Nathdwara-Bagaur Haveli-Return from Udaipur

प्रिय मित्रों,

Water scooter ride in Fateh Sagar Lake

Water scooter ride in Fateh Sagar Lake

आज इस यात्रा का अंतिम चरण है। हम पांच दिन पहले अपनी कार से गाज़ियाबाद के लिये निकले थे, वहां से नई दिल्ली एयरपोर्ट से वायुयान द्वारा उदयपुर पहुंच गये। पांच दिन के लिये airport-to-airport टैक्सी की।

सहेलियों की बाड़ी देखी, अंबराई में खाना खाया, होटल वंडरव्यू पैलेस में ठहरे। अगले ही दिन टैक्सी द्वारा पिंडवारा होते हुए माउंट आबू पहुंचे । ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के ज्ञान सरोवर परिसर में अपना ठिकाना बनाया, शाम को Sunset Point और नक्कीलेक देखी।

अगले दिन माउंट आबू का स्थानीय भ्रमण किया जिसमें दिलवाड़ा मंदिर, अनादरा पार्क, गुरु शिखर, पीस पार्क, मधुबन आदि देखे । शाम को पुनः नक्की झील और अगले दिन सुबह उदयपुर हेतु वापसी ! उदयपुर पहुंच कर भारतीय लोक कला मंडल, महाराणा प्रताप मैमोरियल, सिटी पैलेस, गुलाब पार्क (यानि सज्जन सिंह पार्क), विंटेज कार कलेक्शन तक पहुंचे,खाना खाया और अब आगे !

 

श्रीनाथद्वारा मंदिर

प्राचीन कारों को न देख पाने से मेरा दिल टूट चुका था और भग्न हृदय लिये मैं टैक्सी में आ बैठा और हम सब चल पड़े श्रीनाथद्वारा मंदिर के दर्शन हेतु। मैने अपना कैमरा भी पैक करके पीछे रख दिया था और मेरे हाथ में कैमरा न देख कर सब समझ चुके थे कि मैं कोप भवन में पड़ा हुआ हूं।

48 किमी की यात्रा में कुछ खास स्मरणीय रहा हो, ऐसा मुझे नहीं लगता। मुझे सड़क मार्ग की यात्राएं सिर्फ तब अच्छी लगती हैं जब स्टीयरिंग मेरे हाथ में हो और सड़क हरे भरे पेड़ों से युक्त हो और पहाड़ी मार्ग हो। इस यात्रा में मैने नींद का जम कर लुत्फ लिया। जब हमारी टैक्सी श्री नाथद्वारा मंदिर से करीब आधा किमी पहले रुकी तो मेरी भी नींद खुली। बाबूराम ने कहा कि आगे संकरा बाज़ार है, जहां कार नहीं जा सकती है, अतः आगे मंदिर तक, (जिसे वहां हवेली कहा जाता है), पैदल ही जाइये। अतः हम सब सामान कार में ही छोड़ कर — (कैमरा भी :( ) श्री नाथ जी मंदिर की ओर चल पड़े। रास्ते में खिलौनों व कपड़ों की, हैंडीक्राफ्ट की, gifts and novelties की, प्रसाद व मिठाइयों की दुकानें थीं। उनमें से ही किसी एक से हमने प्रसाद भी खरीद लिया।

श्रीनाथजी भगवान श्रीकृष्ण का ही दूसरा नाम है। यह विश्वास किया जाता है कि धर्मांध औरंगजेब के आतंक के चलते बृज (वृन्दावन, मथुरा, उ.प्र.) में गोवर्धन पर्वत में स्थित श्रीजी को स्थानान्तरित करने का निश्चय किया गया था। जिस वाहन में श्रीनाथ जी को ले जाया जा रहा था, वह एक स्थान पर पहिया धंस जाने से रुक गया और उसने आगे बढ़ने से साफ इंकार कर दिया। पंडित जी ने इसे भगवत्‌ इच्छा के रूप में स्वीकार करते हुए ठीक उसी स्थान पर श्रीनाथ जी को स्थापित करने का निश्चय कर लिया। उदयपुर से 48 किमी दूर स्थित यह स्थान श्रीनाथद्वारा नाम से विख्यात हुआ। आज यहां पर एक छोटा सा कस्बा है जिसके मध्य में हवेली है और सारी सड़कें इसी हवेली की ओर ही आकर समाप्त होती हैं।

Shri Nath Ji - Photo Courtesy - Google.

Shri Nath Ji – Photo Courtesy – Google.

