Historical

The Amazing Story of Lucknow’s Bada Imambada

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Despite the continuous building and breaking, the Bada Imambada turned out to be magnificient. It rivalled the Moghul architecture. No iron or cement has been used in the building. The imambada boasts of one of the largest arched structure with no supporting beams. Under this vaulted chamber lies the simple grave of the Nawab.The grave of the architect also lies in the main hall. Asafuddaulah was truly generous and class blind.

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Sankaram and Kotturu

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Andhra was a bastion of Buddhism for at least a thousand years. It was a centre of learning and Buddhism spread out to Sri Lanka and South East Asia through its ports. The stupas and monasteries provided the architectural models for the more famous Buddhist shrines in the rest of the world like the famous Borobodur in Indonesia. The Buddhist phase lasted for nearly a thousand years till the rise of Shaivism in the 7th century CE obliterated Buddhism from this region. It is sad that while these places attract visitors from all over the Buddhist world, Indians are not aware of the existence of these places.In this series, I am retracing the footsteps of those distant ancestors of mine.

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ताजमहल- बेपनाह मोहब्बत की अनमोल निशानी ……………

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साथियों, इस श्रंखला की पिछली पोस्ट में मैंने आपलोगों को अपनी वृन्दावन यात्रा तथा वहां के अनुभवों के बारे में बताया था। वृन्दावन से लौट…

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उदयपुर – जगदीश मंदिर – माउंट आबू हेतु प्रयाण

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वहां से निकल कर अगला पड़ाव था – जगदीश मंदिर ! मैं चूंकि एक घंटा पहले यहां तक आ चुका था अतः मुझे बड़ा अच्छा सा लग रहा था कि अब मैं अपने परिवार के लिये गाइड का रोल निर्वहन कर सकता हूं। परन्तु पहली बार तो मैं मंदिर की सीढ़ियों के नीचे से ही वापिस चला गया था। ऊपर मेरे लिये क्या – क्या आकर्षण मौजूद हैं, इसका मुझे आभास भी नहीं था। मंदिर की सीढ़ियों के नीचे दो फूल वालियां अपने टोकरे में फूल – मालायें लिये बैठी थीं । माला खरीद कर हम सीढ़ियों पर बढ़ चले। भाईसाहब का कई वर्ष पूर्व एक्सीडेंट हुआ था, तब से उनको सीढ़ियां चढ़ने में असुविधा होती है। वह बोले कि मैं टैक्सी में ही बैठता हूं, तुम लोग दर्शन करके आओ। मैने कहा कि टैक्सी में बैठे रहने की कोई जरूरत नहीं। मुझे एक दूसरा रास्ता मालूम है मैं आपको वहां से मंदिर में ले चलूंगा। उसमें दो-तीन सीढ़ियां ही आयेंगी। वह आश्चर्यचकित हो गये कि मुझे इस मंदिर के रास्तों के बारे में इतनी गहन जानकारी कैसे है। वास्तव में, जब मैं पैदल घूम रहा था तो एक बहुत ढलावदार रास्ते से होकर मैं मंदिर के प्रवेश द्वार तक आया था। उस ढलावदार रास्ते पर भी जगदीश मंदिर के लिये छोटा सा प्रवेश द्वार दिखाई दिया था। भाईसाहब इतनी सारी सीढ़ियां नहीं चढ़ सकते थे क्योंकि उनका घुटना पूरा नहीं मुड़ पाता परन्तु ढलावदार रास्ते पर चलने में कोई दिक्कत नहीं थी। मेरी जिस ’आवारागर्दी’ को लेकर सुबह ये तीनों लोग खफा नज़र आ रहे थे, अब तीनों ही बहुत खुश थे। आखिर इसी ’आवारागर्दी’ (जिसे मैं घुमक्कड़ी कहना ज्यादा पसन्द करता हूं) की वज़ह से भाईसाहब को मंदिर के दर्शन जो हो गये थे।

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Hilltop monasteries on the seaside

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What Jawaharlal Nehru had said about India is equally applicable to my hometown, Visakhapatnam, better known as Vizag. It is a young city with a history that goes back to the prehistoric period. In this series, I shall revisit the footprints left on the sands of time in and around Vizag by the early Buddhists.

I shall start at Thotlakonda, a 130 metre high hillock overlooking the famed beaches of Vizag. The Buddhist settlement was accidentally discovered in 1988 by Naval personnel were carrying out an aerial survey for setting up some facility.

