मांडू दर्शन भालसे परिवार के संग

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इस संस्कृत विश्वविद्यालय का नाम अशर्फी महल क्यों कर पड़ गया, इसके बारे में मैने दो कहानियां सुनी हैं – एक उस गाइड के मुंह से जो मुकेश भालसे ने मांडू दर्शन कराने के लिये तय किया था। उस गाइड के अनुसार, “मुगल बादशाह जहांगीर की बेगम बहुत ज्यादा प्रेगनेंट थी और अशर्फी महल की सीढ़ियां चढ़ने में आनाकानी कर रही थी । इसके लिये बादशाह ने प्रत्येक सीढ़ी पर चढ़ने के लिये बेगम पर अशर्फी लुटाने का वायदा किया। अशर्फी के लालच में बेगम अपनी प्रेगनेंसी को भुला कर सीढ़ियां चढ़ती चली गई।” दूसरी कहानी आर. बी. देशपांडे अपनी पुस्तक “Glimpses of Mandu: Past and Present” में उद्धृत करते हैं, जो वास्तव में बादशाह जहांगीर की मुंह जबानी है –

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Photography : Using Light to Your Advantage

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एक फोटोग्राफर का प्रकाश के जिन पहलुओं से जन्म – जन्म का रिश्ता होता है, वे हैं – प्रकाश का कोण (angle of light) की दिशा direction of light, प्रकाश की मात्रा (luminocity या brightness), तीव्रता (intensity), और कंट्रास्ट (contrast) ! सबसे पहले प्रकाश के कोण की बात करें तो हम कह सकते हैं कि हम सब प्रकाश को ऊपर से नीचे की ओर आते हुए देखने के अभ्यस्त हैं। सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक हमें सूर्य धरती के ऊपर से ही धरती पर प्रकाश बिखेरता हुआ नज़र आता है। हमारे काम आये या न आये, चन्द्रमा का प्रकाश भी ऊपर से नीचे की ओर आता प्रतीत होता है। हमारे ठीक सामने से प्रकाश आये ऐसा शायद वाहनों की हैड लाइट के मामले में ही देखने में आता है या फिर कैमरे में लगी हुई फ्लैशलाइट प्रकाश सामने से हमारे चेहरे पर फेंकती है। चूंकि हम जन्म से लेकर अपने अंतिम दिन तक ऊपर से नीचे की ओर आते हुए प्रकाश को ही देखा करते हैं अतः घरों में भी हम बल्ब और ट्यूब छत के आस – पास ही लगवाते हैं, न कि फर्श के आसपास। फोटोग्राफर भी अपने स्टूडियो में लाइटें मॉडल के सिर के लेवल से ऊपर ही फिट करते हैं, नीचे नहीं ! प्रकाश का स्रोत अगर धरती के आस पास हो तो कैसा लगेगा, यह देखना हो तो कुछ हॉरर फिल्में देख डालिये ! ठोडी, होंठ, नाक, आंख आदि की छाया जब नीचे के बजाय ऊपर की ओर बनेंगी तो अपनी अर्द्धांगिनी की शक्ल देख कर एक बारगी तो डर ही जायेंगे।

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आज की शाम – मुकेश भालसे के नाम !

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सुबह शंख ध्वनि, घंटे – घड़ियाल की मंगल ध्वनि से आंख खुली तो देखा कि 7 बज रहे हैं। कविता घर में बने हुए अपने मंदिर से बाहर आ चुकी थीं और बच्चों को हिला-हिला कर जगा रही थीं कि घूमने चलना है अतः अलस त्यागो और फटाफट तैयार हो जाओ ! बच्चे पहले तो उठने के मूड में नहीं थे क्योंकि रविवार का छुट्टी का दिन था पर जब ध्यान दिलाया गया कि पिकनिक पर जाना है तो फटाफट बिस्तर में से निकल आये। शिवम्‌ को यह भी लालच दिया गया कि नीचे चल कर कार की सफाई में भी उसकी सहायता ली जायेगी। लड़कों को पता नहीं क्यों ऐसे अजीबो-गरीब कामों में बहुत मज़ा आता है। मेरे बेटे भी जब छोटे थे तो खेल – खिलौनों के बजाय प्लास, पेचकस, संडासी जैसे सामान में अधिक रुचि लेते थे।