श्री कृष्ण के अनन्य भक्त वल्लभाचार्य के सुपुत्र गुसाईं जी, जो गोवर्धन पर श्रीजी की सेवा में रहते थे, उन्होंने एक बार वृंदावन से द्वारिका जाते समय मेवाड़ में सिंहद (कहीं सिंहगढ़ तो नहीं? ) नामक स्थान देखा जो प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर था। वह वहां दो दिन रहे और इस दौरान महाराणा उदयसिंह उनसे मिलने के लिये आये। महाराणा उदय सिंह से गुसाईं जी के बारे में सुन कर बाद में उनकी महारानी भी उनके दर्शन हेतु आईं जो मीराबाई की पुत्री थीं। उनकी पुत्रवधु अजबा कुमारी मेवाड़ थीं। उन्होंने भी गुसाईं जी से दीक्षा ग्रहण की।

जब गुसाईं जी द्वारिका के लिये प्रस्थान करने लगे तो अजबा कुमारी मेवाड़ व्यथित होने लगीं। इस पर गुसाईं जी ने उनको कहा, “चिंता मत करो, खुद श्रीजी यहां आकर तुम्हें दर्शन देंगे।“ गुसाईं जी का यह वाक्य भगवान श्रीकृष्ण के जी के जंजाल बन गया। गुसाईं जी के वचन की रक्षा के लिये उनको ब्रज से मेवाड़ नित्य आने-जाने हेतु M.S.T. बनवानी पड़ गई। अजबा कुमारी और श्रीकृष्ण कभी साथ – साथ चौपड़ खेलते थे तो कभी बांसुरी वादन का निर्मल आनन्द लेते थे।

एक दिन जब श्रीजी ब्रज वापिस जाने के लिये उठने लगे तो अजबा बोलीं, “आपको हर रोज़ इतनी दूर आना – जाना पड़ता है, आप यहीं क्यों नहीं आ जाते? श्रीजी ने कह दिया कि भई, इसके लिये तो फिलहाल सॉरी ! जब तक मेरे परम सखा गुसाईं जी ब्रज में मेरे साथ हैं, मैं उनको छोड़ कर कहीं नहीं जाऊंगा। हां, उनके गो-लोक गमन के बाद इस दिशा में गंभीरता से सोचा जायेगा। सोचना क्या है, मैं उस समय तक के लिये यहां आऊंगा जब तक कि गुसाईं जी पुनः जन्म न लें। उनके पुनः अवतरण के बाद मैं फिर उनके ही पास चला जाऊंगा।

वृंदावन में आकर भगवान जी मेवाड़ में अजब कुमारी से किया गया वायदा ऐसे ही भूल गये जैसे मैं कश्मीर यात्रा श्रृंखला के तीन पोस्ट लिख कर आगे लिखना भूल गया हूं ! अचानक एक दिन उनको याद आया पर गुसाईं जी के वंशज उनको किसी भी हालत में वृन्दावन से जाने नहीं देंगे, यह सोच कर उन्होंने सोचा कि कुछ और जुगाड़ करना पड़ेगा। बस उन्होंने औरंगजेब की मति भ्रष्ट कर दी और वह हिन्दू मंदिरों पर हमले करने के लिये कुख्यात हो गया। ऐसे में वृन्दावन से श्री कृष्ण को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने, मेवाड़ पहुंचने और वहां जाकर गाड़ी का पहिया धरती में फंसने की लीलाएं प्रभु ने रचीं ।

यह सब 17वीं शताब्दी की बात है जो आपको सुना रहा हूं । यह सब घटना चक्र गर्गसंहिता के गिरिराज खंड में अंकित है। नाथद्वारा में मंदिर की स्थापना और श्रीजी के प्राकट्य से बहुत सदियों पहले ही ये भविष्यवाणी हो चुकी थी। यह तो आप सब को पता ही होगा कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म ईसा से 3228 वर्ष पूर्व 19/20 जुलाई को 12.39 मध्यरात्रि में रोहिणी नक्षत्र में मथुरा में हुआ था। राधा उनसे दो वर्ष बड़ी थीं और उनका जन्म 25 सितंबर को 12.48 दोपहर में बरसाना में हुआ था। कृष्ण एवं राधा वास्तव में एक ही आत्मा के दो नाम हैं जो केवल द्वापर युग में ही दो भिन्न-भिन्न स्वरूपों में प्रकट हुई थीं वह भी एक खास वज़ह से! अब आप पूछेंगे कि ये खास वज़ह क्या थी? तो साहब, वज़ह ये थी कि राधा भक्तों को केवल यह ज्ञान देने के लिये आई थीं कि भगवान को पाना हो तो भक्ति में भावना का संगम परमावश्यक है। सिर्फ बुद्धि के सहारे भगवान को नहीं पाया जा सकता , उनको पाना है तो शुद्ध हृदय और उसमें असीमित दिव्य प्रेम आवश्यक है। आई बात समझ मां ?

श्रीनाथ जी मंदिर में भगवान की लौकिक उपस्थिति की भावना बहुत गहरी है और यह भावना ही श्रीनाथजी मंदिर को विश्व के अन्य मंदिरों से विलग, एक दिव्य स्वरूप प्रदान करती है। हमारे वहां जाने के बाद, सुना है कि वहां पर नये, भव्य मंदिर परिसर का निर्माण कार्य चल रहा है जो लगभग पूर्ण होने को है। पर जो विशिष्ट बात मैं आपको बताने जा रहा हूं वह ये है कि एक दिन भगवान श्रीनाथ जी ने एक भक्त को रात को स्वप्न में आकर कहा कि उठो और हवेली के द्वार पर जाकर देखो क्या हो रहा है। इतना अधिक शोर है कि मैं सो भी नहीं सकता।