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Hotel Wonder View Udaipur

उदयपुर और माउंट आबू घूमने चलें?

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अंततः वह क्षण भी आया जब उस प्रतीक्षालय की दीवारों पर लगे हुए इलेक्ट्रॉनिक डिस्प्ले बोर्ड पर हमारी फ्लाइट का ज़िक्र आया और सभी यात्रियों को बस में बैठने हेतु उद्‌घोषणा की गई। पत्नी ने कहा कि बस की क्या जरूरत है, पैदल ही चलते हैं तो उसके जीजाजी ने कहा कि चिंता ना करै ! टिकट नहीं लगता। मैं एयरपोर्ट की बस में बैठते ही कैमरा लेकर ठीक ऐसे ही एलर्ट हो गया जैसे बॉर्डर पर हमारे वीर जवान सन्नद्ध रहते हैं। दो – तीन मिनट की उस यात्रा में वायुयान तक पहुंचने तक भी बीस-तीस फोटो खींच डालीं!

जब अपने वायुयान के आगे पहुंचे तो बड़ी निराशा हुई! बहुत छोटा सा (सिर्फ 38 सीटर) जहाज था वह भी सफेद पुता हुआ। मुझे लगा कि मैं छः फुटा जवान इसमें कैसे खड़ा हो पाउंगा ! सिर झुका कर बैठना पड़ेगा! एयर डैक्कन एयरलाइंस के इस विमान में, जिसका दिल्ली से उदयपुर तक का हमने सिर्फ 1201 रुपये किराया अदा किया था, हम अन्दर प्रविष्ट हुए तो ऐसा नहीं लगा कि सिर झुका कर चलना पड़ रहा है। सिर्फ बाहर से ही ऐसा लग रहा था कि जहाज में घुस नहीं पाउंगा। खैर अन्दर पहुंच कर अपनी सीटें संभाल लीं। मुझे खिड़की वाली सीट चाहिये थी सो किसी ने कोई आपत्ति दर्ज़ नहीं की। अन्दर सब कुछ साफ-सुथरा था। एयरहोस्टेस भी ठीक-ठाक थी। यात्रा के दौरान सुरक्षा इंतज़ामों का परिचय देने की औपचारिकता का उसने एक मिनट से भी कम समय में निर्वहन कर दिया। सच तो यह है कि कोई भी एयरलाइंस, यात्रा के शुभारंभ के समय दुर्घटना, एमरजेंसी, अग्नि शमन जैसे विषय पर बात करके यात्रियों को आतंकित नहीं करना चाहती हैं पर चूंकि emergency procedures के बारे में यात्रियों को बताना कानूनन जरूरी है, अतः इसे मात्र एक औपचारिकता के रूप में फटाफट निबटा दिया जाता है। यात्रियों को समझ कुछ भी नहीं आता कि किस बटन को दबाने से ऑक्सीज़न मास्क रिलीज़ होगा और उसे कैसे अपने नाक पर फिट करना है। एमरजेंसी लैंडिंग की स्थिति में क्या-क्या करना है और कैसे – कैसे करना है। अगर कभी दुर्घटना की स्थिति बनती है तो यात्रियों में हाहाकार मच जाता है, वह निस्सहाय, निरुपाय रहते हैं, कुछ समझ नहीं पाते कि क्या करें और क्या न करें! मेरे विचार से इसका कोई न कोई मध्यमार्ग निकाला जाना चाहिये। अस्तु !

कुछ ही क्षणों में हमारे पायलट महोदय ने प्रवेश किया और बिना हमारा अभिनन्दन किये ही कॉकपिट में चले गये। उनके पीछे – पीछे एयरहोस्टेस भी चली गई पर जल्दी ही वापस आ गई और हमें अपनी अपनी बैल्ट कसने के निर्देश दिये। मैने अपनी पैंट की बैल्ट और कस ली तो श्रीमती जी ने कहा कि सीट की बैल्ट कसो, पैंट की नहीं ! अपनी ही नहीं, मेरी सीट की भी। मैने एयरहोस्टेस को इशारा किया और कहा कि मेरी सीट की बैल्ट कस दे। (सिर्फ 1201 रुपये दिये हैं तो उससे क्या? आखिर हैं तो हम वायुयान के यात्री ही ! एयरहोस्टेस पर इतना अधिकार तो बनता ही है!) अब मुझे भी समझ आ गया था कि सीट बैल्ट कैसे कसी जायेगी अतः पत्नी की सीट की भी बैल्ट मैने कस दी। मुझे खिड़की में से अपने जहाज की पंखड़िया घूमती हुई दिखाई दीं, द्वार पहले ही बन्द किये जा चुके थे। एयर स्ट्रिप पर निगाह पड़ी तो पुराना चुटकुला याद आया। “जीतो ने संता से अपनी पहली हवाई यात्रा के दौरान खिड़की से बाहर झांकते हुए कहा कि बंता ठीक कहता था कि हवाई जहाज की खिड़की से झांक कर देखो तो जमीन पर चलते हुए लोग बिल्कुल चींटियों जैसे लगते हैं! संता ने जीतो को झिड़का, “अरी बुद्धू ! ये चींटियां ही हैं, अभी जहाज उड़ा ही कहां है!” चलो खैर !

