Hills

Did you notice me...it's my shadow

Hariyali Idhar Udhar…

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A team building activities is an ideal way to take a break from your daily routine and there is something for everyone as the combination of Team Building and Sports Activities. Recently, I had attended a Training Program at Pegasus Institute for Excellence at Dibli, a small hamlet in the upper Dehradun. It was a great learning experience as an Individual & professional.

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Shimla by Toy Train

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While clicking through the window of my compartment, I couldn’t help admiring the beautiful curves. (Again, don’t get me wrong please! I am talking of the curves our train was taking ! ) The sharpest curve our train took was of 48.12 meter radius. As regards fastest speed of the train, please don’t ever think that it can compete with Chinese Bullet Train. It can run at the maximum speed of 25 km. per hour. In case you are not happy with this speed, try the Rail Car which has an admirable speed of 30 km. / hour! From Kalka to Shimla, in all there are 20 railway stations. Although our train was labelled as Express train, it stopped at most of the stations especially in later half of the journey. It was as if it was a private bus wherein the cleaner had the moral obligation to halt the vehicle to enable an old lady to disembark. I think the guard of our train was going an extra mile by accompanying her up to the road and seeing her off before flagging the train to move on.

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गढ़वाल घुमक्कड़ी: तपोवन – रुद्रप्रयाग – दिल्ली

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रास्ते में हम लोग लोग थोड़ी देर रुद्रप्रयाग में रुके और फिर चल दिए श्रीनगर की ओर. श्रीनगर पहुँचते पहुँचते हमें काफी देर हो चुकी थी और आज रात इससे आगे जाने का कोई साधन नहीं दिख रहा था. कोई जीप या बस मिलने की तो संभावना बिलकुल भी नहीं थी क्योंकि यहाँ हिमाचल की तरह रात को बसें नहीं चलती. ऐसे में हमारे चालक साब ने हमें रात श्रीनगर में ही बिताने का सुझाव दिया और हमें रात गुजारने का एक ठिकाना भी दिखाया. हमने ठिकाना तो देख लिया पर अब किसी का भी यहाँ रुकने का मन नहीं था और सब जल्द से जल्द घर पहुँचना चाहते थे. उत्तरांचल में वैसे तो रात को कोई वाहन नहीं चलते पर सब्ज़ी फल आदि रसद पहुँचाने वाले ट्रकों की आवाजाही रात भर चालू रहती है, सोचा क्यों ना इसे ही आजमाया जाए. आज शायद किस्मत हम पर मेहरबान थी, थोडा पूछ्तात करने पर ही हमें एक ट्रक मिल गया जो हरिद्वार तक जा रहा था. ट्रक चलने में अभी लगभग आधा घंटा बाकी था और सुबह सिर्फ आश्रम में ही भोजन किया था इसलिए एक ढाबे पर जाकर थोड़ी पेट पूजा की गई.

ट्रक पर वापस लौटे तो देखा की चालक के साथ वाली सीट पर पहले ही दो लोग बैठे हुए थे. ऐसे में वहाँ हम तीनों का एक साथ बैठना संभव और सुरक्षित नहीं था. इसलिए दोनों की बुरी हालत देखकर मैं ट्रक के पीछे चला गया जहाँ कुछ अन्य लोग पहले से ही लेटे थे. इस ट्रक के ऊपर एक बरसातीनुमा दरी थी जो शायद सब्जियों को धूल और बारिश से बचाने के लिए डाली गयी थी और नीचे खाली प्लास्टिक के डब्बे रखे हुए थे जिनमे सब्जियाँ रखी जाती हैं. इन्ही हिलते डुलते प्लास्टिक के डब्बों के ऊपर हम सभी मुसाफ़िर लेटे हुए थे. ट्रक चलने पर कुछ समय तो बड़ा मजा आया पर जैसे जैसे रात गहराती गयी और नींद आने लगी तो इन हिलते हुए डब्बों पर सोना बड़ा दुखदायी लग रहा था क्योंकि एक तो ये डब्बे आपस में टकराकर हिल रहे थे और टेढ़े मेढ़े होने की वजह से चुभ भी रहे थे. खैर मेरे लिए तो ये सब रोमांच था, लेकिन रोमांच धीरे धीरे बढ़ने लगा जब इन्द्रदेव अर्धरात्रि में जागे और हम पर जमकर मेहरबान हुए. तिरछी पड़ती हुई मोटी मोटी बारिश की बूँदे हमारे ऊपर एक शॉवर की तरह पड़ रही थी जो एक मंद मंद शीतल रात को एक बर्फ़ीली सी महसूस होने वाली रात में बदलने के लिए काफी थी. ऐसे में ऊपर रखी हुई दरी ने ठण्ड से तो नहीं पर भीगने से तो बचा ही लिया. ठण्ड में किटकिटाते हुए, बिना सोये जैसे तैसे करीब चार बजे के आस पास ट्रक चालक ने हमें हरिद्वार में एक सुनसान मोड़ पर उतार दिया. जितना दर्द मेरे शरीर में उस ट्रक में सवारी करते हुए हुआ उतना पूरी यात्रा कहीं नहीं हुआ, शरीर इतना अकड़ गया था कि ट्रक से बाहर निकलने के लिए भी हिम्मत जुटानी पड़ रही थी. ठण्ड के मारे बुरा हाल था, सुनसान गलियों से होकर गुजरते हुए हम लोग बस स्टेशन की ओर बढ़ने लगे. ऐसे में रास्ते में एक चाय का ठेला देखकर चेहरे पर कुछ ख़ुशी आयी, भाईसाब के हाथ की गर्मागरम चाय और बंद खाकर शरीर में कुछ ऊर्जा आई. फिर तो बस जल्दी जल्दी कदम बढ़ाते हुए हरिद्वार बस स्टेशन पहुँचकर, दिल्ली की बस पकड़ी तो लगभग दस या ग्यारह बजे तक दिल्ली पहुँच कर ही राहत की साँस ली. यात्रा समाप्त!

