Udaipur Vintage Cars

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इस गाड़ी का तकनीकी नाम है GLK21 ! वाह, बड़ाई सोणा नाम है! सन्‌ 1924 के दिनों के तो इंसान भी आज कल मुश्किल से ही मिलते हैं, ये बेचारी तो कार है। वर्ष 2000 के आस-पास मेवाड़ घराने के मन में ये खयाल आया कि हम अपनी कारों की एक प्रदर्शनी क्यूं ना लगा दें। कम से कम प्रवेश टिकट के पैसों से ड्राइवर की तनखाह तो निकलेगी! तो फिर यह खयाल भी हाथ के हाथ आया कि कार देखने के लिये लोग तो तब आयेंगे जब कार बढ़िया हालत में हों । ऐसे में अपने जीवन के फाइनल बसंत देख रही इस कार को पुनः युवा बनाने का अभियान शुरु हुआ। Hofmanns of Henley, UK की राय ली गई और उनके तकनीकी निर्देशन में गाड़ी के एक-एक अंग का प्रत्यारोपण शुरु हुआ। गाड़ी के पहिये न्यू ज़ीलेंड से मंगाये गये। गीयर बक्से की मरम्मत के लिये इंग्लैंड की उसी कंपनी के इंजीनियर आये जिन्होंने इसे बनाने की ज़ुर्रत की थी। यह कुछ ऐसा ही था कि शादी के स्वर्णजयंती वर्ष में कोई व्यक्ति अपने श्वसुर को पत्र लिख कर कहे कि आपकी सत्तर साल की बिटिया का ब्लड transfusion होना है, जरा आकर सहायता करें। जैसे श्वसुर अपने दामाद को “ना” नहीं कर पाते ऐसे ही Hofmanns of Henley कंपनी के श्रीयुत्‌ ग्राहम ने भी मना नहीं किया और गाड़ी के रेडियेटर और गीयर बाक्स को बिल्कुल नये जैसा बना कर दे दिया। धन्य हैं मेवाड़ के महाराणा और धन्य हैं इंग्लैंड के इंजीनियर ! आज ये गाड़ी उदयपुर की सड़कों पर पूरी शान से दौड़ती है। आपको शायद मालूम हो कि रॉल्स-रॉयस कार की सबसे बड़ी पहचान उसका रेडियेटर ही होती है जिसका डिज़ाइन आज तक भी नहीं बदला। O & M विज्ञापन एजेंसी के मालिक ने एक बार लिखा था कि इस गाड़ी को जब बनाया जाता है तो इसकी बॉडी पर stethescope लगा-लगा कर देखा जाता है कि इसमें कहीं कोई आवाज़ तो नहीं आ रही है! पांच बार प्राइमर और नौ बार पेंट का कोट चढ़ाया जाता है, अन्दर कहां, क्या, कैसे चाहिये – यह सब आपकी फर्माइश के हिसाब से बनाया जाता है। ऐसा नहीं कि जो कंपनी वालों को पसन्द आया, लगा दिया। इतना ही नहीं, गाड़ी की हैड लाइट के एंगिल, direction, focus वगैरा सारे समायोजन ड्राइवर अपने आस-पास लगाये गये लीवर से ही कर सकता था। जे हुई ना कुछ बात !

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Exploring Udaipur City Palace

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आगे बढ़े तो छत से झांकने पर एक और प्रांगण दिखाई दिया। बताया गया कि यहां रवीना टंडन की शादी हुई थी। जरूर हुई होगी, हमें तो निमंत्रण मिला नहीं था शादी का, हमारी बला से! सच पूछो तो रवीना शादीशुदा है या कुंवारी है – हमें इसमें भी कोई रुचि नहीं है। हमारे लिये तो हमारी अपनी श्रीमती जी ही रवीना, ऐश्वर्या, माधुरी, सीता, सावित्री, गार्गी, विद्योत्तमा, तिलोत्तमा सब कुछ हैं। (यह लाइन मैने उनको पढ़वाने के लिये ही लिखी है!)

सिटी पैलेस को समझना हो तो आप कुछ कुछ यूं समझें कि ये एक लंबाई में बनाया हुआ महल-कम-दुर्ग-कम-होटल-कम-संग्रहालय है। अगर आप 49,999 रुपये तथा उस पर विलासिता कर यानि luxury tax और VAT दे सकते हैं तो आप फतेह प्रकाश पैलेस या शिव सागर पैलेस होटल में से किसी एक होटल में एक रात रुक भी सकते हैं। अगर आप सोनिया गांधी के दामाद हैं और रातोंरात अरबपति बन चुके हैं तो आप अपने बच्चों का विवाह भी इन HRH Heritage hotels में से किसी एक में आयोजित कर सकते हैं। पर अगर आप 30 रुपये में सिटी पैलेस म्यूज़ियम देखने आये हैं तो आप शानदार हवेलियां देखिये, कमरों में सजाये हुए पंखे, बिस्तरे, मूढ़े आदि देखिये, अद्‍भुत वास्तुकला देखिये, अंग्रेज़ पर्यटकों को निहारिये, 200 रुपये कैमरे के लिये देकर फोटो वगैरा खींचिये और संकरी गली से बाहर निकल लीजिये।