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Single day venture to Taj

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There is a separate line for women there, usually that is longer. And you would have a bunch of touts who would offer you options to by pass the long queue. Totally avoidable. The line moves fast and shouldn’t take you more than 10 minutes. 20 bucks per ticket, if you are an Indian citizen and INR 250 for foreign tourists. Also kids up to the age of 15 have free entry.  Do not carry anything except your camera and phone inside. Usually the security would withhold everything else, even my son’s dinosaur toys.

It is usually crowded and stuffed inside the tomb. Do not try to click a pic inside with your mobile. There is an old caretaker who would snatch your phone and throw it outside. Yes. Once you are out and on your way back, at the exit there would be people trying to sell you small mementos of Taj. The fair price is 20 bucks, so don’t get tricked like me. I paid 50 per piece and was superbly excited about my skills to bargain when another kid walked up and offered me the same for 15-20 bucks per piece.

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The Indomitable Daulatabad Fort, Aurangabad

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As you enter the fort, you are greeted by this tall minar – Chand Minar. It used to be covered with Persian glazed tiles. Now they have whitewashed it in faded orange colour. You want to strangle the person who ordered this colour. The minar was built by Ahmed Shah II to celebrate the capture of the fort. To approach from the front one has to go through three bastions of fortified walls.

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A Glimpse Of Jaipur

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Upon entering the walled city, we were immediately accosted by each and every shopkeeper of each and every shop in the myriad bazaars within. This was annoying enough for us as Indians. It must be downright intimidating for the foreigners.

The shopkeepers aggressive sales pitch were a big put off. Having said that, I could see why Jaipur is called a shoppers paradise. Though most of the wares on offer were touristy tat, there was certainly a huge variety of some rather good tat as well. I succumbed and did not leave without my fair share of purchases though I would have bought a lot more had it not been such a nuisance having to bargain fiercely in every store. Initial prices quoted anywhere were at least 3 to 4 times higher than the final settled amount. The haggling became just too much of an effort and I decided not to buy anything more. The Jaipur traders are geared to sell to the foreign tourist though I doubt that most foreigners would pay such steep prices, they probably drive a much harder bargain than we do. One cannot even walk in peace without being constantly assailed by men beseeching you to enter their shops.

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हरिद्वार और देहरादून का तूफानी दौरा – २