मुकेश ने गैराज़ में से अपनी शेवरले स्पार्क निकाली और फिर शिवम्‌ के साथ एक बाल्टी पानी, कुछ अखबार और डस्टर आदि लेकर नीचे पहुंचे। मैं भी अपना कैमरा उठाने लगा तो बोले, अभी इसका क्या काम ! जाने में तो अभी दो घंटे हैं। मैने कहा कि पिकनिक तो उसी समय से शुरु हो जाती है जब हम यह निश्चय कर लेते हैं कि पिकनिक पर जाना है। उसके बाद में की जाने वाली सभी तैयारियां भी पिकनिक का अभिन्न हिस्सा हैं। कार की धुलाई – पुछाई – सुखाई सब इस अविस्मरणीय पिकनिक का अविभाज्य भाग है। इसलिये इन सब की फोटो भी जरूरी है! सब कुछ पिकनिक की भावना से करो तो हर काम में मज़ा आने लगता है। आधा घंटे तक MP 11 CC 0470 कार की मस्का पालिश की गई। फिर ऊपर आकर नहाये – धोये ! कविता तब तक धांसू वाली स्टफ्ड पूरियां और सब्ज़ी बना चुकी थीं जिनका हमने जी भर के भोग लगाया। बच्चों ने कार में सारा सामान बूट में रखा। भोले बाबा को बारंबार प्रणाम करके हम सब फ्लैट से नीचे उतर आये और मुकेश ने कार की चाबी मेरे हाथों में सौंप दी।

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इन्दौर – पैदल स्थानीय भ्रमण!

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संभवतः तीसरी मंजिल पर जाकर एक ओर खेल कूद की दुकानें और दूसरी ओर खाने पीने के रेस्तरां दिखाई दिये। जेब में हाथ मार कर देखा तो पता चला कि मेरे सारे पैसे तो होटल में ही छूट गये हैं। अब दोबारा किसी भी हालत में होटल जाने और वापिस आने का मूड नहीं था। पैंट की, शर्ट की जेब बार – बार देखी पर एटीएम कार्ड के अतिरिक्त कुछ नहीं मिला। कैमरे के बैग की एक जेब में हाथ घुसाया तो मुड़ा तुड़ा सा १०० रुपये का एक नोट हाथ में आ गया। उस समय मुझे ये १०० रुपये इतने कीमती दिखाई दिये कि बस, क्या बताऊं ! छोले भटूरे का जुगाड़ तो हो ही सकता था। वही खा कर मॉल से बाहर निकल आया। सोचा इस बार सड़क के दूसरे वाले फुटपाथ से वापस होटल तक जाया जाये। सड़क का डिवाइडर पार कर उधर पहुंचा तो एक छोटा सा अष्टकोणीय (या शायद षट्‌कोणीय रहा होगा) भवन दिखाई दिया जिसकी छत पर एक स्तंभ भी था। सभी दीवारों पर जैन धर्म से संबंधित आकृतियां उकेरी गई थीं। यह जैनियों की किसी संस्था का कार्यालय था, जिसमें छोटे-छोटे दो कमरे बैंकों ने एटीएम के लिये किराये पर भी लिये हुए थे। एटीएम देख कर मेरी जान में जान आई और मैने तुरन्त कुछ पैसे निकाल लिये क्योंकि मेरी जेब में अब सिर्फ १० रुपये का ही एक नोट बाकी था।

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इन्दौर पहुंच गये हम!

