हरमंदिर साहब, अकाल तख्त और जलियांवाला बाग दर्शन

यद्यपि मैं रात को लगभग दो बजे सोया था, सुबह जल्दी ही आंख खुल गई।  कहते हैं कि हम सबके मस्तिष्क में एक बायोलॉजिकल क्लॉक है।  यदि आप अपने आप को यह कह कर सोयें कि सुबह पांच बजे हर हालत में उठना है तो पौने पांच बजे ही आपकी आंख स्वयमेव खुल जायेगी।   नाइट लैंप के धीमे-धीमे  प्रकाश में मैं समय नहीं देख पा रहा था तो मोबाइल का बटन दबा कर, आंखें सिकोड़ कर देखा तो 5:45 हुए थे।

एक बार इच्छा हुई कि दोबारा सो जाऊं पर फिर खयाल आया कि यहां घूमने आया हूं, सोने के लिये नहीं !  सुबह – सुबह जाकर देखना चाहिये कि स्वर्ण मंदिर सूर्योदय के समय कैसा लगता है।  बस, आलस्य भाग गया।   फटाफट नहा-धोकर पुनः कैमरा कंधे पर डाला, सर पर भगवा वस्त्र बांधा, अपनी चरण-पादुकायें नीचे रिसेप्शन पर रखीं और छोटे वाले गेट से बाहर!

अमृतसर स्वर्णमंदिर परिसर के बाहर जूता घर

जोड़ाघर – बड़े-छोटे के अहं का संपूर्ण त्याग करके ही ऐसी कारसेवा संभव है।

स्वर्ण मंदिर के बाहर इतनी सुबह दर्शनार्थी कम ही थे।  सड़क पर कुछ सेवादार झाड़ू लगा रहे थे।    एक अद्‌भुत बात जो अमृतसर जाकर बड़ी शिद्दत से सीखने को मिली वह ये कि किसी भी व्यक्ति को उसके काम के आधार पर छोटा या बड़ा समझना सबसे बड़ी मूर्खता है।  स्वर्णमंदिर में कोई झाड़ू लगा रहा हो, आपकी चप्पल उठा रहा हो, फर्श पर पोचा लगा रहा हो तो ये समझने की भूल कतई नहीं करनी चाहिये कि ये लोग यहां कोई नौकर-चाकर है।  हो सकता है, आपकी चप्पल उठा कर रैक में रख कर आपको टोकन देने वाला वास्तव में कोई करोड़पति बिज़नेस मैन हो जो धार्मिक भावना के वशीभूत अपने सारे अहं को दरकिनार कर,  आपकी सेवा करने में अपना पुण्यलाभ देख रहा हो।     सच तो यह है कि उनके हाथ में चप्पल सौंपते हुए मन में अत्यधिक संकोच होता है कि ये झकाझक सफेद कपड़े पहने, सफेद दाढ़ी वाले वयोवृद्ध सज्जन मेरी चप्पल उठा कर अपना परलोक सीधा कर रहे होंगे पर मुझे क्यों पाप लिप्त कर रहे हैं?  अपनी चरण पादुकायें होटल में ही छोड़ आने की मुख्य वज़ह यही थी!  जिन महापुरुषों ने कारसेवा की ये अद्‌भुत परम्परा डाली है, उनके श्रीचरणों में मेरा सादर नमन!

स्वर्णमंदिर द्वार के बाहर लगी टोंटियां।

 

हरमंदिर साहब के परिक्रमा पथ पर बैठे श्रद्धालु

 

