Mount Abu Sight Seeing

प्रिय मित्रों,

एक शाम उदयपुर में बिता कर अगले दो दिनों के लिये हम माउंट आबू के लिये उदयपुर से अपनी टैक्सी लेकर निकले तो शहर छोड़ने से पहले अंबा जी माता मंदिर और जगदीश मंदिर के दर्शन किये।   इसके बाद राष्ट्रीय राजमार्ग ७६ पकड़ कर पिंडवाड़ा होते हुए आबू रोड पहुंचे जिसे तलहटी भी कहते हैं क्योंकि यह आबू पर्वत की जड़ में बसा हुआ नगर है।  यहां रोड-साइड ढाबे “अप्सरा होटल” में खाना खाकर ज्ञान सरोवर,  माउंट आबू पहुंच गये थे।  ज्ञान सरोवर ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालय का अद्‌भुत परिसर है और हम सहारनपुर से चलते समय अपने बारे में एक परिचय पत्र लिखवा कर लाये थे जिसमें हमें इस परिसर में रुकने हेतु व्यवस्था करने का अनुरोध किया गया था।

दो कमरे हम दोनों परिवारों के लिये और एक कमरा हमारे ड्राइवर हसीन के लिये भी आबंटित हो गये तो हम बेफिक्र होकर शाम को सनसैट प्वाइंट देखने निकले।  सच तो यह है कि घर से चलते समय हमारे परिवार के तीनों सदस्य  बड़े अनमने ढंग से ज्ञान सरोवर में रुकने के लिये राजी हुए थे पर जब यहां आकर परिसर देखा, अपने कमरे देखे और उससे भी बढ़ कर अपना भावपूर्ण स्वागत होता देखा तो तीनों की  तबीयत गार्डन – गार्डन हो गई थी।

शाम को sunset point  से लौट कर हम नक्की लेक पर आये और बोटिंग की।  अगले दिन सुबह ज्ञान सरोवर में नाश्ता किया, और रसोई आदि की आश्चर्यजनक व्यवस्था देखते-भालते वापिस अपने कमरों की ओर आये तो देखा कि एक बिल्कुल नयी इंडिका टैक्सी और सांवला सा एक व्यक्ति हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं।  अपनी सास की तबीयत खराब होने के कारण हसीन को तो पिछली शाम को ही उदयपुर लौटना पड़ा था पर हमारे लिये वह बहुत अच्छी व्यवस्था करके ही गया लगता था।   नये ड्राइवर ने बताया कि उसका नाम बाबू है और अब आने वाले तीन दिनों तक वह ही हमारे साथ रहेगा।

कमरे बन्द करके हमने बाबूराम से कहा कि माउंट आबू में जो कुछ भी देखने लायक है, वह सब आज देखेंगे और बीच में १ बजे मधुबन भी पहुंचना है क्योंकि हमें दोपहर का खाना वहीं पर खाना है।  शाम को नक्की झील पर चलेंगे, बाज़ार घूमेंगे और रात को ज्ञान सरोवर में ही रुकेंगे और सुबह पांच बजे यहां से उदयपुर के लिये वापसी करेंगे।  यह आर्डर थमा कर हम सब टैक्सी में लद लिये और चल पड़े माउंट आबू दर्शन के लिये।

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पीस पार्क में पिकनिक का निर्मल आनन्द

जैसा कि मैने पहले बताया था, टैक्सी में बैठ कर नया शहर घूमो तो भूगोल तो सारा गड्ड-मड्ड हो जाता है।  हम पहले कहां गये, फिर उसके बाद कहां गये यह क्रमवार बयान करना अब संभव नहीं लग रहा है  क्योंकि यह वर्ष 2007 मार्च का किस्सा चल रहा है।

मंदिर के फोटो देख कर भी यह निश्चय पू्र्वक नहीं कह पा रहा हूं कि इस मंदिर का नाम क्या था।  वैसे हम अचलगढ़,  अनादरा प्वाइंट, अर्बुदा मंदिर,  गुरु शिखर, दिलवाड़ा मंदिर के अलावा ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के विभिन्न परिसर  (पांडव भवन, पीस पार्क आदि )  देखने गये थे।

