Religious

गढ़वाल घुमक्कडी: बद्रीनाथ – माणा – वसुधारा – जोशिमठ

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चलो अब चलते हैं मुचुकूंद गुफा, ‘अरे नही यार ये तो बहुत उपर लगता है’ दीपक बोला. ‘अरे नही भाई, पास ही तो है’, मैं बोला. ‘3 किमी तो दूर है भाई, फिर हम लोग वसुधारा नही जा पाएँगे, देख लो’, पुनीत बोला. बात सबको ठीक लगी, हम लोग वसुधारा को नही छोड़ना चाहते थे, गुफ़ाएँ तो सबने देख ही ली थी अब वसुधारा के दर्शन करने को सब बड़े बेकरार थे. इसलिए बिना समय गवाए हम लोग नीचे भीम पुल की ओर बढ़ चले. भीम पुल के पास आकर सबसे पहले एक बड़ी भ्रांति टूटी जो थी ‘सरस्वती के लुप्त हो जाने की’, हमने तो सरस्वती दर्शन से पहले केवल यही सुन रखा था की यह नदी अब विलुप्त हो चुकी है और शायद भूमिगत होकर बहती है.

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Makkah – Performing the Hajj pilgrimage

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A trip to Makkah normally takes about three hours, give or take. The actual distance from my village to it is about 290 km. This night, though, we took over ten hours to reach Makkah, and over 16 hours to finally reach the hotel rooms where we would all be staying. I would tell you all the sordid details, but suffice it to know that our agent had arranged the whole trip ILLEGALLY … that is, there was no payment made to the Government of Saudi Arabia for performance of a legal journey. We were performing Hajj at a very low cost … the cost would include the transportation to Makkah and the return from it, and the 11-persons-per-room stay in a hotel in Makkah. Food, internal travelling, comforts etc. were EXCLUDED. Of course, the organiser’s huge profit margin was INCLUDED in the 1800 Saudi Riyals per person package!

As we were not official pilgrims, the police stopped our bus at many places. At one spot, we were immediately directed to the opposite side and asked to return to Ta’if, the city from which we had just left; we tried to re-negotiate this barricade, and failed again. Then, in a burst of creativity, one of my co-passengers simply shifted one of the barricades aside and we drove past it, out of sight of the police! Ahead, as night deepened, most of us went off to sleep. The bus plodded on, inch by inch, as it neared Makkah. At the break of dawn, the driver woke us all and asked us to get off the bus, while he tried to get the bus past yet another police barricade. We got off, and walked past the lingering police with hundreds of other pilgrims in a similar predicament. Finding some flat, even ground on the side of the road, we all plopped there to await the bus that would come to pick us up. It was another two hours before it did. In the meantime, night turned into day and the sun climbed up, changing the weather from a balmy, warm one into an uncomfortable, hot one.

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A Road trip to Gangotri Dham from Harsil

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Present temple of Gangotri was built in 18th century, by Gorkha General Amar Singh Thapa, is located near the spot where the goddess Ganga is said to have first descended on earth from heaven, as an answer to the prayers of King Bhagriath! Gongotri is the highest and most important temple of Goddess Ganga. The origin of Bhagirathi river, Gaumukh glacier is 18 kms from Gangotri and there person can reach only by foot. One can go by horse riding but up to certain point and from there by foot they have to go. Gangotri remains opened from May and get closed on the day of Diwali festival. During winter, Gangotri temple remains closed due to heavy snowfall.

