Nasik

Road journeys – Nashik to Ahmedabad

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In 30 minutes we reached the famous abode of the Mahatma, the father of the nation and a legend preaching lessons on peace even today. We were enthralled with the mere feeling that we are actually at the site where, Mahatma Gandhi once lived, preached, enlightened our political revolutionists with his successful spiritual ideas of peaceful revolution and earned independence through his ardent anshans, un-armed and without blood shed. The river Sabarmati alongside flowing timidly adds tranquility in the already pacific atmosphere of the heavenly adobe. A few foreign visitors accompanied with philosophers on Gandhian studies were keen in learning with humility. We visited the whole area pursuing every facts preserved in pictures, models and writings with great respect and honour. A stall with Gandhiji’s books and relevant works by other legends was very worth visiting. A classic piece on crystal with Gandhiji’s portrait in it was what we couldn’t resist purchasing besides few artifacts and books. The hutment of Mahatma, a much revered place and the replicas of the items used by the immortal was also of interest. A charkha in working condition at its verandah is still there, in remembrance to the veteran, honouring his omnipresence in every Indian heart and beyond. A man weaving on the charkha drew every ones attention and was framed in all cameras including mine. The room, where Gandhiji resided was found locked for no better reasons but one can see through the netted wires on its windows, the resting place of the Mahatma, Later we also visited Vinobaji’s hut which is a thatched roofed mud hutment with two rooms one for him and another for Mira Ben the Anglo follower of Gandhiji.

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Road journeys – Daman to Mumbai-Shirdi-Nasik

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After relishing the home made graceful dinner, after so long, we started our onward journey to Shirdi at 9 pm, a 250 km drive was supposed to take 5-6 hrs. Kavita on the front seat, immaculately navigated through the zig-zags and soon through the Ghodbander road we were on the Eastern expressway to Nasik. I was told that Mumbaikars often travel on this route on weekends for Shirdi and Nasik at this hour so no issues driving till late night there. On the contrary, I didn’t find much private vehicles and was little uncomfortable regarding the route to Shirdi from Igatpuri which is a single and bumpy 100 km drive. Engulfed with apprehensions of adversities, with three ladies on board, I was a bit skeptic to whether go Shirdi or halt at Nasik which is relatively safer because of the HW throughout. Kavita on the other hand was confident and relaxed about the safety issues. In a state of topsy-turvy, I stopped at a large food joint (not many on this route) at Igatpuri for a stretch, fags & refreshment to ladies. I was pleased to see a few private vehicles parked there, on enquiring most of them revealed of their return journey to Mumbai and suburbs. One Innova driver was however, going Shirdi with ladies on board and assured about a safe journey except that the road from Ghoti to Shirdi is single and mostly dusty and bumpy.

He was on first instance very impressed about knowing us from Delhi. He had once tried luck in Delhi and stayed in Laxmi Nagar for one year was fallen for the city as usual but luck pushed him back because of his mother’s ill health and since then staying in a slum in Khar near Bandra. While chatting, he was extremely happy recalling the names of the Delhi-NCR localities, praising proudly, every thing about his lavish life style way back in 2002-03 during his stay in Delhi.

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त्र्यंबकम गौतमीतटे …….त्र्यंबकेश्वर से शिर्डी.

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भीमाशंकर प्रवास तथा वहां के रात्री विश्राम की खट्टी मीठी यादें मन में संजोए अब हम अपने अगले गंतव्य त्र्यंबकेश्वर की यात्रा प्रारंभ करने…

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Romancing the Train – Pune to Nasik

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My favourite travel author Paul Theroux says in the opening paragraph of ‘The Great Railway Bazaar’ – the best travel book ever written – “I have seldom heard a train go by and not wished I was on it”. One simple sentence summarizes the entire romance and mysticism around the trains. It conjures up the sights and sounds of unknown exotic destinations. It is as if you don’t care where the train goes; you only want to be someplace that is far and not seen before. Someplace where people look different, language you can’t understand but sounds musical; and food is an adventure everytime.