हरिद्वार और देहरादून का तूफानी दौरा – २

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मेरा विचार था कि बुद्धा टैंपिल मेरे 1980 में देहरादून छोड़ देने के बाद अस्तित्व में आया है किन्तु जब मैने भाई से पूछा तो उसने बताया कि पहले ये इतना लोकप्रिय नहीं हुआ करता था अतः हम लोग पहले यहां आया नहीं करते थे। पिछले कुछ वर्षों से, जब से ISBT यहां पास में बनी है और इस क्षेत्र में जनसंख्या भी बढ़ गई और बाज़ार भी बन गये तो लोगों को पता चला कि ऐसा कोई सुन्दर सा मंदिर भी यहां आसपास में है। क्लेमेंटाउन में स्थित इस बौद्ध मठ के बारे बाद में मैने जानने का प्रयास किया तो इसके महत्व की अनुभूति हुई। यह मठ तिब्बत के विश्वविख्यात बौद्ध मठ की प्रतिकृति है और इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसके मुख्य भवन की दीवारों पर मौजूद भित्तिचित्र हैं, कलाकृतियां हैं जिनके माध्यम से भगवान बुद्ध के जीवन की अनेकानेक घटनाओं को अंकित किया गया है। (इनका चित्र लेना मना है)। इसका निर्माण वर्ष 1965 में हुआ बताया जाता है। लगभग पचास कलाकार तीन वर्ष तक इन दीवारों पर स्वर्णिम रंग के पेंट से कलाकृतियां बनाते रहे हैं तब जाकर यह कार्य पूरा हुआ। बहुत दूर से ही इस मंदिर का स्तूप दिखाई देता है जो 220 फीट ऊंचा है। यह जापान की वास्तुकला शैली पर आधारित है। इस मुख्य भवन में पांच मंजिलें हैं और हर मंजिल पर भगवान बुद्ध की व अन्य अनेकानेक प्रतिमायें भी स्थापित की गई हैं। यह मानव की स्वभावगत कमजोरी है कि वह जिस कला को देखकर प्रारंभ में चकित रह जाता है, बाद में उसी कला के और भी अगणित नमूने सामने आते रहें तो धीरे-धीरे उसका उत्साह भी कम होता जाता है। बहुत ज्यादा ध्यान से वह हर चीज़ का अध्ययन नहीं कर पाता। पहली मंजिल पर स्थित कलाकृतियों और प्रतिमाओं को देखने में हमने जितना समय लगाया उससे थोड़ा सा ज्यादा समय में हमने बाकी चारों मंजिलें देख लीं ! शायद इसकी एक मुख्य वज़ह ये है कि हम उन सब कलाकृतियों को समझ नहीं पा रहे थे और हमें सब कुछ एक जैसा सा लग रहा था। कोई गाइड यदि वहां होता जो एक-एक चीज़ का महत्व समझाता तो अलग बात होती।

मुख्य मंडप में से निकल कर सीढ़ियां उतर कर लॉन में आये तो बायें ओर भी एक स्तंभ दिखाई दिया। लॉन में एक धर्मचक्र स्थापित किया गया है। आपने तिब्बतियों को अपने हाथ में एक धर्मचक्र लिये हुए और उसे हाथ की हल्के से दी जाने वाली जुंबिश से निरंतर घुमाते हुए देखा होगा। वे पोर्टेबल धर्मचक्र वास्तव में इसी धर्मचक्र की अनुकृतियां हैं। इस स्तूप में लगभग 500 लामा धार्मिक शिक्षा ग्रहण करते हैं। बताया जाता है कि तिब्बत के बाद यह एशिया का सबसे बड़ा स्तूप है।

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हरिद्वार और देहरादून का तूफानी दौरा

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तो साब! ऐसे बना हमारा हरिद्वार का प्रोग्राम जिसमें मेरा कतई कोई योगदान नहीं था। घर के ताले – कुंडे बन्द कर के हम चारों अपनी बुढ़िया कार में बैठे, रास्ते में सबसे पहले पंपे पर गाड़ी रोकी, पांच सौ रुपल्ली का पैट्रोल गाड़ी को पिलाया, गाड़ी में फूंक भरी (मतलब हवा चैक कराई) और हरिद्वार की दिशा में चल पड़े! मारुति कार में और चाहे कितनी भी बुराइयां हों, पर एक अच्छी बात है! हवा-पानी-पैट्रोल चैक करो और चल पड़ो ! गाड़ी रास्ते में दगा नहीं देती !

चल तो दिये पर कहां ठहरेंगे, कुछ ठिकाना नहीं ! गर्मी के दिन थे, शनिवार था – ऐसे में हरिद्वार में बहुत अधिक भीड़ होती है। नेहा इतनी impulsive कभी नहीं होती कि बिना सोचे – विचारे यूं ही घूमने चल पड़े पर बच्चों की इच्छा के आगे वह भी नत-मस्तक थी! मन में यह बात भी थी कि अगर हरिद्वार में कोई भी सुविधाजनक जगह ठहरने के लिये नहीं मिली तो किसी न किसी रिश्तेदार के घर जाकर पसर जायेंगे! “आपकी बड़ी याद आ रही थी, कल रात आपको सपने में देखा, तब से बड़ी चिन्ता सी हो रही थी ! सोचा, मिल कर आना चाहिये!” अपनी प्यारी बड़ी बहना को छोटी बहिन इतना कह दे तो पर्याप्त है, फिर आवाभगत में कमी हो ही नहीं सकती!