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हरिद्वार और देहरादून का तूफानी दौरा – २

हरिद्वार और देहरादून का तूफानी दौरा – २

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मेरा विचार था कि बुद्धा टैंपिल मेरे 1980 में देहरादून छोड़ देने के बाद अस्तित्व में आया है किन्तु जब मैने भाई से पूछा तो उसने बताया कि पहले ये इतना लोकप्रिय नहीं हुआ करता था अतः हम लोग पहले यहां आया नहीं करते थे। पिछले कुछ वर्षों से, जब से ISBT यहां पास में बनी है और इस क्षेत्र में जनसंख्या भी बढ़ गई और बाज़ार भी बन गये तो लोगों को पता चला कि ऐसा कोई सुन्दर सा मंदिर भी यहां आसपास में है। क्लेमेंटाउन में स्थित इस बौद्ध मठ के बारे बाद में मैने जानने का प्रयास किया तो इसके महत्व की अनुभूति हुई। यह मठ तिब्बत के विश्वविख्यात बौद्ध मठ की प्रतिकृति है और इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसके मुख्य भवन की दीवारों पर मौजूद भित्तिचित्र हैं, कलाकृतियां हैं जिनके माध्यम से भगवान बुद्ध के जीवन की अनेकानेक घटनाओं को अंकित किया गया है। (इनका चित्र लेना मना है)। इसका निर्माण वर्ष 1965 में हुआ बताया जाता है। लगभग पचास कलाकार तीन वर्ष तक इन दीवारों पर स्वर्णिम रंग के पेंट से कलाकृतियां बनाते रहे हैं तब जाकर यह कार्य पूरा हुआ। बहुत दूर से ही इस मंदिर का स्तूप दिखाई देता है जो 220 फीट ऊंचा है। यह जापान की वास्तुकला शैली पर आधारित है। इस मुख्य भवन में पांच मंजिलें हैं और हर मंजिल पर भगवान बुद्ध की व अन्य अनेकानेक प्रतिमायें भी स्थापित की गई हैं। यह मानव की स्वभावगत कमजोरी है कि वह जिस कला को देखकर प्रारंभ में चकित रह जाता है, बाद में उसी कला के और भी अगणित नमूने सामने आते रहें तो धीरे-धीरे उसका उत्साह भी कम होता जाता है। बहुत ज्यादा ध्यान से वह हर चीज़ का अध्ययन नहीं कर पाता। पहली मंजिल पर स्थित कलाकृतियों और प्रतिमाओं को देखने में हमने जितना समय लगाया उससे थोड़ा सा ज्यादा समय में हमने बाकी चारों मंजिलें देख लीं ! शायद इसकी एक मुख्य वज़ह ये है कि हम उन सब कलाकृतियों को समझ नहीं पा रहे थे और हमें सब कुछ एक जैसा सा लग रहा था। कोई गाइड यदि वहां होता जो एक-एक चीज़ का महत्व समझाता तो अलग बात होती।

मुख्य मंडप में से निकल कर सीढ़ियां उतर कर लॉन में आये तो बायें ओर भी एक स्तंभ दिखाई दिया। लॉन में एक धर्मचक्र स्थापित किया गया है। आपने तिब्बतियों को अपने हाथ में एक धर्मचक्र लिये हुए और उसे हाथ की हल्के से दी जाने वाली जुंबिश से निरंतर घुमाते हुए देखा होगा। वे पोर्टेबल धर्मचक्र वास्तव में इसी धर्मचक्र की अनुकृतियां हैं। इस स्तूप में लगभग 500 लामा धार्मिक शिक्षा ग्रहण करते हैं। बताया जाता है कि तिब्बत के बाद यह एशिया का सबसे बड़ा स्तूप है।

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हरिद्वार और देहरादून का तूफानी दौरा

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तो साब! ऐसे बना हमारा हरिद्वार का प्रोग्राम जिसमें मेरा कतई कोई योगदान नहीं था। घर के ताले – कुंडे बन्द कर के हम चारों अपनी बुढ़िया कार में बैठे, रास्ते में सबसे पहले पंपे पर गाड़ी रोकी, पांच सौ रुपल्ली का पैट्रोल गाड़ी को पिलाया, गाड़ी में फूंक भरी (मतलब हवा चैक कराई) और हरिद्वार की दिशा में चल पड़े! मारुति कार में और चाहे कितनी भी बुराइयां हों, पर एक अच्छी बात है! हवा-पानी-पैट्रोल चैक करो और चल पड़ो ! गाड़ी रास्ते में दगा नहीं देती !