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Nathdwara-Bagaur Haveli-Return from Udaipur

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उदयपुर अपनी जिन झीलों के कारण विश्व प्रसिद्ध है उनमें फतेह सागर झील भी एक है। अगर आप सोच रहे होंगे कि फतेह सागर झील का निर्माण महाराणा फतेह सिंह ने किया होगा तो आप सरासर गलत हैं। इस कृत्रिम झील का निर्माण 1678 में महाराणा जय सिंह ने किया था। पर बाद में महाराणा फतेह सिंह ने इसका विस्तार किया और यह झील उनके नाम को समर्पित हो गई। उदयपुर के उत्तर-पश्चिम में और पिछोला झील के उत्तर में स्थित यह झील जयसमंद झील के बाद दूसरी कृत्रिम झील है जिसका निर्माण निश्चय ही उदयपुर को रेगिस्तानों के लिये प्रसिद्ध राजस्थान को सूखे से बचाने के लिये किया गया होगा। ढाई किमी लंबी, डेढ़ किमी चौड़ी और साढ़े ग्यारह मीटर तक गहराई वाली इस झील के मध्य में स्थित तीन टापुओं में से सबसे बड़े टापू पर नेहरू पार्क है। इस पार्क में जाने के लिये नाव का सहारा लिया जाता है। इन झील को पानी तीन मार्गों से मिलता है और एक मार्ग का उपयोग मानसून के दिनों में पानी की अधिकता से निपटने के लिये किया जाता है ताकि झील में से फालतू पानी को निकाला जा सके।

दूसरे वाले टापू पर सुन्दर सुन्दर से पानी के फव्वारे लगाये गये हैं और तीसरे टापू पर नक्षत्रशाला (solar observatory) है। हम लोग सिर्फ नेहरू पार्क तक ही सीमित रहे जिसमें नाव की आकार का एक रेस्टोरेंट भी बनाया गया है। लोग बताते हैं कि वहां पर एक चिड़ियाघर भी है, जिसकी अब मुझे याद नहीं है। हो सकता है उस समय वह न रहा हो या उसमें जानवर न होकर सिर्फ चिड़िया ही हों !

नेहरू पार्क से आप चाहें तो बोटिंग के मजे ले सकते हैं। वहां पर बहुत तेज़ भागने वाले हॉण्डा वाटर स्कूटर भी थे जिस पर जाट देवता जैसे पराक्रमी घुमक्कड़ झील की परिक्रमा कर रहे थे। वैसे यदि आप उस स्कूटर की सवारी करना नहीं जानते तो भी कोई दिक्कत नहीं है। उनका आपरेटर आपको ड्राइविंग सीट पर बैठा कर खुद सारे कंट्रोल अपने हाथ में ले लेता है। आप यदि स्टीयरिंग भी ठीक से नहीं पकड़ सकते तो मेरी तरह से आप भी इन सब झंझटों से दूर ही रहें।

