्ते से आगे बढ़ गए थे. मौसम फिर से  खराब होना शुरू हो गया था. माता के भवन की यात्रा के मार्ग में थोड़ी थोड़ी दूर पर टिन शेड बने हुए हैं. जिनमे मौसम खराब होने पर व बारिस होने पर रुक सकते हैं. बारिश होने से हम लोग भी एक टिन शेड में रुक गए थे.

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अमृतसर यात्रा – स्वर्ण मंदिर दर्शन

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तो साहेबान, अपुन अपने दोनों बैग पैक करके (एक में कपड़े, दूसरे में लैपटॉप व कैमरा) नियत तिथि को नियत समय पर नियत रेलगाड़ी पकड़ने की तमन्ना दिल में लिये स्टेशन जा पहुंचे।  ये नियत तिथि, नियत समय, नियत रेलगाड़ी सुनकर आपको लग रहा होगा कि मैं जरूर कोई अज्ञानी पंडित हूं जो यजमान को संकल्प कराते समय “जंबू द्वीपे, भरत खंडे, वैवस्वत मन्वन्तरे, आर्यावर्त देशे” के बाद अमुक घड़ी, अमुक पल, अमुक नगर बोल देता है।  हमारे वातानुकूलित कुर्सीयान में, जो कि इंजन के दो डिब्बों के ही बाद में था, पहुंचने के लिये हमें बहुत तेज़ भाग दौड़ करनी पड़ी क्योंकि किसी “समझदार” कुली ने हमें बताया था कि C1 आखिर में आता है अतः हम बिल्कुल प्लेटफॉर्म के अन्त में खड़े हो गये थे।  जब ट्रेन आई और C1 कोच हमारे सामने से सरपट निकल गया तो हमने उड़न सिक्ख मिल्खासिंह की इस्टाइल में सामान सहित ट्रेन के साथ-साथ दौड़ लगाई।  परन्तु अपने कोच तक पहुंचते पहुंचते हमारी सांस धौंकनी से भी तीव्र गति से चल रही थी। हांफते हांफते अपनी सीट पर पहुंचे तो देखा कि हमारी सीट पर एक युवती पहले से ही विराजमान है।  तेजी से धकधका रहे अपने दिल पर हाथ रख कर, धौंकनी को नियंत्रण में करते हुए उनसे पूछा कि वह – मेरी – सी – ट पर – क्या – कररर – रररही – हैं !!!  उनको शायद लगा कि मैं इतनी मामूली सी बात पर अपनी सांस पर नियंत्रण खोने जा रहा हूं अतः बोलीं, मुझे अपने लैपटॉप पर काम करना था सो मैने विंडो वाली सीट ले ली है, ये बगल की सीट मेरी ही है, आप इस पर बैठ जाइये, प्लीज़।

मैने बैग और सूटकेस ऊपर रैक में रखे और धम्म से अपनी पुश बैक पर बैठ गया और कपालभाती करने लगा। दो-चार मिनट में श्वास-प्रश्वास सामान्य हुआ और गाड़ी भी अपने गंतव्य की ओर चल दी।  मिनरल वाटर वाला आया, एक बोतल ली, खोली और डेली ड्रिंकर वाले अंदाज़ में मुंह से लगा कर आधी खाली कर दी!  बीच में महिला की ओर गर्दन एक आध बार घुमाई तो वही सिंथेटिक इस्माइल!  मैने अपना बैग खोल कर उसमें से अंग्रेज़ी की एक किताब निकाल ली ! (बैग में यूं तो हिन्दी की भी किताब थी पर बगल में पढ़ी लिखी युवती बैठी हो तो अंग्रेज़ी की किताब ज्यादा उपयुक्त प्रतीत होती है।) किताब का टाइटिल “Same Soul Many Bodies” देख कर वह बोली,

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Trip to Kaudiyala

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All of us were full of excitement and adventure and thrill, this was an out of the world experience , now thrill doesn’t stop here, our trainer told that before we reach a cliff for cliff jumping we all will jump in river when he will ask to do. As soon as the last rapid came , he asked us to jump and we did, what a thrill……and excitment, chilled water and strong flow of water, but we are holding a rope tied with raft and floated with raft for 2-3 kms.