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Back to Udaipur-LokKala Mandal and Shilpgram

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शिल्पग्राम से हम बाहर निकले तो बाबू ने पास में ही, न जाने किस पार्क में गाड़ी ले जाकर खड़ी कर दी। बीच में एक फव्वारा, अच्छा हरा – भरा लॉन, अच्छे – अच्छे चेहरे थकान मिटाने के लिये काफी उपयुक्त सिद्ध हुए। घास पर लेटे रहे, कोल्ड-ड्रिंक पीते हुए चिप्स खाते खाते घंटा भर वहीं बिताया। जब सूर्यास्त हो गया तो महिलाओं को फिर हुड़क उठी कि बाज़ार चलते हैं। बाबू कुछ एंपोरियम में ले कर गया पर हम हर जगह यही शक करते रहे कि पता नहीं, कैसा सामान होगा, पता नहीं कितना महंगा बता रहे होंगे। मैने एक बार भी श्रीमती जी को जिद नहीं की कि ये सामान अच्छा है, खरीद लो! हम लोगों ने पहले ही तय कर रखा था कि यदि हम में से कोई कुछ खरीदना चाहेगा और दूसरा मना कर देगा तो वह चीज़ नहीं खरीदी जायेगी। इसके बाद पुनः हाथी पोल आये और श्रीमती जी ने दो जयपुरी रजाइयां खरीद ही डालीं जो वज़न में बहुत हल्की थीं और पैक होने के बाद उनका आकार भी बहुत कम रह गया था !

खाना पुनः बावर्ची में ही खा कर हम वापिस होटल वंडरव्यू पैलेस में पहुंच गये जहां हमारे नाम के दोनों कमरे बुक थे। अगला दिन हमने तय कर रखा था – सिटी पैलेस, बागौर की हवेली, नेहरू पार्क, और नाथद्वारा मंदिर देखने के लिये।

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Mount Abu Sight Seeing

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माउंट आबू भ्रमण के दौरान बहुत सारा समय हमने पीस पार्क में भी बिताया था। वहां घुसते ही सबसे पहले हमें ब्रह्माकुमारी वालों ने एक वीडियो दिखाया जिसका सार ये था कि ज़िन्दगी मिलेगी दोबारा – दोबारा अगर तुम नहीं करोगे अज्ञान से किनारा ! अज्ञान का अर्थ है – खुद को और इस शरीर को एकाकार समझ लेना। इस वीडियो के अनुसार हम आत्मा हैं जो इस शरीर के अन्दर, दोनों नेत्रों के मध्य भाग में, यानि भृकुटि में रहते हैं। हम यानि आत्मा, इस शरीर रूपी गाड़ी के ड्राइवर हैं। हम सब आत्मायें परमपिता परमात्मा के प्यारे बच्चे हैं, उनके अंश हैं। हम निरंतर यह स्मृति बनाये रखें कि हमारा और हमारे परमपिता परमात्मा का बाप-बेटे का नाता है तो हमें उनसे ऐसे ही स्नेह भाव उपजेगा जैसे किसी युवक को किसी अनजानी युवती से सगाई हो जाने के बाद उससे स्नेह उपजने लगता है। उसे कहना नहीं पड़ता कि भाई, कभी टाइम निकाल कर अपनी मंगेतर को भी याद कर लिया कर! वह खाते-पीते, सोते-जागते, उठते-बैठते हर समय अपनी मंगेतर को ही याद करता रहता है, उससे मिलने के ख्वाब देखा करता है। आजकल के लड़के तो मोबाइल में couple plan ले लेते हैं ताकि चौबीसों घंटे हॉटलाइन से जुड़े रहें। ठीक वैसे ही हमें यदि परमपिता परमात्मा से अपने संबंध का ज्ञान हो जाये तो हम हर समय उनकी स्मृति में ही रहेंगे। यह तब होगा जब हम सदैव यह याद करेंगे कि हम यह शरीर नहीं हैं बल्कि इस शरीर को संचालित करने वाली आत्मा हैं। हम सब विस्मृति की शिकार आत्मायें हैं जो यहां – वहां सुख की लालसा में भटकती रहती हैं जबकि वास्तविक सुख परमपिता परमात्मा से मिलन में है जो हम योग लगा कर किसी भी समय अनुभव कर सकते हैं । उसके लिये मरना कतई जरूरी नहीं है।