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The Devdar Prayers

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Down to earth from heaven, our vehicle proceeded through roads making inroads into sea of deodars. Crossing the valleys and forests our next stop was the famous Khajjiar. This is a relatively small Himalyan meadow and a shallow lake surrounded by mighty pines and devdars all around. One of the most favoured tourist stop was but a bit of disappointment. The meadow was dull and lake looked like a pit of stagnated water with lot of rubbish thrown around. And to add to it, there were stalls selling anything from popcorn to buddhee ke baal on the meadow itself. May be it would be more enchanting when it is monsoon green or winter white. Here again a temple awaited us namely KhajjiNag. A typical Himachali temple in wood and sloping roof has a black stone idol of the Nag devta. Nag worship is quite common in this part of Himalaya with Khajji nag, BhagsuNag and many more.
Again travelling down in setting sun and through darkening valleys we finally reached Chamba, located on the banks of river Ravi. Chamba is a part of settlement between 2 mighty Himalayan ranges Dhauladhar in the south and Pir Panjal in the North. Chamba got its name from Champavati, daughter of Shailavarma. The town was founded in 10’Th or 11’Th century. The name of the king is written differently in many places, Sahilvarma, Shalivahan and Shailverma. Chamba looked like a cheerful town with packed shops of fabric, chappals, mithais and chaat. Not to forget the roadside sellers with radishes and oranges and berries. This temple town is home to some of the exquisite stone architecture blended with intricate wood carvings.

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My 12th Amarnath Yatra – Trip Report and Pictures , Part 2

My 12th Amarnath Yatra – Trip Report and Pictures , Part 2

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We get up at 5.30 AM. It was very cold outside. Around 6 AM we came out of tent to proceed further to Holy Cave. We took a bucket of hot water for Rs.50 from Tentwala and wash our face and hands etc. We did not take bath as we were so tired and weather was very cold. We took a cup of tea and stood in the line for Darshan. After Aarti, Darshan started at 7:30AM. Around 8.15 AM we reached in holy cave .All the atmosphere was filled with the Jaikare of Bam Bam Bhole. We forget all our tiredness and body pain after Darshan. We were feeling so energetic. I got very emotional after Darshan. A full size ice lingam was in front of my eyes. As I already mention that this was my 12th Yatra to Holy cave but this year ice lingam size was the biggest I have ever seen. We spent around 40 minutes in the Holy cave and offered some rituals. We came down from the cave. As we had not taken lunch and dinner yesterday, we were very hungry. We took one prantha each and tea from the Bhandara and started journey towards Baltal. It was around 9.30 AM. There were frequent traffic jam on the ways due to heavy rush. At 3:45 PM we reached at Domel and went to Barfani sewa mandal Bhandara. We took lunch there and rested for night at there.

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गढ़वाल घुमक्कड़ी: भविष्य बद्री

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देवभूमि गढ़वाल के कुछ छिपे हुए रत्नों को तलाशती तीन दोस्तों की कभी ना भुला पाने वाली रोमांचक घुमक्कड़ी की दास्तान…जिसमे हमने कुछ बेहतरीन नज़ारे देखे, कुछ अनोखे और सोच बदलने वाले अनुभवों से गुजरे, कुछ खुबसूरत दोस्तों से मिले, कुछ बेहतरीन ठिकानों पर रात गुजारी और बहुत कुछ सीखने को मिला…

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Back to Udaipur-LokKala Mandal and Shilpgram

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शिल्पग्राम से हम बाहर निकले तो बाबू ने पास में ही, न जाने किस पार्क में गाड़ी ले जाकर खड़ी कर दी। बीच में एक फव्वारा, अच्छा हरा – भरा लॉन, अच्छे – अच्छे चेहरे थकान मिटाने के लिये काफी उपयुक्त सिद्ध हुए। घास पर लेटे रहे, कोल्ड-ड्रिंक पीते हुए चिप्स खाते खाते घंटा भर वहीं बिताया। जब सूर्यास्त हो गया तो महिलाओं को फिर हुड़क उठी कि बाज़ार चलते हैं। बाबू कुछ एंपोरियम में ले कर गया पर हम हर जगह यही शक करते रहे कि पता नहीं, कैसा सामान होगा, पता नहीं कितना महंगा बता रहे होंगे। मैने एक बार भी श्रीमती जी को जिद नहीं की कि ये सामान अच्छा है, खरीद लो! हम लोगों ने पहले ही तय कर रखा था कि यदि हम में से कोई कुछ खरीदना चाहेगा और दूसरा मना कर देगा तो वह चीज़ नहीं खरीदी जायेगी। इसके बाद पुनः हाथी पोल आये और श्रीमती जी ने दो जयपुरी रजाइयां खरीद ही डालीं जो वज़न में बहुत हल्की थीं और पैक होने के बाद उनका आकार भी बहुत कम रह गया था !