यदि किसी ने मेरे कष्टों की ओर ध्यान नहीं दिया तो मैं यहां से चला जाऊंगा। वह भक्त हड़बड़ा कर उठ गया और हवेली के पास जाकर बैठ गया। ऊफ, ट्रक में से उतारी जा रही निर्माण सामग्री, पत्थरों आदि का इतना अधिक शोर वहां पर था कि किसी का भी इतने शोरगुल में वहां सोना असंभव ही था। बात श्रीनाथद्वारा टैंपल बोर्ड के सदस्यों और बोर्ड के अध्यक्ष गोस्वामी जी तक पहुंची तो उनको अपनी भूल का अहसास हुआ और उसके बाद रात में शोरगुल बिल्कुल न हो, ऐसा प्रबन्ध किया गया। ऐसे अनेको दृष्टांत वहां सुने जाते हैं और हम किसी का यही विश्वास है कि श्रीकृष्ण वहां पर लौकिक रूप में भी विराजमान रहते हैं।

श्रीनाथद्वारा में श्रीकृष्ण की सबसे प्रिय स्थली उनकी गौशाला है जहां पर 2000 गायों को पाला जारहा है जिनकी सेवा 50 ग्वाल करते हैं। कहते हैं कि यदि श्रीनाथ जी अपने स्थान पर दिखाई न दें तो वह गौशाला में ही होते हैं।

श्रीनाथ मंदिर का स्वामित्व Nathdwara Temple Act, 1959 के उपबन्धों के आधीन गठित बोर्ड के पास है। आप जो भी चढ़ावा वहां पर चढ़ाते हैं, वह सब बोर्ड की ही संपत्ति मानी जाती है किसी पंडे या पुजारी की नहीं। यहां तक कि श्रीजी के दर्शन से पूर्व व बाद में उनके श्रृंगार के लिये स्वर्णाभूषण भी गहनाघर अधिकारी पंडितों को देते हैं और दर्शन के बाद में अपने अधिकार में वापिस ले लेते हैं। यदि स्वर्णाभूषणों में कोई भी कमी पाई जाये तो उसके लिये गोस्वामी व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार होते हैं। इस सेफ की तीन चाबी भी तीन लोगों के नियंत्रण में रहती हैं। एक अधिशासी अधिकारी के पास, एक गोस्वामी के पास और एक गहनाघर अधिकारी के पास। तीनों चाबी लगा कर ही सेफ खोली जा सकती है। बैंकों में भी तो ऐसा ही किया जाता है।

इस मंदिर में भगवान के दर्शन करने के लिये अलग – अलग समय निर्धारित हैं। आप जब भी श्रीनाथद्वारा मंदिर में जायें तो दर्शन के समय का ध्यान रखें –

मंगला – 5.15 a.m. to 6 a.m.

श्रंगार – 7.15 a.m. to 7.30 a.m.

ग्वाल – 9.15 a.m. to 9.30 a.m.

राजभोग – 11.30 a.m. to 12.30 p.m.

उद्यापन – 03.30 p.m. to 03.45 p.m.

भोग – 04.30 p.m. to 04.45 p.m.

आरती – 05.15 p.m. to 06.00 p.m.

शयन

जब हम लोग मंदिर पहुंचे तो पता चला कि उद्यापन दर्शन होचुके हैं और मंदिर के कपाट बन्द हैं जो अब 4.30 पर खुलेंगे। हम मंदिर की सीढ़ियों पर ही बिल्कुल दरवाज़े से सट कर बैठ गये ताकि कपाट खुलें तो हम सीधे भगवानजी के श्रीचरणों में जा कर गिरें और हमें उनके चरण-स्पर्श का सुख मिल सके।

हमारा नंबर कहीं कट न जाये इसलिये हम अपनी जगह से हिले तक नहीं। पर जब 4.30 पर मंदिर के कपाट खुले तो कोई और दरवाज़ा खोला गया जिसके आगे काफी सारे लोग पंक्ति में पहले से ही लगे हुए खड़े थे। द्वार खुलने से दो-चार मिनट पहले ही किसी ने हमें इशारा किया था कि पंक्ति तो वहां लगी हुई है ! हम हड़बड़ी में उठ कर वहां भागे और लाइन में सबसे पीछे लग गये। सिर्फ 15 मिनट के लिये दर्शन हेतु मंदिर के कपाट खुले और दर्शनार्थियों की लंबी – चौड़ी पंक्तियां ! हम कब में को मंदिर के गर्भगृह में धकियाये जाकर बाहर धकेल भी दिये गये, कुछ पता ही नहीं चला।

दर्शन सिर्फ स्वप्न जैसा सा लगता है। मुझे इस बात का बहुत मलाल रहा कि मंदिर के कपाट पूरे दिन क्यों नहीं खोल कर रखे जा सकते? केवल 15 मिनट के लिये द्वार खोल कर सैंकड़ों दर्शनार्थियों के लिये आपाधापी के दृश्य दिन में सात बार उपस्थित करना नाथद्वारा मंदिर बोर्ड के लिये क्यों आवश्यक है? क्या कृत्रिम रूप से भीड़ पैदा करके मंदिर के प्रति, दर्शनों के प्रति उत्कंठा और जिज्ञासा बढ़ाई जानी अनिवार्य है? न कैमरा ले जाने देंगे, न ठीक से दर्शन ही करने देंगे – मत करने दो, हम भविष्य में कभी आयेंगे ही नहीं !

