Gwalior

The magnificent Gwalior Fort stands high on an enormous rock massif and dominates the skyline of the city of Gwalior. It is also the evidence that Gwalior played an important part in Indias history and possesses a rich cultural heritage in art and architecture. Some of the finest Indian Classical musicians claim Gwalior as their home, the most famous of them being Tansen, whose tomb is one of the heritage places worth visiting.
Other significant historical sites are Jain monoliths of the Tirthankaras, Man Mandir Palace, Gujari Mahal, Suraj Kund, Jai Vilas Palace, Mausoleum of Ghaus Mohammed and Memorials to Rani Jhansi, Tantia Tope and Scindia kings and queens. The sound and light show at the Man Singh Palace brings to life historical stories for the benefit of visitors. The Jai Vilas Palace has some rooms dedicated to a museum showing the lifestyle of the erstwhile Maharajas. It is also the current residence of the Scindia Royal family.
Holy places in Gwalior include a Pratihara Vishnu Shrine at Teli ka Mandir and Sahasrabahu Mandir. Continuing its music legacy, Gwalior is home to a unique Museum of Music set up in the house of the celebrated sarod player, Ustad Hafiz Khan, where you see ancient musical instruments belonging to great Indian musicians. It is called the Sarod Ghar.
Located on the northernmost fringe of Madhya Pradesh, Gwalior is well connected by road, rail and air to major cities in the state and country.
Best Time to Visit: October to March
Languages Spoken: Hindi
Climate: Hot summers, average monsoon, pleasant winters
Heritage sites: Gwalior Fort, Tansens Tomb, Jain monoliths of the Tirthankaras, Man Mandir Palace, Gujari Mahal, Suraj Kund, Jai Vilas Palace, Mausoleum of Ghaus Mohammed, Memorials to Rani Jhansi, Tantia Tope and Scindia kings and queens
Holy Places: Teli ka Mandir, Sahasrabahu Mandir
Knowledge Centres: Sarod Ghar(Museum of Music)

Experiencing the Heart of India

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Hey there. I don’t know where to start. India has opened my eyes to a whole new culture I have never before seen. I’ve been born and brought up in Auckland, New Zealand, and often visit my home city Pune. However, this time, my relatives and I decided to visit the heart of Madhya Pradesh to get a historically and culturally rich experience. After having an initial debate on which places to go to, we came to the official conclusion of touring Khajuraho, Orchha and Gwalior.

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ग्वालियर में घुमक्कड़ी- जय विलास पैलेस

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इन सीढ़ियों से उतर कर हम महल के दूसरे भाग में पहुँचते हैं।  यहाँ पर उस समय सवारी में प्रयुक्त होने वाल तरह -तरह की बग्घी रखी हुई हैं। यहाँ पर उस समय सवारी में प्रयुक्त होने वाल तरह -तरह की बग्घी , डोली आदि रखी हुई हैं।

इसके साथ  ही महल के दूसरे भाग में हम पहुँचते हैं जिसे दरबार हाल के नाम से जाना जाता है।  यहाँ पर राजसी भोजनालय है जहाँ पर एक साथ बहुत सारे लोगो के खाने की व्यवस्था है।  मेहमानों के  साथ यहीं पर खाना खाने का प्रबन्ध है।  दरबार हाल की चकाचौंध उस समय के राज घराने के वैभव और विलासिता की दास्तान कह रहे थे।  इसकी छत में लटके विशालकाय झाड़ – फानूस का वजन लगभग तीन – तीन टन है।  इसकी छत इसका वजन उठा पायेगी या नहीं इसलिए छत के ऊपर दस हाथियो को चढ़ा कर छत की मजबूती की जाँच की गई थी।  दरबार हाल में जाने की सीढ़ियों के किनारे लगी रेलिंग कांच के पायो पर टिकी हुई है।  एक गार्ड यहाँ पर बैठा दर्शको को यही आगाह करवा रहा था कि रेलिंग को न छुए।

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Morena Magic – The Temples of Bateshwar, Padawali and Mitawali

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And then Morena springs the third association – unknown and full of surprises. A friend has just stumbled upon the most incredible circuit of obscure temples, 25 km deep inside Morena; of course by walking in the glorious tradition of baghis of yore. The opportunity to see the temples soon presents itself and you grab it; of course a city slicker like you will need a four wheel ride.

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ग्वालियर में घुमक्कड़ी – ग्वालियर का किला