प्रवेश द्वार के बाहर लगी टोंटियों पर हाथ धोकर, फिर पानी में से गुज़रते हुए पैर धोकर मैने घंटाघर में से परिक्रमा पथ पर प्रवेश किया तो लगा कि श्री हरमंदिर साहब भी रात्रि में एक प्रहर विश्राम करके बिलकुल तरोताज़ा लग रहे हैं।  अक्तूबर की सुबह साढ़े छः बजे अमृतसर का मौसम एकदम ऐसा था जैसे कि खास तौर पर आर्डर देकर मंगवाया हो!  अमृत सरोवर के घाट पर मैने आलथी – पालथी जमाई और वहां के मनोरम दृश्य को मानों अपनी पांचों ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से सहेजना शुरु कर दिया।  दर्शनार्थी आते, परिक्रमा पथ पर चमचमाते हुए फर्श पर साष्टांग दंडवत्‌ करते रहे और आगे बढ़ते रहे।  जाने कितनी देर वहीं बैठा रहा, जब कुछ धूप उस प्रांगण में उतरी तो मुझे लगा कि मंदिर में भीतर प्रवेश किया जाये।

 

 

 

दर्शनी ड्योढ़ी से बाहर तक शान्ति से खड़े हुए दर्शनार्थियों की पंक्तियां

 

दाईं ओर अकाल तख्त के सामने दर्शनी ड्योढ़ी से बाहर तक दर्शनार्थियों की लम्बी – लम्बी पंक्तियां लगी हुई थीं।  सब लोग शान्ति से खड़े हुए थे, कोई बेचैनी नहीं, धक्का – मुक्की करके आगे निकलने का प्रयास नहीं।  एक-दो वृद्ध पुरुष यदि आगे निकले भी तो शांति से, सहज भाव से उनको आगे जाने दिया गया।  ऐसा नहीं कि अन्य लोग कहें,  “भाईसाब, हम क्या झक मार रहे हैं सुबह से लाइन में खड़े हुए? लाइन में पीछे लगिये !”  मुझे तो वैसे भी कोई जल्दी नहीं थी।  मैं तो एक-एक क्षण को जीने के लिये, घूंट – घूंट कर पीने के लिये ही तीन दिन का समय निकाल कर यहां आया था। कुछ लोगों ने कहा भी था कि अमृतसर छोटी सी जगह है। रात की ट्रेन पकड़ कर सुबह छः बजे अमृतसर पहुंचो। स्वर्णमंदिर के दर्शन करो, फिर जलियांवाला बाग जाओ जो बगल में ही है। वहां से फ्री होकर लंच लो, तीन बजे वाघा बार्डर के लिये चल दो। वहां से सात बजे तक वापिस आओ, भरावां ढाबे में खाना खाओ, रात को दस बजे अपनी ट्रेन पकड़ो और सुबह अपने घर !    पर मैं इतनी फुरसत में था कि बस, क्या बताऊं !  तीन रातें अमृतसर में ही बिताने की सोच कर आया था।

दर्शनी ड्योढ़ी का स्वर्णजटित प्रवेश द्वार

 

स्वर्ण मंडित दीवारों पर चित्रकारी एवं इतिहास

 

दर्शनी ड्योढ़ी में स्वर्ण जटित दीवारों पर बने हुए कथा-चित्र

 

 

दर्शनी ड्योढ़ी से मुख्य भवन तक दोनों ओर दस-दस प्रकाश स्तंभ

 

दीवारों पर कलाकारों ने अपना दिल निकाल कर रख दिया लगता है।

 

शबद-कीर्तन सुनते सुनते आगे बढ़ रहे दर्शनार्थी !

 

अमृत सरोवर की पैड़ियों पर काई न जम जाये अतः नित्य कारसेवा चलती है।

 

