Trek to Shikari Devi, The Hunter Goddess

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Disoriented, with mixed feelings and helpless (as my mobile had no network and there was no sign of any human beings around), it took me some time to gather my senses and to think about getting out of this. Though I had experienced this earlier as well on my solo trip to McLeodganj where I was lost while wandering in the jungles near Dharamkot, I somehow managed to get out of this and felt delighted to see a way out. I am now able to relate myself sometime with some similar experiences especially when I watch the program ‘I shouldn’t be alive’ on Discovery Channel which shows the survival stories of the people. I am sure many others who would have experienced this ever will be able to better relate to this.

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Rewalsar – A sacred confluence of multi religions

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When you come to Rewalsar, you cannot be untouched by the spiritual vibrations being reflected in every activity in this sacred land, be it the chirpings of the birds, soulful chantings from the monastery or temple or Gurubani from the Gurudwara, people feeding hungry souls in the lake, pondering monkeys over the trees, Buddhist prayer flags swirling in the air, swimming ducks in the lake, meditating and contemplating holy people on bank of the lake, the green and serene water of the lake, monks running the prayer-wheels, beautiful surrounding hills, finely ornated colourful monasteries with young monks playing around, burning oil lamps, ringing bells, cows and dogs resting near the lake, swaying trees, smiling flowers etc, whatever passes through your eyes gives you a sort of positive vibrations.

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क्रिसमस @ कमरुनाग

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रोहांडा पहुँचकर सबसे पहला काम था, खाली टंकर (पेट) में पेट्रोल (खाना) भरना ताकि लगभग 12 से 13 किलोमीटर का सफ़र बिना किसी अवरोध के पूरा किया जा सके. हालाँकि बाली के मन में शंका थी की कँही पेट्रोल (खाना) ख़त्म न हो जाये, इसलिए थोडा साथ रखकर भी ले चले. यहाँ से शुरू होता है पैदल यात्रा का असली रोमांच. शुरुआती सफ़र थोडा थकाने वाला जरुर था, जिसकी पहली वजह थी रोहांडा में खाया गया भरपेट भोजन और दूसरा कारण थी अप्रत्याशित खड़ी चढाई. खैर जैसे – जैसे आगे बढते गए, प्रकृति का घूँघट उठता गया और कुदरत के कुछ शानदार नज़ारों नें थकान को छूमंतर कर दिया. इस पर बीच में कहीं – कहीं पर हल्की – फुल्की बिखरी बर्फ के निशान इस बात की पुष्टि करते प्रतीत हो रहे थे कि हो ना हो झील पर थोड़ी बहुत बर्फ तो देखने को जरुर मिलेगी, जिससे हमारा उत्साह और जोश दोगुना हो गया. बीच – बीच में दूर कहीं चोटियों पर पड़ी ताज़ा बर्फ और वो हसीं वादियाँ हमारी कल्पनाओं को पँख दे रही थी, ऐसे में किस तरह हमने आधे से ज्यादा दूरी मजे – मजे में तय कर ली थी, पता ही नहीं चला. ऐसे में एक बात अचंभित करने वाली यह थी कि अभी तक के पूरे रास्ते में हमें किसी आदमजात के दर्शन नहीं हुए थे, जबकि देव कमरुनाग को पूरे मंडी जिले का एक प्रमुख आराध्य देव माना जाता है. ऐसी चर्चा करते हुए हम चले ही जा रहे थे के अचानक, शांत घने जंगले के बीचों – बीच किसी जानवर के दौड़ने कि आवाज़ ने पलभर के लिए रोंगटे खड़े कर दिए

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Bijli Mahadev

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So following our original plan to cover Bijli Mahadev, Rewalsar Lake, Shikari Devi, Kamru Nag Lake, Karsog, Tattapani, we reached Kullu on the morning of 30 July’11. Since there were regular buses plying on this route, it allowed us some time to freshen up and to have a quick breakfast. Later we took a mini bus till a village nearby the shrine from where it is just 2.8 km soft trek passing through some of the villages

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Deoria Tal – Tungnath – Chandrashila

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The last night’s amazing views of the sky dotted with innumerable twinkling stars left me spell bound and I was eagerly waiting for the sunrise. Next day, I got up at 4 and asked the tent shop owner to wake up the guide. After half an hour later, we started our climb to the peak and reached there well before time and now all (all bengalis except us as this place interestingly is mostly visited by the bengalis, witness to that are the shop signboards in bengali) were waiting for the sunrise. As soon as the sun rose from behind the Nanda Devi peak, all were all set to capture the golden ring created by the sunrise. Our guide told us the names of all the Himalayan peaks that ranges from Nanda Devi till Yamunotri Peak from right to left where Chaukhamba is the most dominating peak in the middle.

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गढ़वाल घुमक्कडी: कर्णप्रयाग – विष्णुप्रयाग – बद्रीनाथ

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चूँकि आज हमे सिर्फ़ बद्रीनाथ ही पहुँचना था (जो की यहाँ से मात्र 125 किमी ही है), इसलिए हम संगम पर काफ़ी देर बैठे मस्ती करते रहे. संगम का आनंद लेकर और दोनो नदियों के जल से विशुद्धि व उर्जा पाकर हम लोग आगे की यात्रा पर निकलने को तैय्यार थे. ढाबे पर नाश्ता करने के बाद, हम लोग सीधे बद्रीनाथ की बस लेने आ पहुँचे. थोड़ी देर इंतेज़ार के बाद, एकाध बसें आई पर सब खचाखच भारी हुई, पाँव रखने तक की जगह नही थी, यात्रा सीज़न मे ये एक आम नज़ारा है.

