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दिल्ली से हाटु पीक नारकंडा की बाइक यात्रा

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हाटु पीक से करीब दो किलोमीटर पहले से ही सड़क पूरी तरह से बर्फ से ढकी हुई थी और जैसे ही हमने उसके ऊपर बाइक चलाने की कोशिश की, बाइक आगे जाने की बजाय पीछे की तरफ फिसलने लगी। हमारे पीछे कुछ फ़ीट पर खाई थी और रोकने के बावजूद बाइक पीछे की तरफ फिसल रही थी इसलिए मैंने बाइक को दाहिने हाथ के तरफ गिरा दिया जिससे बाइक का हैंडल बर्फ में धंस गया और बाइक रुक गयी।

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अंजनेरी पर्वत की पदयात्रा

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पर्वत की तलहटी वहाँ से लगभग २ किलोमीटर दूर थी. वहाँ तक का रास्ता घुमावदार, पथरीला और उबड़-खाबड़ था. उस पर चलने वाली गाड़ियाँ भयानक हिचकोले ले रहीं थी. पर पदयात्री की लिए, उस मौसम में, वह रास्ता बेहद ख़ूबसूरत नज़ारा पेश कर रहा था. मैं धरती पर नीचे उतर आये बादलों के बीच चल रहा था, पौधों और वृक्षों से हरे हो चुके पहाड़ों को निहार रहा था, कलकल बहने वाले झरनों की आवाज सुन रहा था, उन्मुक्त स्वच्छ हवा में साँसे ले रहा था. ऐसे में सड़कों का पथरीला होना क्या महत्व रखता है? तीन-चार घुमाव के बाद रास्ता समतल हो गया. अब तो प्रकृति की छटा देखते ही बनती थी. बस एक तस्वीर की कल्पना कीजिये

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पांडव लेनी (गुफा), नासिक की पदयात्रा

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नामकरण के किस्सों को जानने के पश्चात् मैं इन्हें देखने के लिए और लालायित हो उठा. कदम तेजी से बढ़ने लगे और मैं गुफा-वृन्द के गेट पर आ गया. वहां २४ लाजवाब गुफाएं थीं. पुरातत्व विभाग द्वारा एक बोर्ड भी लगा हुआ था, जिसमें बताया गया की वे गुफाएं लगभग २०० वर्षों में बनीं थीं. कई गुफाएं तत्कालीन सम्राटों और धनिक-सम्मानित लोगों के द्वारा दान में दी गयी राशि से बनाई गयीं थीं और बौद्ध धर्म के हीनयान सम्प्रदाय के अनुयायियों द्वारा उपयोग में लाई जातीं थीं.

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मोटरसाइकिल से दिल्ली – मंसूरी /धनोल्टी यात्रा

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सहस्त्रधारा में अंदर घुसते ही 10 रूपये/बाइक एंट्री फीस लगती है जो हमने दिया और अंदर चले गए. वहाँ जाकर हमने बाइक को एक दुकान के आगे खड़ा किया और दुकान वाले से दो लॉकर किराये पर लिया (50 रूपये एक लाकर ). अपना बैग और सामान लाकर के अंदर रखने के बाद हमने दुकान वाले को चाय नाश्ता के लिए बोला और पानी में नहाने के लिए चले गए.

अंदर पानी बहुत ही ठंडा था और वहाँ पर स्थानीय लोगो ने जगह-जगह दिवार बनायी थी इसलिए वह किसी स्विमिंग पूल की तरह दिख रहा था.
थोड़ी देर नहाने के बाद हम लोगो ने सहस्त्रधारा किनारे बैठ के चाय और परांठे खाये।

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उज्जैन यात्रा

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फिर अगले दिन हमने उज्जैन दर्शन किया महाकाल एरिया के पास आपको बहुत से ड्राइवर अपना कार्ड देंगे जिसमे घूमने की जगहों के नाम होंगे आप उसमे खुद अपनी इच्छा से नाम जोड़ और हटा सकते हैं हमारा ड्राइवर जो खुद एक मुस्लिम था पर उसकी भक्ति और ज्ञान देखकर हम बहुत प्रभाभित हुए, उसने हमें एक एक जगह का महत्व बताया और अच्छे से दर्शन करवाये, आप यदि उसका नंबर चाहते हैं तो नोट कर लीजिये नाम : ज़ाकिर ०८३४९८२५२०७ और गाड़ी थी मारुती वैन I

