Punjab

Punjab literally means the land of five rivers. This state is a fertile land stretching from the foot hills of the Himalayas to a semi arid region to its south-east. It is mostly an agricultural land and its people are known for their boisterous celebrations, colourful festivals, vibrant costumes, vigorous dances and never say die spirit. The Union Territory of Chandigarh serves as the capital. Besides Chandigarh, Amritsar and Ludhiana are cities with airports while the former two cities have railway services connected to major cities in the country. Driving into Punjab is the perhaps the best option as the national and state highways are well maintained and enroute are plenty of service stations, dhabas and highway motels or restaurants.
The famous Golden Temple Gurudwara is the main pilgrimage site for the Sikh community. Situated in Amritsar, it is thronged by thousands of devotees every day. The well planned modern city of Chandigarh has a unique rock garden, Rose garden, Sukhna Lake and many more. Places of historical interest include the fort of Razia Sultan in Bhatinda, the temples, gurudwaras and mosques at Faridkot, palaces in Patiala, Jallianwala Bagh at Amritsar, the samadhi of Shahid Bhagat Singh, Rajguru and Sukhdev in Ferozepur and Flag lowering ceremony at Wagah Border. Punjab experiences hot and dry summers and a cold sometimes freezing winter. The best time to visit the state would be during October to March.

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स्वर्ण मंदिर – लंगर और रामबाग पैलेस

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लंगर से बाहर निकल कर पुनः वही प्रश्नचिह्न सम्मुख आ खड़ा हुआ – “अब क्या?“ अचानक मुझे याद आया कि एक मित्र ने रामबाग समर पैलेस यानि, महाराजा रणजीत सिंह के महल का ज़िक्र किया था और कहा था कि मैं उसे अवश्य देख कर आऊं। रिक्शे वालों से पूछना शुरु किया तो सबने 30 रुपये बताये। मुझे लगा कि अमृतसर के रिक्शे वालों को तीस का आंकड़ा कुछ ज्यादा ही पसन्द है। रामबाग पैलेस चलने के लिये एक रिक्शा कर लिया। स्वर्ण मंदिर में हर किसी को कार सेवा में तन्मयता से लगे हुए देखते देखते, मुझे लग रहा था कि यह रिक्शावाला भी तो इस विशाल समाज के लिये एक अत्यन्त उपयोगी कार सेवा ही कर रहा है। अतः उसके प्रति सम्मान की भावना रखते हुए मैं रिक्शे में ऐसे सिमट कर बैठा जैसे मेरे सिमट कर बैठने मात्र से मेरा 82 किलो वज़न घट कर 60 किलो रह जायेगा। मेरा वज़न घटे या न घटे ये तो वाहेगुरु जी की इच्छा पर निर्भर है, पर मुझे उम्मीद है कि उन्होंने मेरी भावनाओं को तो अवश्य ही समझ लिया होगा।

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अमृतसर में अटारी – वाघा बार्डर

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हम जब शाम को पांच बजे स्वर्ण जयंती द्वार पर पहुंचे तो सारी बैंच पूरी तरह से ठसाठस भरी हुई थीं।  जब मैने द्वार पर खड़े बी.एस.एफ. के अधिकारी को प्रेस पास दिखाया और कहा कि मुझे आगे जाने दें तो उन्होंने वी.आई.पी. लाउंज के लिये प्रवेश द्वार 3 की ओर इंगित किया और कहा कि आप वहां कोशिश करें।  मैं उधर भागा पर वहां कोई सुनवाई नहीं हुई !  वहां विदेशियों और कुछ वी.आई.पी. महिलाओं, युवतियों और बच्चों को जाने दिया जा रहा था।  अतः फिर वापिस भागा और स्वर्ण जयंती द्वार की सीढ़ियां चढ़ कर वहां पहुंचा जहां पहले ही मानों पूरा हिन्दुस्तान आकर सीटों पर जमा हुआ था।  अपने कैमरे के लिये मुझे जो सर्वश्रेष्ठ स्थान उपलब्ध हो सका वहां जाकर मैं खड़ा होगया।  बड़ा ही मजेदार दृश्य सामने था।  स्वर्ण जयंती द्वार से लेकर पाकिस्तान वाले द्वार तक तिरंगा झंडा हाथ में लेकर भागते हुए जाने और वापिस आने के लिये महिलाओं की लाइन लगी हुई थी।  उनको बी.एस.एफ. के इस अभियान के संयोजक एक अधिकारी तिरंगे झंडे देते थे और भागने का इशारा करते थे।  युवा, प्रौढ़ और यहां तक कि वृद्ध महिलाएं भी बड़े उत्साह से तिरंगा हाथ में लेकर पाकिस्तान की सीमा तक भागती हुई जाती थीं और फिर वापस आती थीं।  हज़ारों की संख्या में दर्शक गण भारत माता की जय, वंदे मातरम्‌,  हर-हर, बम-बम नारे लगा कर उनका उत्साह-वर्धन कर रहे थे।  दर्शकों के उत्साह का आलम कुछ ऐसा था मानों वह वृद्ध महिला नहीं बल्कि पाकिस्तान के बैट्समैन को आउट करने के लिये भारतीय क्रिकेट टीम का बॉलर दौड़ रहा हो। पन्द्रह मिनट तक यह कार्यक्रम चलता रहा फिर महिलाएं, युवतियां और स्कूली बच्चे डांस करने के लिये अपनी अपनी सीट छोड़ कर सड़क पर उतर आये।  पन्द्रह मिनट तक धुआंधार कमर मटकाई गईं और जनता गला फाड़ – फाड़ कर अपने उत्साह का प्रदर्शन करती रही।  सबसे मजेदार बात ये थी कि पाकिस्तान वाले गेट के उस पार भी एक स्टेडियम नज़र आ रहा था जहां तीस-चालीस दर्शक बैठे हुए दिखाई दे रहे थे।  इस ओर हज़ारों दर्शकों का अदम्य उत्साह, नारेबाजी और कान के पर्दे फाड़ देने लायक शोर और उधर केवल मात्र तीस – चालीस दर्शक! अब अगर ऐसे में पाकिस्तानी हुक्मरान डिप्रेशन का शिकार न हों तो क्या हों? मुझे तो लग रहा था कि पाकिस्तान वाली साइड में बैठे दर्शकों का भी मन कर रहा होगा कि हिन्दुस्तान वाला कार्यक्रम देखें पर अनुमति न होने के कारण मन मसोस कर रह जाते होंगे।