कार ड्राइव करते हुए मुझे अक्सर ऐसे लोगों पर कोफ्त होती है जो ट्रैफिक सैंस का परिचय नहीं देते। मैं यह कह कर कि “इन लोगों को तो गोली मार देनी चाहिये” अपना गुस्सा अभिव्यक्त कर लिया करता हूं! बच्चे मेरी इस आदत से परिचित हैं और उन्होंने अब इसे एक खेल का रूप दे दिया है। जब भी सड़क पर कुछ गलत होता दिखाई देता है तो मेरे कुछ कहने से पहले ही तीनों में से कोई न कोई बोल देता है, “आप शांति से ड्राइव करते रहो! गोली तो इसे हम मार देंगे।” मुझे भी हंसी आ जाती है और गुस्सा काफूर हो जाता है।

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अमृतसर में अटारी – वाघा बार्डर

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हम जब शाम को पांच बजे स्वर्ण जयंती द्वार पर पहुंचे तो सारी बैंच पूरी तरह से ठसाठस भरी हुई थीं।  जब मैने द्वार पर खड़े बी.एस.एफ. के अधिकारी को प्रेस पास दिखाया और कहा कि मुझे आगे जाने दें तो उन्होंने वी.आई.पी. लाउंज के लिये प्रवेश द्वार 3 की ओर इंगित किया और कहा कि आप वहां कोशिश करें।  मैं उधर भागा पर वहां कोई सुनवाई नहीं हुई !  वहां विदेशियों और कुछ वी.आई.पी. महिलाओं, युवतियों और बच्चों को जाने दिया जा रहा था।  अतः फिर वापिस भागा और स्वर्ण जयंती द्वार की सीढ़ियां चढ़ कर वहां पहुंचा जहां पहले ही मानों पूरा हिन्दुस्तान आकर सीटों पर जमा हुआ था।  अपने कैमरे के लिये मुझे जो सर्वश्रेष्ठ स्थान उपलब्ध हो सका वहां जाकर मैं खड़ा होगया।  बड़ा ही मजेदार दृश्य सामने था।  स्वर्ण जयंती द्वार से लेकर पाकिस्तान वाले द्वार तक तिरंगा झंडा हाथ में लेकर भागते हुए जाने और वापिस आने के लिये महिलाओं की लाइन लगी हुई थी।  उनको बी.एस.एफ. के इस अभियान के संयोजक एक अधिकारी तिरंगे झंडे देते थे और भागने का इशारा करते थे।  युवा, प्रौढ़ और यहां तक कि वृद्ध महिलाएं भी बड़े उत्साह से तिरंगा हाथ में लेकर पाकिस्तान की सीमा तक भागती हुई जाती थीं और फिर वापस आती थीं।  हज़ारों की संख्या में दर्शक गण भारत माता की जय, वंदे मातरम्‌,  हर-हर, बम-बम नारे लगा कर उनका उत्साह-वर्धन कर रहे थे।  दर्शकों के उत्साह का आलम कुछ ऐसा था मानों वह वृद्ध महिला नहीं बल्कि पाकिस्तान के बैट्समैन को आउट करने के लिये भारतीय क्रिकेट टीम का बॉलर दौड़ रहा हो। पन्द्रह मिनट तक यह कार्यक्रम चलता रहा फिर महिलाएं, युवतियां और स्कूली बच्चे डांस करने के लिये अपनी अपनी सीट छोड़ कर सड़क पर उतर आये।  पन्द्रह मिनट तक धुआंधार कमर मटकाई गईं और जनता गला फाड़ – फाड़ कर अपने उत्साह का प्रदर्शन करती रही।  सबसे मजेदार बात ये थी कि पाकिस्तान वाले गेट के उस पार भी एक स्टेडियम नज़र आ रहा था जहां तीस-चालीस दर्शक बैठे हुए दिखाई दे रहे थे।  इस ओर हज़ारों दर्शकों का अदम्य उत्साह, नारेबाजी और कान के पर्दे फाड़ देने लायक शोर और उधर केवल मात्र तीस – चालीस दर्शक! अब अगर ऐसे में पाकिस्तानी हुक्मरान डिप्रेशन का शिकार न हों तो क्या हों? मुझे तो लग रहा था कि पाकिस्तान वाली साइड में बैठे दर्शकों का भी मन कर रहा होगा कि हिन्दुस्तान वाला कार्यक्रम देखें पर अनुमति न होने के कारण मन मसोस कर रह जाते होंगे।

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