भगवान तो हमारे हृदय में ही बसते हैं, सिर्फ इस भवन के अन्दर ही उनके दर्शन किये जा सकते हैं, ऐसा भ्रम हम नहीं पालते। हम अपने घर में ही मंदिर की स्थापना करके जी भर के नित्य प्रति दर्शन कर लिया करेंगे, जितना मन करेगा लड्डू गोपाल की सेवा और आतिथ्य कर लिया करेंगे ! रखो अपना मंदिर अपने ही पास ! नमस्ते !

खिन्न मन से हम मंदिर से पांव घसीटते से वापस टैक्सी तक आये। नया बाज़ार नामक उस सड़क पर न कुछ खरीदा, न कुछ देखा। चुपचाप टैक्सी में बैठ कर वापिस उदयपुर के लिये चल दिये। बाज़ार में पहुंच कर महिलाओं ने खरीदारी कर कर के अपना गम गलत किया। पुनः बावर्ची में खाना खाया और हम वापिस अपने होटल में आ गये।

1 अप्रैल ! यानि हमारी वापसी का दिन

आज हमारा झीलों के इस खूबसूरत नगरी उदयपुर में अंतिम दिन था और घूमने के लिये काफी सारी जगह बची हुई थीं। मसलन, बागौर की हवेली, नेहरू पार्क, सुखाड़िया सर्किल वगैरा – वगैरा। अतः सुबह जल्दी उठे। बाबू को भी हमने सुबह आठ बजे आने के लिये कह रखा था। हमने यह भी सोचा हुआ था कि आज दिन में 12 बजे होटल से चैक आउट कर देंगे क्योंकि 3 बजे तो हम एयरपोर्ट के लिये प्रस्थान करने ही वाले हैं। दिन भर बाहर घूमेंगे फिरेंगे, खायेंगे पियेंगे। होटल में वापस आ कर करना ही क्या है। होटल वालों से बात की तो उन्होंने कहा कि अगर हम चाहें तो चैक आउट करके अपना लगेज़ नीचे रिसेप्शन के बगल में उनके एक कमरे में रख सकते हैं। दिन में जब जाना हो, ले जायें। हमने इस प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लिया। गर्मी काफी अधिक थी, गाड़ी कई – कई घंटे धूप में पार्किंग में खड़ी रहती थी

अतः खाने पीने का सामान, नाश्ता आदि उसमें खराब होने का खतरा रहता था।

उदय कोठी

हम जब भी अपने होटल से बाहर निकलते थे तो लेक पिछोला होटल की बगल में हनुमान मंदिर और हनुमान घाट के नाम से एक घाट देखा करते थे। इसके ठीक सामने उदय कोठी नाम से एक भव्य बहुमंजिला होटल भी दिखाई देता था। सड़क पर जो बोर्ड लगा हुआ था, उस पर लिखा हुआ था कि इस हैरिटेज होटल की rooftop पर एक स्विमिंग पूल है। मैने अपनी श्रीमती जी से कहा कि आओ जरा देखें तो सही कि इस होटल में क्या – क्या है। वह संकोच करती रहीं कि अगर होटल वालों ने मना कर दिया तो? मैने कहा कि मना करेंगे तो वापस! पर रिसेप्शन पर जाकर हमने कहा कि हम आपके होटल का स्विमिंग पूल (तरणताल) देखना चाहते हैं तो उन्होंने हमारा स्वागत किया और कहा कि शौक से पूरा होटल देखिये। वास्तव में इस होटल की सबसे ऊपर की मंजिल (शायद पांचवी या छटी मंजिल होगी) पर तरणताल देख कर तबीयत मचल उठी कि इस गर्मी में थोड़ी सी तैराकी हो जाये पर फिर मन को काबू में करके सिर्फ कुछ फोटो खींच कर वापिस आ गये।

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Swimming Pool at the Rooftop of Udai Kothi, Udaipur

Swimming Pool at the Rooftop of Udai Kothi, Udaipur

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बागौर की हवेली

आपको याद होगा कि अपने होटल से निकल कर सुबह – सुबह पैदल घूमते हुए, मैं अकेला ही पिछोला के पुल को पार करके जगदीश मंदिर तक गया था और रास्ते में बागौर हवेली का विशालकाय प्रवेशद्वार दिखाई दिया था। आज सोचा कि ये हवेली भी देख ली जाये। पिछोला के गंगौर घाट पर स्थित इस हवेली का निर्माण किसी महाराणा ने नहीं बल्कि कई सारे महाराणाओं के कालखंड में उनके प्रधानमंत्री रहे अमर चन्द बादवा ने कराया था। यदि विकीपीडिया ने सही बताया है तो ये श्रीमान बादवा जी 1751 तक 1778 तक महाराणा प्रताप सिंह द्वितीय, राजसिंह द्वितीय, अरि सिंह और हमीर सिंह के प्रधानमंत्री रहे।