पीस पार्क के मेरे पास कुछ पिछली यात्रा के चित्र भी मौजूद हैं जो ब्रह्माकुमारी केन्द्र पर आयोजित त्रि-दिवसीय शिविर के दौरान मैने लिये थे।  वह भी आपके मनोरंजनार्थ लगाये दे रहा हूं!  दिलवाड़ा मंदिर के तो चित्र खींचने की अनुमति ही नहीं है अतः वहां के चित्रों के लिये तो भाइयों – बहनों से सॉरी ही बोलना पड़ेगा !   इतना अवश्य है कि अब चूंकि मैं अपने परमप्रिय घुमक्कड़ भाइयों – बहिनों – भाभियों के लिये यात्रा संस्मरण लिखने लगा हूं तो आगे से ऐसी गलती नहीं होगी ।  बाकायदा फर्रे यानि नोट्स बना कर रखे जायेंगे  ताकि इम्तहान के दिन यानि लेखन के दिन, फर्रे निकाल निकाल कर नकल की जा सके।   

वैसे अरावली पर्वत श्रंखला में स्थित माउंट आबू का पुराना नाम अर्बुदारण्य या अर्बुदांचल बताया जाता है और जैसा कि हम में से अधिकांश लोग जानते ही हैं कि ये राजस्थान के सिरोही जनपद में स्थित 22 किमी लंबा और 9 किमी चौड़ा राजस्थान का इकलौता पर्वतीय स्थल है जो राजस्थान और राजस्थान से भी अधिक गुजरात के लोगों को ग्रीष्म ऋतु में सांत्वना देने के काम आता है।  कुछ लोग यह भी कहते हैं कि माउंट आबू गुज्जरों का प्रदेश है जो यहां के मूल निवासी हुआ करते थे।  गुजरात का नाम भी गुर्जरात से बदल कर धीरे धीरे गुजरात हो गया बताया जाता है।

यहां का सर्वोच्च शिखर गुरु शिखर है जिसकी ऊंचाई समुद्रतल से 5,600 फीट है।  सन्‌ 1937 में ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की स्थापना हुई थी मगर वह क्षेत्र 1947 के भारत विभाजन के बाद पाकिस्तान में चला गया अतः ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय का वैश्विक प्रधान कार्यालय बनाने के लिये माउंट आबू का चयन किया गया क्योंकि यह पर्वत लगभग उपेक्षित भूमि थी और प्रधान कार्यालय बनाने के लिये जितना स्थान संस्था को चाहिये था, वह यहां बहुत सरलता से मिल गया।  यहां पर मधुबन, पीस पार्क, ज्ञान सरोवर, ग्लोबल हास्पिटल एवं रिसर्च सैंटर आदि की स्थापना / विकास किया गया।  जब उनका काम इतने स्थान से भी नहीं चला और माउंट आबू पर्वत पर और स्थान उपलब्ध होना कठिन हो गया तो पर्वत की तलहटी में आबू रोड पर शान्तिवन के नाम से एक नगर बसाया गया जिसमें 15,000 लोग एक साथ रह सकते हैं, खाना खा सकते हैं, प्रवचन सुन सकते हैं और विश्राम कर सकते हैं।

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आबू रोड (तलहटी) में स्थित शांतिवन परिसर में 15000 क्षमता वाला डायमंड हॉल

आबू रोड (तलहटी) में स्थित शांतिवन परिसर में 15000 क्षमता वाला डायमंड हॉल

डायमंड हॉल में लगाये गये टी.वी.

डायमंड हॉल में लगाये गये टी.वी.