Meanwhile, the train chugs along several stations. It is the perfect weather to buy chikki in Lonavala and feast on hot vada paos. The taste brings back memories from the past. It seems as if the chikki and vada tastes have been standardized like McDonalds. You remember the taste from times long gone when you took the Madgaon Express from CST to Goa every month on the Konkan Railway Line.

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Maharashtra Jyotirlings – Aundha Nagnath, Baijnath and Grhrineshwar

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धर्मशाला में रूम का पता किया तो कोई 700 कोई 500 मांग रहा था, हालांकि वहां मन्दिर ट्रस्ट का धर्मशाला भी है वो मन्दिर के पीछे की और है और किसी पण्डित ने बताया की वहां सिर्फ 100 रुपए ही रुकने का किराया है, उन्ही पण्डित जी से हमने अभिषेक करवाने के लिए बात की तो वो भी हमारे साथ हो लिए की चलिए पहले आपको रूम की व्यवस्था करवाता हूँ फिर आराम से अभिषेक और पूजा के लिए चलना क्योंकि सोमवार होने की वजह से बाबा का पूजा अभिषेक 7 बजे तक करने की इजाजत मन्दिर प्रबन्धन देता है,

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शिंगणापुर यात्रा – जहाँ शनि देव विराजते हैं

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आपको फिर बताना चाहूंगा की साई आश्रम में दर्शन की बायोमेट्रिक सिस्टम है जो में स्तिथ है और रिसेप्शन से सुविधा मिल जाती है ताकि अगर आपने ऑनलाइन पर्ची नहीं ली तो आप आश्रम में ही बॉयोमीट्रिक्स करवा के शाम या सुबह की मंदिर प्रवेश की पर्ची प्राप्त कर सकते हैं । इससे यह सुविधा मिलती है की आपको फिर मंदिर के गेट १ & २ के सामने लाइन से पर्ची लेने में जो समय लगेगा वह समय बच जायेगा और एक बार प्रसादालय से प्रसाद ज़रूर पाए, यह एक डिवाइन अनुभव होगा ।

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शिरडी , जहाँ साई बसते हैं

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आपको बता दूँ की ऑनलाइन पर्ची वालों के लिए गेट नंबर ३ या शनि गेट से एंट्री होती है जलपान होने के बाद हमने मंदिर संसथान के सामने ऑटो करने का फैसला किया पर सामने तांगेवाले को देख के मन ललचा गया और बुक करके मंदिर की और चल पड़े, मंदिर संसथान से १ किमी दूर है और १००० मीटर आपको पैदल चलना होगा रस्ते में दुकान वाले आपको चादर और प्रसादी के लिए बोलेंगे पर आप सिर्फ चादर और गुलाब का फूल लीजियेगा क्योंकि बाबा को प्रसाद बाहर का नहीं चढ़ता सिर्फ फूल और चादर चढ़ती है,

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एशिया का एकमात्र टैंक म्यूजियम , अहमदनगर टैंक म्यूजियम

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सारा परिसर कई प्रकार के टैंकों से भरा था. मगर मेरी नज़र किसी भारतीय टैंक को ढूँढने में लगी हुई थी. अंत में उसी परिसर में एक भारतीय टैंक सुशोभित दिखाई दिया, जिसका नाम “Vijayanta” था. यह टैंक सेंचुरियन टैंकों की श्रेणी का था, जिसे सम्पूर्ण रूप से भारत में बनाया गया था. यह १९६६ में सेना में शामिल हुआ और २००४ में इसे सेवानिवृत किया गया. १९७१ के युद्ध में इसने अहम् भूमिका निभाई. पर उससे भी ज्यादा गौरव की बात यह है कि इसी टैंक ने भारत को टैंकों की दुनिया में निर्माणकर्ता राष्ट्रों की श्रेणी में शामिल कर दिया. अहमदनगर टैंक म्यूजियमअद्भुत थी.

