हरिद्वार और देहरादून का तूफानी दौरा – २

लच्छीवाला, यानि फुल मस्ती

लच्छीवाला देहरादून से लगभग 18 किलोमीटर पहले एक पिकनिक स्थल है जहां पर, अगर पर्यटक जनता न हो तो, निस्सीम शांति है। हरिद्वार-देहरादून मार्ग पर रेलवे लाइन के लिये बनाये गये subway (जो अब फ्लाई ओवर बनने जा रहा है, निर्माण कार्य प्रगति पर है। ) की बगल में मुख्य राजमार्ग से दाईं ओर जंगल की ओर एक रास्ता जाता है। लगभग १ किमी आगे पहुंच कर यह पिकनिक स्थल है। एक अदद नदी के मार्ग में विभिन्न ऊंचाई की दीवारें खड़ी कर – कर के विभिन्न गहराईओं के “स्विमिंग पूल” बना लिये गये हैं। बच्चे कम गहराई वाले “स्विमिंग पूल” में नहा सकते हैं, उससे अधिक गहरा वाला महिलाओं के हित में बनाया गया है और सबसे अधिक गहरा, यानि पांच फीट गहरा पुरुषों के लिये है पर ये वास्तव में नदी ही है जिसके तल को विभिन्न गहराइयां प्रदान कर दी गई हैं। महिलाओं वाला स्विमिंग पूल लगभग खाली ही पड़ा था क्योंकि सारी महिलाएं पुरुषों वाले स्विमिंग पूल में ही थीं।

मैं और दोनों बच्चे फटाफट अपने अपने कपड़े उतार कर पानी में उतर गये। श्रीमती जी ने हमारे सामान की रक्षा के नाम पर पानी में आने से साफ इंकार कर दिया। वह सार्वजनिक स्थानों पर नहाने के मामले में बहुत संकोच करती हैं। घंटा – डेढ़ घंटा पानी में कूदते – फांदते, हम लोग ग्रीष्म ऋतु से लड़ते रहे। फुल मस्ती करने के बाद, श्रीमती जी को उनके अड़ियलपने के लिये कोसते हुए हम सब पुनः गाड़ी में बैठे और देहरादून की ओर चल पड़े। हरिद्वार में जब हमने देहरादून जाने की बात तय की थी तो श्रीमती जी ने छोटे भाई की पत्नी को फोन करके पूछ लिया था कि वह देहरादून में घर पर ही मिलेंगे या नहीं! उन्होंने जब कहा कि दोपहर को लंच पर प्रतीक्षा करेंगे तो हमने लच्छीवाला में लंच लेने का प्रयास नहीं किया और सीधे देहरादून में भाई के घर की ओर रुख करना ही उचित समझा क्योंकि दो बजने वाले थे। लच्छीवाला में पानी में ही हमने दो घंटे बिता दिये थे इसका एहसास हमें घड़ी पर नज़र डालने से ही हुआ। 

छोटे भाई के घर पहुंच कर बच्चे बच्चों के साथ मस्त, दोनों महिलाएं रसोई की दिशा में और हम दोनों भाई बैठक में बैठ कर गप-शप करने लगे। इस बिना पूर्व निर्धारित मुलाकात से हर कोई अत्यन्त प्रसन्न था। खाना खाते-खाते यह तय पाया गया कि थोड़ी देर में, जब धूप थोड़ी कम हो जायेगी तो बुद्धा टैंपिल देखने चलेंगे। बड़ी सुन्दर जगह है। भाई का घर देहरादून में अन्तर्राज्यीय बस अड्डे (ISBT) के पास है और बुद्धा टैंपिल उनके घर से बहुत नज़दीक है।

बुद्धा टैंपल पर पिकनिक

स्तूप के बारे में आवश्यक जानकारी

स्तूप के बारे में आवश्यक जानकारी

 

मुख्य पांच मंजिले भवन हेतु सीढ़ियां

मुख्य पांच मंजिले भवन हेतु सीढ़ियां

 

 