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Kareri Lake ~ a poetic trail

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Gaddis are basically a nomadic tribe who mainly lead a pastoral life depending on their cattle for their livelihood and wander in the high altitude alpine meadows for green and protein rich grass for their cattle and the nectar like pure water. These gaddis seem to be the happiest souls in the world without any worry cheering and living life happily in the lap of mother nature enjoying her eternal and purest beauty to the fullest. You envy at their life for a moment and then wish if you were born a gaddi, maybe in your next life…:)

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गढ़वाल घुमक्कड़ी: तपोवन – रुद्रप्रयाग – दिल्ली

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रास्ते में हम लोग लोग थोड़ी देर रुद्रप्रयाग में रुके और फिर चल दिए श्रीनगर की ओर. श्रीनगर पहुँचते पहुँचते हमें काफी देर हो चुकी थी और आज रात इससे आगे जाने का कोई साधन नहीं दिख रहा था. कोई जीप या बस मिलने की तो संभावना बिलकुल भी नहीं थी क्योंकि यहाँ हिमाचल की तरह रात को बसें नहीं चलती. ऐसे में हमारे चालक साब ने हमें रात श्रीनगर में ही बिताने का सुझाव दिया और हमें रात गुजारने का एक ठिकाना भी दिखाया. हमने ठिकाना तो देख लिया पर अब किसी का भी यहाँ रुकने का मन नहीं था और सब जल्द से जल्द घर पहुँचना चाहते थे. उत्तरांचल में वैसे तो रात को कोई वाहन नहीं चलते पर सब्ज़ी फल आदि रसद पहुँचाने वाले ट्रकों की आवाजाही रात भर चालू रहती है, सोचा क्यों ना इसे ही आजमाया जाए. आज शायद किस्मत हम पर मेहरबान थी, थोडा पूछ्तात करने पर ही हमें एक ट्रक मिल गया जो हरिद्वार तक जा रहा था. ट्रक चलने में अभी लगभग आधा घंटा बाकी था और सुबह सिर्फ आश्रम में ही भोजन किया था इसलिए एक ढाबे पर जाकर थोड़ी पेट पूजा की गई.

ट्रक पर वापस लौटे तो देखा की चालक के साथ वाली सीट पर पहले ही दो लोग बैठे हुए थे. ऐसे में वहाँ हम तीनों का एक साथ बैठना संभव और सुरक्षित नहीं था. इसलिए दोनों की बुरी हालत देखकर मैं ट्रक के पीछे चला गया जहाँ कुछ अन्य लोग पहले से ही लेटे थे. इस ट्रक के ऊपर एक बरसातीनुमा दरी थी जो शायद सब्जियों को धूल और बारिश से बचाने के लिए डाली गयी थी और नीचे खाली प्लास्टिक के डब्बे रखे हुए थे जिनमे सब्जियाँ रखी जाती हैं. इन्ही हिलते डुलते प्लास्टिक के डब्बों के ऊपर हम सभी मुसाफ़िर लेटे हुए थे. ट्रक चलने पर कुछ समय तो बड़ा मजा आया पर जैसे जैसे रात गहराती गयी और नींद आने लगी तो इन हिलते हुए डब्बों पर सोना बड़ा दुखदायी लग रहा था क्योंकि एक तो ये डब्बे आपस में टकराकर हिल रहे थे और टेढ़े मेढ़े होने की वजह से चुभ भी रहे थे. खैर मेरे लिए तो ये सब रोमांच था, लेकिन रोमांच धीरे धीरे बढ़ने लगा जब इन्द्रदेव अर्धरात्रि में जागे और हम पर जमकर मेहरबान हुए. तिरछी पड़ती हुई मोटी मोटी बारिश की बूँदे हमारे ऊपर एक शॉवर की तरह पड़ रही थी जो एक मंद मंद शीतल रात को एक बर्फ़ीली सी महसूस होने वाली रात में बदलने के लिए काफी थी. ऐसे में ऊपर रखी हुई दरी ने ठण्ड से तो नहीं पर भीगने से तो बचा ही लिया. ठण्ड में किटकिटाते हुए, बिना सोये जैसे तैसे करीब चार बजे के आस पास ट्रक चालक ने हमें हरिद्वार में एक सुनसान मोड़ पर उतार दिया. जितना दर्द मेरे शरीर में उस ट्रक में सवारी करते हुए हुआ उतना पूरी यात्रा कहीं नहीं हुआ, शरीर इतना अकड़ गया था कि ट्रक से बाहर निकलने के लिए भी हिम्मत जुटानी पड़ रही थी. ठण्ड के मारे बुरा हाल था, सुनसान गलियों से होकर गुजरते हुए हम लोग बस स्टेशन की ओर बढ़ने लगे. ऐसे में रास्ते में एक चाय का ठेला देखकर चेहरे पर कुछ ख़ुशी आयी, भाईसाब के हाथ की गर्मागरम चाय और बंद खाकर शरीर में कुछ ऊर्जा आई. फिर तो बस जल्दी जल्दी कदम बढ़ाते हुए हरिद्वार बस स्टेशन पहुँचकर, दिल्ली की बस पकड़ी तो लगभग दस या ग्यारह बजे तक दिल्ली पहुँच कर ही राहत की साँस ली. यात्रा समाप्त!

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गढ़वाल घुमक्कड़ी: भविष्य बद्री

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देवभूमि गढ़वाल के कुछ छिपे हुए रत्नों को तलाशती तीन दोस्तों की कभी ना भुला पाने वाली रोमांचक घुमक्कड़ी की दास्तान…जिसमे हमने कुछ बेहतरीन नज़ारे देखे, कुछ अनोखे और सोच बदलने वाले अनुभवों से गुजरे, कुछ खुबसूरत दोस्तों से मिले, कुछ बेहतरीन ठिकानों पर रात गुजारी और बहुत कुछ सीखने को मिला…

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