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हरमंदिर साहब, अकाल तख्त और जलियांवाला बाग दर्शन

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घंटाघर के प्रवेश द्वार से पुनः अंदर कदम रखा तो सिक्ख संग्रहालय नज़र आया।  सोचा कि चलो, इसे भी देख लिया जाये।  हॉल में प्रवेश करते ही दाईं ओर ऊपर जाने के लिये सीढ़ियां थीं ।  ऊपर पहुंचा तो लिखा मिला, “फोटो खींचना मना है जी।“ पहले तो बड़े ध्यान से एक – एक चित्र को देखना और उसके नीचे दिये गये विवरण को पढ़ना शुरु किया पर फिर लगा कि इतने शहीदों का वर्णन पढ़ते-पढ़ते मैं भी जल्दी ही शहीदों की लिस्ट में अपना नाम लिखवा लूंगा।  हे भगवान !  इतने शहीद यहां और इनके अलावा उन्नीस सौ के करीब जलियांवाला बाग में!  अब मुझे इस बात का कोई आश्चर्य नहीं हो रहा था कि अमृतसर में हर सड़क का नाम किसी न किसी शहीद के नाम पर ही क्यों है?

शहीदों के चित्र देखते देखते अंतिम कक्ष में पहुंचा तो देखा कि नवीनतम शहीदों की पंक्ति में बेअंत सिंह और सतवंत सिंह के भी बड़े – बड़े तैल चित्र लगे हुए हैं। पहचाने आप?  बेअंत सिंह और सतवंत सिंह वे दोनों अंगरक्षक थे जिन्होंने अंगरक्षक के रूप में प्रधानमंत्री की सुरक्षा की जिम्मेदारी अपने सिर पर लेकर भी निहत्थी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या की थी।  मन में सहसा विद्रोह की भावना ने सर उठाया।  फिर देखा कि एक तैल चित्र और लगा हुआ है जिसमें गोलों – बारूद की मार से क्षत-विक्षत लगभग खंडहर अवस्था में अकाल तख्त का चित्र था।  अकाल तख्त की यह दर्दनाक स्थिति आपरेशन ब्लू स्टार के समय आतंकवादियों को अकाल तख्त से बाहर निकलने के लिये विवश करने के दौरान हुई थी।  एक आम भारतीय की तरह मेरा भी मानना है कि अकाल तख्त की ऐसी कष्टकर, वेदनाजनक स्थिति के लिये यदि भारतीय सेना को दोषी माना जाता है तो वे लोग भी कम से कम उतने ही दोषी अवश्य हैं जिन्होंने भिंडरवाले को अकाल तख्त में छिप कर बैठने और वहां से भारतीय सेना पर वार करने की अनुमति प्रदान की थी।  अकाल तख्त की पवित्रता तो उसी क्षण भंग हो गई थी जब उसमें हथियार, गोले और बारूद लेकर भिंडरवाले और उसके अन्य साथियों ने प्रवेश किया और इस बेपनाह खूबसूरत और पवित्र भवन को शिखंडी की तरह इस्तेमाल किया।  वैसे जो लोग राजनीति की गहराइयों से परिचित हैं उनका कहना है कि भिंडरवाले भी तो कांग्रेस का ही तैयार किया हुआ भस्मासुर था जिसे कांग्रेस ने अकाली दल की काट करने के लिये संत के रूप में सजाया था।  अस्तु !

