अमृतसर में अटारी – वाघा बार्डर

लगभग साढ़े तीन बजे इंटरकॉम की घंटी बजी। होटल रिसेप्शन से यह बताने के लिये फोन था कि वाघा बॉर्डर ले जाने के लिये टैक्सी आ गई है।  नीचे जा कर देखा तो एक ड्राइवर महोदय हमें लेकर जाने के लिये खड़े थे। होटल से बाहर आये तो गाड़ी दिखाई नहीं दी।  पूछा तो पता चला कि इस गली में नहीं आ सकती थी, अतः बाहर है।  जैसा कि धीरे – धीरे ज्ञान प्राप्ति हुई, बाहर का अर्थ था, लगभग आधा किमी दूर चौक फव्वारे की पार्किंग !   पर, फव्वारा चौक के आगे स्वर्ण मंदिर की ओर पुलिस का बैरियर लगा हुआ था।  मैने स्वर्ण मंदिर प्रबन्धकों के वाहन फव्वारे चौक से आगे मंदिर के प्रवेश द्वार तक जाते देखे हैं किन्तु उस अपवाद को जाने दें तो आम व्यावसायिक वाहनों का इस प्वाइंट से आगे जाना मना है।

ड्राइवर महोदय हमें वहीं चौक पर खड़ा छोड़ कर पार्किंग में से अपनी गाड़ी लाने के लिये चले गये। मेरे साथ तीन परिवार और भी थे।  मुझे अभी तक यह समझ नहीं आया था कि ऐसी कौन सी गाड़ी आ रही है जिसमें हम बारह लोग यात्रा करेंगे।  जब दो ही मिनट में टाटा की एस यू वी सामने आकर खड़ी हुई तो देखा कि उसमें दो सीट आगे, तीन सीट बीच में और दो आमने सामने सबसे पीछे थीं, यानि कुल मिला कर सात सीटर !  बस, इसी बात पर पंगा हो गया।  ड्राइवर महोदय की इच्छा थी कि तीन अवयस्क बच्चों और खुद चालक सहित हम सब बारह लोग उस गाड़ी में समा जायें जो केवल इस स्थिति में संभव होता यदि बच्चों को फर्श पर बैठने को कहा जाये और मैं भी अपने साथ एक बच्चे को समायोजित कर लूं। सवारियों में मेरे अतिरिक्त बाकी तो परिवार थे अतः मैं अकेला होने के कारण सबसे पहले सबसे आगे की सीट पर (ड्राइवर सीट के बगल में) बैठ गया था।  दस – पन्द्रह मिनट की झक – झक के बाद एक परिवार ने क्षोभ के कारण इस गाड़ी से जाने का कार्यक्रम निरस्त कर दिया।  अब बाकी हम सब आराम से पैर फैला कर बैठ गये। ड्राइवर महोदय किड़ – किड़ करते रहे कि उनका भयंकर आर्थिक नुकसान हो गया है पर हमने कहा कि बंधु, अगर 7 सवारियों में आपका पड़ता नहीं खाता तो रेट अधिक कर दो पर लक्ज़री गाड़ी के नाम पर हमें ऐसे ले जाने का प्रयास तो न करो जैसे आलू के बोरे लाद रखे हों !  गाड़ी का एसी बहुत जानदार था अतः मुझे पांच मिनट में ही असुविधा होने लगी थी।  मैने अपने आस – पास की duct का मुंह ड्राइवर की ओर कर के प्रयास किया कि ठंडी हवा की बौछार सीधी मेरे ऊपर न आये पर जब उससे भी बात नहीं बनी तो खुद ही ए.सी. की पावर कम कर दी।

जय जवान


हम अटारी बॉर्डर की ओर तेजी से बढ़ रहे थे और मेरा मन कल्पना की उड़ान भर रहा था कि भारत और पाकिस्तान की सीमा कैसी लगती होगी !  और किसी भी देश के बॉर्डर को लेकर हमारे मन में इतनी उत्सुकता शायद न रहे पर पाकिस्तान की तो बात ही अलग है।  जो देश कुछ दशक पूर्व तक हमारे देश का अभिन्न अंग था, और अपने जन्म से लेकर आज तक निरंतर हमसे पंगे लेने की कोशिश करता रहता है, अटारी बार्डर पार करते ही वह देश हमारे सामने आने वाला है, यह सोच-सोच कर मन व्यग्र हो रहा था।