अमरचन्द की मृत्यु के पश्चात्‌ इस हवेली का नियंत्रण मेवाड़ के राजघराने के पास आ गया और मेवाड़ घराने के एक रिश्तेदार नाथ सिंह ने इसे कब्जा लिया। सन्‌ 1878 में महाराणा सज्जन सिंह ने इस हवेली का विस्तार कराया और यहां भी एक त्रिपोलिया टाइप का गेट बनवाया। वर्ष 1947 के बाद इस हवेली पर राज्य सरकार का अधिकार हो गया और इसके दुर्दिन आ गये। राज्य सरकार ने अपने कर्मचारियों को रहने के लिये इसके 138 कमरे आबंटित कर दिये और इन कर्मचारियों ने इस हवेली की शान में ऐसी – ऐसी गुस्ताखियां कीं कि बस! पर गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि जब जब धरती पर धर्म की हानि होती है, संतों को पीड़ित किया जाता है, तब – तब मैं अवतार लेकर साधु – संतों के परित्राण के लिये और विनाशाय च दुष्कृताम्‌ धर्म की पुनः स्थापना के लिये अवतार लेता हूं।

इस बार श्रीकृष्ण ने West Zone Culture Centre के रूप में जन्म लिया और इस हवेली को न केवल मुक्त कराया बल्कि इसे एक संग्रहालय के रूप में विकसित किया। पश्चिमी क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र के अधिकारियों ने यहां तक सोचा कि इस हवेली की वास्तुकला स्वयं में दर्शनीय है अतः इसका पुनरुद्धार करके इस वास्तुकला को सुरक्षित रखा जाना वांछनीय है।

धन्य हैं प्रभु आप! आपकी लीला अपरम्पार है। पहले इसे महाराष्ट्र, गोवा, राजस्थान और गुजरात की लोककलाओं और लोकसंस्कृति के संग्रहालय के रूप में विकसित करने की बात थी, पर बाद में सिर्फ मेवाड़ की राजसी संस्कृति तक इसे सीमित रखे जाने पर सहमति बनी। बागौर की हवेली के जीर्णोद्धार के लिये जब सांस्कृतिक केन्द्र के अधिकारियों ने मेवाड़ के राजघराने से संपर्क कर उनकी सहायता मांगी तो उन्होंने यह शर्त रख दी होगी कि इस हवेली में केवल मेवाड़ राजघराने की संस्कृति व कलाकृतियों का ही प्रदर्शन होना चाहिये।

138 कमरे, बीसियों आंगन, जीने, बुर्ज, स्नानागार, अर्वाचीन, प्राचीन, आधुनिक कलाकृतियां देखते देखते जब हम थक कर चूर हो चुके थे तो नीचे प्रथम तल पर एक कमरे में पोलिएस्टरीन (polystyrene) से बनाई गईं विश्व भर के प्रमुख भवनों की अनुकृतियों (replica) भी नज़र पड़ी जिनमें आइफल टावर, पीसा की एक ओर को झुकी हुई मीनार, ताजमहल, चार मीनार के अतिरिक्त जीप, कार, बस आदि भी वहां दिखाई दीं। मुझे लगता है कि आप यदि इनमें से कुछ सामान खरीदना चाहें तो बेशक खरीद सकते हैं।

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बागौर की हवेली देखने के लिये प्रति व्यक्ति 25 रुपये खर्च करना कोई महंगा सौदा नहीं है, खास कर तब जबकि कैमरे के लिये अलग से कुछ न देना पड़े। हम बागौर की हवेली में सुबह के समय गये थे पर शाम को 7 बजे यहां टैरेस पर sound and light show होता है, उसे देखना हर किसी के लिये रुचिकर हो सकता है। वैसे संग्रहालय को देखने का समय 10 बजे से सायं 5.30 बजे निर्धारित है।

बागौर हवेली की पृष्ठभूमि में चित्र

बागौर हवेली की पृष्ठभूमि में चित्र

Appreciating the artifacts in Bagaur Haveli

Appreciating the artifacts in Bagaur Haveli

coloured glasses are frequently used in Rajasthan to decorate a window.

coloured glasses are frequently used in Rajasthan to decorate a window.

 

Lake Side Restaurant at Bagaur Ki Haveli. Across the lake, our hotel also is visible.

Lake Side Restaurant at Bagaur Ki Haveli. Across the lake, our hotel also is visible.

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Our Hotel seen from Gangaur Ghat

Our Hotel seen from Gangaur Ghat

बागौर की हवेली को बाय-बाय, टाटा करके हमने फतेह सागर झील की ओर रुख किया क्योंकि हम टैक्सी से आते जाते नेहरू पार्क को देख कर ललचाते रहते थे। यह नेहरू पार्क फतेह सागर झील के मध्य में ही स्थित है।