चल तो दिये पर कहां ठहरेंगे, कुछ ठिकाना नहीं ! गर्मी के दिन थे, शनिवार था – ऐसे में हरिद्वार में बहुत अधिक भीड़ होती है। नेहा इतनी impulsive कभी नहीं होती कि बिना सोचे – विचारे यूं ही घूमने चल पड़े पर बच्चों की इच्छा के आगे वह भी नत-मस्तक थी! मन में यह बात भी थी कि अगर हरिद्वार में कोई भी सुविधाजनक जगह ठहरने के लिये नहीं मिली तो किसी न किसी रिश्तेदार के घर जाकर पसर जायेंगे! “आपकी बड़ी याद आ रही थी, कल रात आपको सपने में देखा, तब से बड़ी चिन्ता सी हो रही थी ! सोचा, मिल कर आना चाहिये!” अपनी प्यारी बड़ी बहना को छोटी बहिन इतना कह दे तो पर्याप्त है, फिर आवाभगत में कमी हो ही नहीं सकती!

कार ड्राइव करते हुए मुझे अक्सर ऐसे लोगों पर कोफ्त होती है जो ट्रैफिक सैंस का परिचय नहीं देते। मैं यह कह कर कि “इन लोगों को तो गोली मार देनी चाहिये” अपना गुस्सा अभिव्यक्त कर लिया करता हूं! बच्चे मेरी इस आदत से परिचित हैं और उन्होंने अब इसे एक खेल का रूप दे दिया है। जब भी सड़क पर कुछ गलत होता दिखाई देता है तो मेरे कुछ कहने से पहले ही तीनों में से कोई न कोई बोल देता है, “आप शांति से ड्राइव करते रहो! गोली तो इसे हम मार देंगे।” मुझे भी हंसी आ जाती है और गुस्सा काफूर हो जाता है।

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Trip to Haridwar By Car from Delhi

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There are many small but good restaurants are there. We decided one Punjabi Restaurant in front of Jai Gurudev Ashram and enjoyed our meal there. In the evening we went towards local temple and visit Chandi Devi Mandir. We hire Auto which is famous with the name Vikram, as the Auto is from Vikram company. We have to change the second auto from the main raod intersection towards Chandi Devi. Their we have to pay the entrance fee and Cable Car fee. We rach at the Mandir premises from where we have to stand in the line to board the cable car as the Mandir is situated at the top of hill. It was a breath stiopping moment at the top of hill. Akmost the whole Haridwar city and river ganga basin is visible from there. We participated in the evening puja there and fed some chanas to monkey. Here monkeys are very naughty, they snatch the eatable items from the visitors.

After darshan we returned back to Har Ki Pauri and attended Evening Pooja there. Har ki Pauri was very crowded and it was very risky with kids to go near the ghats. So we decided to view the prayer from the foot over bridge and after prayer plan to visit the Ganga river from the close. Evening prayer and the environment were very devotional. Many persons on the foot over bridge start chanting Gangaji Aarti. After end of the prayer much priest start moving towards crowd with Aarti Jyot and every one get a chance to take the arti darshan from the close.

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धनोल्टी , सहस्त्रधारा ,ऋषिकेश और फिर हरिद्वार

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रात की नीरवता मे गंगा की लहरो की तट की पैकडियो से टकराने की आवाज आ रही थी. इसी बीच मेरी श्रीमती जी ढुढती हुई आ गयी. आते ही बोली यहाँ कहाँ लेटे हो, मै बोला क्या करू यहाँ पर ठंडक है इसलिये इन सबके साथ यहीं लेट गया हूँ पर नींद तो आ नही रही है. बोली चलो बस मे ही आरम करना. यहाँ के ठंडे फर्श पर लेटे रहे तो कमर अकड जायगी. अब मुझे लगा, इससे तो अच्छा वापस दिल्ली चलते हैं, यहाँ परेशन होने से क्या फायदा. इतनी रात मे भी कई लोग गंगा नहा रहे थे. मैने गंगा का जल अपने उपर छिड़का और बस मे पहुंचकर जब सबसे वापस दिल्ली चलने के लिये कहा तो कुछ लोग बोले जब इतना परेशान हो ही चुके हैं तो अब कल गंगा नहाकर ही चलेंगे. मैने कहा ठीक है जैसी तुम सबकी मर्जी. बस मे बैठे हुए पता नही कब नींद लग गयी. दिन निकल आने के बाद ही नींद खुली.