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खाना खाने के बाद मैने तो लंबी तान ली और ये तीनों महिलाएं न जाने क्या – क्या गपशप करती रहीं। राजा की मंडी (आगरा) स्टेशन आया तो अपने घुमक्कड़ भाई रितेश गुप्ता की याद आई। उनसे सच्ची-मुच्ची वाली मुलाकात तो आज तक नहीं हो पाई पर फेसबुक पर गप-शप अक्सर ही होती रहती है। मैने उनको इस ट्रेन से जाने के बारे में सूचना नहीं दी हुई थी पर फिर भी न जाने किस आशा में, प्लेटफार्म पर उतरा, कुछ पल चहल-कदमी की और फिर वापिस ट्रेन में आ बैठा। बाहर अंधेरा होने लगा था और खिड़की से कुछ दिखाई नहीं दे रहा था, अतः सामने वालों पर ही ध्यान केन्द्रित किया। सोचा, बच्चों को कुछ ज्ञान की बातें बताई जायें। घुमक्कड़ का ज़िक्र शुरु कर दिया और बताया कि अगर उन्होंने वह वेबसाइट नहीं देखी तो समझो ज़िन्दगी में कुछ नहीं देखा। वहीं बैठे – बैठे रितेश, मनु, जाट देवता, डी.एल. अमितव, नन्दन, मुकेश-कविता भालसे, प्रवीण वाधवा आदि-आदि सब का परिचय दे डाला। रेलवे को भी कोसा कि लैपटॉप नहीं चल पा रहा है, वरना उनको घुमक्कड़ साइट भी दिखा डालता।

रात हुई, खाना खाया, कुछ देर किताब पढ़ी, फिर सामान को ठीक से लॉक करके और कैमरे वाले बैग को अपनी छाती से लगा कर सो गया। ग्वालियर में उतर कर अंधेरे में अपने मोबाइल से एक-दो फोटो खींचने का भी प्रयत्न किया पर कुछ बात कुछ बनी नहीं। सुबह पांच बजे आंख खुली और ट्रेन लगभग 7 बजे इन्दौर स्टेशन पर आ पहुंची।

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Photography – Lighting

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प्रकाश का सबसे सस्ता, सुन्दर और टिकाऊ स्रोत हमारे सूर्य देवता ही हैं। चंदा मामा जो खुद भी सूर्य देवता से उधार लिये हुए प्रकाश से काम चलाते हैं, फोटोग्राफर के लिये ज्यादा उपयोगी नहीं हैं क्योंकि वह भरोसेमंद इंसान नहीं हैं – कभी हैं, कभी गायब हो जाते हैं। जिस दिन होते हैं, उस दिन भी इतना प्रकाश हमें नहीं दे पाते कि ढंग की फोटो खींच सकें, अतः उनके भरोसे न रहना ही ठीक है। उनको धरती को प्रकाश देने से कहीं अधिक अपनी खुद की फोटो खिंचवाना, अपने बारे में कवितायें और गीत लिखवाना ज्यादा भाता है। हमने सुना तो यहां तक है कि चंदा मामा बहुत सारे लोगों के पागलपन का भी कारण बन जाते हैं अतः हम फोटोग्राफर लोग उनकी फोटो खींचते रहें तो ही ठीक है। आपको पता ही होगा कि Luna से Lunar और Lunatic शब्द बने हैं।

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Getting the most out of your camera