धर्म चक्र जिसके  मध्य में घूमने वाला यंत्र है।

धर्म चक्र जिसके मध्य में स्थित यंत्र को घुमाया जाता है।

 

बुद्ध मंदिर परिसर में शॉपिंग काम्प्लेक्स

बुद्ध मंदिर परिसर में शॉपिंग काम्प्लेक्स

 

 

स्तूप की पांचवी मंजिल

मंदिर के लिये चलते समय दोनों कारें ले ली गईं ताकि आराम से बैठ कर जा सकें और वापसी में हम सड़क से ही सहारनपुर की ओर रुख कर सकें, घर तक दोबारा कार लेने के लिये न आना पड़े। हां, इतना अवश्य था कि एक कार में सब बड़े लोग थे जबकि दूसरी कार में सिर्फ बच्चे ही थे।

मेरा विचार था कि बुद्धा टैंपिल मेरे 1980 में देहरादून छोड़ देने के बाद अस्तित्व में आया है किन्तु जब मैने भाई से पूछा तो उसने बताया कि पहले ये इतना लोकप्रिय नहीं हुआ करता था अतः हम लोग पहले यहां आया नहीं करते थे। पिछले कुछ वर्षों से, जब से ISBT यहां पास में बनी है और इस क्षेत्र में जनसंख्या भी बढ़ गई और बाज़ार भी बन गये तो लोगों को पता चला कि ऐसा कोई सुन्दर सा मंदिर भी यहां आसपास में है। क्लेमेंटाउन में स्थित इस बौद्ध मठ के बारे बाद में मैने जानने का प्रयास किया तो इसके महत्व की अनुभूति हुई। यह मठ तिब्बत के विश्वविख्यात बौद्ध मठ की प्रतिकृति है और इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसके मुख्य भवन की दीवारों पर मौजूद भित्तिचित्र हैं, कलाकृतियां हैं जिनके माध्यम से भगवान बुद्ध के जीवन की अनेकानेक घटनाओं को अंकित किया गया है। (इनका चित्र लेना मना है)। इसका निर्माण वर्ष 1965 में हुआ बताया जाता है। लगभग पचास कलाकार तीन वर्ष तक इन दीवारों पर स्वर्णिम रंग के पेंट से कलाकृतियां बनाते रहे हैं तब जाकर यह कार्य पूरा हुआ। बहुत दूर से ही इस मंदिर का स्तूप दिखाई देता है जो 220 फीट ऊंचा है। यह जापान की वास्तुकला शैली पर आधारित है। इस मुख्य भवन में पांच मंजिलें हैं और हर मंजिल पर भगवान बुद्ध की व अन्य अनेकानेक प्रतिमायें भी स्थापित की गई हैं। यह मानव की स्वभावगत कमजोरी है कि वह जिस कला को देखकर प्रारंभ में चकित रह जाता है, बाद में उसी कला के और भी अगणित नमूने सामने आते रहें तो धीरे-धीरे उसका उत्साह भी कम होता जाता है। बहुत ज्यादा ध्यान से वह हर चीज़ का अध्ययन नहीं कर पाता। पहली मंजिल पर स्थित कलाकृतियों और प्रतिमाओं को देखने में हमने जितना समय लगाया उससे थोड़ा सा ज्यादा समय में हमने बाकी चारों मंजिलें देख लीं ! शायद इसकी एक मुख्य वज़ह ये है कि हम उन सब कलाकृतियों को समझ नहीं पा रहे थे और हमें सब कुछ एक जैसा सा लग रहा था। कोई गाइड यदि वहां होता जो एक-एक चीज़ का महत्व समझाता तो अलग बात होती।

मुख्य मंडप में से निकल कर सीढ़ियां उतर कर लॉन में आये तो बायें ओर भी एक स्तंभ दिखाई दिया। लॉन में एक धर्मचक्र स्थापित किया गया है। आपने तिब्बतियों को अपने हाथ में एक धर्मचक्र लिये हुए और उसे हाथ की हल्के से दी जाने वाली जुंबिश से निरंतर घुमाते हुए देखा होगा। वे पोर्टेबल धर्मचक्र वास्तव में इसी धर्मचक्र की अनुकृतियां हैं। इस स्तूप में लगभग 500 लामा धार्मिक शिक्षा ग्रहण करते हैं। बताया जाता है कि तिब्बत के बाद यह एशिया का सबसे बड़ा स्तूप है।