अब सभी हर की पोड़ी पर चल दिये. तभी हमारे साथ के मनोज जी हर की पोड़ी के सामने बने धर्मशाला मे दो कमरे तय कर आये. बोले 500-500 रुपये मे मिल रहे हैं लेना है. मैने कहा ले लो भई थोड़ी देर के लिये ही सही बरसात के करण गंगा का पानी मटमैला था कुछ लोग नखरे करने लगे. पर बाकी सभी ने तो गंगा मे ढंग से स्नान किया. . नहा कर तैयार होने मे ही सभी को दस बज गये. अब भी कुछ एक तैयार नही हुए थे, मैने कहा मै तो नाश्ता कर के बस मे बैठने जा रहा हूँ तुम सब लोग भी जल्दी से आ जाओ. जब इतने सारे लोग होते हैं तब सारे अपनी- अपनी मर्जी चलाते हैं. करीब 12 बजे बस मे पहुंचे. अब वापस दिल्ली लौटना था.

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हरमंदिर साहब, अकाल तख्त और जलियांवाला बाग दर्शन

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घंटाघर के प्रवेश द्वार से पुनः अंदर कदम रखा तो सिक्ख संग्रहालय नज़र आया।  सोचा कि चलो, इसे भी देख लिया जाये।  हॉल में प्रवेश करते ही दाईं ओर ऊपर जाने के लिये सीढ़ियां थीं ।  ऊपर पहुंचा तो लिखा मिला, “फोटो खींचना मना है जी।“ पहले तो बड़े ध्यान से एक – एक चित्र को देखना और उसके नीचे दिये गये विवरण को पढ़ना शुरु किया पर फिर लगा कि इतने शहीदों का वर्णन पढ़ते-पढ़ते मैं भी जल्दी ही शहीदों की लिस्ट में अपना नाम लिखवा लूंगा।  हे भगवान !  इतने शहीद यहां और इनके अलावा उन्नीस सौ के करीब जलियांवाला बाग में!  अब मुझे इस बात का कोई आश्चर्य नहीं हो रहा था कि अमृतसर में हर सड़क का नाम किसी न किसी शहीद के नाम पर ही क्यों है?

शहीदों के चित्र देखते देखते अंतिम कक्ष में पहुंचा तो देखा कि नवीनतम शहीदों की पंक्ति में बेअंत सिंह और सतवंत सिंह के भी बड़े – बड़े तैल चित्र लगे हुए हैं। पहचाने आप?  बेअंत सिंह और सतवंत सिंह वे दोनों अंगरक्षक थे जिन्होंने अंगरक्षक के रूप में प्रधानमंत्री की सुरक्षा की जिम्मेदारी अपने सिर पर लेकर भी निहत्थी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या की थी।  मन में सहसा विद्रोह की भावना ने सर उठाया।  फिर देखा कि एक तैल चित्र और लगा हुआ है जिसमें गोलों – बारूद की मार से क्षत-विक्षत लगभग खंडहर अवस्था में अकाल तख्त का चित्र था।  अकाल तख्त की यह दर्दनाक स्थिति आपरेशन ब्लू स्टार के समय आतंकवादियों को अकाल तख्त से बाहर निकलने के लिये विवश करने के दौरान हुई थी।  एक आम भारतीय की तरह मेरा भी मानना है कि अकाल तख्त की ऐसी कष्टकर, वेदनाजनक स्थिति के लिये यदि भारतीय सेना को दोषी माना जाता है तो वे लोग भी कम से कम उतने ही दोषी अवश्य हैं जिन्होंने भिंडरवाले को अकाल तख्त में छिप कर बैठने और वहां से भारतीय सेना पर वार करने की अनुमति प्रदान की थी।  अकाल तख्त की पवित्रता तो उसी क्षण भंग हो गई थी जब उसमें हथियार, गोले और बारूद लेकर भिंडरवाले और उसके अन्य साथियों ने प्रवेश किया और इस बेपनाह खूबसूरत और पवित्र भवन को शिखंडी की तरह इस्तेमाल किया।  वैसे जो लोग राजनीति की गहराइयों से परिचित हैं उनका कहना है कि भिंडरवाले भी तो कांग्रेस का ही तैयार किया हुआ भस्मासुर था जिसे कांग्रेस ने अकाली दल की काट करने के लिये संत के रूप में सजाया था।  अस्तु !