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इससे पहले कि मैं किस्सा-ए-फोटोग्राफी शुरु करूं, अगर अनुमति-ए-आपकी हो तो पहले एक किस्सा सुनाना चाहूंगा। सुना है कि एक छात्र फोटोग्राफी सीखने के लिये मुंबई के एक प्रख्यात फोटोग्राफर के पास पहुंचा। पांच दिन तक कैमरे के सभी अंग-प्रत्यंगों का परिचय देने के बाद, गुरु ने अपने शिष्य से कहा कि अपने कैमरे में एक फिल्म डालो और निकल पड़ो मुंबई की फोटोग्राफी के लिये ! जो कुछ भी अच्छा लगे, उसकी फोटो खींच लाओ ! रात को थका-हारा शिष्य वापिस आया! फिल्म धुलवाई गई और प्रिंट बनवा कर मेज पर फैला दिये गये। गुरुजी ने शिष्य से पूछा, “बताओ, किस स्थान की फोटो सबसे अच्छी लगीं?” शिष्य ने जवाब दिया, मुझे तो गेट वे ऑफ इंडिया की फोटो सबसे अच्छी लग रही है। गुरुजी ने अगले दिन उस शिष्य को सारी की सारी फोटो गेटवे ऑफ इंडिया की खींचने का आदेश दे दिया। शिष्य ने विभिन्न कोणों से सारे के सारे चित्र गेटवे ऑफ ईंडिया के ही खींच डाले। शाम को फिल्म धुली, प्रिंट बने और फिर गुरुजी ने पूछा, “कौन का फोटो सबसे अच्छा लगा?” तो शिष्य ने बता दिया । गुरुजी ने पुनः एक फिल्म लोड कराई और कहा कि कल जाकर गेटवे ऑफ इंडिया के सारे के सारे फोटो इसी एंगिल के खींच कर लाओ! बेचारा शिष्य पुनः गया और सुबह से शाम तक उसी एंगिल से भिन्न-भिन्न प्रकाश में फोटो खींचता रहा। शाम को पुनः प्रिंट फैलाये गये और गुरुजी ने जब शिष्य से पूछा, “कौन सा फोटो पसन्द आया है?” तो शिष्य ने बता दिया कि मुझे तो सूर्यास्त के समय का यह चित्र सबसे अधिक भा रहा है! गुरुजी ने उसे कहा, “जाओ, तुम्हारी शिक्षा पूर्ण हुई!” तुम्हें photographic subject, various angles और various types of lighting का ज्ञान हो गया है। फोटोग्राफी यहीं से शुरु होती है, अब जीवन भर फोटोग्राफी करते रहो और सीखते रहो!

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Shimla – Kufri – Jakhu Temple and Back Journey

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Early morning at around 6 o’ clock, when rest of the family members were still asleep, I attended to daily routine and then decided (as usual) to wander and acquint myself a bit with the geography of Shimla. The first important thing I discovered was the fact that you didn’t need to go through the Victory tunnel to reach other side of the town. The tunnel is for automobiles only (but you won’t get fined if you do venture into it). Even if you walk towards the Bus Stand, you would find lanes at your left side with very stiff heights to scale, which promise to leave you at other side of the hill i.e. Mall Road side. However, without going to the Mall Road side, I walked roughly 1 km. in the opposite direction of the railway station and discovered that I had reached Bus Stand. Well, I was as happy at my discovery as Vasco-de-gama must have been after discovering Bharat Varsh aka India! Regarding it enough achievement for the time being, I made a U-turn and arrived at the hotel. Since I didn’t find any group of pahadi girls singing as I often see in Hindi movies, I had to hum a song myself and that too without any tabla or dholak (no it was not Abida Parveen this time but someone else which I don’t remember! ) First rays of the Sun peeped into the room and blessed us with very exhilerating and invigorating feeling. Technically, these were not first rays of the Sun because when the Sun ascended high enough in the sky to defeat the hills and throw its rays directly into our room, our watch was already showing 8 a.m.

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Shimla by Toy Train

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While clicking through the window of my compartment, I couldn’t help admiring the beautiful curves. (Again, don’t get me wrong please! I am talking of the curves our train was taking ! ) The sharpest curve our train took was of 48.12 meter radius. As regards fastest speed of the train, please don’t ever think that it can compete with Chinese Bullet Train. It can run at the maximum speed of 25 km. per hour. In case you are not happy with this speed, try the Rail Car which has an admirable speed of 30 km. / hour! From Kalka to Shimla, in all there are 20 railway stations. Although our train was labelled as Express train, it stopped at most of the stations especially in later half of the journey. It was as if it was a private bus wherein the cleaner had the moral obligation to halt the vehicle to enable an old lady to disembark. I think the guard of our train was going an extra mile by accompanying her up to the road and seeing her off before flagging the train to move on.