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अमृतसर यात्रा – स्वर्ण मंदिर दर्शन

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तो साहेबान, अपुन अपने दोनों बैग पैक करके (एक में कपड़े, दूसरे में लैपटॉप व कैमरा) नियत तिथि को नियत समय पर नियत रेलगाड़ी पकड़ने की तमन्ना दिल में लिये स्टेशन जा पहुंचे।  ये नियत तिथि, नियत समय, नियत रेलगाड़ी सुनकर आपको लग रहा होगा कि मैं जरूर कोई अज्ञानी पंडित हूं जो यजमान को संकल्प कराते समय “जंबू द्वीपे, भरत खंडे, वैवस्वत मन्वन्तरे, आर्यावर्त देशे” के बाद अमुक घड़ी, अमुक पल, अमुक नगर बोल देता है।  हमारे वातानुकूलित कुर्सीयान में, जो कि इंजन के दो डिब्बों के ही बाद में था, पहुंचने के लिये हमें बहुत तेज़ भाग दौड़ करनी पड़ी क्योंकि किसी “समझदार” कुली ने हमें बताया था कि C1 आखिर में आता है अतः हम बिल्कुल प्लेटफॉर्म के अन्त में खड़े हो गये थे।  जब ट्रेन आई और C1 कोच हमारे सामने से सरपट निकल गया तो हमने उड़न सिक्ख मिल्खासिंह की इस्टाइल में सामान सहित ट्रेन के साथ-साथ दौड़ लगाई।  परन्तु अपने कोच तक पहुंचते पहुंचते हमारी सांस धौंकनी से भी तीव्र गति से चल रही थी। हांफते हांफते अपनी सीट पर पहुंचे तो देखा कि हमारी सीट पर एक युवती पहले से ही विराजमान है।  तेजी से धकधका रहे अपने दिल पर हाथ रख कर, धौंकनी को नियंत्रण में करते हुए उनसे पूछा कि वह – मेरी – सी – ट पर – क्या – कररर – रररही – हैं !!!  उनको शायद लगा कि मैं इतनी मामूली सी बात पर अपनी सांस पर नियंत्रण खोने जा रहा हूं अतः बोलीं, मुझे अपने लैपटॉप पर काम करना था सो मैने विंडो वाली सीट ले ली है, ये बगल की सीट मेरी ही है, आप इस पर बैठ जाइये, प्लीज़।

मैने बैग और सूटकेस ऊपर रैक में रखे और धम्म से अपनी पुश बैक पर बैठ गया और कपालभाती करने लगा। दो-चार मिनट में श्वास-प्रश्वास सामान्य हुआ और गाड़ी भी अपने गंतव्य की ओर चल दी।  मिनरल वाटर वाला आया, एक बोतल ली, खोली और डेली ड्रिंकर वाले अंदाज़ में मुंह से लगा कर आधी खाली कर दी!  बीच में महिला की ओर गर्दन एक आध बार घुमाई तो वही सिंथेटिक इस्माइल!  मैने अपना बैग खोल कर उसमें से अंग्रेज़ी की एक किताब निकाल ली ! (बैग में यूं तो हिन्दी की भी किताब थी पर बगल में पढ़ी लिखी युवती बैठी हो तो अंग्रेज़ी की किताब ज्यादा उपयुक्त प्रतीत होती है।) किताब का टाइटिल “Same Soul Many Bodies” देख कर वह बोली,

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A visit to Jallianwala Bagh, Golden Temple & Wagha Border

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Today India is a vibrant Nation. However, we tend to take many things for granted. In our normal day to day, routine life we hardly remember them who sacrificed their life to free our motherland. On our 66th years of Independence, let’s make a resolution to make India beautiful and fight against terrorism, anti-social elements, corruptions…each one of us can make a difference.