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माता वैष्णोदेवी यात्रा – भाग ३ (चरणपादुका से माता का भवन)

माता वैष्णोदेवी यात्रा – भाग ३ (चरणपादुका से माता का भवन)

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धीरे धीरे चलते हुए, रुकते हुए, बैठते हुए, हम लोग उस दो राहे पर आ गए थे, जंहा से एक रास्ता  अर्ध कुंवारी की और जाता हैं. और बांये से एक रास्ता नीचे की और से माता के भवन की और जाता हैं. अर्ध कुंवारी की और से माता के भवन पर जाने के लिए हाथी मत्था की कठिन चढाई चढनी पड़ती हैं. और इधर से दूरी करीब साढ़े छह  किलो मीटर पड़ती हैं. जबकि नीचे वाले रास्ते से चढाई बहुत  कम पड़ती हैं. और इधर से माता के भवन की दूरी  करीब पांच किलो मीटर पड़ती हैं.  अर्ध कुंवारी माता के भवन की यात्रा में ठीक मध्य में पड़ता हैं. यंहा पर माता का एक मंदिर, गर्भ जून गुफा, और बहुत से रेस्टोरेंट, भोजनालय, डोर मेट्री आदि बने हुए हैं. यंहा पर यात्री गण थोड़ी देर विश्राम करके, गर्भ जून की गुफा, व माता के दर्शन करते हैं, फिर आगे की यात्रा करते हैं. पर हम लोग नीचे के रास्ते से जाते हैं, और वापिस आते हुए माता के दर्शन करते हैं. ये कंहा जाता हैं की माता वैष्णो देवी इस गुफा में नो महीने रही थी, और गुफा के द्वार पर हनुमान जी पहरा देते रहे थे. भैरो नाथ माता को ढूँढता घूम रहा था, और माता इस गुफा से निकल कर आगे बढ़ गयी थी.

हम लोग नीचे वाले रास्ते से आगे बढ़ गए थे. मौसम फिर से  खराब होना शुरू हो गया था. माता के भवन की यात्रा के मार्ग में थोड़ी थोड़ी दूर पर टिन शेड बने हुए हैं. जिनमे मौसम खराब होने पर व बारिस होने पर रुक सकते हैं. बारिश होने से हम लोग भी एक टिन शेड में रुक गए थे.

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अमृतसर यात्रा – स्वर्ण मंदिर दर्शन