डायमंड हॉल का अन्दर का दृश्य

डायमंड हॉल का अन्दर का दृश्य

डायमंड हॉल का लम्म्म्म्म्म्बा कॉरिडोर

डायमंड हॉल का लम्म्म्म्म्म्बा कॉरिडोर

माउंट आबू में अनेक मंदिर भी हैं जिनमें आधार देवी (अर्बुदादेवी का मंदिर), दिलवाड़ा मंदिर आदि अत्यन्त प्रसिद्ध हैं।  ब्रह्माकुमारीज़ का अन्तर्राष्ट्रीय प्रधान कार्यालय होने के कारण यहां विश्व भर से उनके अनुयायी आते रहते हैं।  माउंट आबू के अनेकानेक दर्शनीय स्थल ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालय द्वारा बनाये गये परिसर ही हैं जिनका विकास व प्रबंध इस संस्था के ही हाथ में है।  यहां पर इस संस्था द्वारा चलाया जा रहा एक ग्लोबल हास्पिटल है जिसमें मरीज़ों को आधुनिक चिकित्सा पद्धति के अलावा योग का लाभ भी मिलता है।  विशेष रूप से हृदय रोग के मरीज़ों को, जिनको बाईपास सर्जरी की जरूरत होती है, उनको यहां पर सर्जरी के अलावा योग से हृदय रोग चिकित्सा के प्रयोग किये जाते हैं जो बहुत सफल हुए हैं।

हमारे पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम इस ग्लोबल हास्पिटल में एकाधिक बार आये हैं और यहां चल रहे प्रयोगों से बहुत प्रसन्नता व्यक्त करते रहे हैं।  AIIMS के एक हृदय रोग विशेषज्ञ डा. सतीश गुप्ता ने, जो AIIMS छोड़ कर ग्लोबल हास्पिटल में आ गये, हमें बताया कि वह AIIMS में अनेक वर्ष तक सर्जन रहते हुए, अनेकानेक बाईपास सर्जरी करते रहे परन्तु जब उन्होंने देखा कि छः महीने के भीतर ही मरीज़ वापिस उतनी ही blockage लेकर लौट आते हैं तो उनको सोचने पर विवश होना पड़ा कि क्या वे सही मायने में मरीज़ों की बाईपास सर्जरी करके उनका रोग दूर कर पा रहे हैं?  यहां अध्ययन और प्रयोग करते करते उन्होंने जो निष्कर्ष निकाले वे यही थे कि बाईपास सर्जरी करके वह blockage को जितना कम करते चले आरहे हैं, उतना काम तो योग भी कर देता है।  अस्तु !

हम माउंट आबू में जिन – जिन स्थानों पर गये थे, वहां के चित्र देख-देख कर मैं याद करने का प्रयास कर रहा हूं कि ये कौन सा मंदिर था, ये कौन सा पहाड़ था।  कुछ चित्र गुरु शिखर के प्रतीत होते हैं क्योंकि यहां पर पहाड़ के अंतिम छोर पर टेलिस्कोप लगा कर एक व्यक्ति आबू रोड तलहटी के दृश्य दिखा रहा था।  वहां पर अनादरा प्वाइंट भी लिखा हुआ दिखाई दे रहा है।  एक मंदिर जो शायद दत्तात्रेय का था, वह भी हमने देखा था।  वहां की वनस्पति, विशेषकर लाल रंग के फूलों ने हमें बहुत आकर्षित किया था।

बहुत सारा समय हमने पीस पार्क में भी बिताया था।  पहले हमें बीस मिनट का एक वीडियो दिखाया गया जिसका सार ये था कि ज़िन्दगी मिलेगी दोबारा – दोबारा अगर तुम नहीं करोगे अज्ञान से किनारा !  अज्ञान का अर्थ है – खुद को और इस शरीर को एकाकार समझ लेना।  इस वीडियो के अनुसार हम सब आत्माएं हैं जो इस शरीर के अन्दर, दोनों नेत्रों के मध्य भाग में, यानि भृकुटि में रहते हैं। हम यानि आत्मा, इस शरीर रूपी गाड़ी के ड्राइवर हैं।  हम सब आत्मायें ज्योति स्वरूप परमपिता परमात्मा के प्यारे बच्चे हैं, उनके अंश हैं।

हम सब के साथ दिक्कत यह है कि हम इस धरती पर जन्म लेने के बाद अपना वास्तविक रूप भुला बैठते हैं और इस प्रकार परमपिता परमात्मा के बच्चे होकर भी  जीवन भर आवारा समान भटकते रहते हैं।  लोग कहते हैं कि हम मंदिर में भगवान के सामने बैठ कर भगवान का चिन्तन करना तो बहुत चाहते हैं पर क्या करें मन इधर – उ्धर भटकता रहता है।  इसके उत्तर में बहनों ने हमें बताया  कि  यदि हम सब निरंतर यह स्मृति बनाये रखें कि हमारा और हमारे परमपिता परमात्मा का बाप-बेटे का नाता है तो हमें उनसे ऐसे ही स्नेह भाव उपजेगा जैसे किसी युवक को किसी अनजानी युवती से सगाई हो जाने के बाद उससे स्नेह उपजने लगता है।