हमने शुरुआत की श्री रामकृष्ण आश्रम उज्जैन से जो की मानव सेवा में लगा हुआ है यहाँ पर एक सुंदर फिजियोथेरेपी क्लिनिक है जो गरीबो की सेवा करती है, हमने आश्रम की सुंदरता निहारते हुए जप किया और मंदिर के दर्शन किये I आश्रम में दान दिया और प्रसाद ग्रहण किया

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मुंबई की गुफाएँ – जोगेश्वरी देवी की खोज में

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इतने में कुछ विदेशी पर्यटक आ गए. बड़े-बड़े कैमरों के साथ. वे भी हनुमान मंदिर की तरफ जा रहे थे. मैं भी उनके पीछे चल पड़ा. वो रास्ता एक बड़े-से आँगन से हो कर जाता था, जिसके दोनों तरफ गुफ़ाएँ बनीं हुईं थीं. मेरे पुरोहित ने बताया था कि वर्तमान का वो आँगन पूर्व-काल में गुफ़ा ही था, जिसकी छत कालांतर में गिर चुकी थी. अगर वह गुफा का हिस्सा था, तब तो एक जमाने में वह गुफा बहुत-ही विशाल रही होगी. खैर आँगन से गुजर कर हम हनुमान-मंदिर पहुँचे और वहां दर्शन किया. मंदिर एक गुफा में बना हुआ था. कोई ज्यादा लोग नहीं थे. वहां से तुरंत ही सभी निकल पड़े और फिर गणेश मंदिर तक आये. वह नजदीक ही था. वह भी एक गुफा में बना हुआ था.

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संजय गाँधी राष्ट्रीय उद्यान, मुंबई की पदयात्रा – “कान्हेरी गुफा”

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पर एक बात थी. कान्हेरी पहाड़ का वह स्थान बिलकुल वीरान था. इतना वीरान कि गुफाओं के अन्दर अकेले जाने में ऐसा महसूस हो कि कोई वहां पहले से मौजूद है, जो आपको निरंतर देख रहा है. उस वीरानी में मन में कई ख़याल आते हैं. जैसे कि क्या वहां जाने वाले का कोई सम्बन्ध पश्चात काल में उस गुफा से था और उसी सम्बन्ध के सहारे वह इस जीवन में भी वहां लौट कर आया हो? उस अंतिम गुफा में बैठ कर मैंने अपनी एक कविता का प्रथम अन्तरा लिखा. इस कविता के दूसरे अंतरे बाद में मुंबई के अन्य गुफाओं की यात्रा में पूर्ण हुए.

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दिल्ली से कैंची धाम और नैनीताल की यात्रा दो दिनो मैं

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कैंची धाम पहुँच कर के वहाँ पहाड़ी नींबू का शर्बत पिया और मंदिर मैं जा कर के थोड़ी देर मंदिर परिसर मैं बाबा के आसन के पास बैठा रहा, मैं जब वहाँ मंदिर परिसर मैं बैठा हुआ था तो मन मैं शांति का एहसास हो रहा था और बिलकुल भी इच्छा नहीं हो रही थी की मैं वहाँ से जाऊँ, पहले सोचा था की मंदिर परिसर मैं सिर्फ 10 मिनट तक रहूँगा लेकिन मैं उससे काफी ज़्यादा समय तक वहीं रहा और नहीं जानता कितनी देर तक बस वहाँ बैठ कर के मैं उस शांति के एहसास को महसूस कर रहा था, लेकिन मुझे वहाँ से चलना ही था मेरे पास समय की कमी थी शायद कभी मैं वहाँ फिर जा कर के एक या दो दिनो तक का समय बिताऊँ।

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कृष्णागिरी उपवन, संजय गाँधी राष्ट्रीय उद्यान- मुंबई पदयात्रा