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Nathdwara-Bagaur Haveli-Return from Udaipur

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उदयपुर अपनी जिन झीलों के कारण विश्व प्रसिद्ध है उनमें फतेह सागर झील भी एक है। अगर आप सोच रहे होंगे कि फतेह सागर झील का निर्माण महाराणा फतेह सिंह ने किया होगा तो आप सरासर गलत हैं। इस कृत्रिम झील का निर्माण 1678 में महाराणा जय सिंह ने किया था। पर बाद में महाराणा फतेह सिंह ने इसका विस्तार किया और यह झील उनके नाम को समर्पित हो गई। उदयपुर के उत्तर-पश्चिम में और पिछोला झील के उत्तर में स्थित यह झील जयसमंद झील के बाद दूसरी कृत्रिम झील है जिसका निर्माण निश्चय ही उदयपुर को रेगिस्तानों के लिये प्रसिद्ध राजस्थान को सूखे से बचाने के लिये किया गया होगा। ढाई किमी लंबी, डेढ़ किमी चौड़ी और साढ़े ग्यारह मीटर तक गहराई वाली इस झील के मध्य में स्थित तीन टापुओं में से सबसे बड़े टापू पर नेहरू पार्क है। इस पार्क में जाने के लिये नाव का सहारा लिया जाता है। इन झील को पानी तीन मार्गों से मिलता है और एक मार्ग का उपयोग मानसून के दिनों में पानी की अधिकता से निपटने के लिये किया जाता है ताकि झील में से फालतू पानी को निकाला जा सके।

दूसरे वाले टापू पर सुन्दर सुन्दर से पानी के फव्वारे लगाये गये हैं और तीसरे टापू पर नक्षत्रशाला (solar observatory) है। हम लोग सिर्फ नेहरू पार्क तक ही सीमित रहे जिसमें नाव की आकार का एक रेस्टोरेंट भी बनाया गया है। लोग बताते हैं कि वहां पर एक चिड़ियाघर भी है, जिसकी अब मुझे याद नहीं है। हो सकता है उस समय वह न रहा हो या उसमें जानवर न होकर सिर्फ चिड़िया ही हों !

नेहरू पार्क से आप चाहें तो बोटिंग के मजे ले सकते हैं। वहां पर बहुत तेज़ भागने वाले हॉण्डा वाटर स्कूटर भी थे जिस पर जाट देवता जैसे पराक्रमी घुमक्कड़ झील की परिक्रमा कर रहे थे। वैसे यदि आप उस स्कूटर की सवारी करना नहीं जानते तो भी कोई दिक्कत नहीं है। उनका आपरेटर आपको ड्राइविंग सीट पर बैठा कर खुद सारे कंट्रोल अपने हाथ में ले लेता है। आप यदि स्टीयरिंग भी ठीक से नहीं पकड़ सकते तो मेरी तरह से आप भी इन सब झंझटों से दूर ही रहें।