उसे कहना नहीं पड़ता कि भाई, कभी टाइम निकाल कर अपनी मंगेतर को भी याद कर लिया कर!  वह खाते-पीते, सोते-जागते, उठते-बैठते हर समय अपनी मंगेतर को ही याद करता रहता है, उससे मिलने के ख्वाब देखा करता है। आजकल के लड़के तो मोबाइल में couple plan ले लेते हैं ताकि चौबीसों घंटे हॉटलाइन से जुड़े रहें।  ठीक वैसे ही हमें यदि परमपिता परमात्मा से अपने संबंध का ज्ञान हो जाये तो हम हर समय उनकी स्मृति में ही रहेंगे।  इसी को योग कहते हैं ।  योग का शाब्दिक अर्थ है – “जोड़ना”।

जब हम योग की स्थिति में होते हैं तो हम आत्मस्वरूप में स्थित रहते हुए परमात्मा से संवाद करने लगते हैं।   यह अभ्यास तब होगा जब हम सदैव यह याद रखें कि हम यह शरीर नहीं हैं बल्कि इस शरीर के अन्दर स्थित और इसे संचालित करने वाली आत्मा हैं।  हम सब विस्मृति की शिकार आत्मायें हैं जो यहां – वहां सुख की लालसा में भटकती रहती हैं जबकि वास्तविक सुख परमपिता परमात्मा से मिलन में है जो हम योग लगा कर किसी भी समय अनुभव कर सकते हैं ।  उसके लिये मरना कतई जरूरी नहीं है।   (कितने भाई लोग इस भाषण को पढ़ते – पढ़ते एक झपकी ले चुके हैं?  अपने – अपने हाथ खड़े करें !!!  :D )

गुरु शिखर और अचलगढ़ नाम की दो पर्वत चोटियों के मध्य स्थित विशाल परिसर में विकसित इस पीस पार्क में न केवल अत्यन्त सुन्दर उद्यान हैं, रोज़ गार्डन हैं, झूले हैं, रॉक गार्डन है, पिकनिक के लिये और खेल कूद के लिये मैदान हैं बल्कि सबसे आनन्द दायक बात ये है कि इस पीस पार्क का प्रबंध अत्यन्त कुशल और सेवाभावी व्यक्तियों के हाथों में है।  ब्रह्माकुमारी केन्द्र यानि मधुबन, ज्ञान सरोवर और शान्तिवन में तीन या अधिक दिनों के लिये नियमित रूप से शिविर लगते रहते हैं और एक दिन प्रशिक्षुओं को घुमाने के लिये भी नियत रहता है।  पीस पार्क में भी वे कुछ घंटे बिताते हैं, यहां उनके लिये खेल-कूद व खाने-पीने की भी व्यवस्था की जाती है।  ऐसे ही एक अवसर के चित्र यहां लगा रहा हूं।

दिलवाड़ा मंदिर परिसर में जब हम पहुंचे तो वहां पर कुछ बसें पहले से ही पहुंची हुई थीं। ये बसें गुजरात की थीं और कुछ महिलायें वहां मंदिर के प्रवेश द्वार पर हल्ला-गुल्ला भी कर रही थीं क्योंकि इस दिलवाड़ा मंदिर में महिलाओं के लिये प्रवेश के नियम बहुत सख्त हैं।  रजस्वला महिलाओं का वहां प्रवेश बिल्कुल वर्जित है। मोबाइल, चमड़े के बैग, बैल्ट आदि तो वर्जित हैं ही,  आम पर्यटक के लिये कैमरा अन्दर लेकर जाना बिल्कुल वर्जित है। हां, अगर आप मुंबई से किसी फिल्म की शूटिंग के लिये आये हुए हैं और मंदिर के प्रबन्धकों को लाखों रुपये दान में देने वाले हैं तो आप पलक पांवड़ों पर रखे जा सकते हैं।  पिक्चर पोस्टकार्ड वहां पर उपलब्ध हैं जिनमें सभी मंदिरों के भीतर के चित्र हैं।  स्वाभाविक है कि इन मंदिरों का प्रबन्धन वर्ग धार्मिक कारणों से नहीं, बल्कि व्यवसायिक कारणों से फोटो की अनुमति नहीं देता है।

