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Some Days in Gujarat – Sabarmati Ashram (The modern pilgrimage)

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Gujarat prem of Gandhi Ji is in full flow and is displayed through various facets clearly. We might have heard about the love and attachment of Gandhi ji to Gujarati language but the real extent of it one understands when one sees almost all the documents pertaining to Ashram and his personal correspondence to the men of Gujarat written in Gujarati.

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Shillong, Meghalaya – the abode in the clouds

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We were told by the locals that surprisingly in Cherrapunji it rains mostly at night. Thus, the day-to-day activity is not really disrupted by the rain. 
However, the irony is that despite perennial rainfall, Cherrapunji faces an acute shortage of drinking water, and the inhabitants often have to trek for miles to obtain potable water.

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Some days in Gujarat – Finally We Reached (Part 2)

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Anyway we crawled through this part dreaming about the great highway ahead as I had heard of. And our dream came true sooner and an awesome highway welcomed us and our Maruti was behaving like a luxury car on this highway, so good is the highway, a zigzag movement notwithstanding. Now all of us were feeling hungary and in search of a good Dhaba was our priority.

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Ashtur Dreams – The Technicolour Royal Necropolis of Bahmani Sultanate

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Just looking at the long line of tombs you know the big daddy is the Ahmad Shah I Wali Tomb. The tomb is the second from the east. Ahmad Shah shifted the capital to Bidar in 1430 and rebuilt the old fort. Riches from different conquests brought opulence to Bidar which turned the city into a centre of culture and progress. He was religiously inclined and invited saints to Bidar. He was devoted to Hadrat Banda Nawaz of Gulbarga and later to Shah Nimat Ullah of Kirman, reportedly a Sufi dervish. He also respected the doctrine of Lingayats, a religious order of Deccan established by the philosopher, statesman and social reformer Basavanna (1134-1196). Ahmad Shah was like an earlier Akbar.

The Ahmad Shah I Wali Tomb is majestic and looks solid. The walls are about twelve feet thick supporting a huge orb dome on the top. There are three doors built into huge recessed arches. The walls carry three tiers of arches of varying dimensions. The tomb looks similar to its contemporary tombs in Delhi’s Lodhi Gardens.

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आगरा: ताज की तरफ वाया सिकंदरा (अकबर का मकबरा)

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मुगलों के बनवाए कुछ मकबरे तो वाकई इतने बुलंद और आलीशान हैं कि आपको उनकी मौत से भी रश्क हो जाता है | इस काल की जितनी भी मुख्य इमारतें हैं, उनमे कुछ ना कुछ ऐसा जरूर है, जिस से आप उनकी भवन-निर्माण कला के मुरीद हो जाएँ, इस मामले में ये मकबरा भी आपको एक ऐसा नायाब पल देता है, जब आप, (चित्र में लाल घेरे वाले) पत्थर पर खड़े होकर जो भी बोलते हैं, वो इस के हर हिस्से में सुनाई देता है यानी कि आज के दौर का Public Address System. और आप हैरान तो तब रह जाते हैं जब इस स्पॉट से दो फुट दायें–बाएं या आगे-पीछे होने पर. आपकी आवाज केवल आप तक ही रह जाती है |

सदियों से, जो मौत इतनी डरावनी और भयावह समझी जाती रही है कि कोई अपनी मरजी से उसके पास तक नही जाना चाहता, उसे याद तक नही करना चाहता, ऐसे में उसकी यादगार को कायम रखने के लिए इतने भव्य और आलीशान मकबरों का निर्माण, वाकई कमाल की बात है |

मिर्ज़ा ग़ालिब का एक शेर इस मौके पर बेसाख्ता ही याद आकर लबों पर एक हल्की सी मुस्कान बिखेर देता है –

“ मत पूछ, के क्या हाल है मेरा तेरे पीछे?, सोच के क्या रंग तेरा, मेरे आगे ! “

मिस्त्र के पिरामिड और ये मकबरे, ऐसा नही, कि मौत को कोई चुनोती देते हों या मौत पर इंसान की जीत का परचम फहराते हों, पर हाँ इतना जरूर है कि इन्हें देखने के बाद मौत इतनी भी बदसूरत नजर नही आती! बहरहाल सूरज अपना जलवा दिखाने को बेकरार हो रहा है, और घड़ी की सुईयां भी सरपट भाग रही हैं, ऐसे में हम फैसला करते हैं कि हमें अपनी ऊर्जा ताजमहल के लिए भी बचा कर रखनी है | अत:, हम जल्दी से अकबर के मकबरे को अपनी यादों में समेट, मुगलिया सल्तनत के एक बेताज बादशाह को उसकी फराखदिली और पंथ-निरपेक्षता के लिए उसे अपना आखिरी सलाम देते हुए, एक और मकबरे, ताजमहल को देखने आगरा की और कूच कर देते हैं…..