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Udaipur Vintage Cars

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इस गाड़ी का तकनीकी नाम है GLK21 ! वाह, बड़ाई सोणा नाम है! सन्‌ 1924 के दिनों के तो इंसान भी आज कल मुश्किल से ही मिलते हैं, ये बेचारी तो कार है। वर्ष 2000 के आस-पास मेवाड़ घराने के मन में ये खयाल आया कि हम अपनी कारों की एक प्रदर्शनी क्यूं ना लगा दें। कम से कम प्रवेश टिकट के पैसों से ड्राइवर की तनखाह तो निकलेगी! तो फिर यह खयाल भी हाथ के हाथ आया कि कार देखने के लिये लोग तो तब आयेंगे जब कार बढ़िया हालत में हों । ऐसे में अपने जीवन के फाइनल बसंत देख रही इस कार को पुनः युवा बनाने का अभियान शुरु हुआ। Hofmanns of Henley, UK की राय ली गई और उनके तकनीकी निर्देशन में गाड़ी के एक-एक अंग का प्रत्यारोपण शुरु हुआ। गाड़ी के पहिये न्यू ज़ीलेंड से मंगाये गये। गीयर बक्से की मरम्मत के लिये इंग्लैंड की उसी कंपनी के इंजीनियर आये जिन्होंने इसे बनाने की ज़ुर्रत की थी। यह कुछ ऐसा ही था कि शादी के स्वर्णजयंती वर्ष में कोई व्यक्ति अपने श्वसुर को पत्र लिख कर कहे कि आपकी सत्तर साल की बिटिया का ब्लड transfusion होना है, जरा आकर सहायता करें। जैसे श्वसुर अपने दामाद को “ना” नहीं कर पाते ऐसे ही Hofmanns of Henley कंपनी के श्रीयुत्‌ ग्राहम ने भी मना नहीं किया और गाड़ी के रेडियेटर और गीयर बाक्स को बिल्कुल नये जैसा बना कर दे दिया। धन्य हैं मेवाड़ के महाराणा और धन्य हैं इंग्लैंड के इंजीनियर ! आज ये गाड़ी उदयपुर की सड़कों पर पूरी शान से दौड़ती है। आपको शायद मालूम हो कि रॉल्स-रॉयस कार की सबसे बड़ी पहचान उसका रेडियेटर ही होती है जिसका डिज़ाइन आज तक भी नहीं बदला। O & M विज्ञापन एजेंसी के मालिक ने एक बार लिखा था कि इस गाड़ी को जब बनाया जाता है तो इसकी बॉडी पर stethescope लगा-लगा कर देखा जाता है कि इसमें कहीं कोई आवाज़ तो नहीं आ रही है! पांच बार प्राइमर और नौ बार पेंट का कोट चढ़ाया जाता है, अन्दर कहां, क्या, कैसे चाहिये – यह सब आपकी फर्माइश के हिसाब से बनाया जाता है। ऐसा नहीं कि जो कंपनी वालों को पसन्द आया, लगा दिया। इतना ही नहीं, गाड़ी की हैड लाइट के एंगिल, direction, focus वगैरा सारे समायोजन ड्राइवर अपने आस-पास लगाये गये लीवर से ही कर सकता था। जे हुई ना कुछ बात !

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Exploring Udaipur City Palace

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आगे बढ़े तो छत से झांकने पर एक और प्रांगण दिखाई दिया। बताया गया कि यहां रवीना टंडन की शादी हुई थी। जरूर हुई होगी, हमें तो निमंत्रण मिला नहीं था शादी का, हमारी बला से! सच पूछो तो रवीना शादीशुदा है या कुंवारी है – हमें इसमें भी कोई रुचि नहीं है। हमारे लिये तो हमारी अपनी श्रीमती जी ही रवीना, ऐश्वर्या, माधुरी, सीता, सावित्री, गार्गी, विद्योत्तमा, तिलोत्तमा सब कुछ हैं। (यह लाइन मैने उनको पढ़वाने के लिये ही लिखी है!)

सिटी पैलेस को समझना हो तो आप कुछ कुछ यूं समझें कि ये एक लंबाई में बनाया हुआ महल-कम-दुर्ग-कम-होटल-कम-संग्रहालय है। अगर आप 49,999 रुपये तथा उस पर विलासिता कर यानि luxury tax और VAT दे सकते हैं तो आप फतेह प्रकाश पैलेस या शिव सागर पैलेस होटल में से किसी एक होटल में एक रात रुक भी सकते हैं। अगर आप सोनिया गांधी के दामाद हैं और रातोंरात अरबपति बन चुके हैं तो आप अपने बच्चों का विवाह भी इन HRH Heritage hotels में से किसी एक में आयोजित कर सकते हैं। पर अगर आप 30 रुपये में सिटी पैलेस म्यूज़ियम देखने आये हैं तो आप शानदार हवेलियां देखिये, कमरों में सजाये हुए पंखे, बिस्तरे, मूढ़े आदि देखिये, अद्‍भुत वास्तुकला देखिये, अंग्रेज़ पर्यटकों को निहारिये, 200 रुपये कैमरे के लिये देकर फोटो वगैरा खींचिये और संकरी गली से बाहर निकल लीजिये।

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