A visit to Taragarh Fort, Ajmer

By

Hakim requested me to park the car in his locality where a local lad would be taking care of the car. But, it was not easy to believe a total stranger and so I did not heed to his request and parked the car in the official parking lot which was very congested. It required great skill to park and more to retrieve the vehicle. Somehow I did it. After parking the car, we went to see the dargah along with Syed Abdul Hakim. He introduced us to the nearest structure as Karbala built in memory of the Mohammed Ali, who was the son-in-law of the Prophet Mohammed and who was martyred by the Khalifa. Every year they mourn his killing in the Karbala. It was a settlement of Shia Muslims. According to Hakim, the population of that place was about 5000 for which a separate polling booth is arranged during election time.

From Karbala, Hakim took us to his shop-cum-office, where his relatives were selling the Chadar (Shawl), Flowers and incense sticks etc. and persuaded me into purchasing the items from their family shop. Though his shop was not cheap by any means, we had no option but to purchase from there itself. So, we purchased the items from Hakim and his relatives carefully choosing the items that were being sold at the lowest rates and proceeded towards the dargah. My son, Ruchir looked good when he walked upto the Akbar gate carrying the chadar on his head. After entering the premises, we saw a massive silver sword at the top of a building. Hakim told us that it was Jafarani sword given to the Dargah by Mughal Emperor, Akbar.

Read More

Road Travel Reminiscences – Delhi to Ajmer via Jaipur

By

So, we moved ahead and found the third jewel of this marvelous city, i.e., Hawa Mahal. Standing tall and illuminated, this Mahal had seen off the day of crowded markets and polluted vehicles. The Hawa Mahal told me… “O Traveller! I was built for providing cool air and shelter. My structure was befitting the queens. Pollution is that I am smoking everyday and night, days after days, years after years and generations after generations.” I consoled him in my mind and said “O worthy Palace! Soils made you and soils you would become….The respect you get is the respect you deserve. Stand tall till your strength permits”.

After meeting with the three jewels of this great city, we drove ahead towards the new township. The Janpath of Jaipur leads to the mighty building of the Rajasthan Legislative Assembly, the seat of power in democracy. It was almost 11 pm and we had to take rest for the journey next day. Still, I stopped in the middle of the Janpath. The building was trying to say something. It told me… “O Travellor! I am the power today. Don’t you agree? Or, dare not disagree.” I smiled in my mind and replied “O worthy building! Come to me after 150 years. I will see you with pride and anoint you with my tears, if your power still remained intact”.

Read More

जीवदानी माता का मंदिर और अरनाला द्वीप के क़िले का परिचय

By

किले के उत्तरी द्वार पर किले का मुख्य दरवाज़ा जो, समुद्र की तरफ़ खुलता था. किसी जमाने में उस समुद्री तट पर पुर्तगाली और ब्रिटिश नौसेना तैनात रही होगी. उस दिशा में समुद्र दूर-दूर तक फैला दिखाई देता था और यह साफ़ दिख रहा था कि सामरिक दृष्टि से अर्नाले के किले का महत्त्व कितना था. इसी दरवाज़े के ऊपर मराठों की पुर्तगालियों पर विजय के बारे में एक शिलालेख भी अंकित था. साथ ही किले की दीवारों पर शेर और हाथी जैसे प्रतीक चिन्ह भी उकृत थे.

Read More

वज्रेश्वरी के गर्म पानी के स्रोतों का आश्चर्य

By

एक-दूसरे पर जल के छीटें फेंकना, हंसी-मज़ाक करना, पानी के बीच अपनी फोटो खिंचवाना इत्यादि जल-क्रियाओं से लोग खुशियाँ मना रहे थे. तैरना जानने वाले लोग तो उस नदी के बीचो-बीच तैर रहे थे. कुछ स्त्रीयां नदी के तट पर बैठ कर अपनी-अपनी अंजुलियों में किनारे पर आई हुईं छोटी-छोटी मछलियों को पकड़ने की चेष्टा कर रहीं थीं.