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परन्तु मुझे आकर्षित किया उनके केलों ने. खूब सुन्दर और पुष्ट केले थे. मुझे केले खरीदता देख कर एक स्त्री ने मुझे समझाया कि मैं खीरे ले लूं और केले छोड़ दूँ. पर मैं कहाँ मानने वाला था. बस जैसे ही मैंने केले ख़रीदे, वृक्षों की डालों से तेजी-से उतर कर करीबन २०-२५ बंदरों ने मुझे घेर लिया. घबरा कर मैंने केले वहीँ जमीन पर फेंके, जो क्षण-भर में ही बंदरों द्वारा लूट लिए गए. अब उस डंडे से लैस व्यक्ति ने बंदरों को भगाने के लिए डंडा भाजना शुरू किया. बन्दर भाग गए. अब यह तो नहीं पता कि डंडे से भागे या केले चट कर के भागे. मैंने उन दोनों स्त्रियों को समझाने की कोशिश की कि जब यहाँ बंदरों का उत्पात है तो केले बेचते ही क्यों हो. दोनों स्त्रियाँ मुस्कुरायीं क्योंकि आज उन्हें एक और शहरी आदमी मिला था, जो जंगल में बिना देखे चलता था.

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विश्व विपासना पैगोडा, मुंबई की यात्रा

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सुरक्षा-जाँच वाले कमरे की छत से जो रौशनी की बल्ब्स लटक रहे थे, उनकी डिजाईन देखने योग्य थी. जाँच के पश्चात पैगोडा की निचली मंजिल पर पहुंचे, जहाँ देखने के लिए कई स्थल थे. सीढ़ी के दोनों तरफ कलात्मक चबूतरे थे. एक चबूतरे पर बड़ा-सा घंटा लिए हुए मनुष्यों की प्रतिमाएं थीं और दुसरे चबूतरे पर घरियाल लिए हुए मनुष्यों की प्रतिमाएं थीं. इसलिए पहले को Bell-tower और दुसरे को Gong-tower कहा जाता था. यह दोनों स्थल लोगों में बहुत प्रिय थे क्योंकि इन पर चढ़ना मना नहीं था. लोग इन पर चढ़ कर अपनी सेल्फी ले सकते थे और साथ ही इन्हें बजा भी सकते थे.

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पंचवटी की यात्रा – भाग २

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पंचवटी का शाब्दिक अर्थ है, “पांच बड़/बरगद के वृक्षों से बना कुञ्ज”. अब हम उस स्थान में प्रवेश कर रहे थे, जहाँ रामायण काल में श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजी ने निवास किया था. पर्णकुटी तो इतने दिनों तक अब शेष नहीं रह सकती. पर पांच वृक्षों से घिरा वह कुञ्ज आज भी शेष दिखाया जा रहा है. सभी पांच वृक्षों पर नंबर लगा दिए गए थे, ताकि लोग उन्हें देख कर गिन सकें. वर्तमान में उन पांच वृक्षों के कुंज के बीच से ही पक्का रास्ता भी बना हुआ था, जिस पर एक ऑटो-स्टैंड भी मौजूद था और साधारण यातायात चालू था. बरगद के वे वृक्ष काफी ऊँचे हो गए थे. श्रधालुओं ने उन वृक्षों की पूजन स्वरूप उनपर कच्चे धागे भी लपेटे थे. हमलोगों ने पहली बार पंचवटी से साक्षात्कार किया.

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पंचवटी की यात्रा – भाग १

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नारोशंकर मंदिर की छत अपने आप में स्थापत्य-कला के लिए प्रसिद्ध है. काफ़ी विदेशी पर्यटक इस मंदिर की छत का अध्धयन करने आते हैं. चट्टानों के नक्काशीदार टुकड़े सिर्फ उन टुकड़ों पर बने खांच में लग कर अभी तक खड़े है. मंदिर के अन्दर के सभा मंडप में एक नंदी और एक कछुए की मूर्ति है. कछुए की मूर्ति तो जमीन के सतह पर ही अंकित है. कुछ ऐसा-ही त्रैम्बकेश्वर मंदिर में भी देखने को मिलता है. मंदिर के बाहर के प्रांगन में भी कई कलात्मक आकृतियाँ हैं, जैसे की काल-सर्प की प्रतिमा. नारोशंकर मंदिर में कुछ समय बिताने के बाद हमलोग फिर से राम-तीर्थ की तरफ बढ़े.

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