दिलवाड़ा मंदिर में संगमरमर पर जो कलाकारी की गई है, उसे पत्थरों पर लिखी हुई कवितायें ही कहा जा सकता है। मंदिर की छतों से लटकते हुए संगमरमर के झूमर, अर्थात्‌ झाड़ – फानूस ऐसे हैं कि आजकल के कांच वाले झूमर (chandeliars) उनके सामने पानी भरते दिखाई दें।  संगमरमर के हज़ारों पुष्प बनाये गये हैं और हर पुष्प की पंखुड़ी तक आते आते पत्थर इतना पतला कर दिया गया है कि प्रकाश उसके आरपार झांकने लगता है।   यदि एक झूमर लगभग पूरा तैयार हो और आखिरी पुष्प बनाते समय पत्थर टूट जाये तो क्या होता होगा?  :(

दिलवाड़ा मंदिर देख कर हम लोग मधुबन आगये यानि ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय का अन्तर्राष्ट्रीय मुख्यालय।  सुबह ज्ञान सरोवर परिसर से चलते समय यहां मधुबन में हमें दोपहर का भोजन ग्रहण करने का सुझाव दिया गया था जिसे जिसे ब्रह्मा भोजन कहा जाता है और हर कोई इस भोजन को प्रसाद की भावना से ग्रहण करता है।  हम सब की पहचान के लिये हमें सुझाव दिया गया था कि हम अपने वक्ष पर ’अतिथि’ वाला कागज़ का बैज लगाये रखें ताकि आप जहां कहीं भी जायें, कहीं बी.के. भाइयों और बहनों को आपको पहचानने में त्रुटि न हो और आपका यथोचित सम्मान हो।  कागज़ के इस बैज का चमत्कारिक प्रभाव हमने पीस पार्क में भी देखा था।

यहां मधुबन में भी हमें भोजन कक्ष में भीड़ के बावजूद सबसे पहले एक मेज़ दे दी गई। भोजन के बाद  वाशबेसिन पर जाकर बी.के. भाइयों – बहिनों की तरह हम भी अपने बर्तन खुद साफ करना चाहते थे, पर उसके लिये भी मना कर दिया गया।  हमें कहीं भी आने-जाने की मनाही नहीं थी।  हमसे अपेक्षा थी तो केवल यह कि हम जोर-जोर से न बोलें और वहां के सामान्य नियमों का पालन करें।  हम ज्ञान सरोवर में जिन कमरों में ठहरे हुए थे, उनके बाहर एक मेज़ पर सुबह पांच बजे भी थर्मस टाइप के स्टील के बड़े कंटेनर में लगभग उबलता हुए पानी, चाय, दूध, कॉफी, ओटमिल्क, चीनी, कप-प्लेट आदि रखे थे ताकि हम जो भी चाहें, जैसा भी चाहें, बना कर पी सकें।

एक अन्य मेज पर कपड़े प्रेस करने के लिये भी automatic, steam press का पूरा प्रबन्ध किया हुआ था। बी.के. परिवार के सभी सदस्य एक दूसरे को अभिवादन करने के लिये हाथ जोड़ कर “ओम्‌ शांति” कहते हैं सो हमने भी यही अपना लिया था और उदयपुर पहुंच कर भी हम आपस में एक दूसरे को “ओम्‌ शांति” कह कर अभिवादन करने लगे थे!

सभी बी.के. परिसरों में भोजन कक्ष की व्यवस्था कुछ कुछ स्वर्ण मंदिर के लंगर जैसी ही है। चाहे पन्द्रह हज़ार लोग ही भोजन करने के लिये क्यों न आ जायें – पन्द्रह मिनट में सबको भोजन परोस दिया जाता है।  मैं बार – बार बी.के. लिख रहा हूं शायद आप समझ ही चुके होंगे कि बी.के. का अर्थ है – ब्रह्माकुमार या ब्रह्माकुमारी !

