गौरी से वो मुलाकात व इकाकुला का हसीन समुद्र तट !

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आज की इस कड़ी में आपकी मुलाकात कराएँगे गौरी और उसके एकाकी जीवन से। साथ ही ले चलेंगे आपको इकाकुला के खूबसूरत समुद्र तट पर। साथ ही होगी भितरकनिका से जुड़ी यात्रा संबंधित कुछ महत्त्वपूर्ण जानकारी।

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डाँगमाल के मैनग्रोव जंगलों के विचरण में बीती वो सुबह…..

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मैनग्रोव के जंगल दलदली और नमकीन पानी वाले दुष्कर इलाके में अपने आपको किस तरह पोषित पल्लवित करते हैं ये तथ्य भी बेहद दिलचस्प है। अपना भोजन बनाने के लिए मैनग्रोव को भी फ्री आक्सीजन एवम् खनिज लवणों की आवश्यकता होती है। चूंकि ये पानी में हमेशा डूबी दलदली जमीन में पलते हैं इसलिए इन्हें भूमि से ना तो आक्सीजन मिल पाती है और ना ही खनिज लवण। पर प्रकृति की लीला देखिए जो जड़े अन्य पौधों में जमीन की गहराइयों में भोजन बनाने के लिए फैल जाती हैं वही मैनग्रोव में ऊपर की ओर बरछी के आकार में बढ़ती हैं। इनकी ऊंचाई 30 सेमी से लेकर 3 मीटर तक हो सकती है। जड़ की बाहरी सतह में अनेक छिद्र बने होते हैं जो हवा से आक्सीजन लेते हैं और नमकीन जल में घुले सोडियम लवणों से मैनग्रोव को छुटकारा दिलाते हैं। मैनग्रोव की पत्तियों की संरचना भी ऍसी होती है जो सोडियम लवण रहित जल को जल्द ही वाष्पीकृत नहीं होने देती।

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नज़ारे भितरकनिका के : मैनग्रोव के जंगल, नौका विहार और पक्षियों की दुनिया !

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पेड़ की हर ऊँची शाख पर पक्षी यूँ बैठे थे मानों बाहरी आंगुतकों से जंगलवासियों को सचेत कर रहे हों। जंगलों के बीच ऐसी यात्रा करने में आपके पास अगर अच्छी जूम लेंस का कैमरा और उससे बेहतर SLR ना हो तो पक्षियों को पहचानने और कैमरे में क़ैद करना मुश्किल होता है क्यूँकि पास जाते वक़्त हलका सा खटका हुआ तो चिड़िया फुर्र।

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आइए चलें भुवनेश्वर से भितरकनिका के सफ़र पर…

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हमारा अगला पड़ाव राजनगर (Rajnagar) था जो कि भितरकनिका जाने का प्रवेशद्वार है। केन्द्रपाड़ा और राजनगर के बीच की दूरी करीब 70 किमी है। इन दोनों के बीच पतामुन्दई (Patamundai) का छोटा सा कस्बा आता है। ये पूरी सड़क एक लेन वाली है और फिर त्योहार की गहमागहमी अलग से थी इसलिए चाहकर भी अपने गंतव्य तक जल्दी नहीं पहुँचा जा सकता था। हर पाँच छः गाँवों को पार करते ही एक मेला नज़र आ जाता था। गाँव के मेलों की रौनक कुछ और ही होती है… थोड़ी सी जगह में तरह तरह की वस्तुएँ बेचते फुटकर विक्रेता और रंग बिरंगी पोशाकों में उमड़ा जन समुदाय जो शायद एक साल से इन मेलों की प्रतीक्षा में हो।

राँची और कटक की दुर्गापूजा से अलग जगह जगह दुर्गा के आलावा शिव पार्वती, लक्ष्मी और हनुमान जी की भी मूर्तियाँ मंडप में सजी दिखाई पड़ीं। बाद में पता चला कि इस इलाके का ये सबसे बड़ा त्योहार है और इसे यहाँ गजलक्ष्मी पूजा (Gajlakshmi Puja) कहा जाता है।