गुरु शिखर और अचलगढ़ नाम की दो पर्वत चोटियों के मध्य स्थित विशाल परिसर में विकसित इस पीस पार्क में न केवल अत्यन्त सुन्दर उद्यान हैं, रोज़ गार्डन हैं, झूले हैं, रॉक गार्डन है, पिकनिक के लिये और खेल कूद के लिये मैदान हैं बल्कि सबसे आनन्द दायक बात ये है कि इस पीस पार्क का प्रबंध अत्यन्त कुशल और सेवाभावी व्यक्तियों के हाथों में है। ब्रह्माकुमारी केन्द्र यानि मधुबन, ज्ञान सरोवर और शान्तिवन में तीन या अधिक दिनों के लिये नियमित रूप से शिविर लगते रहते हैं और एक दिन प्रशिक्षुओं को घुमाने के लिये भी नियत रहता है। पीस पार्क में भी वे कुछ घंटे बिताते हैं, यहां उनके लिये खेल-कूद व खाने-पीने की भी व्यवस्था की जाती है। ऐसे ही एक अवसर के चित्र यहां लगा रहा हूं।

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Mt. Abu – Sunset Point – Nakki Lake

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सूर्यास्त होगया तो मैने कहा कि चलो, खेल खतम, पैसा हज़म ! अब यहां से पैदल ही नीचे चलेंगे। लुढ़कते – लुढ़कते हम नीचे पहुंचे और टैक्सी में बैठ कर नक्की लेक की ओर चल दिये। इससे पहले मैं 2003 और 2005 में भी माउंट आबू गया था। वर्ष जून 2003 में तो नक्की लेक सूखी हुई मिली थी और उसमें हज़ारों मज़दूर पुरुष और महिलाएं तसले सिर पर लिये हुए घूम रहे थे। (उस समय की खींची हुई एक फोटो भी सौभाग्य से मिल गयी है जो अपने पाठकों के सौभाग्य के लिये संलग्न किये दे रहा हूं ।) परन्तु सौभाग्य से इस बार नक्की में भरपूर पानी था और नावों में लोग सवारी कर रहे थे। हमने भी एक नाव ले ली जिसे पैडल बोट कहते हैं । बेचारे दो पुरुष पैडल मारते हुए नाव को आगे बढ़ाते हैं और पीछे दो बीवियां आराम से झील का नज़ारा देखती हुई चलती हैं। संभवतः एक घंटे तक हम नक्की में यूं ही पैडल मारते घूमते रहे। इस नक्की लेक के बारे में बहुत प्रचलित किंवदंती, जो अक्सर पढ़ने को मिलती है वह ये है कि देवताओं ने एक खूंखार राक्षस से बचने के लिये नख से धरती में झील बना डाली थी । यही नहीं, नक्की झील को लेकर एक और रोमांटिक कहानी रसिया बालम की भी चली आ रही है जिसने एक राजकुमारी से विवाह की लालसा में एक रात में ही आधा किलोमीटर लंबी और चौथाई किमी चौड़ी और २०-३० फीट गहरी झील खोद डाली थी। हे भगवान, कैसे – कैसे राजा होते थे उस जमाने में! मुनादी करा दी कि जो कोई एक रात में नक्की झील खोद देगा, उससे अपनी बिटिया का ब्याह रचा दूंगा ! सौभाग्य से इस झील को खोदने के बाद भी रसिया बालम फिर भी कुंवारा ही रहा क्योंकि राजा की घोषणा को रानी ने वीटो कर दिया। राजा को रानी से डांट पड़ी सो अलग!

नक्की झील माउंट आबू के हृदय स्थल में स्थित है और यहां का प्रमुखतम आकर्षण है। माउंट आबू के बाज़ार मुख्यतः नक्की झील के आस-पास ही केन्द्रित हैं। बात सही भी है, जब सारे टूरिस्ट नक्की पर ही आने हैं तो दुकान कहीं और खोलने का क्या लाभ? एक और बड़ी विशेष जानकारी जो विकीपीडिया से प्राप्त हुई है, वह ये कि 12 फरवरी 1948 को यहां पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की अस्थियां विसर्जित की गई थीं और गांधी घाट का निर्माण किया गया था। पर मुझे याद नहीं पड़ता कि हमने नक्की झील पर कहीं गांधी घाट के दर्शन किये हों! सॉरी बापू ! अगली बार जायेंगे तो ऐसी गलती पुनः नहीं होगी! नक्की झील के आस-पास के एक रेस्टोरेंट में भोजन लेकर (कहां, ये याद नहीं ! भोजन कैसा था, ये तो कतई याद नहीं)। हम लोग वापिस ज्ञान सरोवर में आ पहुंचे और अपने – अपने कमरों में नींद के आगोश में समा गये। (किसी इंसान के आगोश में समाने की तो वहां अनुमति भी नहीं थी !)