Read More

जाने, मुम्बई निकट गणेशपुरी के गर्म पानी के स्रोतों का सत्य

By

इधर छिटपुट हो रही बारिश से मेरा तन-बदन भींग चुका था. उस भींगे हुए ठंडे मौसम में ईच्छा होने लगी कि गर्म पानी के सोतों में स्नान किया जाए. आखिर इतनी दूर मैं उन्हीं के लिए तो आया था. पर मैं महादेव मंदिर वाले उन सार्वजनिक कुंडों में डुबकीनहीं लगाना चाहता था. किंकर्तव्यविमूढ़ता की उस परिस्तिथिति में तन्सा नदी के तट से जैसे निकला, वैसे ही एक पुराने ब्रिटिश समय की कोठी नज़र आई. उत्सुकता शांत करने हेतु मैं कोठी तक चला गया. इस कोठी का नाम रत्नाबाद था. वर्तमान में इसे “गर्म-पानी स्नान तथा हेल्थ रिसोर्ट” के रूप में परिवर्तित किया गया था.

Read More

एशिया का एकमात्र टैंक म्यूजियम , अहमदनगर टैंक म्यूजियम

By

सारा परिसर कई प्रकार के टैंकों से भरा था. मगर मेरी नज़र किसी भारतीय टैंक को ढूँढने में लगी हुई थी. अंत में उसी परिसर में एक भारतीय टैंक सुशोभित दिखाई दिया, जिसका नाम “Vijayanta” था. यह टैंक सेंचुरियन टैंकों की श्रेणी का था, जिसे सम्पूर्ण रूप से भारत में बनाया गया था. यह १९६६ में सेना में शामिल हुआ और २००४ में इसे सेवानिवृत किया गया. १९७१ के युद्ध में इसने अहम् भूमिका निभाई. पर उससे भी ज्यादा गौरव की बात यह है कि इसी टैंक ने भारत को टैंकों की दुनिया में निर्माणकर्ता राष्ट्रों की श्रेणी में शामिल कर दिया. अहमदनगर टैंक म्यूजियमअद्भुत थी.

Read More

अंजनेरी पर्वत की पदयात्रा

By

पर्वत की तलहटी वहाँ से लगभग २ किलोमीटर दूर थी. वहाँ तक का रास्ता घुमावदार, पथरीला और उबड़-खाबड़ था. उस पर चलने वाली गाड़ियाँ भयानक हिचकोले ले रहीं थी. पर पदयात्री की लिए, उस मौसम में, वह रास्ता बेहद ख़ूबसूरत नज़ारा पेश कर रहा था. मैं धरती पर नीचे उतर आये बादलों के बीच चल रहा था, पौधों और वृक्षों से हरे हो चुके पहाड़ों को निहार रहा था, कलकल बहने वाले झरनों की आवाज सुन रहा था, उन्मुक्त स्वच्छ हवा में साँसे ले रहा था. ऐसे में सड़कों का पथरीला होना क्या महत्व रखता है? तीन-चार घुमाव के बाद रास्ता समतल हो गया. अब तो प्रकृति की छटा देखते ही बनती थी. बस एक तस्वीर की कल्पना कीजिये

Read More

पांडव लेनी (गुफा), नासिक की पदयात्रा

By

नामकरण के किस्सों को जानने के पश्चात् मैं इन्हें देखने के लिए और लालायित हो उठा. कदम तेजी से बढ़ने लगे और मैं गुफा-वृन्द के गेट पर आ गया. वहां २४ लाजवाब गुफाएं थीं. पुरातत्व विभाग द्वारा एक बोर्ड भी लगा हुआ था, जिसमें बताया गया की वे गुफाएं लगभग २०० वर्षों में बनीं थीं. कई गुफाएं तत्कालीन सम्राटों और धनिक-सम्मानित लोगों के द्वारा दान में दी गयी राशि से बनाई गयीं थीं और बौद्ध धर्म के हीनयान सम्प्रदाय के अनुयायियों द्वारा उपयोग में लाई जातीं थीं.