लाइन में लगे – लगे भी मेरा कैमरा क्लिक – क्लिक करता रहा, धीरे – धीरे पंक्ति आगे सरकती रही। पंक्ति में लगे – लगे अमृत सरोवर की सीढ़ियों को रगड़-रगड़ कर साफ करते हुए कार सेवक दिखाई दे रहे थे।   अंततः वह क्षण भी आया जब मैने हरमंदिर साहब के मुख्य भवन में प्रवेश किया।  श्रद्धा सुमन अर्पण करने के बाद एक कोना ढूंढ कर वहां दस मिनट के लिये बैठा भी।  सीढ़ियां चढ़ कर प्रथम तल पर पहुंचा तो वहां से परिक्रमा पथ और चारों दिशाओं में झकाझक सफेद रंग की दोमंजिला इमारत को निहारता रहा।  दो-एक फोटो भी लीं पर फिर बाद में एक सज्जन ने फोटो लेने के लिये मना कर दिया।  नीचे उतर कर आया तो वापस दर्शनी ड्योढ़ी जाने के लिये कोई भीड़ भरी पंक्तियां दिखाई नहीं दे रही थीं !  आराम से बाहर आया, कडाह प्रसाद ग्रहण किया। एक दोना भर प्रसाद खा कर भी मन नहीं भरा, तो दूसरे सज्जन के सामने फिर हाथ फैला कर खड़ा हो गया। उन्होंने पूछा कि आप दर्शन कर आये? मैने कहा, “जी हां !”  वे बोले, “वहां से आते हुए प्रसाद नहीं मिला?” मैने कहा, “जी मिला, पर शायद कम था, और इच्छा है!”  हंसते हुए उन्होंने एक दोना पुनः मेरे हाथों में रख दिया।  दो – दो दोने प्रसाद के पेल के, सच्चे हृदय से उनको आशीर्वाद देकर मैने हाथ धोये और फिर अपना कैमरा ऑन कर लिया और भटकती आत्मा की तरह अकाल तख्त की ओर बढ़ा।

सरोवर के उस पार परिक्रमा पथ पर ऐतिहासिक बेरी का पेड़ नज़र आरहा है।

हे भगवान! इतने सारे कमरे?  हर कमरे में श्री गुरुग्रंथ साहिब का पाठ चल रहा था।  एक से पूछा कि भाईसाहब, ये हर कमरे में पाठ कैसा चल रहा है?  तो उन्होंने बड़ी श्रद्धा से उधर देखा फिर दोबारा मेरी ओर देखा, फिर वापिस उधर देखा और फिर मेरी ओर देख कर पूछा, “आपको नहीं पता?”  मैने कहा, नहीं!”  बोले, “मुझे भी नहीं पता!”

बाद में वापसी यात्रा के दौरान मेरे सहयात्री सरदार जी ने बताया कि हमारे आपके जैसे अनेक गृहस्थ परिवार मनोकामना पूरी होने पर पाठ कराने का संकल्प लेते हैं तो उन कमरों में ऐसे ही गृहस्थों की ओर से पाठ चलते रहते हैं।  आप चाहें तो वहां उपस्थित रह सकते हैं और चाहें तो भुगतान करके आ सकते हैं।  आपकी ओर से पाठ करा दिया जाता है।  जैसे लोग माता की चौकी, भगवती जागरण या सुन्दर कांड का पाठ कराते हैं, ऐसे ही ये भी पाठ होता है परन्तु इसमें धन का अश्लील प्रदर्शन नहीं होता।

सिर पर गुरु ग्रंथ साहब को लेकर आते श्रद्धालु !

 

वहां घूमते – घूमते, ज्ञान वर्द्धन करते-करते बड़ी देर हो चुकी थी। मैने घड़ी की ओर देखा तो केवल दस बज रहे थे जबकि मुझे लग रहा था कि शायद १ या २ बजने वाले होंगे। अकाल तख्त की ओर से ही बाहर निकल आया तो नेस्केफे का स्टॉल देखा।  अरे वाह, कॉफी सिर्फ आठ रुपये!  उससे कहा कि भई, एक कॉफी दो तो बोला, “पन्द्रह रुपये” ।  यह राग हमें समझ नहीं आया। जब उसने समझाया तब भी समझ नहीं आया।  मैने उसे गुस्से में घूरते हुए उसके स्टॉल की फोटो खींची मानों ये केस सीधे सी.बी.आई. को विशेष जांच के लिये भेजने की योजना हो !  आगे एक दुकान देखी तो दस रुपये का स्टील का एक कड़ा खरीद कर पहन लिया और फिर घंटाघर की ओर कदम बढ़ा दिये।