फतेह सागर झील और नेहरू पार्क

उदयपुर अपनी जिन झीलों के कारण विश्व प्रसिद्ध है उनमें फतेह सागर झील भी एक है। अगर आप सोच रहे होंगे कि फतेह सागर झील का निर्माण महाराणा फतेह सिंह ने किया होगा तो आप सरासर गलत हैं। इस कृत्रिम झील का निर्माण 1678 में महाराणा जय सिंह ने किया था। पर बाद में महाराणा फतेह सिंह ने इसका विस्तार किया और यह झील उनके नाम को समर्पित हो गई। उदयपुर के उत्तर-पश्चिम में और पिछोला झील के उत्तर में स्थित यह झील जयसमंद झील के बाद दूसरी कृत्रिम झील है जिसका निर्माण निश्चय ही उदयपुर को रेगिस्तानों के लिये प्रसिद्ध राजस्थान को सूखे से बचाने के लिये किया गया होगा। ढाई किमी लंबी, डेढ़ किमी चौड़ी और साढ़े ग्यारह मीटर तक गहराई वाली इस झील के मध्य में स्थित तीन टापुओं में से सबसे बड़े टापू पर नेहरू पार्क है। इस पार्क में जाने के लिये नाव का सहारा लिया जाता है। इन झील को पानी तीन मार्गों से मिलता है और एक मार्ग का उपयोग मानसून के दिनों में पानी की अधिकता से निपटने के लिये किया जाता है ताकि झील में से फालतू पानी को निकाला जा सके।

दूसरे वाले टापू पर सुन्दर सुन्दर से पानी के फव्वारे लगाये गये हैं और तीसरे टापू पर नक्षत्रशाला (solar observatory) है। हम लोग सिर्फ नेहरू पार्क तक ही सीमित रहे जिसमें नाव की आकार का एक रेस्टोरेंट भी बनाया गया है। लोग बताते हैं कि वहां पर एक चिड़ियाघर भी है, जिसकी अब मुझे याद नहीं है। हो सकता है उस समय वह न रहा हो या उसमें जानवर न होकर सिर्फ चिड़िया ही हों !

नेहरू पार्क से आप चाहें तो बोटिंग के मजे ले सकते हैं। वहां पर बहुत तेज़ भागने वाले हॉण्डा वाटर स्कूटर भी थे जिस पर जाट देवता जैसे पराक्रमी घुमक्कड़ झील की परिक्रमा कर रहे थे। वैसे यदि आप उस स्कूटर की सवारी करना नहीं जानते तो भी कोई दिक्कत नहीं है। उनका आपरेटर आपको ड्राइविंग सीट पर बैठा कर खुद सारे कंट्रोल अपने हाथ में ले लेता है। आप यदि स्टीयरिंग भी ठीक से नहीं पकड़ सकते तो मेरी तरह से आप भी इन सब झंझटों से दूर ही रहें।

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Nehru Park, Udaipur

Nehru Park, Udaipur

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Nehru Park, Fateh Sagar Lake, Udaipur

Nehru Park, Fateh Sagar Lake, Udaipur

नेहरू पार्क से निकलते – निकलते हमें डेढ़ बज गया था और अब खाना खा कर होटल सामान उठाने के लिये जाना था ताकि समय से एयरपोर्ट पहुंचा जा सके। हमारी वापसी हेतु वही 38 सीटर लघुयान मौजूद था पर इस बार एयर-होस्टेस बदल गई थी।

इस यात्रा में जिन बातों ने मुझे बहुत प्रभावित किया वह थीं – उदयपुर वासियों के मन में अपने शहर के लिये गौरव की भावना । हसीन ने जो कुछ कहा था, यदि वह कम हो तो एक किस्सा और सुन लीजिये । फिर हम अपने रस्ते, आप अपने रस्ते ! किस्सा ये है कि होटल पहुंच कर हमने अपना सामान टैक्सी में रखवाया, होटल को भुगतान किया और अपनी टैक्सी में बैठे ही थे कि होटल का मालिक/मैनेजर भागा-भागा आया और मेरे हाथों में मेरा कैमरा सौंपता हुआ बोला – “आपका कैमरा काउंटर के बगल में सोफे पर छूट गया था। अपने घर जाकर आप ये तो कुछ दिन बाद भूल जाते कि किस होटल में और कहां कैमरा छोड़ा था, पर सारी ज़ि्दगी हर किसी से यही कहते कि उदयपुर गये थे, वहां मेरा कैमरा खो गया।“ मैं अचरज से उसे देखता ही रह गया। उस दिन से आज तक मैं अपने सहारनपुर वासियों को ये किस्सा जब-तब बताया करता हूं ताकि सहारनपुर वासी भी अपने शहर का सम्मान करना, और सहारनपुर के सम्मान में ही अपना सम्मान करना सींखें।

Waiting lounge at Udaipur Airport

Waiting lounge at Udaipur Airport

Journey back to home.

Journey back to home.

Bye bye, Udaipur

Bye bye, Udaipur

रात्रि में सभी एयरपोर्ट पर ट्रैफिक बढ़ जाता है, नई दिल्ली एयरपोर्ट पर भी लैंडिंग के लिये कोई रन वे खाली नहीं था अतः हमारा वायुयान दस मिनट तक ऊपर ही ऊपर दिल्ली एयरपोर्ट के चक्कर लगाता रहा। मैने एयर होस्टेस से कहना चाहा कि गाज़ियाबाद में हमारी सड़क बिल्कुल रन वे जैसी ही है, चाहें तो वहीं उतार लें पर फिर बाकी यात्रियों का ख़याल करके इस सुझाव को अपने दिल के अन्दर वापिस रख लिया। वायुयान की खिड़की में से हमें दिल्ली के वह दृश्य दिखाई दे रहे थे, जो हमने इससे पहले कभी नहीं देखे थे। वायुयान का पैट्रोल खत्म होने तक वह हमें वहीं घुमाता रहता तो भी हमें बुरा लगने वाला नहीं था।

New Delhi Airport from a little above.