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कुछ कदम आगे बढ़ता हूँ तो देखता हूँ कि किले की तरफ जाने वाली पतली सी सड़क के एक तरफ, पत्थर की चट्टानों को काट कर जैन समुदाय के तीर्थकरों कि मूर्तियां बनाई गईं हैं। इनमे से कई मूर्तियों भग्न अवस्था में थीं जिन्हे शायद किले पर विजय प्राप्त करने के बाद मद -मस्त मुस्लिम आक्रान्ताओ ने इस अवस्था में पहुँचाया था। यह बहुत ही कष्टप्रद विषय है कि इस्लाम को मानने वाले अविवेक में अपने विजयी दंभ को वह इन पत्थरो पर निकालने लगते है। एक तरफ तो यह मुग़ल अपने आप को कला प्रेमी के रूप में स्थापित करने की चेष्टा करते हैं और दूसरी तरफ चट्टानों पर की गई इन कलाकृतियों को नष्ट करते हैं। मंगलवार का दिन था इसलिए बहुत कम लोग ही किला घूमने के लिए जा रहे थे। छुट्टी का दिन होता तो शायद यहाँ पर भीड़ देखने को मिलती। वह दोनों युवक-युवती मुझे रास्ता बता कर तेजी से आगे बढ़ गए। मेरे पीछे एक विदेशी युवती भी चट्टानों को काटकर बनाये गए इन जैन तीर्थकारों को देखती हुई आ रही थी। मै धीरे – धीरे चढ़ाई पर चढ़ता हुआ आगे बढ़ रहा था पर मुझे दूर – दूर तक किला कही नहीं दिख रहा था। इतनी चढ़ाई चढ़ने के बाद मन ही सोंच रहा था कि इतनी चढ़ाई पर किला बनाने का अभिप्राय शायद यही होता होगा कि जल्दी तो किसी दुश्मन की हिम्मत ही नहीं होती होगी इतनी चढ़ाई पर चढ़ कर हमला करने की और अगर किया भी तो पहले ही उसकी सेना इतनी पस्त हो चुकी होती है कि जीत की बहुत कम ही गुंजाइश होती होगी। दो – तीन सौ गज या कुछ ज्यादा की चढ़ाई चढ़ने के बाद एक और गेट दिखाई पड़ता है। किले के दूसरे गेट से करीब 200 गज आगे आने पर चढ़ाई ख़त्म हो जाती है। यहाँ पर भी एक गार्ड रूम है। यहाँ पर एक प्राइवेट टैक्सी वाला बैठा था। किला और किले के अंदर उसके आस – पास की जगह घुमाने के लिए इसने 250 रूपये मांगे। इतनी चढ़ाई चढ़ने के बाद अब और आगे चलने की हिम्मत नहीं हो रही थी। मैंने कहा कि पीछे भी कुछ एक लोग आ रहे हैं उनसे पूछ लो अगर वह लोग चले चलेंगे तो हम लोग आपस में शेयर कर लेंगे । तभी वह विदेशी युवती भी आ गई।ड्राइवर ने उसके पास जाकर शेयर टैक्सी किराये पर लेने के लिए कहा पर वह उसकी बात ठीक से समझी नहीं तब मैंने उससे कहा कि अगर हम लोग यह टैक्सी शेयर कर ले तो सब जगह घूम लेंगे। यह टैक्सी वाला 250 रूपये मांग रहा है आधे – आधे हम लोग दे देंगे। वह युवती भी शायद थक गई थी , वह राजी हो गई।

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इन्दौर पहुंच गये हम!

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खाना खाने के बाद मैने तो लंबी तान ली और ये तीनों महिलाएं न जाने क्या – क्या गपशप करती रहीं। राजा की मंडी (आगरा) स्टेशन आया तो अपने घुमक्कड़ भाई रितेश गुप्ता की याद आई। उनसे सच्ची-मुच्ची वाली मुलाकात तो आज तक नहीं हो पाई पर फेसबुक पर गप-शप अक्सर ही होती रहती है। मैने उनको इस ट्रेन से जाने के बारे में सूचना नहीं दी हुई थी पर फिर भी न जाने किस आशा में, प्लेटफार्म पर उतरा, कुछ पल चहल-कदमी की और फिर वापिस ट्रेन में आ बैठा। बाहर अंधेरा होने लगा था और खिड़की से कुछ दिखाई नहीं दे रहा था, अतः सामने वालों पर ही ध्यान केन्द्रित किया। सोचा, बच्चों को कुछ ज्ञान की बातें बताई जायें। घुमक्कड़ का ज़िक्र शुरु कर दिया और बताया कि अगर उन्होंने वह वेबसाइट नहीं देखी तो समझो ज़िन्दगी में कुछ नहीं देखा। वहीं बैठे – बैठे रितेश, मनु, जाट देवता, डी.एल. अमितव, नन्दन, मुकेश-कविता भालसे, प्रवीण वाधवा आदि-आदि सब का परिचय दे डाला। रेलवे को भी कोसा कि लैपटॉप नहीं चल पा रहा है, वरना उनको घुमक्कड़ साइट भी दिखा डालता।

रात हुई, खाना खाया, कुछ देर किताब पढ़ी, फिर सामान को ठीक से लॉक करके और कैमरे वाले बैग को अपनी छाती से लगा कर सो गया। ग्वालियर में उतर कर अंधेरे में अपने मोबाइल से एक-दो फोटो खींचने का भी प्रयत्न किया पर कुछ बात कुछ बनी नहीं। सुबह पांच बजे आंख खुली और ट्रेन लगभग 7 बजे इन्दौर स्टेशन पर आ पहुंची।

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Gwalior- Weekend Gateway to “Hindustan Ka Dil”

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However, booked one Cab (Tata Indica) for a 7 hr journey, which would take me to the Gwalior Fort(Man Mandir Palace, Sas-Bahu Temple, Gujjari Mahal, Suraj Kind, Teli ka Mandir), Jai Vilas Palace (aka Jiwaji Rao Scindia Museum), Sun temple, Mohd. Ghauz Monument, Tansen Monument, Gwalior Zoo for 700 bucks. It was decided that the cab would be there by 9 am. I had another 1 hr. 30 mins in hand.

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