बुद्धं शरणम गच्छामी ………….आइये सारनाथ चलें।
साथियों, इस श्रंखला की पिछली पोस्ट में आपने पढ़ा की वाराणसी के प्रमुख मंदिर तथा रामनगर फोर्ट घुमने के बाद हम लोग होटल के…
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साथियों, इस श्रंखला की पिछली पोस्ट में आपने पढ़ा की वाराणसी के प्रमुख मंदिर तथा रामनगर फोर्ट घुमने के बाद हम लोग होटल के…
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इस बार हमें 2 नंबर गेट से प्रवेश करना था और इस बार ड्राईवर व गाइड भी समझदार लग रहे थे उन्होंने हमें आश्वासन दिया की वो हमें इस बार बाघ दिखा देगे . वो रास्ते मै अपने अनुभव बता रहे थे थोड़ी देर बाद गणपति का मंदिर भी दिखा जिसकी बहुत मान्यता थी मंदिर के बाद जंगल मै प्रवेश किया, लगभग १० मिनट गाडी चलाने के बाद ही ड्राईवर और गाइड आपस मै बात करने लगे और उन्होंने गाडी बहुत तेज दौड़ा दी, हम कुछ समझ नहीं पाए लेकिन कुछ बोले नहीं, ५ मिनट बाद ही वो बोले की कैमरे निकाल लीजिये क्योकि सामने ही एक बाघ था जो पानी मै आराम कर रहा था,
उन्होंने बताया की ये मादा है,हम सभी बहुत रोमांचित महसूस कर रहे थे क्योकि हम बाघ के बहुत नज्दीक थे, अभी १० मिनट ही हुए थे की पीछे से वन अधिकारी की जिप्सी आ गयी जिसमे वो खुद नहीं था लेकिन उसके कुछ गेस्ट थे उसकी जिप्सी आने के सभी जिप्सियो को वहा से जाने का इशारा कर दिया गया, हमारे ड्राईवर ने भी गाडी आगे बढ़ा दी
हमने उसको मना किया की वो ऐसा क्यों कर रहा है तो बोला कि अधिकारी साहेब ज्यादा देर खड़ा नहीं रहने देगे इसलिए थोड़ी देर बाद घुमा कर वापिस ले आऊगा बड़ा गुस्सा आया और मैंने उसको बोल भी की हम लोग पैसे खर्च करके इतनी दूर सिर्फ बाघ देखने आये है तो उसने बोला की आप इसकी शिकायत कर सकते है। 15 मिनट बाद हम वापिस उस्सी जगह आ गए उस समय वह सिर्फ 3 गाडी थी जिसमे एक अधिकारी की और बाकी 2 भी खास लोगो की ही थी। देखकर फिर गुस्सा आया की वो खुद क्यों अभी तक वहा है लेकिन किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ा और लगातार उनकी गाडी ही बाघ के सामने रही।
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देवभूमि गढ़वाल के कुछ छिपे हुए रत्नों को तलाशती तीन दोस्तों की कभी ना भुला पाने वाली रोमांचक घुमक्कड़ी की दास्तान…जिसमे हमने कुछ बेहतरीन नज़ारे देखे, कुछ अनोखे और सोच बदलने वाले अनुभवों से गुजरे, कुछ खुबसूरत दोस्तों से मिले, कुछ बेहतरीन ठिकानों पर रात गुजारी और बहुत कुछ सीखने को मिला…
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आगे बढ़े तो छत से झांकने पर एक और प्रांगण दिखाई दिया। बताया गया कि यहां रवीना टंडन की शादी हुई थी। जरूर हुई होगी, हमें तो निमंत्रण मिला नहीं था शादी का, हमारी बला से! सच पूछो तो रवीना शादीशुदा है या कुंवारी है – हमें इसमें भी कोई रुचि नहीं है। हमारे लिये तो हमारी अपनी श्रीमती जी ही रवीना, ऐश्वर्या, माधुरी, सीता, सावित्री, गार्गी, विद्योत्तमा, तिलोत्तमा सब कुछ हैं। (यह लाइन मैने उनको पढ़वाने के लिये ही लिखी है!)