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Trip to Darbar Sahib-Where self meets the soul…-I

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There is this railway crossing on the Dinanagar-Gurdaspur stretch of NH-15 which lies miraculously at the centre of a leftward curve. Most of the drivers usually get caught unaware at this crossing. I was familiar with the notoriety of this curve and hence was attentive to its arrival. Just after crossing over the railway line, we stopped near a fruit-seller to fill our empty stomachs and sat on the nearby tube-well to chat. Our jokes and pranks didn’t seem to end anytime soon but we realised that we should pull ahead. Back to the car, we hit the road again and entered Gurdaspur city after 10 kms. There is a bypass which you can take to avoid the traffic and congestion at the Gurdaspur town but since it was a national holiday (2nd Oct), the traffic was sparse and we drove through the city. Looking around for some nice place to have a proper breakfast, all four of us had our necks craned out of the window. However, any place proposed by one was put down by the rest…a big disadvantage of traveling in an all-guys-group i think. Suddenly, I saw a turbanated policeman signalling us to stop. I just wanted to zip ahead as we were on the right side of law in every respect (thats what I believed till then) but Jaspreet insisted that we should stop as the Punjab Police cops chase such cars which dont stop and then harrass you even more…the job they are best at. Stopping a few metres ahead, I asked everyone to relax and not to get out of the car…a mistake that cost us 200 bucks!!! The Sardarji policeman came upto our car…positioned his elbows on the window and asked where we were from. We replied in Punjabi that we are from Jammu and heading towards The Harmandir Sahib. The Sardarji smiled at us and asked us why we had not fastened our seat belts…..HOLY SHIT… We realised that after we started driving from our last stop where we had fruits, we had just forgot to fasten our seat-belts.

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श्री जटेश्वर महादेव मंदिर भाग २

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नई दिल्ली से ट्रेन ठीक टाइम पर चली और मैं सकुशल पंजाब पहुँच जाता हूँ . मित्र सम्बन्धी मेल मिलाप करने में दो दिन और निकल जाते हैं . आज चंडीगढ़ से शिव भोले की यात्रा शुरू करते हैं. जैसा आपने श्रीखण्ड महादेव यात्रा में संदीप जी के साथ शिव भोले के विशाल शिवलिंग के दर्शन किये . चंडीगढ़ से सीधे हाथ शिमला जाने पर श्रीखण्ड महादेव जी आते हैं पर उलटे हाथ जाने पर रोपड़ नाम का स्थान आता है. जहाँ से श्री जटेश्वर महादेव जी को बस मिलती है. अगर आप अपने वाहन पर हैं तो भी बहां रोपड़ से जाया जा सकता है.

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श्री जटेश्वरमहादेव मंदिर भाग १

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पायलट द्वारा घोषणा थी ” बाहर का तापमान 30 डिग्री सेल्सियस है, प्लीज़ अपने सेल फ़ोन बंद कर दें ……..” यह केथी पेसेफिक की हांगकांग से दिल्ली वाया बैंकॉक की उड़ान थी. इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे दिल्ली पर विमान धीरे धीरे नीचे आ गया था और इसे जमीन को छूने के बाद तेजी से यह चल रहा था . धीरे धीरे गति कम हु़ई और लोगों ने अपने सेल फोन शुरू कर दिए और सब व्यस्त थे. यह विमान 300 लोगों को दिल्ली ले कर आया था. कुछ मिनटों के बाद दरवाजे खोल दिए और लोग बाहर जाने शुरू हो गए .मुझे कोई जल्दी नहीं थी और मैं थोड़ा इंतजार के बाद अपना बैग ले कर बाहर की और चल पड़ा .

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घुमक्कड़ी – कुछ खट्टी…. कुछ मीठी (2)

घुमक्कड़ी – कुछ खट्टी…. कुछ मीठी (2)

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क्या है घुमक्कड़ी…
पढ़ो तो इक किताब है घुमक्कड़ी
देखो गर तो इक ख्वाब है घुमक्कड़ी
हंसो तो आसान बन जाती घुमक्कड़ी
सुनो तो ज्ञान बन जाती घुमक्कड़ी

Dear friends, in my previous post of the series, you saw how important the reminiscences are in our travelling. Many a times, we forget other details of our travellings and remember it by the sweet & sour memories of that travelling. Travelling is not simply going to some places or reaching the heights of Himalayas… when we rewind the films of our travels and see it frame by frame … we find that it has changed our life altogether. It has made us more confident, given us more tolerance, given us more strength and sometimes even changed our perspective towards life and its aim.

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Balle Balle To Amritsar!

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We got more proof of people’s devotion when we saw children happily mopping the marble steps as people left or entered the hall. Then there were volunteers who were continuously cleaning candle wax from the marble pavement, even as new visitors kept lighting more candles.

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5. Naggar (HP) and road back home via Chandigarh-Rothak-Ajmer-Ahmedabad-Mumbai

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Had it not been for the book, Outlook Traveller Gateways (on HP), Naggar would not have happened. Books are still much much superior as compared to host of blogs and websites. Online forums, at best, are good for an “occasional tip” and that too happens cause people speak about the content which is quite recent. Books need to re-published. The Outlook Traveller Gateways (on HP) which I referred to was published in 2008 and two years down the line nothing much had changed….

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