भोजन करने के बाद हम आधा घंटा बाबा के कमरे में आकर बैठ गये।  “बाबा का कमरा” यानि ध्यान कक्ष !  इस कक्ष में आपस में बातचीत करना बिल्कुल निषिद्ध है।  इस कमरे में जाते ही तब हैं जब आप कुछ देर शांति से बैठ कर आत्मावलोकन करना चाहते हैं।  यहां सामने दीवार पर शिव बाबा यानि, परमपिता परमात्मा के प्रतीक के रूप में night bulb जैसा एक प्रतीक जलता रहता है जिस में से स्वर्णिम रंग की किरणें फूटती दिखाई देती हैं।  उसी दीवार पर नीचे ब्रह्मा बाबा का भी एक विशाल चित्र लगा होता है।

ब्रह्मा बाबा यानि इस संस्था के संस्थापक जिनको 1937 में दिव्य ज्ञान मिला और उसके बाद उन्होंने इस दिव्य ज्ञान को आगे बढ़ाने के लिये इस संस्था को जन्म दिया।  पांच छोटी – छोटी बालिकाओं को साथ लेकर उन्होंने प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की स्थापना की।  ये पांचों बालिकायें आज दादी के रूप में जानी जाती हैं और इस संस्था की मुख्य प्रशासिका मानी जा सकती हैं। इन सभी की आयु 80 वर्ष से अधिक है।  कुछ वर्ष पहले इनमें से एक सबसे बड़ी दादी की आयु पूर्ण हो चुकी है।

ये सब दादियां और अन्य टीचर बहनें और बी.के. भाई लोग ब्रह्मचर्य का व्रत लेकर आजीवन अविवाहित रहते हैं।  दादियां इस अंतर्राष्ट्रीय संस्था की प्रमुख हैं जिसके लगभग आठ लाख सदस्य हैं पर इतनी सरल और मधुर स्वभाव की हैं कि जब देखो बी.के. भाई और बहनें उनको परिसर में कहीं पर भी घेर कर खड़े हो जाते हैं और “गप-शप” करने लगते हैं।  यह बात अलग है कि इस “गप-शप” में भी ये बड़े महत्वपूर्ण तत्वज्ञान की बातें बता जाती हैं!

एक दादी

एक दादी

हमसे तो उन्होंने बस यही पूछा कि हम आनन्द से हैं या नहीं, भोजन किया या नहीं, कोई असुविधा तो नहीं है,  बाबा के कमरे में बैठे या नहीं, अपने शहर में हम अपने सेवा केन्द्र पर नियमित रूप से जाते हैं या नहीं आदि आदि !  यहां चरण-स्पर्श करने की कोई परम्परा नहीं है।  मैने आज तक एक भी बी.के. सदस्य को किसी भी दादी या टीचर बहिन के चरण-स्पर्श करते नहीं देखा।

सभी टीचर बहनें भाषण भी देती हैं तो इतने मधुर स्वर में कि लगता है कानों में रसवर्षा हो रही हो।  “Speak less, Speak slowly, Speak sweetly” यह इन सभी का गुरुमंत्र है। मुझे वर्ष 2005 की एक सेमिनार का स्मरण है। तीन-चार साल का एक छोटा सा बच्चा हॉल में टहलते-टहलते स्टेज पर चढ़ गया था और घूमते – घूमते दादी के पास पहुंच गया जो उस समय मुख्य प्रशासिका थीं।  नाराज़ होने के बजाय उन्होंने उस बच्चे को उठा कर प्यार से अपनी गोदी में बैठा लिया था जो कार्यक्रम संपन्न होने तक आराम से उनकी गोद में ही बैठा रहा।

ध्यान कक्ष से बाहर आये तो सामने वाले परिसर की ओर बढ़ चले जिसे यूनिवर्सल पीस हॉल कहा जाता है।  ये सभी हॉल एक जैसे डिज़ाइन के अनुसार ही बनाये गये हैं, अन्तर है तो बस इतना कि इनमें श्रोताओं के बैठने की क्षमता अलग – अलग है।