New Delhi Airport from a little above.

गाज़ियाबाद पहुंचे तो रात्रि के साढ़े दस बज चुके थे। बड़ा बेटा भी वहां मौजूद था। सबसे पहले उसने मेरे कैमरे का मैमोरी कार्ड निकाल कर अपने लैपटॉप में लगाया और मेरी सारी फोटो अपने पास सुरक्षित कर लीं। रात को बड़ी दीदी के घर पर ही रुक कर यात्रा के खर्चों का हिसाब-किताब किया गया, घर के बाकी सदस्यों को किस्से सुनाये गये और अगले दिन सुबह हम अपनी कार में सामान लाद कर वापिस सहारनपुर के लिये चल पड़े।

आप सबने इस यात्रा में जिस तरह रुचि पूर्वक हमारा साथ दिया, वह निश्चय ही बहुत सुखद और प्रेरक है। मुझे जितना मज़ा उदयपुर और माउंट आबू में घूमने में आया था, उससे कुछ अधिक मज़ा इस यात्रा का किस्सा आप सब के सामने बांचने में आया है। उदयपुर और माउंट आबू के बारे में आपको बताने के प्रयास में मुझे कहीं – कहीं अपने तथ्यों को पुष्टि करने के लिये उदयपुर से संबंधित साहित्य और विकीपीडिया जैसी वेबसाइट का भी सहारा लेना पड़ा। यही कारण है कि इस श्रृंखला को लिखना शुरु करने से पहले मैं उदयपुर के बारे में जितना जानता था, आज उससे बेहतर जानने लगा हूं। फिर भी, मामला पुराना हो चुका है अतः कहीं – कहीं कुछ गलतियां हो गई हों, ऐसा पूर्णतः संभव है। अतः आप सब से अनुरोध है कि मेरी गलतियों के लिये क्षमा करते हुए, यदि कहीं पर भूल सुधार की आवश्यकता हो तो मुझे अवश्य ही सूचित करें।
एक बार पुनः आप सब को नमस्कार सहित !

20 Comments

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    great humor. great story-telling. but ye dil mange more. ab vapis kashmir pe aa jaiye.

    Nandan Jha reacted in the following manner :

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    • Dear Icelandic SS Ji,

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      @Nandan Jha : ????? ?? ! ?????? ??? ?? ??? ????? ???? ???? ????????????? ?? ?????? ??? ????? ??? ?? ???? ?? ????? – ??????? ?? ???? ???? ???? ?? ???????, ?? ???? ?? ??? ?? ?? ??? ??? ??? ? ??????? ???? ?? ?????????? ?????? ?? ???? ??? ??? ? ?? ??? ??? ??? ?????? ?? ???? ?? ?? ?? ???? ??? ?????? ?? ???? ??? :D

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  • D.L.Narayan says:

    Dear Sushantji, I was trying all evening to read your blog but I was getting some error message and I thought that something was wrong with my PC. Glad to know that the problem lay somewhere else.

    It is said that when Lord Krishna died, the Dwapara Yuga ended and Kaliyuga began. Tradition tells us that Kaliyuga started in 3102 BC and that Lord Krishna lived for 125 years. So, the birth date given by you is surprisingly quite accurate. When I first read the data given by you, my first reaction was scepticism; how can anyone know the exact date and time of someone born so long ago: But we celebrate Janmashtami every year and know that Rohini is his birth star. So, pinpointing the date and time is really not as difficult a task as we assume it to be. Complex tasks have simple solutions!

    Your frustration at the negative experiences in popular temples mirrors my own. God is everywhere, yet we seek Him/Her/It in temples. However, instead of focusing on the idol alone, one must enjoy the ambience, the architecture, the traditions which have survived for thousands of years; then, the disappointment is gradually replaced by wonder and then we can feel the spiritual vibrations in the shrine.

    The palaces you have shown us are a wonderful reminder of the creative genius of our ancestors. The skill and artistry is amazing indeed. When you can enjoy vintage architecture, then why worry about vintage cars? By the way, the photographs have come out very well.

  • Surinder Sharma says:

    Dear Sushant,

    Good Photos, excellent narration. You describe plane journey so beautifuly, I am thinking I have to enjoyed it in small plane. Thanks a lot

    • Dear Surinder Sharma Ji,

      Thanks for the encouraging words. I have submitted my story of Shimla and it should be before you in next week. Thinking of writing my experiences of some more places too.

      Sushant Singhal

  • Praveen Wadhwa says:

    Your post and pictures made Udaipur even greater than it is actually.
    Very nice and colorful post.

    • Dear Praveen Wadhwa, (Referring you as PW reminds me of Password ! )

      Thank you very much but I feel that Udaipur is really one of the finest travel destinations in my country and the credit goes to both – the people and the places.

  • Superb Series Sushant jee,
    Enjoyed every bit of it. Photos were superb and so was description.This will be very helpful in my journey to Udaipur and Nathdwara . Did you go to Ekling jee Temple?