घंटाघर के प्रवेश द्वार से पुनः अंदर कदम रखा तो सिक्ख संग्रहालय नज़र आया।  सोचा कि चलो, इस संग्रहालय ने मेरा क्या बिगाड़ा है !   इसे भी देखे लेते हैं।   दरबार के प्रवेश द्वार से अन्दर आते ही दाईं ओर ऊपर जाने के लिये सीढ़ियां थीं ।  ऊपर पहुंचा तो लिखा मिला, “फोटो खींचना मना है जी।“ पहले तो बड़े ध्यान से एक – एक चित्र को देखना और उसके नीचे दिये गये विवरण को पढ़ना शुरु किया पर फिर लगा कि इतने शहीदों का वर्णन पढ़ते-पढ़ते मैं भी जल्दी ही शहीदों की लिस्ट में अपना नाम लिखवा लूंगा।  हे भगवान !  इतने शहीद यहां और इनके अलावा उन्नीस सौ के करीब जलियांवाला बाग में!  अब मुझे इस बात का कोई आश्चर्य नहीं हो रहा था कि अमृतसर में हर सड़क का नाम किसी न किसी शहीद के नाम पर ही क्यों है?

शहीदों के चित्र देखते देखते सब नाम गड्ड – मड्ड होने लगे थे परन्तु अंतिम कक्ष में पहुंचा तो देखा कि नवीनतम शहीदों की पंक्ति में बेअंत सिंह और सतवंत सिंह के भी बड़े – बड़े तैल चित्र लगे हुए हैं। पहचाने आप?  बेअंत सिंह और सतवंत सिंह वे दोनों अंगरक्षक थे जिन्होंने अंगरक्षक के रूप में प्रधानमंत्री की सुरक्षा की जिम्मेदारी अपने सिर पर लेकर भी निहत्थी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या की थी।  मन में सहसा विद्रोह की भावना ने सर उठाया।  फिर देखा कि एक तैल चित्र और लगा हुआ है जिसमें गोलों – बारूद की मार से क्षत-विक्षत लगभग खंडहर अवस्था में अकाल तख्त का चित्र था।  अकाल तख्त की यह दर्दनाक स्थिति आपरेशन ब्लू स्टार के समय आतंकवादियों को अकाल तख्त से बाहर निकलने के लिये विवश करने के दौरान हुई थी।  एक आम भारतीय की तरह मेरा भी मानना है कि अकाल तख्त की ऐसी कष्टकर, वेदनाजनक स्थिति के लिये यदि भारतीय सेना को दोषी माना जाता है तो वे लोग भी कम से कम उतने ही दोषी अवश्य हैं जिन्होंने भिंडरवाले को अकाल तख्त में छिप कर बैठने और वहां से भारतीय सेना पर वार करने की अनुमति प्रदान की थी।  अकाल तख्त की पवित्रता तो उसी क्षण भंग हो गई थी जब उसमें हथियार, गोले और बारूद लेकर भिंडरवाले और उसके अन्य साथियों ने प्रवेश किया और इस बेपनाह खूबसूरत और पवित्र भवन को शिखंडी की तरह इस्तेमाल किया।  वैसे जो लोग राजनीति की गहराइयों से परिचित हैं उनका कहना है कि भिंडरवाले भी तो कांग्रेस का ही तैयार किया हुआ भस्मासुर था जिसे कांग्रेस ने अकाली दल की काट करने के लिये संत के रूप में सजाया था।  अस्तु !