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उदयपुर – जगदीश मंदिर – माउंट आबू हेतु प्रयाण

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वहां से निकल कर अगला पड़ाव था – जगदीश मंदिर ! मैं चूंकि एक घंटा पहले यहां तक आ चुका था अतः मुझे बड़ा अच्छा सा लग रहा था कि अब मैं अपने परिवार के लिये गाइड का रोल निर्वहन कर सकता हूं। परन्तु पहली बार तो मैं मंदिर की सीढ़ियों के नीचे से ही वापिस चला गया था। ऊपर मेरे लिये क्या – क्या आकर्षण मौजूद हैं, इसका मुझे आभास भी नहीं था। मंदिर की सीढ़ियों के नीचे दो फूल वालियां अपने टोकरे में फूल – मालायें लिये बैठी थीं । माला खरीद कर हम सीढ़ियों पर बढ़ चले। भाईसाहब का कई वर्ष पूर्व एक्सीडेंट हुआ था, तब से उनको सीढ़ियां चढ़ने में असुविधा होती है। वह बोले कि मैं टैक्सी में ही बैठता हूं, तुम लोग दर्शन करके आओ। मैने कहा कि टैक्सी में बैठे रहने की कोई जरूरत नहीं। मुझे एक दूसरा रास्ता मालूम है मैं आपको वहां से मंदिर में ले चलूंगा। उसमें दो-तीन सीढ़ियां ही आयेंगी। वह आश्चर्यचकित हो गये कि मुझे इस मंदिर के रास्तों के बारे में इतनी गहन जानकारी कैसे है। वास्तव में, जब मैं पैदल घूम रहा था तो एक बहुत ढलावदार रास्ते से होकर मैं मंदिर के प्रवेश द्वार तक आया था। उस ढलावदार रास्ते पर भी जगदीश मंदिर के लिये छोटा सा प्रवेश द्वार दिखाई दिया था। भाईसाहब इतनी सारी सीढ़ियां नहीं चढ़ सकते थे क्योंकि उनका घुटना पूरा नहीं मुड़ पाता परन्तु ढलावदार रास्ते पर चलने में कोई दिक्कत नहीं थी। मेरी जिस ’आवारागर्दी’ को लेकर सुबह ये तीनों लोग खफा नज़र आ रहे थे, अब तीनों ही बहुत खुश थे। आखिर इसी ’आवारागर्दी’ (जिसे मैं घुमक्कड़ी कहना ज्यादा पसन्द करता हूं) की वज़ह से भाईसाहब को मंदिर के दर्शन जो हो गये थे।

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उदयपुर में पहला दिन और यादगार डिनर

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शाम के छः बज रहे थे और हमारा महिलावर्ग ’सोलह सिंगार’ करके उदयपुर भ्रमण के लिये पूरी तरह तैयार था। रिसेप्शन से इंटरकॉम पर संदेश आया कि ड्राइवर महोदय आ गये हैं और हम नीचे आ जायें। हम सब अपनी इंडिका टैक्सी में लद कर घूमने चल पड़े! टैक्सी से स्थानीय भ्रमण में मुझे एक दिक्कत अनुभव होती है और वह ये कि हम जिस शहर में घूम रहे होते हैं, उसके भूगोल से काफी कुछ अपरिचित ही रह जाते हैं। किसी शहर को ठीक से समझना हो तो स्टीयरिंग आपके हाथ में होना चाहिये तब आपको किसी स्थान का भूगोल समझ में आता है। अगर कहीं से मोटरसाइकिल या स्कूटर किराये पर मिल सके तो घूमने का सबसे बढ़िया और मजेदार तरीका वही है। परन्तु हमने तो पांच दिनों के लिये टैक्सी कर ली थी और मेरी पत्नी सहित सभी सहयात्रियों की प्राथमिकता सुविधापूर्ण यात्रा थी जिसमें कार के शीशे बन्द करके वातानुकूलित हवा खाना सबसे महत्वपूर्ण था। ऐसे में मैने तो हल ये निकाला था कि जहां भी मौका लगे, अकेले ही पैदल घूमने निकल पड़ो! घरवाले अगर होटल में आराम फरमाना चाहते हैं तो उनको होटल में ही रहने दो, अकेले ही घूमो मगर घूमो अवश्य । अस्तु!

