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अन्नू भाई चला चकराता – पम्म पम्म पम्म – लाखामंडल

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कभी गाडी से इधर झांक, कभी उधर झांक | देखते के कुछ समझ आ जाए , क्यूंकि आगे तो हम लगातार देखे ही रहें थे आख्ने फाड़ें ,    हा हा हा …वहां गाड़ी की हेड लाइट की रोशनी में जो कुछ एक दो मीटर तक दिख रहा था बस समझो उस समय वही हमारी दुनिया थी बाकी तो कुछ दिख ही नहीं रहा था,थोड़ी देर बाद हमें खुद मालुम नहीं की कब कहाँ दो चार मकानो के बीच से होकर हमारी वो पथरीली सड़क गुजर रही थी (अँधेरा होने के कारण ) तब गाड़ी रोकी … वहीँ एक दो आदमी मिले। एक सज्जन से परिचय होने पर उन्होने बताया के वो रहने वाले तो बड़ोत (UP) के ही हैं।   यहाँ उनकी  पुरानी जमींन है, सो यहाँ भी रहते हैं।  वहीँ एक घर में भी बनी छोटी सी दूकान से दर्जनों  “पारले जी ” की बिस्कुट के पैकेट खरीद अन्नू और प्रवीण बाबू तो बिजी हो गए …..मै  वैसे भी भी बिस्कुट नहीं खाता और गाडी भी चला रहा था।  सो उन साहब से बातचीत कर आगे का हाल चाल और रास्ते का ब्यौरा ले चल पड़ा।

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हम चले अमृतसर की सैर को

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प्रोग्राम  अमृतसर जाने का तय हुआ, आरक्षण  कराया गया.४ नवम्बर की रात का स्वर्णमंदिर एक्सप्रेस (फ्रोंटिएर मेल) का जाने का तय हुआ, वापसी ६ नवम्बर को छत्तीसगढ़ एक्स्प. से थी. रेलवे स्टेशन पर जल्दी पहुँच कर, वंहा पर बैठ कर चाय वाय पीने का आनंद ही कुछ और होता हैं.

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गढ़वाल घुमक्कडी: कर्णप्रयाग – विष्णुप्रयाग – बद्रीनाथ

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चूँकि आज हमे सिर्फ़ बद्रीनाथ ही पहुँचना था (जो की यहाँ से मात्र 125 किमी ही है), इसलिए हम संगम पर काफ़ी देर बैठे मस्ती करते रहे. संगम का आनंद लेकर और दोनो नदियों के जल से विशुद्धि व उर्जा पाकर हम लोग आगे की यात्रा पर निकलने को तैय्यार थे. ढाबे पर नाश्ता करने के बाद, हम लोग सीधे बद्रीनाथ की बस लेने आ पहुँचे. थोड़ी देर इंतेज़ार के बाद, एकाध बसें आई पर सब खचाखच भारी हुई, पाँव रखने तक की जगह नही थी, यात्रा सीज़न मे ये एक आम नज़ारा है.

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