लगभग ३० किमी की यात्रा करके, अटारी बॉर्डर पर पहुंचे।  हमें होटल से पता चला था कि हम कैमरा और मोबाइल लेकर जा सकते हैं, फोटो खींचने की कोई मनाही नहीं है, परन्तु और कोई बैग, हैंड बैग, लेडीज़ पर्स आदि ले जाने की अनुमति नहीं है।  इसके बावजूद एक परिवार अपने साथ ढेर सारे बैग गाड़ी में रख कर लाया था क्योंकि वापसी में उनको सीधे रेलवे स्टेशन जाकर ट्रेन पकड़नी थी।  अटारी बॉर्डर से भी एक किमी पहले एक रेस्टोरेंट पर टैक्सी खड़ी करके ड्राइवर महोदय ने कहा कि आगे पैदल जाइये और अपने बैग आदि सभी सामान इस रेस्टोरेंट में जमा करा कर रसीद लेते जाइये। ।  ड्राइवर ने साफ मना कर दिया था कि गाड़ी में कोई भी बैग नहीं रक्खा जा सकता है।   मैने कैमरा अपने कंधे पर टांग लिया और खाली बैग जिसमें सिर्फ होटल की चाबी थी, उस रेस्टोरेंट में देना चाहा तो वह तीस रुपये प्रति नग मांगने लगे।  मैने साफ मना कर दिया और बैग टैक्सी में ही रखना चाहा तो ड्राइवर ने नखरे किये परन्तु “सामान की मेरी कोई जिम्मेदारी नहीं है” कहते हुए बैग मेरी सीट पर डाल दिया।  मुझे लगता है कि टैक्सी वाले की उस रेस्टोरेंट वाले से पक्की सैटिंग थी वरना बैग गाड़ी में भी रक्खे हुए क्या मांग रहे थे?   एक किमी आगे तक भी हमें कारें, टैक्सियां, बसें आदि जाती हुई मिलीं !  पाकिस्तान जाने वाले ट्रकों की तो पूरी एक किमी लंबाई तक लाइन लगी हुई थी ज्यादातर ट्रकों में प्याज, आलू आदि के बोरे लदे हुए मिले।  मुझे आश्चर्य हो रहा था कि हमारी जेब की तलाशी लेने वाले सैन्य अधिकारी इन ट्रकों की तलाशी कैसे ले पायेंगे?  इन बोरों के अन्दर क्या – क्या भरा हुआ है, किसी स्कैनर मशीन से ही पता लगाया जा सके तो अलग बात है, एक-एक बोरे को खोल कर तो देखा नहीं जा सकता।  वैसे भी १०० से अधिक ट्रक खड़े हुए थे।

एक किमी पैदल चलने के बाद हमारी तलाशी ली गई और सामने ही स्वर्ण जयंती द्वार दिखाई दिया जिसके बाद लगभग २०० कदम दूरी पर एक और द्वार था, जिसके बाद पाकिस्तान शुरु हो जाता है।  इस स्वर्ण जयंती द्वार और पाकिस्तान की सीमा के बीच में दर्शकों के लिये स्टेडियम जैसी सीढ़ियां  बना कर परेड दिखाने की व्यवस्था की गई है।  वहां लगे हुए एक सूचना पट्ट से जानकारी मिली कि इस स्वर्णजयंती द्वार और इस स्टेडियम के निर्माण का श्रेय लालकृष्ण आडवाणी को है जिन्होंने अटल बाजपेयी की सरकार में गृहमंत्री रहते हुए इस द्वार और स्टेडियम का निर्माण कराया। जब मैने वापसी में ड्राइवर महोदय से आडवाणी के इस काम की तारीफ की तो वह बोले, “आप कभी गरमी या बरसात में आकर देखिये कि क्या हालत होती है दर्शकों की! साढ़े पांच बजे से छः बजे के बीच में  परेड होती है परन्तु दर्शक अच्छी सीट की उम्मीद में शाम को तीन बजे से आकर बैठने लगते हैं ताकि परेड का लुत्फ उठा सकें।  भयंकर गर्मी में, बिना सिर पर छत के, यहां सीमेंट की बैंच पर बैठ कर दो घंटे इंतज़ार करना क्या होता है, यह भुक्तभोगी ही जान सकता है।  ड्राइवर ने कहा कि यदि आप लेखक या पत्रकार हैं और अखबारों में लिखते हैं तो सरकार को अवश्य बतायें कि यहां स्टेडियम के ऊपर शैड बनवायें।  अस्तु !