पता नहीं, किधर – किधर को घुमाते फिराते हुए, और उदयपुर की शान में कसीदे पढ़ते हुए हमारे टैक्सी चालक हसीन महोदय ने जब टैक्सी रोकी तो पता चला कि हम सहेलियों की बाड़ी पर आ पहुंचे हैं। हसीन ने अपने यात्रियों के लिये गाइड के रूप में सेवायें प्रदान करना अपना पावन कर्तव्य मान लिया था अतः सहेलियों की बाड़ी के बारे में हमें बताया कि ये फतेह सागर लेक के किनारे पर स्थित एक आमोद गृह है जहां महारानी अपनी 48 सखियों के साथ जल विहार और किल्लोल किया करती थीं । आज कल जैसे पति लोग अपनी पत्नी को एक मीडिया फोन लाकर दे दिया करते हैं ताकि वह वीडियो गेम खेलती रहे और पति भी सुकून और शांति भरे कुछ पल घर में गुज़ार सके, कुछ-कुछ ऐसे ही 18 वीं शताब्दी में उदयपुर के महाराणा संग्राम सिंह ने अपने घर को संग्राम से बचाने के लिये अपनी महारानी और उनके साथ दहेज में आई हुई 48 युवा परिचारिकाओं के मनोरंजन के लिये सहेलियों की बाड़ी बनवा कर दे दी थी। यह एक विशाल बाग है जिसमें खूबसूरत फव्वारे लगे हुए हैं । फतेह सागर लेक इसकी जलापूर्ति करती है। हम जब यहां पर पहुंचे तो सूर्यास्त हो चुका था। बाग में कृत्रिम प्रकाश में हमें सहेलियों की बाड़ी का बहुत विस्तार से अध्ययन करने का मौका तो नहीं मिला पर कुछ बड़े खूबसूरत से फव्वारे वहां चल रहे थे जिनके बारे में विश्वस्त सूत्रों से यानि विकीपीडिया से ज्ञात हुआ है कि ये फव्वारे rain dance का आभास देने के लिये बाद में महाराणा भोपाल सिंह ने इंग्लैंड से मंगवाये और यहां पर लगवाये थे।

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Hotel Wonder View Udaipur

उदयपुर और माउंट आबू घूमने चलें?

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अंततः वह क्षण भी आया जब उस प्रतीक्षालय की दीवारों पर लगे हुए इलेक्ट्रॉनिक डिस्प्ले बोर्ड पर हमारी फ्लाइट का ज़िक्र आया और सभी यात्रियों को बस में बैठने हेतु उद्‌घोषणा की गई। पत्नी ने कहा कि बस की क्या जरूरत है, पैदल ही चलते हैं तो उसके जीजाजी ने कहा कि चिंता ना करै ! टिकट नहीं लगता। मैं एयरपोर्ट की बस में बैठते ही कैमरा लेकर ठीक ऐसे ही एलर्ट हो गया जैसे बॉर्डर पर हमारे वीर जवान सन्नद्ध रहते हैं। दो – तीन मिनट की उस यात्रा में वायुयान तक पहुंचने तक भी बीस-तीस फोटो खींच डालीं!

जब अपने वायुयान के आगे पहुंचे तो बड़ी निराशा हुई! बहुत छोटा सा (सिर्फ 38 सीटर) जहाज था वह भी सफेद पुता हुआ। मुझे लगा कि मैं छः फुटा जवान इसमें कैसे खड़ा हो पाउंगा ! सिर झुका कर बैठना पड़ेगा! एयर डैक्कन एयरलाइंस के इस विमान में, जिसका दिल्ली से उदयपुर तक का हमने सिर्फ 1201 रुपये किराया अदा किया था, हम अन्दर प्रविष्ट हुए तो ऐसा नहीं लगा कि सिर झुका कर चलना पड़ रहा है। सिर्फ बाहर से ही ऐसा लग रहा था कि जहाज में घुस नहीं पाउंगा। खैर अन्दर पहुंच कर अपनी सीटें संभाल लीं। मुझे खिड़की वाली सीट चाहिये थी सो किसी ने कोई आपत्ति दर्ज़ नहीं की। अन्दर सब कुछ साफ-सुथरा था। एयरहोस्टेस भी ठीक-ठाक थी। यात्रा के दौरान सुरक्षा इंतज़ामों का परिचय देने की औपचारिकता का उसने एक मिनट से भी कम समय में निर्वहन कर दिया। सच तो यह है कि कोई भी एयरलाइंस, यात्रा के शुभारंभ के समय दुर्घटना, एमरजेंसी, अग्नि शमन जैसे विषय पर बात करके यात्रियों को आतंकित नहीं करना चाहती हैं पर चूंकि emergency procedures के बारे में यात्रियों को बताना कानूनन जरूरी है, अतः इसे मात्र एक औपचारिकता के रूप में फटाफट निबटा दिया जाता है। यात्रियों को समझ कुछ भी नहीं आता कि किस बटन को दबाने से ऑक्सीज़न मास्क रिलीज़ होगा और उसे कैसे अपने नाक पर फिट करना है। एमरजेंसी लैंडिंग की स्थिति में क्या-क्या करना है और कैसे – कैसे करना है। अगर कभी दुर्घटना की स्थिति बनती है तो यात्रियों में हाहाकार मच जाता है, वह निस्सहाय, निरुपाय रहते हैं, कुछ समझ नहीं पाते कि क्या करें और क्या न करें! मेरे विचार से इसका कोई न कोई मध्यमार्ग निकाला जाना चाहिये। अस्तु !