वाह्य परिक्रमा को हरा भरा रखने के लिये एक संस्था को जिम्मेदारी मिली है।

आपरेशन ब्लू स्टार के बाद इस गलियारे की आवश्यकता अनुभव की गई थी।

 

आपरेशन ब्लू स्टार के बाद स्वर्णमंदिर को पुनः ऐसी अशोभनीय स्थिति से बचाने के लिये सरकार ने गलियारा बनवाया है जिसको वाह्य परिक्रमा पथ के रूप में स्थापित किया गया।  इस गलियारे को खूबसूरत ढंग से सजाने का जिम्मा भी एक संस्था को दे दिया गया है।  इस गलियारे में किसी भी प्रकार का वाहन लाने की अनुमति नहीं है अतः ये स्वर्ण मंदिर परिसर के लिये एक सुरक्षा चक्र का कार्य करता है।

 

इस गलियारे तक आते-आते रास्ते में एक छोटा सा जलाशय मिला जिसमें खूब सारे कबूतर बेचारे कबूतरियों को प्रसन्न करने का अनथक प्रयास कर रहे थे और जो जो अपने इस प्रयास में सफल हो रहे थे, वे सब कबूतरियों के साथ किल्लोल कर रहे थे।  कबूतरों की भावनाओं को दृष्टिगत रखते हुए जिस किसी ने भी इस सूक्ष्म तरणताल का निर्माण किया होगा, उसकी कोमल भावनाओं को शत शत नमन !

घंटों से नंगे पांव चलते – चलते काफी थकान होचुकी थी और गलियारे से बाहर सड़क पर चलने से अब तक मेरे पांव में काफी सारे कंकड़ – पत्थर और एक आधी फांस चुभ चुके थे अतः मुझे अपनी भलाई इसी में नज़र आई कि अपने कमरे में जाऊं, पैरों को कुछ देर गर्म पानी में रख कर थोड़ा सा विश्राम दूं और तब आगे का कार्यक्रम सोचूं !  होटल के कमरे में आया, कैमरा बिस्तर पर टिकाया।   खुद भी बैठा और अपने तलवों की ओर देखा तो आंखों में आंसू आ गये!  हाय राम, एक दिन में क्या से क्या हालत कर ली मैने अपने पैरों की !  अब अपनी श्रीमती जी को क्या मुंह दिखाऊंगा!  उन्होंने खास तौर पर चलते चलते ताकीद की थी – “आपके पांव बहुत खूबसूरत हैं, इन्हें जमीन पर मत उतारियेगा। मैले हो जायेंगे ।“  कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा!  पर,  मुझ सुदामा के लिये होटल के उस कमरे में कोई कृष्ण सरीखे सखा तो उपस्थित थे नहीं जो “पानी परांत को हाथ गह्यो नहीं, नैनन के जल सों ही पग धोए।“  के अन्दाज़ में मेरे पांव धो देते।   मजबूरन खुद ही उठा, गीज़र से गर्मा – गर्म पानी बाल्टी में लिया, उसमें थोड़ा ठंडा पानी भी मिलाया क्योंकि बैग में बरनौल रखना भूल गया था।   दस-पन्द्रह मिनट तक पानी में पैर लटकाये रहा, होटल वालों के साबुन और फिर झकाझक सफेद तौलिये का सदुपयोग अपने पैरों को पुनः चमकाने में किया तब कहीं जाकर आत्मा को (और पैरों को भी )  शांति मिली।

यद्यपि सुबह – सुबह मैं दो दोने भर के प्रसाद ग्रहण कर चुका था पर न जाने क्यूं ऐसा लग रहा था कि वह सदियों पुरानी बात हो।  भूख पुनः लग आई थी।  कमरे से बाहर निकला  और खाने की खुशबू की तलाश में नथुने फड़काता हुआ बाज़ार की ओर बढ़ा !   सामने ही एक तिमंजिला भवन में अमृतसर के “मशहूर कुलचे और ताजा ठंडी लस्सी” लिखा देख कर फटाफट एक सीट ऐसे घेर ली मानों मुंबई की लोकल ट्रेन हो।  तीस रुपये का कुलचा – सब्ज़ी और पच्चीस रुपये की लस्सी क्षुधा को शान्त करने के लिये पर्याप्त सिद्ध हुई !  तथाकथित अमृतसरी कुलचे में वैसी कोई विशेषता नज़र नहीं आई जैसा कि उम्मीदें लगा रखी थीं।

स्वर्ण मंदिर से कुछ ही कदमों की दूरी पर स्थित है जलियांवाला बाग !