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Trip to Bhutan – Thimpu, Paro and Phuntsoling

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We met our guide who took us to our destination, Galling Resort, about 3 kms away from town along a graveled road. Located on the banks of Paro chu; the property was tastefully constructed and painted in unique mud color ethnic Bhutanese style. The view from the balcony was breathtaking with Paro Chu rumbling right in front across the road, part of Paro beyond and finally the valley rising to meet the misty mountains that made the distant horizon. Anyone with an eye for the nature or a plain nature lover is bound to be enchanted by the natural beauty, landscape that would make not spending couple of days almost impossible. We did just that. The resort was warm, comfortable with a cozy lounge, wood paneled bedroom and comfortable attached bath. Our rooms had the same view as balcony and decided to keep the curtains drawn and windows opened so as to be part of the beautiful view.

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A Foodies Journey through Bangladesh

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Now that we have gorged on heavenly Mughlai delicacies, lets  salivate for earthy Bengal food- “Bangla Khabar”, as the locals call it. Bengalis are famous for their preparation of fish, fish in any form, fried, baked or steamed. But that’s only one side of the coin, Bengalis can cook a wide variety of  delectable greens as well. So lets turn our steps towards all that “Sonar Bangla” has to offer. We will go to a small eatery in Old Dhaka called “Nirob” or “Silence”. Located at Nizamuddin Road, it is very popular with the local people. The name of this place probably comes from the fact that once the food is served , its variety and taste makes the chattiest guest “Silent”. The USP of this hotel is that it offers around 19  different eatables  in small plates to the guest.

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सुनहरे अतीत की परछाईओं का एक गाँव: गोकुल

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और फिर आगे-आगे वो पंडित जी और उनके पीछे-पीछे हम सात लोगों का कारवाँ, गोकुल की गलियों में निकल पड़ा उस जगह को देखने के लिए जहाँ यमुना में आई बाद के बीच, नन्द बाबा वासुदेव और देवकी के नवजात शिशु को एक टोकरी में रख कर लाये थे और यहीं उसका लालन-पोषण हुआ| कौन जानता था उस वक्त कि ये बच्चा एक पूरे युग का भाग्य-विधाता होगा और कभी भविष्य में इन गलीयों को देखने के लिए दूर-दूर से लोग चल कर आयेंगे| गोकुल की गलियों में पाँव रखते ही आप इस आधुनिक दुनिया से इतर, बिलकुल ही पारम्परिक ग्रामीण दुनिया से रूबरू होते है, जिसके लिए शायद समय का चक्र रुका हुआ है या यूँ कहें जिन्होंने स्वयम ही अपने को उस काल से जोड़ कर रखा हुआ है, जब कृष्ण अपने बाल-गोपालों और गोपियों के साथ इन गलियों में खेला करते होंगे| यदि गलियों में बिछी तारकोल की काली पट्टी को छोड़ दें तो आज भी गोकुल का पूरा गाँव उसी दौर का नजर आता है| सड़क से 3 से 4 फुट ऊंचे मकान पर अर्थशास्त्र को ध्यान में रखते हुए, लगभग हर घर में एक छोटी सी दुकान, पांच गुणा पांच के आकार की जिनमे बहुतायत है हलवाइयों की! पर वो केवल लस्सी, पेड़े जैसी दो-तीन वस्तुएं ही रखते हैं | उत्तर प्रदेश में बिजली की स्थिति तो हम सब जानते ही हैं, सो हर दुकान के मालिक के हाथ में एक हाथ से ही झुलाने वाला पंखा! बाहर से आये हुए लोगों को देखते ही हर हलवाई अपनी गडवी में मथानी घुमाने लगता है और आपको यहाँ-वहाँ से आवाजें अपने कानों में पडती सुनाई देती है, “लस्सी- गोकुल की लस्सी …”! और फिर आपके जेहन में सूरदास की ये पंक्तियाँ कौदने लगती हैं –

“मुख दधि लेप किए
सोभित कर नवनीत लिए।
घुटुरुनि चलत रेनु तन मंडित मुख दधि लेप किए॥“
आखिर दूध, दही और मक्खन के बिना गोकुल की कल्पना कैसे हो सकती है !

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