खाना पुनः बावर्ची में ही खा कर हम वापिस होटल वंडरव्यू पैलेस में पहुंच गये जहां हमारे नाम के दोनों कमरे बुक थे। अगला दिन हमने तय कर रखा था – सिटी पैलेस, बागौर की हवेली, नेहरू पार्क, और नाथद्वारा मंदिर देखने के लिये।

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Solo Bike Trip to Deoriatal in Uttrakhand

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after this again i started journey soon i reached saari village which is the base camp for Deorital.here i got warm welcome from a person his name is rakesh singh negi owner of Rakesh tourist lodge saari village.even all people of saari village were very humble and nice all have praised me that i came from delhi by bike.after taking tea .rakesh singh negi called his friend(surender singh)owner of dhaba at Deorital for my tent arrangements.he showed me  the way to reach deorital which is 2.5km from saari village.i just parked my bike ..here parking is totally safe.

from here real fun and enjoyment of loneliness started.only one song i listen repeatedly  during 1 hour trekking which was SHOW ME THE MEANING OF BEING LONELY..that song seems to be totally  inextricably linked to the surrounding  environment .deoriatal is 70 degree steep climb from saari village.

After 1 hrs of hiking i finally reached the Tal. i was  stunned and speechless on reaching the top. The snow-capped mountain peaks surrounded the Tal….it was awesome, there’s no word which I can describe its beauty.here i found everything what i wanted from  nature.

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Mount Abu Sight Seeing

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माउंट आबू भ्रमण के दौरान बहुत सारा समय हमने पीस पार्क में भी बिताया था। वहां घुसते ही सबसे पहले हमें ब्रह्माकुमारी वालों ने एक वीडियो दिखाया जिसका सार ये था कि ज़िन्दगी मिलेगी दोबारा – दोबारा अगर तुम नहीं करोगे अज्ञान से किनारा ! अज्ञान का अर्थ है – खुद को और इस शरीर को एकाकार समझ लेना। इस वीडियो के अनुसार हम आत्मा हैं जो इस शरीर के अन्दर, दोनों नेत्रों के मध्य भाग में, यानि भृकुटि में रहते हैं। हम यानि आत्मा, इस शरीर रूपी गाड़ी के ड्राइवर हैं। हम सब आत्मायें परमपिता परमात्मा के प्यारे बच्चे हैं, उनके अंश हैं। हम निरंतर यह स्मृति बनाये रखें कि हमारा और हमारे परमपिता परमात्मा का बाप-बेटे का नाता है तो हमें उनसे ऐसे ही स्नेह भाव उपजेगा जैसे किसी युवक को किसी अनजानी युवती से सगाई हो जाने के बाद उससे स्नेह उपजने लगता है। उसे कहना नहीं पड़ता कि भाई, कभी टाइम निकाल कर अपनी मंगेतर को भी याद कर लिया कर! वह खाते-पीते, सोते-जागते, उठते-बैठते हर समय अपनी मंगेतर को ही याद करता रहता है, उससे मिलने के ख्वाब देखा करता है। आजकल के लड़के तो मोबाइल में couple plan ले लेते हैं ताकि चौबीसों घंटे हॉटलाइन से जुड़े रहें। ठीक वैसे ही हमें यदि परमपिता परमात्मा से अपने संबंध का ज्ञान हो जाये तो हम हर समय उनकी स्मृति में ही रहेंगे। यह तब होगा जब हम सदैव यह याद करेंगे कि हम यह शरीर नहीं हैं बल्कि इस शरीर को संचालित करने वाली आत्मा हैं। हम सब विस्मृति की शिकार आत्मायें हैं जो यहां – वहां सुख की लालसा में भटकती रहती हैं जबकि वास्तविक सुख परमपिता परमात्मा से मिलन में है जो हम योग लगा कर किसी भी समय अनुभव कर सकते हैं । उसके लिये मरना कतई जरूरी नहीं है।