सिटी पैलेस को समझना हो तो आप कुछ कुछ यूं समझें कि ये एक लंबाई में बनाया हुआ महल-कम-दुर्ग-कम-होटल-कम-संग्रहालय है। अगर आप 49,999 रुपये तथा उस पर विलासिता कर यानि luxury tax और VAT दे सकते हैं तो आप फतेह प्रकाश पैलेस या शिव सागर पैलेस होटल में से किसी एक होटल में एक रात रुक भी सकते हैं। अगर आप सोनिया गांधी के दामाद हैं और रातोंरात अरबपति बन चुके हैं तो आप अपने बच्चों का विवाह भी इन HRH Heritage hotels में से किसी एक में आयोजित कर सकते हैं। पर अगर आप 30 रुपये में सिटी पैलेस म्यूज़ियम देखने आये हैं तो आप शानदार हवेलियां देखिये, कमरों में सजाये हुए पंखे, बिस्तरे, मूढ़े आदि देखिये, अद्भुत वास्तुकला देखिये, अंग्रेज़ पर्यटकों को निहारिये, 200 रुपये कैमरे के लिये देकर फोटो वगैरा खींचिये और संकरी गली से बाहर निकल लीजिये।
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शिल्पग्राम से हम बाहर निकले तो बाबू ने पास में ही, न जाने किस पार्क में गाड़ी ले जाकर खड़ी कर दी। बीच में एक फव्वारा, अच्छा हरा – भरा लॉन, अच्छे – अच्छे चेहरे थकान मिटाने के लिये काफी उपयुक्त सिद्ध हुए। घास पर लेटे रहे, कोल्ड-ड्रिंक पीते हुए चिप्स खाते खाते घंटा भर वहीं बिताया। जब सूर्यास्त हो गया तो महिलाओं को फिर हुड़क उठी कि बाज़ार चलते हैं। बाबू कुछ एंपोरियम में ले कर गया पर हम हर जगह यही शक करते रहे कि पता नहीं, कैसा सामान होगा, पता नहीं कितना महंगा बता रहे होंगे। मैने एक बार भी श्रीमती जी को जिद नहीं की कि ये सामान अच्छा है, खरीद लो! हम लोगों ने पहले ही तय कर रखा था कि यदि हम में से कोई कुछ खरीदना चाहेगा और दूसरा मना कर देगा तो वह चीज़ नहीं खरीदी जायेगी। इसके बाद पुनः हाथी पोल आये और श्रीमती जी ने दो जयपुरी रजाइयां खरीद ही डालीं जो वज़न में बहुत हल्की थीं और पैक होने के बाद उनका आकार भी बहुत कम रह गया था !
खाना पुनः बावर्ची में ही खा कर हम वापिस होटल वंडरव्यू पैलेस में पहुंच गये जहां हमारे नाम के दोनों कमरे बुक थे। अगला दिन हमने तय कर रखा था – सिटी पैलेस, बागौर की हवेली, नेहरू पार्क, और नाथद्वारा मंदिर देखने के लिये।
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साथियों, पिछली पोस्ट में आपने पढ़ा काशी/वाराणसी/बनारस में हमने करीब ढाई दिन बिताया था। काशी में हमारा पहला दिन दशहरे का दिन था और…
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Despite the continuous building and breaking, the Bada Imambada turned out to be magnificient. It rivalled the Moghul architecture. No iron or cement has been used in the building. The imambada boasts of one of the largest arched structure with no supporting beams. Under this vaulted chamber lies the simple grave of the Nawab.The grave of the architect also lies in the main hall. Asafuddaulah was truly generous and class blind.
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अपने प्रसाद पुष्प जल को आरती के समय अपने पास ही रखे कई बार लोग पंडित और पुलिस वालो के कहने पे बहार ही चदा देते है ! हमसे भी यही गलती हुई थी लेकिन आप लोगो को सचेत करना जरुरी समझता हु !
बाबा के दर्शन करने के लिए सिर्फ २-३ मिनिट का समय मिलता है ! बाबा के दर्शन के बाद आप मंदिर के अन्दर ही बने कई और मंदिरों के दर्शन अवस्य करे ! और जिस प्रकार वैष्णु माता के लंगर में प्रसाद मिलता है उसी प्रकार महाकाल के मंदिर में भी प्रसाद के लिए एक टोकन मंदिर के अन्दर ही मिलता है एक सदस्य को सिर्फ एक टोकन ,बाबा का प्रसाद इतना स्वादिस्ट और लाजवाब होता है की बस पूछिए ही मत ! और वयवस्था तो इतनी शानदार है की तारीफे काबिल है टोकन ११ बजे से रात ८ बजे तक ही मिलता है प्रसाद में कभी रोटी ,कढी,चावल,सब्जी, मीठे चावल आदि !
मैं आप लोगो से स्पेसल आग्रह करना चाहूँगा की एक बार बाबा का प्रसाद अवस्य ग्रहण करे !