हम जब शाम को पांच बजे स्वर्ण जयंती द्वार पर पहुंचे तो सारी बैंच पूरी तरह से ठसाठस भरी हुई थीं।  जब मैने द्वार पर खड़े बी.एस.एफ. के अधिकारी को प्रेस पास दिखाया और कहा कि मुझे आगे जाने दें तो उन्होंने वी.आई.पी. लाउंज के लिये प्रवेश द्वार 3 की ओर इंगित किया और कहा कि आप वहां कोशिश करें।  मैं उधर भागा पर वहां कोई सुनवाई नहीं हुई !  वहां विदेशियों और कुछ वी.आई.पी. महिलाओं, युवतियों और बच्चों को जाने दिया जा रहा था।  अतः फिर वापिस भागा और स्वर्ण जयंती द्वार की सीढ़ियां चढ़ कर वहां पहुंचा जहां पहले ही मानों पूरा हिन्दुस्तान आकर सीटों पर जमा हुआ था।  अपने कैमरे के लिये मुझे जो सर्वश्रेष्ठ स्थान उपलब्ध हो सका वहां जाकर मैं खड़ा होगया।  बड़ा ही मजेदार दृश्य सामने था।  स्वर्ण जयंती द्वार से लेकर पाकिस्तान वाले द्वार तक तिरंगा झंडा हाथ में लेकर भागते हुए जाने और वापिस आने के लिये महिलाओं की लाइन लगी हुई थी।  उनको बी.एस.एफ. के इस अभियान के संयोजक एक अधिकारी तिरंगे झंडे देते थे और भागने का इशारा करते थे।  युवा, प्रौढ़ और यहां तक कि वृद्ध महिलाएं भी बड़े उत्साह से तिरंगा हाथ में लेकर पाकिस्तान की सीमा तक भागती हुई जाती थीं और फिर वापस आती थीं।  हज़ारों की संख्या में दर्शक गण भारत माता की जय, वंदे मातरम्‌,  हर-हर, बम-बम नारे लगा कर उनका उत्साह-वर्धन कर रहे थे।  दर्शकों के उत्साह का आलम कुछ ऐसा था मानों वह वृद्ध महिला नहीं बल्कि पाकिस्तान के बैट्समैन को आउट करने के लिये भारतीय क्रिकेट टीम का बॉलर दौड़ रहा हो। पन्द्रह मिनट तक यह कार्यक्रम चलता रहा फिर महिलाएं, युवतियां और स्कूली बच्चे डांस करने के लिये अपनी अपनी सीट छोड़ कर सड़क पर उतर आये।  पन्द्रह मिनट तक धुआंधार कमर मटकाई गईं और जनता गला फाड़ – फाड़ कर अपने उत्साह का प्रदर्शन करती रही।  सबसे मजेदार बात ये थी कि पाकिस्तान वाले गेट के उस पार भी एक स्टेडियम नज़र आ रहा था जहां तीस-चालीस दर्शक बैठे हुए दिखाई दे रहे थे।  इस ओर हज़ारों दर्शकों का अदम्य उत्साह, नारेबाजी और कान के पर्दे फाड़ देने लायक शोर और उधर केवल मात्र तीस – चालीस दर्शक!   अब अगर ऐसे में पाकिस्तानी हुक्मरान डिप्रेशन का शिकार न हों तो क्या हों?  मुझे तो लग रहा था कि पाकिस्तान वाली साइड में बैठे दर्शकों का भी मन कर रहा होगा कि हिन्दुस्तान वाला कार्यक्रम देखें पर अनुमति न होने के कारण मन मसोस कर रह जाते होंगे।

 

वाघा बार्डर पर भारतीय नागरिक सेना का उत्साह-वर्द्धन करते हुए

वाघा बार्डर पर भारतीय नागरिक सेना का उत्साह-वर्द्धन करते हुए


साढे पांच बजने से दो मिनट पहले ही सब महिलाओं, बच्चों, युवतियों को आदेश हो गया कि वह अपनी – अपनी सीट पर बैठ जायें।  इधर एक बैरक के बाहर बी.एस.एफ. (सीमा सुरक्षा बल) के संभवतः १० जवान, बड़ी खूबसूरत पगड़ी बांधे हुए सावधान की मुद्रा में खड़े थे।  इनमें दो महिला जवान भी थीं जो सबसे आगे थीं ।  जब धरती पर पैर पटक कर वह दोनों तेजी से कदमताल करती हुईं पाकिस्तान के द्वार की ओर बढ़ीं तो जनता ने इतना शोर मचाया कि मेरा कान आज तक भी सामान्य नहीं हो पाया है।  मुझे शक है कि भारतीय दर्शक अपनी आवाज़ पाकिस्तानी हुक्मरानों तक पहुंचाना चाहते थे —   “सुनो, गौर से दुनिया वालों, बुरी नज़र ना हम पर डालो !  चाहे जितना जोर लगा लो ! सबसे आगे होंगे हिन्दुस्तानी!”   लाहौर वहां से सिर्फ 24 किमी ही तो था और यहां भारतीयों की हुंकार 24 किमी दूर लाहौर तक पहुंच रही हो तो मुझे इसमें कतई आश्चर्य नहीं होगा।