कुछ ही क्षणों में हमारे पायलट महोदय ने प्रवेश किया और बिना हमारा अभिनन्दन किये ही कॉकपिट में चले गये। उनके पीछे – पीछे एयरहोस्टेस भी चली गई पर जल्दी ही वापस आ गई और हमें अपनी अपनी बैल्ट कसने के निर्देश दिये। मैने अपनी पैंट की बैल्ट और कस ली तो श्रीमती जी ने कहा कि सीट की बैल्ट कसो, पैंट की नहीं ! अपनी ही नहीं, मेरी सीट की भी। मैने एयरहोस्टेस को इशारा किया और कहा कि मेरी सीट की बैल्ट कस दे। (सिर्फ 1201 रुपये दिये हैं तो उससे क्या? आखिर हैं तो हम वायुयान के यात्री ही ! एयरहोस्टेस पर इतना अधिकार तो बनता ही है!) अब मुझे भी समझ आ गया था कि सीट बैल्ट कैसे कसी जायेगी अतः पत्नी की सीट की भी बैल्ट मैने कस दी। मुझे खिड़की में से अपने जहाज की पंखड़िया घूमती हुई दिखाई दीं, द्वार पहले ही बन्द किये जा चुके थे। एयर स्ट्रिप पर निगाह पड़ी तो पुराना चुटकुला याद आया। “जीतो ने संता से अपनी पहली हवाई यात्रा के दौरान खिड़की से बाहर झांकते हुए कहा कि बंता ठीक कहता था कि हवाई जहाज की खिड़की से झांक कर देखो तो जमीन पर चलते हुए लोग बिल्कुल चींटियों जैसे लगते हैं! संता ने जीतो को झिड़का, “अरी बुद्धू ! ये चींटियां ही हैं, अभी जहाज उड़ा ही कहां है!” चलो खैर !

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हरिद्वार और देहरादून का तूफानी दौरा – २

हरिद्वार और देहरादून का तूफानी दौरा – २

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मेरा विचार था कि बुद्धा टैंपिल मेरे 1980 में देहरादून छोड़ देने के बाद अस्तित्व में आया है किन्तु जब मैने भाई से पूछा तो उसने बताया कि पहले ये इतना लोकप्रिय नहीं हुआ करता था अतः हम लोग पहले यहां आया नहीं करते थे। पिछले कुछ वर्षों से, जब से ISBT यहां पास में बनी है और इस क्षेत्र में जनसंख्या भी बढ़ गई और बाज़ार भी बन गये तो लोगों को पता चला कि ऐसा कोई सुन्दर सा मंदिर भी यहां आसपास में है। क्लेमेंटाउन में स्थित इस बौद्ध मठ के बारे बाद में मैने जानने का प्रयास किया तो इसके महत्व की अनुभूति हुई। यह मठ तिब्बत के विश्वविख्यात बौद्ध मठ की प्रतिकृति है और इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसके मुख्य भवन की दीवारों पर मौजूद भित्तिचित्र हैं, कलाकृतियां हैं जिनके माध्यम से भगवान बुद्ध के जीवन की अनेकानेक घटनाओं को अंकित किया गया है। (इनका चित्र लेना मना है)। इसका निर्माण वर्ष 1965 में हुआ बताया जाता है। लगभग पचास कलाकार तीन वर्ष तक इन दीवारों पर स्वर्णिम रंग के पेंट से कलाकृतियां बनाते रहे हैं तब जाकर यह कार्य पूरा हुआ। बहुत दूर से ही इस मंदिर का स्तूप दिखाई देता है जो 220 फीट ऊंचा है। यह जापान की वास्तुकला शैली पर आधारित है। इस मुख्य भवन में पांच मंजिलें हैं और हर मंजिल पर भगवान बुद्ध की व अन्य अनेकानेक प्रतिमायें भी स्थापित की गई हैं। यह मानव की स्वभावगत कमजोरी है कि वह जिस कला को देखकर प्रारंभ में चकित रह जाता है, बाद में उसी कला के और भी अगणित नमूने सामने आते रहें तो धीरे-धीरे उसका उत्साह भी कम होता जाता है। बहुत ज्यादा ध्यान से वह हर चीज़ का अध्ययन नहीं कर पाता। पहली मंजिल पर स्थित कलाकृतियों और प्रतिमाओं को देखने में हमने जितना समय लगाया उससे थोड़ा सा ज्यादा समय में हमने बाकी चारों मंजिलें देख लीं ! शायद इसकी एक मुख्य वज़ह ये है कि हम उन सब कलाकृतियों को समझ नहीं पा रहे थे और हमें सब कुछ एक जैसा सा लग रहा था। कोई गाइड यदि वहां होता जो एक-एक चीज़ का महत्व समझाता तो अलग बात होती।