Read More

मुंबई की गुफाएँ – जोगेश्वरी देवी की खोज में

By

इतने में कुछ विदेशी पर्यटक आ गए. बड़े-बड़े कैमरों के साथ. वे भी हनुमान मंदिर की तरफ जा रहे थे. मैं भी उनके पीछे चल पड़ा. वो रास्ता एक बड़े-से आँगन से हो कर जाता था, जिसके दोनों तरफ गुफ़ाएँ बनीं हुईं थीं. मेरे पुरोहित ने बताया था कि वर्तमान का वो आँगन पूर्व-काल में गुफ़ा ही था, जिसकी छत कालांतर में गिर चुकी थी. अगर वह गुफा का हिस्सा था, तब तो एक जमाने में वह गुफा बहुत-ही विशाल रही होगी. खैर आँगन से गुजर कर हम हनुमान-मंदिर पहुँचे और वहां दर्शन किया. मंदिर एक गुफा में बना हुआ था. कोई ज्यादा लोग नहीं थे. वहां से तुरंत ही सभी निकल पड़े और फिर गणेश मंदिर तक आये. वह नजदीक ही था. वह भी एक गुफा में बना हुआ था.

Read More

मुंबई की गुफाएँ – मंडपेश्वर और महाकाली

By

यह भी कहा जाता है कि जब-जब शासन बदला, तब-तब इस गुफा का विभिन्न प्रकार से उपयोग किया गया. कभी तो यहाँ सैनिकों के टुकड़ियाँ निवास करती थीं, तो कभी शरणार्थी-गण. यह भी समझा जाता है कि प्रत्येक शासन काल में यह गुफा उजड़ी और फिर नए सिरे से बसी. लोग यह भी मानतें हैं कि विश्व युद्ध के समय भी अंग्रेज सैन्य-बल यहाँ बसा हुआ था. इनका यह मतलब निकलता है कि मंडपेश्वर गुफाएं हमेशा से लोगों द्वारा आबादित रहीं हैं.

Read More

संजय गाँधी राष्ट्रीय उद्यान, मुंबई की पदयात्रा – “कान्हेरी गुफा”

By

पर एक बात थी. कान्हेरी पहाड़ का वह स्थान बिलकुल वीरान था. इतना वीरान कि गुफाओं के अन्दर अकेले जाने में ऐसा महसूस हो कि कोई वहां पहले से मौजूद है, जो आपको निरंतर देख रहा है. उस वीरानी में मन में कई ख़याल आते हैं. जैसे कि क्या वहां जाने वाले का कोई सम्बन्ध पश्चात काल में उस गुफा से था और उसी सम्बन्ध के सहारे वह इस जीवन में भी वहां लौट कर आया हो? उस अंतिम गुफा में बैठ कर मैंने अपनी एक कविता का प्रथम अन्तरा लिखा. इस कविता के दूसरे अंतरे बाद में मुंबई के अन्य गुफाओं की यात्रा में पूर्ण हुए.

Read More

कृष्णागिरी उपवन, संजय गाँधी राष्ट्रीय उद्यान- मुंबई पदयात्रा

By

परन्तु मुझे आकर्षित किया उनके केलों ने. खूब सुन्दर और पुष्ट केले थे. मुझे केले खरीदता देख कर एक स्त्री ने मुझे समझाया कि मैं खीरे ले लूं और केले छोड़ दूँ. पर मैं कहाँ मानने वाला था. बस जैसे ही मैंने केले ख़रीदे, वृक्षों की डालों से तेजी-से उतर कर करीबन २०-२५ बंदरों ने मुझे घेर लिया. घबरा कर मैंने केले वहीँ जमीन पर फेंके, जो क्षण-भर में ही बंदरों द्वारा लूट लिए गए. अब उस डंडे से लैस व्यक्ति ने बंदरों को भगाने के लिए डंडा भाजना शुरू किया. बन्दर भाग गए. अब यह तो नहीं पता कि डंडे से भागे या केले चट कर के भागे. मैंने उन दोनों स्त्रियों को समझाने की कोशिश की कि जब यहाँ बंदरों का उत्पात है तो केले बेचते ही क्यों हो. दोनों स्त्रियाँ मुस्कुरायीं क्योंकि आज उन्हें एक और शहरी आदमी मिला था, जो जंगल में बिना देखे चलता था.

Read More