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सिक्किम त्रासदी : कुछ फुटकर यादें…

सिक्किम त्रासदी : कुछ फुटकर यादें…

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यही वज़ह है कि जब कोई प्राकृतिक आपदा उस प्यारी सी जगह को एक झटके में झकझोर देती है, मन बेहद उद्विग्न हो उठता है। हमारे अडमान जाने के ठीक दो महिने बाद आई सुनामी एक ऐसा ही पीड़ादायक अनुभव था। सिक्किम में आए इस भूकंप ने एक बार फिर हृदय की वही दशा कर दी है। हमारा समूह जिस रास्ते से गंगटोक फेनसाँग, मंगन, चूँगथाँग, लाचुंग और लाचेन तक गया था आज वही रास्ता भूकंप के बाद हुए भू स्खलन से बुरी तरह लहुलुहान

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सफ़र सिक्किम का भाग 8 : फूलों की तरह लब खोल कभी, खुशबू की जुबाँ में बोल कभी…

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दुनिया जहान की छोड़िए हम तो बात सिक्किम की कर रहे थे। क्या आपके लिए ये आश्चर्य की बात नहीं है कि सिक्किम जैसे अत्यंत छोटे से प्रदेश में भी इस फूल की 600 प्रजातियाँ हैं। दरअसल सिक्किम का कुछ हिस्सा समुद्र तल के करीब है तो इसके कुछ हिस्से कुछ 17000 फीट से भी ऊँचे हैं। इसलिए इस पूरे इलाके की आबो हवा इतने तरह के आर्किड्स की रचना करने में सहायक होती है।

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सफर सिक्किम का भाग 7 : बर्फ की वादियाँ , छान्गू झील और कथा बाबा हरभजन सिंह की !

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पिछली पोस्ट में आपने इस श्रृंखला में मेरे साथ यूमथांग घाटी की सैर की थी। शाम को हम गंगतोक लौट चुके थे। रात भर…

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In the Valley of Flower

सफ़र सिक्किम का भाग 6 : फूलों की घाटी यूमथांग !

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चूंकि ये घाटी 12000 फीट की ऊँचाई पर स्थित है यहाँ गुरूडांगमार की तरह हरियाली की कोई कमी नहीं थी। कमी थी तो बस आसमान की उस नीली छत की जो सुबह में दिखने के बाद यहाँ पहुँचते ही गायब हो गई थी। पहाड़ों में बस यही दिक्कत है। अगर नीली छतरी का साथ ना हो तो प्रकृति का सारा नैसर्गिक सौंदर्य फीका पड़ जाता है।

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सफ़र सिक्किम का भाग 5 : चोपटा घाटी और लाचुंग की वो निराली सुबह..

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पहाड़ के ठीक सामने का हिस्सा जिधर हमारा होटल था अभी भी अंधकार में डूबा था। दूर दूसरे शिखर के पास एक छोटा सा पेड़ किरणों की प्रतीक्षा में अपनी बाहें फैलाये खड़ा था। उधर बादलों की चादर को खिसकाकर सूर्य किरणें अपना मार्ग प्रशस्त कर रहीं थीं।

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सफ़र सिक्किम का भाग 4 : वो तेज़ हवा, बेहोशी और गुरुडांगमार झील…

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पर ये क्या बाहर प्रकृति का एक सेनापति तांडव मचा रहा था, सबके कदम बाहर पड़ते ही लड़खड़ा गये, बच्चे रोने लगे, कैमरे को गले में लटकाकर मैं दस्ताने और मफलर लाने दौड़ा । जी हाँ, ये कहर वो मदमस्त हवा बरसा रही थी जिसकी तीव्रता को 16000 फीट की ठंड, पैनी धार प्रदान कर रही थी । हवा का ये घमंड जायज भी था। दूर दूर तक उस पठारी समतल मैदान पर उसे चुनौती देने वाला कोई नहीं था, फिर वो अपने इस खुले साम्राज्य में भला क्यूँ ना इतराये । खैर जल्दी-जल्दी हम सब ने कुछ तसवीरें खिंचवायीं ।

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