 

मुश्किल से सौ कदम आगे बढ़ा तो जलियांवाला बाग का प्रवेश द्वार मिला – ठीक वहीं जहां “गूगल कौर”  ने बताया था।  मेरे निरपराध देशवासियों के खून से रंगी इस धरती की रज माथे पर लगा कर भीतर प्रवेश किया।  सबसे पहले बाहर प्रांगण में एक सूचना पट्ट और नाम शलाका !  विशाल कक्ष में प्रवेश किया तो दीवारों पर श्वेत श्याम चित्र लगे हुए थे जो उस दर्दनाक, अभूतपूर्व घटनाक्रम के गवाह थे।  कक्ष में से होकर बाहर उद्यान में प्रवेश किया तो दायें हाथ पर शहीदों के सम्मान में अखंड ज्योति जलती दिखाई दी।  मुझे लग रहा था कि मैं एक अत्यन्त विशिष्ट स्थान पर मौजूद हूं जिसकी गंभीरता और गरिमा का निर्वहन करना हर भारतीय नागरिक का कर्त्तव्य है।   पर कुछ युवक – युवतियां ऐसे भी नज़र आये जो कुछ पल साथ बिताने की लालसा में उसे एक आम कंपनी बाग समझ कर आते रहते होंगे।  निश्चय ही अमृतसर के स्थानीय निवासी तो जलियांवाला बाग में तब ही आते होंगे जब उनके घर में मेहमान आये हुए हों और उनको जलियांवाला बाग दिखाना हो !  बाहर से आये हुए पर्यटकों की चिन्ता ही क्या?

अनाम शहीदों की पावन स्मृति में अमर ज्योति सतत्‌ जलती रहती है।

 

 

जलियांवाला कांड की स्मृति में डूबी दो साध्वी !

 

शहीदी कुआं जो लाशों से पट गया था

दीवारों में गोलियों से जो जख्म हुए थे, वे आज भी जस के तस हैं।

 

शहीदी कुएं को एक स्मारक का स्वरूप दे दिया गया है।

 

जलियांवाला बाग के एकमात्र प्रवेश द्वार को बन्द करके जनरल डायर ने जिस प्रकार शांति से सभा कर रहे निहत्थे नागरिकों पर, बिना उनको बचने का अवसर दिये, गोलियों के राउंड पर राउंड खाली कर दिये थे, वह कोई ऐसा ही सैन्य अधिकारी कर सकता था जिसके संस्कारों में ही बर्बरता विद्यमान हो!  सुना है कि पुराने जमाने में यूरोप में जब किसी को मौत की सजा सुनाई जाती थी तो शहर के नागरिकों के लिये ये एक मेले जैसा आनन्दपूर्ण अवसर होता था।  घर से सज-धज कर, संवर कर स्त्री – पुरुष और बच्चे पिकनिक के से माहौल की इच्छा में स्टेडियम में आते थे जहां मदमत्त हाथी के पांव तले कुचल कर अपराधी को मौत की सजा दी जाती थी। अपने प्राणों की रक्षा के लिये वह सजायाफ्ता अपराधी स्टेडियम में इधर से उधर भागता था और महावत उसे पल – पल तड़पाते हुए जीवन की भीख मांगते हुए देख कर अट्टहास करता था।  जनता भी पॉपकार्न खाती हुई, अपने अपने मग में से कॉफी पीती हुई इस दृश्य से आह्लादित अनुभव करती थी।  अंततः जब वह कैदी मारा जाता था तो “खेल खत्म – पैसा हज़म” की सी भावना से लोग अपने अपने घर को चल पड़ते थे। अस्तु !