मंदिर के मुख्य भवन के दाईं ओर एक शॉपिंग कांप्लेक्स दिखाई दिया जिसमें दो-तीन दुकानों में रेस्टोरेंट और बाकी में gifts and novelties की दुकानें हैं। आप अपने साथ इस स्तूप की यादें ले जाना चाहें तो अनेकानेक कलाकृतियां और दैनन्दिन उपयोग की वस्तुएं बेचने वाली दस-बारह दुकानें यहां पर हैं।

इस मंदिर कांप्लेक्स में हम लगभग दो-ढाई घंटे घूमते-फिरते रहे। शाम ढलने के साथ ही यहां पर भीड़ बढ़ती चली गई और यह एक धार्मिक स्थल कम और पर्यटन स्थल अधिक लगने लगा जहां पर देहरादून वासी अपनी शाम बिताने आ जाया करते हैं।

घर वापसी (कल्याण सिंह की या अमर सिंह की नहीं, हमारे परिवार की)

रात्रि में पहाड़ी रास्ते में भी वाहन चलाने में मुझे या बेटे को कोई दिक्कत नहीं होती है तथापि हमारी महिला वर्ग की राय थी कि या तो हम रात को देहरादून में ही रुक जायें या फिर अनावश्यक देर किये बिना वापिस चल पड़ें। रुकना व्यावहारिक नहीं था क्योंकि सोमवार को बच्चों और और मुझे भी अपनी अपनी व्यस्तताएं थीं अतः हम सब बाय-बाय, टाटा करके अपनी कार में बैठे और सहारनपुर की ओर चल पड़े। देहरादून से सहारनपुर की दूरी लगभग 70 किमी है जो अपने वाहन से लगभग एक घंटा बीस मिनट में आसानी से पूरी हो जाती है। बिना कहीं रुके हम अपने पूरे दिन की स्मृतियों को बार-बार याद करते हुए मजे से रात्रि 8.30 पर सहारनपुर आ पहुंचे। ऐसा लग ही नहीं रहा था कि हम कल शाम ही सहारनपुर से निकले थे क्योंकि इतनी सारी जगह गये, इतने सारे लोगों से मुलाकात हुईं कि ऐसा लग रहा था मानों कई दिनों से घूम रहे हैं।

सहारनपुर में जब पुनः जनता रोड पर प्रवेश करने लगे तो पत्नी ने कहा कि थकान के कारण खाना बनाने का मन नहीं है और कहीं होटल में भी खाने का मन नहीं है अतः क्या किया जाये! हम तीनों ने बिना एक क्षण भी गंवाये उत्तर दिया, भूखे रहने का भी मन नहीं है।“ अतः सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पास हुआ कि दही लेते हुए घर में घुसें और पुलाव बना लिया जाये। खिचड़ी तेरे चार यार, दही – पापड़ – घी – अचार।

आपने हम सब को इतनी विनम्रता से झेला, इसके लिये आप पाठक-शिरोमणि की उपाधि से अलंकृत किये जाते हैं। आपका हार्दिक अभिनन्दन !

 

6 Comments

  • JATDEVTA says:

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  • Mahesh Semwal says:

    hamesha ki tarah bahuth accha lekh !

  • Mukesh Bhalse says:

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  • Mukesh Bhalse says:

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  • Baldev swami says:

    Res S S ,
    It is very much clear that talent has no limits, what a talent sir, what are the comments (ghar wapsi), and ( khichari tere —-), these are the proverb which cannot be used by every one, I will say only this,
    LIKHNE KO TO LIKHTEN HAIN BAHUT SE SITAMGAR,
    PAR SS KA LIKHNE KA HAI ANDAJE-BYAN AUR,

    Waitng for another post,

    Baldev swami

  • Nandan Jha says:

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