यह प्राचीनतम हॉल है। हर किसी हॉल यानि श्रोतृशाला यानि auditorium में backdrop के रूप में ब्रह्माबाबा का चित्र होता है और ऊपर शिव बाबा का प्रतीक चिह्न होता है जिससे ध्यान केन्द्रित करने में सहायता मिलती है। हॉल में साइड की दोनों दीवारों पर लगभग 15-20 फीट की ऊंचाई पर कांच की खिड़कियां दिखाई देती हैं जिनमें विभिन्न भाषाओं के अनुवादक बैठते हैं।  कुछ सीटों पर हैडफोन लटके हुए रहते हैं जिन पर भाषा लिखी होती है।  आप अपनी भाषा का हैडफोन कानों पर लगा सकते हैं।  प्रवचन का अनुवाद आपको आपकी भाषा में सुनाया जाता रहेगा।

 

प्रवचन के अनुवाद के लिये खिड़कियों में अनुवादक मौजूद हैं।

प्रवचन के अनुवाद के लिये खिड़कियों में अनुवादक मौजूद हैं।

यहां से विदा लेकर हमने सोचा कि अब दो घंटे आराम करें और शाम को पुनः नक्की लेक पर पहुंच जायें।  अतः बाबू को ज्ञान सरोवर के लिये कह कर हम गाड़ी में बैठ गये।  शाम को पुनः नक्की लेक पर गये।  पुनः बोटिंग की, बाज़ार में घूमे – फिरे और  वहीं खाना भी खाया और रात को नौ बजे पुनः ज्ञान सरोवर में आ गये और दो-एक घंटे मक्खन जैसी घास पर लॉन में ही लेटे रहे और दूर-दूर तक फैले ज्ञान सरोवर परिसर के सौन्दर्य को निहारते रहे।   हमारा ज्ञान सरोवर में रुकने का उद्देश्य पैसे बचाना कतई नहीं था।  वास्तव में मेरी इच्छा ये थी कि मैं अपने परिवार वालों को इस संस्था की जानकारी प्रत्यक्ष अनुभव द्वारा प्राप्त करने में सहायता करूं।  आपस में सोच विचार कर सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पास हुआ कि यहां पर कुछ न कुछ आर्थिक सहयोग अवश्य किया जाना चाहिये। अतः लगभग दस बजे हम बाबा के कमरे में गये और वहां रखी हुई गुल्लक में अंदाज़े से इतनी राशि छोड़ आये जो हम दो दिन किसी होटल में ठहरते तो शायद खर्च करते।  गीता बहिन जी के लिये उनके कार्यालय में संदेश छोड़ आये कि हम सुबह वापिस जा रहे हैं क्योंकि सुबह पांच बजे हमारा ज्ञान सरोवर से प्रस्थान करने का इरादा था।

दिन भर के आनंद दायक अनुभवों को याद करते हुए हम सुबह पांच बजे का अलार्म लगा कर सो गये और सुबह जब उठ कर बाहर तब आये जब हमें बाबूराम ड्राइवर ने सुबह फोन किया और कहा कि वह बाहर हमारी प्रतीक्षा कर रहा है। हम सब ने अपनी अपनी इच्छानुसार चाय-काफी-ओटमिल्क बना कर पिया (मैने कभी भी ओट मिल्क का स्वाद नहीं लिया था अतः मैने तो वही लिया) और गाड़ी में बैठ कर वापिस उदयपुर की ओर चल पड़े।  पहाड़ी रास्ते पर कार की हैडलाइट के प्रकाश में आधा – पौना घंटा चलते-चलते जब हम आबू रोड यानि तलहटी तक पहुंचे, सूर्योदय हो गया था और मेरे तीनों परिवार वाले अपनी अपनी सीटों पर लुढ़के पड़े सो रहे थे।  मैने अपने बैग में से आबिदा परवीन की एक सी.डी. Kabir by Abida बाबूराम को दी और बेगम आबिदा के सूफी कलाम का मज़ा लेते – लेते दस बजे तक वापिस उदयपुर आ पहुंचे।  रास्ते में बाबूराम के साथ,  उदयपुर में कहां – कहां, कब – कब जायेंगे, क्या क्या देखेंगे यह सब प्लान बना डाले।  मुझे लगा कि बाबूराम को हमारी रुचियों – अभिरुचियों के बारे में कुछ जानकारी हसीन ने पहले से ही दे रखी थी। बाबूराम बहुत सीमित बोलने वाला व्यक्ति था जो सिर्फ आदेशों का पालन करना जानता था।

