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शान्तमय सुरमय निर्मल नीरव चम्बा, उत्तराखंड

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पूछने पर पता चला की वहां किसी और का कमरा बुक नहीं है और अगली तीन रातों के लिए हम लोग अकेले ही वहां रूकने वाले हैं | हम लोग रूम में पहुंचे और ‘मेरे द्वारा सरकारी होटल के चयन’ विषय पर पत्नी जी का भाषण सुना | एक बार फिर मामले को सँभालते हुए मैंने शीघ्र सोने का प्रस्ताव रखा जो कुछ संक्षिप्त टिपण्णीयों के बाद मंजूर हो गया |

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ब्रह्मगिरी की पदयात्रा , त्रैम्बकेश्वर

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सीढ़ियों ने अब बहुत ऊँचाई ले ली थी. विशाल चट्टान-नुमा ब्रह्मगिरी पर्वत अपने सम्पूर्ण विशालता को ले कर हमारे सामने था. उस ऊँचाई से त्रैम्बकेश्वर शहर कितना बौना और मनोहर लग रहा था. सीढियां पर्वत की सपाट सतहों से लग गयी थीं. इन सीढ़ियों में घाटी की तरफ लोहे की रेलिंग्स भी लगे हुए थे ताकि कोई फिसल कर घाटियों में न गिर जाये. उस पर अब बन्दर सामने आ गए. पहाड़ की ऊँची खड़ी सपाट सतह पर भी ये बन्दर चीखते-चिल्लाते ऐसे दौड़ते थे की मानो समतल धरती पर दौड़ रहे हों. कूद कर अचानक किसी पदयात्री के सामने आ जाना और उनके हाथ से खाना छीन लेने में इन बंदरों को महारत हासिल थी. पर अनुभवी यात्री अपने साथ इनके लिए भी कुछ खाद्य सामग्री ले कर चलते है. श्री दानी ने भी ऐसा ही किया था. उसने अपने थैले से बिस्कुट निकाला और बंदरों को निश्चिंतता से खिलाया. और इधर हम तीनों अनुभव-हीन यात्री अपनी छड़ियाँ पकड़े बंदरों से बच कर आगे चलते रहे.

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गंगऊ बाँध और रनगवां बाँध – सौ साल पुराना छुपा खजाना

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एल टाइप सी अजीब सी शेप लिए हुए विसाल डैम आपने आप में एक सुरंग सा था आर पार जो उसके मेंटेनेंस के लिए होगी शायद। जिसमे सैकड़ो खिड़किया थी जिनसे रोशनी ऐसे आ रही थी मानो हम कई शीशो में एक के गहराते  से माहोल में अपने अक्ष देख रहे हों।   वहां जगह जगह विदेशो से लायी गयी मशीने और उपकरण आज भी ज्यों के त्यों

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हिमाचल का अनमोल रत्न  ‘त्रिउण्ड’ : आकर्षक पर्वतारोहण क्षेत्र

हिमाचल का अनमोल रत्न ‘त्रिउण्ड’ : आकर्षक पर्वतारोहण क्षेत्र

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जिस प्रकार स्वादिष्ट व्यंजनों की चर्चा भूखे व्यक्ति की भूख को ओर अधिक बढ़ा देती है उसी प्रकार त्रिउण्ड के प्राकृतिक सौंदर्य की चर्चा ने घुमक्कड़ों की लालसा को भी बढ़ा दिया होगा. जिन्होंने त्रिउण्ड की घुमक्कड़ी नहीं की है उनके मन में अवश्य ही ये प्रश्न उठ रहे होंगे कि त्रिउण्ड कैसे पहुंचा जाए,

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चम्बा के चीड़ से धनौल्टी के देवदार तक

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धनौल्टी देवदार के पेड़ों के बीच बसा हुआ है | इस छोटे से हिल स्टेशन के हर ओर के विहंगम दृश्य आपके मन को निश्चय ही मोह लेंगे है | पूरा पार्क देवदार के पेड़ों से आच्छादित है जिसके बीच से चलने के लिए लकड़ी से रास्ते बनाये गये हैं | हम लोग उन टेढ़े मेढ़े रास्तों से होते हुए आगे बढ़ने लगे और साथ ही साथ आने वाले हर एक मनमोहक दृश्यों का आनंद उठाते रहे |

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लखनऊ में हैं गर तो इमामबाड़ा देखना ना भूलियेगा जनाब !

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लखनऊ में हैं आप और बड़ा इमामबाड़ा नहीं देखा तो ऐसा ही है जैसे आगरा जाकर ताजमहल ना देख पाए हों या दिल्ली में होकर भी इंडिया गेट नहीं देख पाये.

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लखनऊ का इमामबाड़ा और शाही बावली की घुम्मकड़ी

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इमामबाड़े की दूर तक फैली सीढ़ियां तथा बाईं ओर शाही बावली और दाईं और नायाब मस्जिद के चित्र तत्कालीन वास्तुकला की भव्यता का सजीव चित्रण कर रहे थे. मैंने जूते उतारकर इमामबाड़े …

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ब्रह्माकुमारी  आश्रम  की यात्रा व आध्यात्मिक ज्ञान  के पल….!

ब्रह्माकुमारी आश्रम की यात्रा व आध्यात्मिक ज्ञान के पल….!