गुरु शिखर और अचलगढ़ नाम की दो पर्वत चोटियों के मध्य स्थित विशाल परिसर में विकसित इस पीस पार्क में न केवल अत्यन्त सुन्दर उद्यान हैं, रोज़ गार्डन हैं, झूले हैं, रॉक गार्डन है, पिकनिक के लिये और खेल कूद के लिये मैदान हैं बल्कि सबसे आनन्द दायक बात ये है कि इस पीस पार्क का प्रबंध अत्यन्त कुशल और सेवाभावी व्यक्तियों के हाथों में है। ब्रह्माकुमारी केन्द्र यानि मधुबन, ज्ञान सरोवर और शान्तिवन में तीन या अधिक दिनों के लिये नियमित रूप से शिविर लगते रहते हैं और एक दिन प्रशिक्षुओं को घुमाने के लिये भी नियत रहता है। पीस पार्क में भी वे कुछ घंटे बिताते हैं, यहां उनके लिये खेल-कूद व खाने-पीने की भी व्यवस्था की जाती है। ऐसे ही एक अवसर के चित्र यहां लगा रहा हूं।

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Mt. Abu – Sunset Point – Nakki Lake

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सूर्यास्त होगया तो मैने कहा कि चलो, खेल खतम, पैसा हज़म ! अब यहां से पैदल ही नीचे चलेंगे। लुढ़कते – लुढ़कते हम नीचे पहुंचे और टैक्सी में बैठ कर नक्की लेक की ओर चल दिये। इससे पहले मैं 2003 और 2005 में भी माउंट आबू गया था। वर्ष जून 2003 में तो नक्की लेक सूखी हुई मिली थी और उसमें हज़ारों मज़दूर पुरुष और महिलाएं तसले सिर पर लिये हुए घूम रहे थे। (उस समय की खींची हुई एक फोटो भी सौभाग्य से मिल गयी है जो अपने पाठकों के सौभाग्य के लिये संलग्न किये दे रहा हूं ।) परन्तु सौभाग्य से इस बार नक्की में भरपूर पानी था और नावों में लोग सवारी कर रहे थे। हमने भी एक नाव ले ली जिसे पैडल बोट कहते हैं । बेचारे दो पुरुष पैडल मारते हुए नाव को आगे बढ़ाते हैं और पीछे दो बीवियां आराम से झील का नज़ारा देखती हुई चलती हैं। संभवतः एक घंटे तक हम नक्की में यूं ही पैडल मारते घूमते रहे। इस नक्की लेक के बारे में बहुत प्रचलित किंवदंती, जो अक्सर पढ़ने को मिलती है वह ये है कि देवताओं ने एक खूंखार राक्षस से बचने के लिये नख से धरती में झील बना डाली थी । यही नहीं, नक्की झील को लेकर एक और रोमांटिक कहानी रसिया बालम की भी चली आ रही है जिसने एक राजकुमारी से विवाह की लालसा में एक रात में ही आधा किलोमीटर लंबी और चौथाई किमी चौड़ी और २०-३० फीट गहरी झील खोद डाली थी। हे भगवान, कैसे – कैसे राजा होते थे उस जमाने में! मुनादी करा दी कि जो कोई एक रात में नक्की झील खोद देगा, उससे अपनी बिटिया का ब्याह रचा दूंगा ! सौभाग्य से इस झील को खोदने के बाद भी रसिया बालम फिर भी कुंवारा ही रहा क्योंकि राजा की घोषणा को रानी ने वीटो कर दिया। राजा को रानी से डांट पड़ी सो अलग!

नक्की झील माउंट आबू के हृदय स्थल में स्थित है और यहां का प्रमुखतम आकर्षण है। माउंट आबू के बाज़ार मुख्यतः नक्की झील के आस-पास ही केन्द्रित हैं। बात सही भी है, जब सारे टूरिस्ट नक्की पर ही आने हैं तो दुकान कहीं और खोलने का क्या लाभ? एक और बड़ी विशेष जानकारी जो विकीपीडिया से प्राप्त हुई है, वह ये कि 12 फरवरी 1948 को यहां पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की अस्थियां विसर्जित की गई थीं और गांधी घाट का निर्माण किया गया था। पर मुझे याद नहीं पड़ता कि हमने नक्की झील पर कहीं गांधी घाट के दर्शन किये हों! सॉरी बापू ! अगली बार जायेंगे तो ऐसी गलती पुनः नहीं होगी! नक्की झील के आस-पास के एक रेस्टोरेंट में भोजन लेकर (कहां, ये याद नहीं ! भोजन कैसा था, ये तो कतई याद नहीं)। हम लोग वापिस ज्ञान सरोवर में आ पहुंचे और अपने – अपने कमरों में नींद के आगोश में समा गये। (किसी इंसान के आगोश में समाने की तो वहां अनुमति भी नहीं थी !)

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