27 Comments

  • SilentSoul says:

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      • D.L.Narayan says:

        In Persian, Parveen refers to a cluster of stars known in our astronomy as Krittika. Our Praveen (??????) means proficient. However, the Sanskrit word Praveen becomes Parveen in Punjabi just like Indra becomes Inder. When it is for a male it is a ?????; for a female it isn’t, like Parveen Sultana, Parveen Babi or your favourite Sufi singer, Begum Abida Parveen.

  • Praveen Wadhwa says:

    A great post, I visited Mount Abu, some years ago, but didn’t’ go inside the ashram.
    Thanks.

    • Thank you Praveen Wadhwa Ji,

      Did you have several posts already written somewhere, say, in your diary? I envy your speed, accuracy and efficiency. All of your posts are superb! I keep staring at the photographs of nature! Nilgiri photo is really unbelievable.

      • Praveen Wadhwa says:

        SS Ji

        I never wrote about my journey or never had a diary. Even I read any book and disposed it upon reading or rather I always tear some pages from a book each day that I am reading on my walks, so not to carry the bulk.
        Photographs are not always mine so pl. never compliment me for the photos.

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  • Surinder Sharma says:

    Very informative post and everything is in details. Thanks a lot share wonderful journey.

  • Surinder Sharma says:

    Really good post, lot of information about Brahmkumar, otherwise press has always issues with Hindu Dharmguru, but I never read any thing against Brahmkumar. Nice to see group dance. Otherwise these days we saw lot of tension….

    Thanks

  • D.L.Narayan says:

    No post by Sushant Singhal cannot be anything but good. However, you say that you did not really enjoy writing this particular post and it shows – for example, Vitamin H (humour) was missing. By your high standards, it was not an exceptional post, but we enjoyed it nevertheless and found it very informative about the Brahmakumaris.

    As you say, not allowing photography in temples (not the sanctum) is a recent trend and the reasons are anything but spiritual. Sad that you could not present to us the magnificent architecture of Dilwara.

  • Sushant jee yeh bahut hee badiya series hai… kaafee kuch naya seekha maine is main, khas tor pay Brahmkumari sanstha ke bare main. Yahan hyderabad main bhee unka bahut bada kendra hai .

    thanks.

    • Thank you DT (I hope you don’t mind using your initials only. After all, it is not DDT. :D

      Brahmakumaris may not be having all elusive answers to our questions, but they are definitely a great organisation.

  • Nice Description AS USUAL

    Small photos don’t make post attractive . : -)

    • Point noted Vishal Ji. You won’t find thumbnails in future posts. I also concur with your views. If we could see full-screen slide show of all images, that could have been a great alternative but in its present avtar, clicking every picture to see it enlarged is no fun.

  • dr o p tiwari says:

    yatra vivran sundar ha.

    mount aabu jana padega, baccho ko kahta hu.

    badhai.

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  • Ritesh Gupta says:

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  • Ritesh Gupta says:

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  • Abheeruchi says:

    Apki post acchi lagi. Muhe mere us samay ko yaad dila diya jab maine aur mere family member ne kuch samay BK ke saath bitaya tha kyunki inka centre delhi me humare ghar ke samne hi tha. Mere family to unke saath mount abu ka inka main centre dekh aaye the unfortunately office ke kaaran mai nahi ja payi thi…

    Accha laga post padh ke. Unki sabki yaad aa gayi.

    Waise Murder kisne kiya wali conversation padh ke bahut accha laga.

    Apko aur apki family ko humari taraf se very happy new year..

  • Nandan Jha says:

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  • Gaurav says:

    Dear Ghumakkars, I need your suggestion…..I am planning to drive from Jaipur to Mount Abu at midnight. I have travelled in this route during daytime, but is it a safe highway to drive during night?

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