बाबा के दर्शन के बाद हम लोगो ने उज्जैन के दर्शनीय स्थलों को देखने का फैसला किया उसके लिए यहाँ कई साधन है जैसे की ऑटो , बस, वाहिनी, वेन आदि अपनी सुविधा के हिसाब से आप इनमे से कोई एक बुक कर सकते है ऑटो आपको ३०० रुपे में बुक हो जायेगा और वाहिनी और वन तक़रीबन ७०० रुपे लेंगे और बस ५० पर सवारी|
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दोस्तों, पिछली पोस्ट में आपने पढ़ा की आगरा में मैं, रितेश गुप्ता जी एवं जाट देवता एवं हम सबके परिवार इकट्ठा हो गए थे…
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सूर्यास्त होगया तो मैने कहा कि चलो, खेल खतम, पैसा हज़म ! अब यहां से पैदल ही नीचे चलेंगे। लुढ़कते – लुढ़कते हम नीचे पहुंचे और टैक्सी में बैठ कर नक्की लेक की ओर चल दिये। इससे पहले मैं 2003 और 2005 में भी माउंट आबू गया था। वर्ष जून 2003 में तो नक्की लेक सूखी हुई मिली थी और उसमें हज़ारों मज़दूर पुरुष और महिलाएं तसले सिर पर लिये हुए घूम रहे थे। (उस समय की खींची हुई एक फोटो भी सौभाग्य से मिल गयी है जो अपने पाठकों के सौभाग्य के लिये संलग्न किये दे रहा हूं ।) परन्तु सौभाग्य से इस बार नक्की में भरपूर पानी था और नावों में लोग सवारी कर रहे थे। हमने भी एक नाव ले ली जिसे पैडल बोट कहते हैं । बेचारे दो पुरुष पैडल मारते हुए नाव को आगे बढ़ाते हैं और पीछे दो बीवियां आराम से झील का नज़ारा देखती हुई चलती हैं। संभवतः एक घंटे तक हम नक्की में यूं ही पैडल मारते घूमते रहे। इस नक्की लेक के बारे में बहुत प्रचलित किंवदंती, जो अक्सर पढ़ने को मिलती है वह ये है कि देवताओं ने एक खूंखार राक्षस से बचने के लिये नख से धरती में झील बना डाली थी । यही नहीं, नक्की झील को लेकर एक और रोमांटिक कहानी रसिया बालम की भी चली आ रही है जिसने एक राजकुमारी से विवाह की लालसा में एक रात में ही आधा किलोमीटर लंबी और चौथाई किमी चौड़ी और २०-३० फीट गहरी झील खोद डाली थी। हे भगवान, कैसे – कैसे राजा होते थे उस जमाने में! मुनादी करा दी कि जो कोई एक रात में नक्की झील खोद देगा, उससे अपनी बिटिया का ब्याह रचा दूंगा ! सौभाग्य से इस झील को खोदने के बाद भी रसिया बालम फिर भी कुंवारा ही रहा क्योंकि राजा की घोषणा को रानी ने वीटो कर दिया। राजा को रानी से डांट पड़ी सो अलग!
नक्की झील माउंट आबू के हृदय स्थल में स्थित है और यहां का प्रमुखतम आकर्षण है। माउंट आबू के बाज़ार मुख्यतः नक्की झील के आस-पास ही केन्द्रित हैं। बात सही भी है, जब सारे टूरिस्ट नक्की पर ही आने हैं तो दुकान कहीं और खोलने का क्या लाभ? एक और बड़ी विशेष जानकारी जो विकीपीडिया से प्राप्त हुई है, वह ये कि 12 फरवरी 1948 को यहां पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की अस्थियां विसर्जित की गई थीं और गांधी घाट का निर्माण किया गया था। पर मुझे याद नहीं पड़ता कि हमने नक्की झील पर कहीं गांधी घाट के दर्शन किये हों! सॉरी बापू ! अगली बार जायेंगे तो ऐसी गलती पुनः नहीं होगी! नक्की झील के आस-पास के एक रेस्टोरेंट में भोजन लेकर (कहां, ये याद नहीं ! भोजन कैसा था, ये तो कतई याद नहीं)। हम लोग वापिस ज्ञान सरोवर में आ पहुंचे और अपने – अपने कमरों में नींद के आगोश में समा गये। (किसी इंसान के आगोश में समाने की तो वहां अनुमति भी नहीं थी !)
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The first impression was not bad. Once back in the hotel room by 6:30 p.m. from factory, used to roam around the city, markets and returned to my room after dinner. Aurangabad is a small city with all modern facilities and seems to be economical as well. Roads are good, well maintained and there is no power cut like in the entire State. I spent the first Sunday searching for an accommodation and it was not a difficult task or project like in Delhi & NCR. Room rent was also much lower than what I was paying in Gurgaon for a similar kind of accommodation, if not better. So, that part is ok, but the biggest hurdle came out to be the connectivity with Kolkata, my home.
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Andhra was a bastion of Buddhism for at least a thousand years. It was a centre of learning and Buddhism spread out to Sri Lanka and South East Asia through its ports. The stupas and monasteries provided the architectural models for the more famous Buddhist shrines in the rest of the world like the famous Borobodur in Indonesia. The Buddhist phase lasted for nearly a thousand years till the rise of Shaivism in the 7th century CE obliterated Buddhism from this region. It is sad that while these places attract visitors from all over the Buddhist world, Indians are not aware of the existence of these places.In this series, I am retracing the footsteps of those distant ancestors of mine.
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