जलियांवाला बाग में गोलियों की बौछारों का सामना करती वे तीन दीवारें आज भी उस बर्बर नरपशु की हृदयहीनता की कहानी कहती हैं। दीवारों पर गोलियों के चिह्न आज भी मौजूद हैं जिनको शहीदी स्मारक के रूप में सुरक्षित कर दिया गया है।  वहीं एक शहीदी कुआं है जिसमें सैंकड़ों लोग इसलिये कूद पड़े थे कि शायद गोलियों की बौछार से बच जायें तो जान बच जायेगी ।  बताया जाता है कि वह गहरा कुआं भी लाशों से ऊपर तक पट गया था।

दीवार के आगे कांच की सुरक्षा ताकि पर्यटक यहां भी दीवार पर अपना नाम न लिख जायें!

 

एक अजीब सी वेदना का भाव मन में लिये मैं उस उद्यान में इधर से उधर घूमता रहा, भटकता रहा, जो कुछ भी महत्वपूर्ण  लगा, उसे अपने कैमरे में संकलित करता रहा।  वहां से बाहर निकलते समय देखा कि इस म्यूज़ियम जैसे कक्ष में प्रथम तल पर कोई शो दिखाया जाता है।  अभी शो का समय होने में दो घंटे बाकी थे अतः ये सोच कर मैं बाहर चला आया कि पुनः आ जाऊंगा पर फिर दिमाग़ से बात आई-गई हो गई।

शायद पैदल घूमने फिरने से मेरी क्षुधा में अपार वृद्धि हो जाती है।  बाहर अपना मूड संवारने के लिये सोचा कि कुछ खा लिया जाये।  एक रेस्टोरेंट दिखाई दिया तो उसमें प्रवेश कर गया। रवा मसाला डोसा का आर्डर थमा दिया पर जब सामने डोसा आया तो लगा कि गलती हो गई है। आप अगर पंजाब में घूम रहे हैं तो आपको पंजाबी खाना मंगाना चाहिये। स्थानीय जलवायु में स्थानीय भोजन अधिक स्वादिष्ट भी लगता है और हज़म भी बेहतर ढंग से होता है।  वैसे भी, पंजाब के रसोइये अपने पंजाब का परंपरागत खाना बनाने में जितने निपुण होंगे उतने ही निपुण वह दक्षिण भारत का खाना बनाने में थोड़ा ही होंगे!  निष्काम भावना से खाना खाकर मैं वापस होटल आ गया जो मुश्किल से सौ कदम के फासले पर ही था।  रिसेप्शन पर कुछ अन्य पर्यटक वाघा बार्डर के बारे में पूछ रहे थे कि कैसे जाना सुविधाजनक रहेगा।  होटल वालों ने बताया कि ड्राइवर 3.30 पर यहीं आकर आपको ले जायेगा !  दो प्रकार की टैक्सी हैं – ए.सी. जिसका किराया 120 रुपये प्रति व्यक्ति है, सादी का किराया 100 रुपये है।  मैने 120 वाली तय कर ली और सुबह से अब तक की फोटो लैपटॉप में अंतरित करने और कैमरे की बैटरी चार्ज करने के लिये कमरे में आ गया।  मेरे पास ढाई घंटे थे जिसमें मैं आराम फरमा सकता था।

क्रमशः

वाघा बार्डर का वर्णन और चित्र आपकी प्रतीक्षा में हैं !  किंचित्‌ प्रतीक्षा करें!

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

19 Comments

  • vinaymusafir says:

    Main aksar ghumakkar.com pe amritsar ke post ignore kar deta hoon, par is post ko ignore karna matlab apko ignore karna, Apko ignore karna to bewakufi hai…
    Maja aya dono post padhke. sugathit post hai.
    Jaliyawala bagh aur Golden Temple dono se hi badi dard bhari yaadein jud gayin hain, aur waise bhi Amritsar ne border pe hone ke kaaran, partition ke samay kafi trasdi jheli hain.

    Photos sabhi bahut acche hain, kaunsa camera hai apke paas?
    You are an institution, apko padhna hamesha naya sikhne jaisa hota hain.

  • Mukesh Bhalse says:

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  • rastogi says:

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  • I am really indebted to you for sparing some moments to read the post and taking pains to pen your encouraging comments.

    @vinaymusafir – Aap Amritsar ko ignore kar dete hain? Aisa kyon? Amritsar ab mere to favourite cities me shaamil ho chuka hai.