कैमरे की ज़ूम की रेंज पाकिस्तान तक

कैमरे की ज़ूम की पहुंच पाकिस्तान तक ! परेड देखने आये गिने-चुने पाकिस्तानी दर्शक।

मैं जहां पर खड़ा था, वहां से जवान खड़े हुए दिखाई दे रहे थे, कदमताल करते हुए निकलते और पाकिस्तानी सीमा की ओर परेड करते हुए बढ़ते तो दिखाई दे रहे थे किन्तु वहां पहुंच कर वह क्या-क्या कर रहे थे, यह ठीक से दिखाई नहीं दे रहा था क्योंकि एक पेड़ दृश्य को बाधित कर रहा था।

स्वर्ण जयंती द्वार पर मुस्तैद भारतीय जवान !

वाघा बार्डर – स्वर्ण जयंती द्वार पर मुस्तैद भारतीय जवान !

छः बजे सब जवान उतनी ही स्मार्टनैस के साथ कदमताल करते हुए वापिस आये और जनता ने उनका कर्णभेदी हुंकार के साथ स्वागत किया।  पाकिस्तान-भारत के मध्य का गेट बन्द कर दिया गया और हम भी वैज बर्गर खाते हुए पुनः एक किमी चल कर लगभग उछलते-कूदते हुए अपनी गाड़ी तक आये।  संभवतः adrenalin की मात्रा हम सब के रक्त में बहुत बढ़ चुकी थी जिसे उछल – कूद कर, नारे लगा कर हम खर्च कर देना चाहते थे।  निश्चय ही, अटारी बॉर्डर पर यह परेड देख कर,  वापिस आते समय यह एहसास बहुत गहरा था कि हम सब लोग एक ही मां की संतान हैं और उस मां का नाम है – भारत !   वन्दे मातरम्‌ !!

अगला दिन – रामबाग, महाराजा रणजीत सिंह पैनोरामा और रामतीरथ में।

26 Comments

  • Amitava Chatterjee says:

    A very detailed & equally nice post on Wagah Border.
    I couldn’t read the first two and will read now.

    We had a mixed feeling on the place & the celebration, when we visited there few years back. On our way back, we visited Attari station, which I still remember but not the celebration.

    Personally I think, we should now move on with time.

  • Dear Amitava,

    Thank u for being so quick in offering your feedback on the post. If by ‘moving on’ you imply that we should forget POK, I beg to disagree with you. A nation has a psyche of its own and if you would ask the spectators sitting at the parade as to what India should do while dealing with Pakistan, you would know what our nation wants. Those people at the parade represent the collective psyche of the nation. They are not handpicked and chosen. Instead, they are the best random sampling of Indian citizens – belonging to all religions, races, castes, geographical locations of our country so their collective voice should be heard with seriousness.

    Sushant Singhal

    • Respected Sir,

      The beauty of our democracy is freedom of speech. I saw all the comments while on the move and read them once again this monring and still choose to respond. Some of the points you made are absolutely correct.

      No, we shouldn’t forgot 26/08, 07/06, neither POK and continuous provocation from the other side. One of my relatives lost his son at the border, when we were in school and saw the coffin flown at home, so we had gone through the pain. We are on our 66th years of Independence and sad to see that this problem is not solved yet. Is this such a big problem that it just can’t be solved? No problem can’t be so big that it can’t be solved by close to 6 decades of our Independence. We see no willingness to solve the problem once and for all. Everyone wants to keep it alive for their own benefits, which I want to stop immediately. ‘Spontenous’ is all ‘relative’.

      There should be a national debate on this issue and you will see how our politicians choose to play a safe game…it’s just like Indian judiciary system where a trial just can go on and on for end number of years…and we still spend money on an open & shut case and a person like Ajmal Kashav. Within next 21 days, it will be four years and I am sure you know the expenses we incurred just to keep him alive. We are very good on paper in everything we do…but I don’t think our voice will ever be heard. We need to ask ourselves why there is no attack on US after 9/11 and all of us know the fate of the person behind this attack.