Everything stablised once we reached for cliff jumping, this was a jump from approx 30 feet height again a great thing to do. Finishing off just stopped before Rishikesh, came out of river , completely exhausted so had lemon water to claim our energies back. Took a local bus to reach Shivpuri where our vehicle was waiting.

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A trip to Kasauli and Baru Sahib on bike

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Got up at 7.30 AM. Checked the engine oil in our bikes and found that engine oil level in Hunk was very low. Asked the locals about any spare parts shop around and got to know that we can find one in Dharampur. Started our bikes again at 9.30 AM and moved on to see the very famous ‘Monkey Point’. Harmeet’s Hunk was loaded with 3 heavy bags as he had plans to stay at Baru Sahib. We reached Monkey point and got to know that we will have to trek and bags were not allowed. There was no place available where could keep our bags so had to drop the plan for ‘Monkey Point’. After that, we reached ‘Sunset point’. It was really an amazing place with a lot of breathtaking views. It was greenery all around and completely quiet place. Just the sound of birds. Just feel the fresh air and feels like you are in heaven. It was a very nice experience. After spending some time, enjoying the beauty of nature, we went to the market to have lunch. Had Chinese food at a shop but the food we had there was pathetic. I never had such food in my life. We left from there and decided to go to Shimla and then Kufri from there. Left from Kasauli at 3 PM. While on our way back, I started feeling sick and suffered from indigestion and gastric problems due to the food that we had. Reached Solan as Harmeet had to buy engine oil for his Hunk. Got the engine oil from Chambaghat near Solan. I was still not feeling well. Took a tablet of Pantop-D and we then decided to go to Baru Sahib due to health issues. Way to Baru Sahib was the worst one. Baru Sahib is located 70 kms away from Solan.

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जादू मानसून का :  जब छत्तीसगढ़ ने ओढ़ी धानी चुनरिया !

जादू मानसून का : जब छत्तीसगढ़ ने ओढ़ी धानी चुनरिया !

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भिलाई से रायपुर होती हुई जैसे ही ट्रेन बिलासपुर की ओर बढ़ी बारिश में भीगे छत्तीसगढ़ के हरे भरे नज़ारों को देखकर सच कहूँ तो मन तृप्त हो गया। मानसून के समय चित्र लेने में सबसे ज्यादा आनंद तब आता है जब हरे भरे धान के खेतों के ऊपर काले मेघों का साया ऍसा हो कि उसके बीच से सूरज की रोशनी छन छन कर हरी भरी वनस्पति पर पड़ रही हो। यक़ीन मानिए जब ये तीनों बातें साथ होती हैं तो मानसूनी चित्र , चित्र नहीं रह जाते बल्कि मानसूनी मैजिक (Monsoon Magic) हो जाते हैं। तो चलिए जनाब आपको ले चलते हैं मानसून के इस जादुई तिलिस्मी संसार में । ज़रा देखूँ तो आप इसके जादू से सम्मोहित होने से कैसे बच पाते हैं ?

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Blue sky country

Kinnaur-The land of apples (Part 1)

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On day 3, before starting off for Sangla, we were in a dilemma on whether to make the short trip to Hatu peak or not. As we had to reach Sangla before it was dark, we decided to skip Hatu peak, which is about 8 KMs from Narkanda. Thus, we hit the NH22 directly and road conditions being good, we reached the town of Rampur in about 2 hours. We refuelled the Ertiga here and noted a mileage of 15-16 KM/Litre in hilly road conditions.  After, Rampur, the highway, which was once known to the British as the Hindustan-Tibet road, leads you further on to Jeori before entering the district of Kinnaur at Chaura. After entering Kinnaur, the road, cut into sheer rock, rises steeply above the Satluj River. It follows the Satluj and is one of the most vertiginous roads in the whole country offering a spectacular view of rugged mountains.

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