मुख्य मंडप में से निकल कर सीढ़ियां उतर कर लॉन में आये तो बायें ओर भी एक स्तंभ दिखाई दिया। लॉन में एक धर्मचक्र स्थापित किया गया है। आपने तिब्बतियों को अपने हाथ में एक धर्मचक्र लिये हुए और उसे हाथ की हल्के से दी जाने वाली जुंबिश से निरंतर घुमाते हुए देखा होगा। वे पोर्टेबल धर्मचक्र वास्तव में इसी धर्मचक्र की अनुकृतियां हैं। इस स्तूप में लगभग 500 लामा धार्मिक शिक्षा ग्रहण करते हैं। बताया जाता है कि तिब्बत के बाद यह एशिया का सबसे बड़ा स्तूप है।

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हरिद्वार और देहरादून का तूफानी दौरा

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तो साब! ऐसे बना हमारा हरिद्वार का प्रोग्राम जिसमें मेरा कतई कोई योगदान नहीं था। घर के ताले – कुंडे बन्द कर के हम चारों अपनी बुढ़िया कार में बैठे, रास्ते में सबसे पहले पंपे पर गाड़ी रोकी, पांच सौ रुपल्ली का पैट्रोल गाड़ी को पिलाया, गाड़ी में फूंक भरी (मतलब हवा चैक कराई) और हरिद्वार की दिशा में चल पड़े! मारुति कार में और चाहे कितनी भी बुराइयां हों, पर एक अच्छी बात है! हवा-पानी-पैट्रोल चैक करो और चल पड़ो ! गाड़ी रास्ते में दगा नहीं देती !

चल तो दिये पर कहां ठहरेंगे, कुछ ठिकाना नहीं ! गर्मी के दिन थे, शनिवार था – ऐसे में हरिद्वार में बहुत अधिक भीड़ होती है। नेहा इतनी impulsive कभी नहीं होती कि बिना सोचे – विचारे यूं ही घूमने चल पड़े पर बच्चों की इच्छा के आगे वह भी नत-मस्तक थी! मन में यह बात भी थी कि अगर हरिद्वार में कोई भी सुविधाजनक जगह ठहरने के लिये नहीं मिली तो किसी न किसी रिश्तेदार के घर जाकर पसर जायेंगे! “आपकी बड़ी याद आ रही थी, कल रात आपको सपने में देखा, तब से बड़ी चिन्ता सी हो रही थी ! सोचा, मिल कर आना चाहिये!” अपनी प्यारी बड़ी बहना को छोटी बहिन इतना कह दे तो पर्याप्त है, फिर आवाभगत में कमी हो ही नहीं सकती!

कार ड्राइव करते हुए मुझे अक्सर ऐसे लोगों पर कोफ्त होती है जो ट्रैफिक सैंस का परिचय नहीं देते। मैं यह कह कर कि “इन लोगों को तो गोली मार देनी चाहिये” अपना गुस्सा अभिव्यक्त कर लिया करता हूं! बच्चे मेरी इस आदत से परिचित हैं और उन्होंने अब इसे एक खेल का रूप दे दिया है। जब भी सड़क पर कुछ गलत होता दिखाई देता है तो मेरे कुछ कहने से पहले ही तीनों में से कोई न कोई बोल देता है, “आप शांति से ड्राइव करते रहो! गोली तो इसे हम मार देंगे।” मुझे भी हंसी आ जाती है और गुस्सा काफूर हो जाता है।

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स्वर्ण मंदिर – लंगर और रामबाग पैलेस