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तो साहेबान, अपुन अपने दोनों बैग पैक करके (एक में कपड़े, दूसरे में लैपटॉप व कैमरा) नियत तिथि को नियत समय पर नियत रेलगाड़ी पकड़ने की तमन्ना दिल में लिये स्टेशन जा पहुंचे।  ये नियत तिथि, नियत समय, नियत रेलगाड़ी सुनकर आपको लग रहा होगा कि मैं जरूर कोई अज्ञानी पंडित हूं जो यजमान को संकल्प कराते समय “जंबू द्वीपे, भरत खंडे, वैवस्वत मन्वन्तरे, आर्यावर्त देशे” के बाद अमुक घड़ी, अमुक पल, अमुक नगर बोल देता है।  हमारे वातानुकूलित कुर्सीयान में, जो कि इंजन के दो डिब्बों के ही बाद में था, पहुंचने के लिये हमें बहुत तेज़ भाग दौड़ करनी पड़ी क्योंकि किसी “समझदार” कुली ने हमें बताया था कि C1 आखिर में आता है अतः हम बिल्कुल प्लेटफॉर्म के अन्त में खड़े हो गये थे।  जब ट्रेन आई और C1 कोच हमारे सामने से सरपट निकल गया तो हमने उड़न सिक्ख मिल्खासिंह की इस्टाइल में सामान सहित ट्रेन के साथ-साथ दौड़ लगाई।  परन्तु अपने कोच तक पहुंचते पहुंचते हमारी सांस धौंकनी से भी तीव्र गति से चल रही थी। हांफते हांफते अपनी सीट पर पहुंचे तो देखा कि हमारी सीट पर एक युवती पहले से ही विराजमान है।  तेजी से धकधका रहे अपने दिल पर हाथ रख कर, धौंकनी को नियंत्रण में करते हुए उनसे पूछा कि वह – मेरी – सी – ट पर – क्या – कररर – रररही – हैं !!!  उनको शायद लगा कि मैं इतनी मामूली सी बात पर अपनी सांस पर नियंत्रण खोने जा रहा हूं अतः बोलीं, मुझे अपने लैपटॉप पर काम करना था सो मैने विंडो वाली सीट ले ली है, ये बगल की सीट मेरी ही है, आप इस पर बैठ जाइये, प्लीज़।

मैने बैग और सूटकेस ऊपर रैक में रखे और धम्म से अपनी पुश बैक पर बैठ गया और कपालभाती करने लगा। दो-चार मिनट में श्वास-प्रश्वास सामान्य हुआ और गाड़ी भी अपने गंतव्य की ओर चल दी।  मिनरल वाटर वाला आया, एक बोतल ली, खोली और डेली ड्रिंकर वाले अंदाज़ में मुंह से लगा कर आधी खाली कर दी!  बीच में महिला की ओर गर्दन एक आध बार घुमाई तो वही सिंथेटिक इस्माइल!  मैने अपना बैग खोल कर उसमें से अंग्रेज़ी की एक किताब निकाल ली ! (बैग में यूं तो हिन्दी की भी किताब थी पर बगल में पढ़ी लिखी युवती बैठी हो तो अंग्रेज़ी की किताब ज्यादा उपयुक्त प्रतीत होती है।) किताब का टाइटिल “Same Soul Many Bodies” देख कर वह बोली,

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A trip to Kasauli and Baru Sahib on bike

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Got up at 7.30 AM. Checked the engine oil in our bikes and found that engine oil level in Hunk was very low. Asked the locals about any spare parts shop around and got to know that we can find one in Dharampur. Started our bikes again at 9.30 AM and moved on to see the very famous ‘Monkey Point’. Harmeet’s Hunk was loaded with 3 heavy bags as he had plans to stay at Baru Sahib. We reached Monkey point and got to know that we will have to trek and bags were not allowed. There was no place available where could keep our bags so had to drop the plan for ‘Monkey Point’. After that, we reached ‘Sunset point’. It was really an amazing place with a lot of breathtaking views. It was greenery all around and completely quiet place. Just the sound of birds. Just feel the fresh air and feels like you are in heaven. It was a very nice experience. After spending some time, enjoying the beauty of nature, we went to the market to have lunch. Had Chinese food at a shop but the food we had there was pathetic. I never had such food in my life. We left from there and decided to go to Shimla and then Kufri from there. Left from Kasauli at 3 PM. While on our way back, I started feeling sick and suffered from indigestion and gastric problems due to the food that we had. Reached Solan as Harmeet had to buy engine oil for his Hunk. Got the engine oil from Chambaghat near Solan. I was still not feeling well. Took a tablet of Pantop-D and we then decided to go to Baru Sahib due to health issues. Way to Baru Sahib was the worst one. Baru Sahib is located 70 kms away from Solan.

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