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अंजनेरी पर्वत की पदयात्रा

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पर्वत की तलहटी वहाँ से लगभग २ किलोमीटर दूर थी. वहाँ तक का रास्ता घुमावदार, पथरीला और उबड़-खाबड़ था. उस पर चलने वाली गाड़ियाँ भयानक हिचकोले ले रहीं थी. पर पदयात्री की लिए, उस मौसम में, वह रास्ता बेहद ख़ूबसूरत नज़ारा पेश कर रहा था. मैं धरती पर नीचे उतर आये बादलों के बीच चल रहा था, पौधों और वृक्षों से हरे हो चुके पहाड़ों को निहार रहा था, कलकल बहने वाले झरनों की आवाज सुन रहा था, उन्मुक्त स्वच्छ हवा में साँसे ले रहा था. ऐसे में सड़कों का पथरीला होना क्या महत्व रखता है? तीन-चार घुमाव के बाद रास्ता समतल हो गया. अब तो प्रकृति की छटा देखते ही बनती थी. बस एक तस्वीर की कल्पना कीजिये

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पांडव लेनी (गुफा), नासिक की पदयात्रा

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नामकरण के किस्सों को जानने के पश्चात् मैं इन्हें देखने के लिए और लालायित हो उठा. कदम तेजी से बढ़ने लगे और मैं गुफा-वृन्द के गेट पर आ गया. वहां २४ लाजवाब गुफाएं थीं. पुरातत्व विभाग द्वारा एक बोर्ड भी लगा हुआ था, जिसमें बताया गया की वे गुफाएं लगभग २०० वर्षों में बनीं थीं. कई गुफाएं तत्कालीन सम्राटों और धनिक-सम्मानित लोगों के द्वारा दान में दी गयी राशि से बनाई गयीं थीं और बौद्ध धर्म के हीनयान सम्प्रदाय के अनुयायियों द्वारा उपयोग में लाई जातीं थीं.

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पंचवटी की यात्रा – भाग २

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पंचवटी का शाब्दिक अर्थ है, “पांच बड़/बरगद के वृक्षों से बना कुञ्ज”. अब हम उस स्थान में प्रवेश कर रहे थे, जहाँ रामायण काल में श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजी ने निवास किया था. पर्णकुटी तो इतने दिनों तक अब शेष नहीं रह सकती. पर पांच वृक्षों से घिरा वह कुञ्ज आज भी शेष दिखाया जा रहा है. सभी पांच वृक्षों पर नंबर लगा दिए गए थे, ताकि लोग उन्हें देख कर गिन सकें. वर्तमान में उन पांच वृक्षों के कुंज के बीच से ही पक्का रास्ता भी बना हुआ था, जिस पर एक ऑटो-स्टैंड भी मौजूद था और साधारण यातायात चालू था. बरगद के वे वृक्ष काफी ऊँचे हो गए थे. श्रधालुओं ने उन वृक्षों की पूजन स्वरूप उनपर कच्चे धागे भी लपेटे थे. हमलोगों ने पहली बार पंचवटी से साक्षात्कार किया.

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पंचवटी की यात्रा – भाग १

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नारोशंकर मंदिर की छत अपने आप में स्थापत्य-कला के लिए प्रसिद्ध है. काफ़ी विदेशी पर्यटक इस मंदिर की छत का अध्धयन करने आते हैं. चट्टानों के नक्काशीदार टुकड़े सिर्फ उन टुकड़ों पर बने खांच में लग कर अभी तक खड़े है. मंदिर के अन्दर के सभा मंडप में एक नंदी और एक कछुए की मूर्ति है. कछुए की मूर्ति तो जमीन के सतह पर ही अंकित है. कुछ ऐसा-ही त्रैम्बकेश्वर मंदिर में भी देखने को मिलता है. मंदिर के बाहर के प्रांगन में भी कई कलात्मक आकृतियाँ हैं, जैसे की काल-सर्प की प्रतिमा. नारोशंकर मंदिर में कुछ समय बिताने के बाद हमलोग फिर से राम-तीर्थ की तरफ बढ़े.

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