    @mukeshbhalse – ??????, ??? ??? ?????? ?? ?? ???? ???, ?? ?? ?? ??? ?? ??? ?? ??? ???? ??? ! ????? ?? ??????? ?? ??? ?? ?? ?? ?? ????? ?? ????, ????? ?????? ?? ????? ??? ???? !

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  • D.L.Narayan says:

    Wow, Sushant, you have this amazing ability to capture the essence of the places you visit and the people you encounter; above all of course, the ability to express yourself with so much elegance. Usually I consider reading Hindi posts as an imposition of sorts but in your case, it is sheer pleasure. This time, your humour was a bit subdued, and justified too, considering the sanctity of the places you have visited. Yet, your humourous streak can never be suppressed for long and I found the caption “????? ?? ??? ???? ?? ??????? ???? ?????? ???? ?? ????? ?? ???? ??? ? ??? ?????!” vintage Sushant Singhal – a sugar-coated criticism of our inherent tendency to deface monuments.

    Regarding comments of a political nature, I see no harm, as long as it is not offensive. A wise and mature person like you knows how to strike the right balance. Ghumakkar is not just a travelogue of the been-there-done-that variety. It is important to write about the historical, social and political underpinnings for better appreciation of a place; in fact it helps us to understand life itself.

    Thank you once again.

  • D.L.Narayan says:

    I forgot to mention that the artwork on the right side of the picture captioned “??????? ?? ???????? ?? ???? ??? ????? ?? ?? ???? ???? ??” looks like an exquisite example of the Parchin Kari technique. I wrote about it in one of my blogs http://www.ghumakkar.com/2012/06/20/the-shaikh-zayed-grand-mosque/

    • Dear DL,

      My post remains incomplete till my ears are able to hear the music coming from your pen ! Thank u for the generous praises. People say, “????? ????? ??????, ???? ???? ????” but it is not useless to have some people around who boost your morale every now and then. You have really done a great service to me by providing this link back to your post. I shall ever remain grateful to you for that. I must explore this ghumakkar.com more and more. Many a gems are buried here which must not be allowed to remain unexplored.

      Thanks for every word of yours.

      Sushant Singhal

  • Abhee K says:

    Sushant ji,

    Very nice post. Gurudware me sewa karna , ek aisa kaam hai jo mujhe bahut impress karta hai. Delhi ke bangla sahib Gurudware me maine logo ko Jutaghar me line lagate hue dekha tha sewa karne ke liye…Tab mujhe bahut surprise hua tha, par wo actually hota hai, jab repeat scenario maine Golden temple mai bhi dekha tha.Aap ne Swarn madir a langar khaya ki nahi? Waha ki roti banane ki machine bhi world famous hai…Humari generation me history padna aur history ke liye emotions lana thodi mushkil baat hoti hai kyoki hum log (kuch hum mere jaise , saare nahi) wo sab itna deep imagine nahi kar paate. Par jab maine Jaliawala baag ka kuan (well) aur diwar dekhi thi to sach me meri aankh main aansu aa gaye the…

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  • One more fine piece of work from you Sirjee. Pictures are fantastic and wonderful capturing expressions .I dont have much to say about your classy description . Continue with more and more works like this and Thansk for sharing .

    I was trying my best to find some thing so that I can criticize but couldn’t find. :-)

  • Nirdesh says:

    Dear Sushantji,

    Great anecdotal post.

    The photos make me want to go there again.

    Heartwarming words in the reply to Abhee.

    Nirdesh

  • Nandan Jha says:

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    • Sat Siri Akaal ! Aapki baat par gaur avashya farmaya jaayega. I agree and was worried about it. I want uninterrupted text. Photos must not break the flow of reading. Slide show or gallery could be a great idea. let me try it next time. :D

  • Ritesh Gupta says:

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  • Vipin says:

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  • ashok sharma says:

    very good descriptive post with almost all the details beautifully knitted.photographs are real gem.

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