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अब मैं मध्य बर्थ पर था और पत्नी लोअर बर्थ पर. वह महिला जिससे बर्थ एक्सचेंज की थी वह ट्रेन चलते ही ऐसी निंद्रा में लीं हुई कि सवेरे चाय- नाश्ता की आवाजों के कोलाहल और चलकदमी से ही जागी. जैसी मुझे चिंता रहती है मिडिल या अपर बर्थ की ऐसी कोई दिक्कत तो नहीं हुई क्यूंकि एक बार सोने के लिए बेड पर जाने के बाद फिर तो मैं सवेरे ही उठता हूँ चाहे नींद न भी आये. बस बर्थ में शरीर को घुसाना और फिर स्वयं को समेटना– इन दो क्रियाओं के खतरों के कारण मैं लोअर बर्थ को बेहतर मानता हूं। यदि पत्नी के सहमति नहीं होती तो मैं उन महिला को उपकृत करने वाला नहीं थ. लगभग एक महीना पहले बुकिंग कराओ, लोअर सीट के लिए, और एक क्षण में एक आग्रह पर वह बर्थ आप किसी और को सौंप दें, यह तो कोई बात नहीं हुई. हालांकि पत्नी का सोचना इसके विपरीत है, चूँकि वह भी समय-समय पर अपनी यात्रा में लोअर बर्थ को हथियाने में निपुण है, तो उसके लॉजिक के अनुसार उस बर्थ पर किसी महिला को सोने देने में कुछ भी असहजता नहीं है. और यह कि लोअर बर्थ पर महिलाओं का पहला अधिकार नैसर्गिक रूप से बनता है (रेलवे के नियम चाहे जो कुछ हों).

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गणेशोत्सव का उत्साह और माँ गंगा का पावन स्नान … हरिद्वार।

गणेशोत्सव का उत्साह और माँ गंगा का पावन स्नान … हरिद्वार।

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अनायास ही मेरी नजर होटल की खिड़की से बाहर की तरफ गयी तो देखा की सभी लोग गंगा माता के मंदिर की तरफ बने घाट की सीढ़ियों पर पसर चुके थे, मतलब साफ़ है की माँ की आरती आरम्भ होने वाली है, हमने भी कमरा लॉक किये और सरपट दौड़े माता की आरती में शामिल होने को। ऑफ-सीजन होने के कारण किसी प्रकार की धक्का-मुक्की का सामना किये बगैर हमे मंदिर के पास ही आरती में शरीक होने का अवसर प्राप्त हुआ और जो दबंग पण्डे वगेरह अक्सर आपको आरती के समय दूर होने के लिए टोकते रहते थे आज वो स्वयं ही आरती की थाल हमारे हाथों में सौंप रहे थे माता की आरती उतारने को, हमें तो यकीं ही नहीं हो रहा था, खैर चलो छोडो। एक और महत्वपूर्ण बात यह थी की इस दरमियान ही मौसम भी करवट बदल चूका था और ग्रीष्म ऋतू अब शरद ऋतू का अहसास करवाने लगी थी, ऊपर से माँ गंगा की लहरों से उठती ठंडी हवाएं हमें बेबस किये जा रही थी वहीँ पर डेरा जमाये रखने को।

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सरधना– मैरी का चर्च, बेगम सुमरू और उनका राजप्रासाद

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गेट के निकट ही गाड़ी दीवार से सटाकर खड़ी कर हम अपना कैमरे का बैग और पानी की बोतल लिए एंट्री को तैयार थे, लेकिन गेट पर तैनात दो लोगों ने रोकते हुए साफ़ पूछा कि “क्या आप लोग कैथोलिक हैं?”, हम प्रश्न के लिए तैयार नहीं थे, फिर भी हमने दृढ़ता से उनके प्रश्न का नकारात्मक उत्तर देते हुए अपनी सम्बद्धता स्पष्ट की. पर उसने हमें साफ़ तौर से एंट्री देने से मना कर दिया. कारण: संडे के दिन १२ बजे तक का समय प्रार्थना के लिए निर्धारित है और उसमे केवल क्रिस्चियन ही जा सकते हैं. और भी तमाम लोग एंट्री की अपेक्षा में वहां मौजूद थे.

कुछ देर बाद फिर से प्रयास करने पर गेटमैन ने एंट्री दे दी हालाँकि अभी १२ बजने में लगभग २० मिनट शेष थे.

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रणकपुर से कुम्भलगढ़ की डायनामिक यात्रा – Ranakpur to Kumbhalgarh, a dynamic journey

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स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर दो पर मैं रणकपुर एक्सप्रेस का इंतज़ार कर रहा था जो समय से आधा घंट ही लेट थी (थैंक गॉड) | मेरे साथ कुल 10 सहयात्री रहे होंगे जिसमे से एक 4-5 स्टूडेंट्स का ग्रुप था | मैं अकेला बैठ सोच ही रहा था की किसी से कुछ वार्ता वगैरह शुरू की जाये तो समय पास हो पर सामने के जीआरपी रूम के खुले दरवाजे से एक पुलिस वाले द्वारा एक पतले दुबले युवक को पीटने की झलक मिली | अब किसी को ट्रेन की फ़िक्र नहीं रही और सभी लोग भिन्न भिन्न एंगल बनाकर दृश्य को देखने की कोशिश करने लगे |

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