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लंगर से बाहर निकल कर पुनः वही प्रश्नचिह्न सम्मुख आ खड़ा हुआ – “अब क्या?“ अचानक मुझे याद आया कि एक मित्र ने रामबाग समर पैलेस यानि, महाराजा रणजीत सिंह के महल का ज़िक्र किया था और कहा था कि मैं उसे अवश्य देख कर आऊं। रिक्शे वालों से पूछना शुरु किया तो सबने 30 रुपये बताये। मुझे लगा कि अमृतसर के रिक्शे वालों को तीस का आंकड़ा कुछ ज्यादा ही पसन्द है। रामबाग पैलेस चलने के लिये एक रिक्शा कर लिया। स्वर्ण मंदिर में हर किसी को कार सेवा में तन्मयता से लगे हुए देखते देखते, मुझे लग रहा था कि यह रिक्शावाला भी तो इस विशाल समाज के लिये एक अत्यन्त उपयोगी कार सेवा ही कर रहा है। अतः उसके प्रति सम्मान की भावना रखते हुए मैं रिक्शे में ऐसे सिमट कर बैठा जैसे मेरे सिमट कर बैठने मात्र से मेरा 82 किलो वज़न घट कर 60 किलो रह जायेगा। मेरा वज़न घटे या न घटे ये तो वाहेगुरु जी की इच्छा पर निर्भर है, पर मुझे उम्मीद है कि उन्होंने मेरी भावनाओं को तो अवश्य ही समझ लिया होगा।

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अमृतसर में अटारी – वाघा बार्डर

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हम जब शाम को पांच बजे स्वर्ण जयंती द्वार पर पहुंचे तो सारी बैंच पूरी तरह से ठसाठस भरी हुई थीं।  जब मैने द्वार पर खड़े बी.एस.एफ. के अधिकारी को प्रेस पास दिखाया और कहा कि मुझे आगे जाने दें तो उन्होंने वी.आई.पी. लाउंज के लिये प्रवेश द्वार 3 की ओर इंगित किया और कहा कि आप वहां कोशिश करें।  मैं उधर भागा पर वहां कोई सुनवाई नहीं हुई !  वहां विदेशियों और कुछ वी.आई.पी. महिलाओं, युवतियों और बच्चों को जाने दिया जा रहा था।  अतः फिर वापिस भागा और स्वर्ण जयंती द्वार की सीढ़ियां चढ़ कर वहां पहुंचा जहां पहले ही मानों पूरा हिन्दुस्तान आकर सीटों पर जमा हुआ था।  अपने कैमरे के लिये मुझे जो सर्वश्रेष्ठ स्थान उपलब्ध हो सका वहां जाकर मैं खड़ा होगया।  बड़ा ही मजेदार दृश्य सामने था।  स्वर्ण जयंती द्वार से लेकर पाकिस्तान वाले द्वार तक तिरंगा झंडा हाथ में लेकर भागते हुए जाने और वापिस आने के लिये महिलाओं की लाइन लगी हुई थी।  उनको बी.एस.एफ. के इस अभियान के संयोजक एक अधिकारी तिरंगे झंडे देते थे और भागने का इशारा करते थे।  युवा, प्रौढ़ और यहां तक कि वृद्ध महिलाएं भी बड़े उत्साह से तिरंगा हाथ में लेकर पाकिस्तान की सीमा तक भागती हुई जाती थीं और फिर वापस आती थीं।  हज़ारों की संख्या में दर्शक गण भारत माता की जय, वंदे मातरम्‌,  हर-हर, बम-बम नारे लगा कर उनका उत्साह-वर्धन कर रहे थे।  दर्शकों के उत्साह का आलम कुछ ऐसा था मानों वह वृद्ध महिला नहीं बल्कि पाकिस्तान के बैट्समैन को आउट करने के लिये भारतीय क्रिकेट टीम का बॉलर दौड़ रहा हो। पन्द्रह मिनट तक यह कार्यक्रम चलता रहा फिर महिलाएं, युवतियां और स्कूली बच्चे डांस करने के लिये अपनी अपनी सीट छोड़ कर सड़क पर उतर आये।  पन्द्रह मिनट तक धुआंधार कमर मटकाई गईं और जनता गला फाड़ – फाड़ कर अपने उत्साह का प्रदर्शन करती रही।  सबसे मजेदार बात ये थी कि पाकिस्तान वाले गेट के उस पार भी एक स्टेडियम नज़र आ रहा था जहां तीस-चालीस दर्शक बैठे हुए दिखाई दे रहे थे।  इस ओर हज़ारों दर्शकों का अदम्य उत्साह, नारेबाजी और कान के पर्दे फाड़ देने लायक शोर और उधर केवल मात्र तीस – चालीस दर्शक! अब अगर ऐसे में पाकिस्तानी हुक्मरान डिप्रेशन का शिकार न हों तो क्या हों? मुझे तो लग रहा था कि पाकिस्तान वाली साइड में बैठे दर्शकों का भी मन कर रहा होगा कि हिन्दुस्तान वाला कार्यक्रम देखें पर अनुमति न होने के कारण मन मसोस कर रह जाते होंगे।

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