      Having said that, I do agree that this is not the forum to discuss a serious issue of this magnitude. We are just a mere spectator of the bigger political game and our voice will never heard or reach to the right place.

      There is an initiative by TOI ‘Aman Ki Asha’, so our Nation also want peace with our neighbouring country. There will be good people and there will be extremist as well. Finally, we don’t want war at any cost, a request to my neighbours as well, if anyone of you is reading this. Believe me it will be good for both of us and your economy as well.

      Please don’t mind for this long reply, I admire you a lot as a writer. Take care of yourself and have a nice day…smile please, Regards,

      Amitava

  • Vipin says:

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  • abhishek kashyap trainman says:

    great post once again…
    visiting Wagah would be how pridefull, i can just imagine only..
    i have seen some video on youtube crossing Wagah border and other at Munabao-khokhrapaar border..
    anyway ur pics are nice..awsum zoomed up.. donnt know why pakistaani is so less in number there..haha.. they might be afraid of roar of our lion like soldiers.. :)
    and we should respect the sacrifice of our brave lions.. pakistaan like country never deserve our mercy.. they must abolish completely as soon as possible..Jai Hind.

  • Mahesh Semwal says:

    2-3 bar gaya hun , ek alagh hi anubhav hai wagah border.

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  • Nandan Jha says:

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  • D.L.Narayan says:

    Dear Sushant,

    You have subtly said a lot without saying anything. You have quietly ignored the great tamasha, the theatrical and carefully choreographed display of aggressive jingoism by fiercely mustachioed soldiers, which is deemed by many to be the highlight of the Wagah tour. You have not even posted a single picture of this ceremony. However, your real thoughts are conveyed by the words “?? ????? ???? ???? ?? ?? ?? ?? ??? ?? ?? ??? ?? ????? ???”. The subliminal message you convey is a hope for peace and a world without borders.

    I agree with Nandan on this issue and I am looking forward to the day when Nandan posts a blog about having breakfast in New Delhi, lunch in Amritsar and dinner in the renowned Food Street in Lahore. Hopefully, that might just happen during my own lifetime.

  • rastogi says:

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  • ashok sharma says:

    I do agree with Nandan. Its high time to normalise the relations with our neighbor and forget the animosity.This ever increasing greed makes the journey sour most of the time.Somewhere we have to stop,introspect and start behaving little honestly. Then only this beautiful part of the world would become livable.the other and most troubling problem is ever increasing crowd.population explosion resulting into not having any feeling for others, is becoming alarmingly intolerable.Its time to get disciplined, tolerant and bit loving.The essence is: LIVE & LET LIVE.

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  • s r holkar says:

    Singhal ji , Amritser ki Itne sunder sabdomain
    Yatra karane ke liye bhut- bhut dhanyvad . vakai Achcha laga.

  • parveen says:

    hello sir
    i am fully agree with you on this topic.
    parveen

  • vinaymusafir says:

    Accha post hain.
    Vichaar bhi acche hain. Pakistaan par vijay to hum paa sakte hain.
    Par Bharat mein jo pakistaani hain unka kya karrein, jo khate yahan ki hain Gaate wahan ki hai.
    Abhi Kashmir ke ek Mashhoor Moulvi ne kaha hai ki Amarnaath yatra kewal 15 din ki honi chahiye ya phir band hone chaiye….aisi anek baatein hain. Aise logo se kaise nipte?
    Aur bhi baatein hain jo shayad yahan Ghummakar pe kahni thik nahi hongi.
    Bharat ki shuruaat hi nahi sahi rahi. Jawahar Lal Nehru ki jagah, Sardar Patel yogya Pradhaan Mantri Hone chaiye the.
    Ab kya kucch kiya ja sakta hai?

    • Dear Vinay Musafir,

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  • Ritesh Gupta says:

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  • Nirdesh says:

    Dear Sushantji,

    I love the command you have over Hindi language. The post is beautiful.

    Last time I was there, it was so crowded that we could not gain entry into the stadium since it happened to be summer holidays. Will go again on a week day. It is jingoism at its best. But does give an adrenal rush.

    • Dear Nirdesh Ji,

      Thank you for the kind words. If at all I write pleasurably, it is because there are so many people waiting for my posts. The credit goes entirely to them. If I am not sure if anyone is going to read what I am writing, the motivation to write would subside.

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