    Rajasthan has attracted me a lot especially more after my yatra to Pushkar , Ajmer and Jaipur. But I had always wished to visit Udaipur and Nathdwara first but Lord took me to Jaipur first. So nothing is our hands.

    Nice information on Radha jee and Shree Krishna (Krishnaism) , That they are one. Male and female part. The same goes for Shiva and Shakti for Shaivism , Laxmi – Narayan for Vaishnavism , Sita Ram for those who follow Ram, Bhairavi – Bhairav for tantriks , God Father and Mother Nature for Christians and Allah and Duniya for Muslims etc . But it is the people who don’t understand, they all are one.

    One question : the above timings of the temple you have given are timings for which the Kapaat are open or for they closed ?

    Thanks for the wonderful series . Hope to have many more .

    please clarify?

    • Dear Vishal,

      Thank u for never failing to oblige me with your generous comments. Heartiest congratulations for sharing the limelight as Ghumakkar of the Year. All of you really deserve it.

      While returning from Shri Nath Ji temple at Nathdwara, we had stopped en route to yet another series of temples which was perhaps midway between Nathdwara and Udaipur. I can’t recollect the name of the temple complex but there were 8 or 10 ancient temples and after having darshan and paying our respect to the gods here, we had moved on. I do have some pictures of this temple complex which I had taken in low light (after sunset). Since I couldn’t remember any details of this temple complex which I could write about, I didn’t mention it in my post.

      Of course, the time table reproduced by me above refers to the timings when one may have darshan i.e. when the temple doors are open.

      Almost all the great philosophers, rishi, muni and other spiritual leaders have arrived at the same conclusion that Shiv and Shakti, Krishna and Radha …… are two sides of the same coin. Even when you learn about the atom, there is a nucleus (Proton) and electrons are dancing around it in their orbit. They are aptly referred to as Shiv and Shakti in Hindu mythology. They are at the root of this whole universe. Even those things which we consider to be static (say a molecule of calcium, Ferrum (iron), Argentum (Silver), Aurum (gold) etc., this non-stop dance of the Shakti is going on.

      I had read somewhere a beautiful piece which said something to this effect : Shiv and Shakti remained in tight embrace for thousands and thousands of yug. Then Shakti woke up and started a circular dance around Shiv and the energy so generated by this dance, the whole universe came into being.

      I hope these are references to inert and active state of molecule and atom only !

  • Ritesh Gupta says:

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  • Mukesh Bhalse says:

    Dear Sushant Sir,
    Please find my mobile number – 07898909043. Welcome to Indore.

    Thanks.

  • Abheeruchi says:

    Hello Sushant ji,

    Itni sundar stories padh ke dil khush ho gaya.

    Waise to Udaipur mera aur mere papa ka nanihal hai, par distances ke kaaran pehle humara jaana bahut kam hua karta tha par jab bhi jaate the nathadwara,eklingi jaate the.Mere bete ka mundan karane main nathadwara hi gayi thi wo bhi kariban 5-7 saal baad. Humein sab ne dara diya tha ki bahut bhid milegi.Infact mere husband is decision se thode khush bhi nahi the ki itni bhid me chhote bacche ko kyo le jaana.Phir bhi hum gaye. car park kar ke hum ab mandir ki taraf badhe to ek ladke ne mere husband ko kaha ki wo guide hai aur shortcut me le jaake bahut acche darshan karayega,hum pehle maane nahi par baad me mere husband maan gaye.Usne humse perhead 50/- mange, jo hum agree kar gaye.Aap vishwash nahi karenge par usne hume bahut hi alag raaste se le gaya aur kappat khulte se hi hum bhagwan ke saamne the ekdum first line me.Hum waha pure 15 min khade rahe,koi dhakka nahi aur akhir main hum khud hi nikal aaye ki bahut der tak darshan kar liye ab chale.
    Next time agar koi jaaye aur agar aisa reasonable guide milta hai to mujhe lagta hai use 50/- per head dena worth hoga.Just sharing information for future visitors.

    Udaipus se kareeb 65-70 km dur ek aur badhiya mandir hai bhagwaan dwarkadheesh ji ka.Us jagah ka naam hai KANKROLI , next time jaaye to ye mandir bhi dekhiyega,accha lagega.

    Thanks for such a wonderful series.

    • Hi Abhee,

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  • Nirdesh says:

    Dear Sushantji,

    The photos have come out real incredible. And how come you do not post photos with you in them. Or you dont trust your camera with anyone?

    Please share your camera specs. Maybe you can give a small tutorial on photography – especially taking photos in the sun and there is lot of whiteout. The top of the building fade in the sun. Is White Balance of any help here?

    Lovely epic series.

  • Dear Nirdesh Ji,

    Thanks a lot for liking the photographs. In this post my favourite photographs are of the Honda scooter rushing in Fatehsagar Lake. The trail left behind by the scooter came out satisfactorily.

    I would be immensely happy to write whatever I can, about photography. However, I am already fond of your photographs and wanted to learn one or two things from you too. In fact, interaction of this kind is going to benefit all of those who are interested.

    If Nandan permits me, I will write a ghumakkar Insight on photography. Although the topic is very lengthy, I will touch a few points at a time and too concerning travel photography only.

    Sushant Singhal

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