Udaipur Vintage Cars

श्रद्धेय पाठक मित्रों, जैसा कि आप जानते ही हैं,  तीन दिन पहले यह यात्रा सहारनपुर से शुरु हुई थी और उदयपुर से माउंट आबू तक पहुंची, वहां से वापिस उदयपुर आई। उदयपुर में काफी कुछ देखा जा चुका है, जैसे – सहेलियों की बाड़ी, पिछोला लेक, अंबाजी माता मंदिर, जगदीश मंदिर, महाराणा प्रताप मैमोरियल, वीर स्थल, शिल्पग्राम, भारतीय लोक कला मंडल का संग्रहालय आदि आदि । पिछले ही अंक में आपको सिटी पैलेस के दर्शनों का सौभाग्य मिला।  अब चलते हैं एक गैराज़ में खाना खाने !  चिहुंकने की जरूरत नहीं है – ये गैराज़ भी खास है और यहां का रेस्टोरेंट भी !

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उदयपुर में जब चार पहियों वाली कार रखने की आर्थिक क्षमता सिर्फ और सिर्फ राणा और महाराणाओं में हुआ करती थी, तब से ही उनको कार रखने का चस्का लग गया था।  एक अर्द्धचन्द्राकार गैराज़ भी बनाई गई जिसमें एक ही गेट से घुस कर अलग – अलग कमरों में गाड़ियां खड़ी हो सकती थीं।  वे जमाने भी क्या जमाने थे।  मुझे याद है सन्‌ 1924 की ।  एक कार आई थी – रॉल्स रॉयस Rolls Royce !

मोटर साइकिल के जैसे स्पोक वाले पहिये।  इतना लंबा बोनट कि उसके अन्दर आराम में एक नैनो स्मगल की जा सके!  पहियों के ऊपर बड़े – बड़े मड गार्ड, वह भी ऐसे जैसे Enfield bullet मोटरसाइकिल में होते हैं। 1908 से 1940 के मध्य इन कारों को रॉयस नाम के आटो इंजीनियर ने इंग्लैंड में खुद डिज़ाइन किया था।  जैसे एक आर्किटेक्ट होता है और एक इंटीरियर डेकोरेटर होता है ना?  जैसे दुकान से कपड़ा खरीद कर दर्ज़ी से सूट सिलवा लेते हैं  ठीक वैसे ही एक कार का इंजीनियर था और एक कोच मेकर था।  आप कार का डिज़ाइन पसन्द करो और कोच मेकर को बुला कर उससे बनवा लो।  यह बार्कर नाम का कोच मेकर लंदन में ही ऑडले स्ट्रीट पर रहा करता था और आपकी मनपसन्द कोच आपको बना कर दिया करता था।  ऐसे ही हमारे एक तत्कालीन महाराणा जी ने एक दिन एक ऐसी ही कार की फोटो देख कर ये उद्गार व्यक्त किये –

“कभी – कभी मेरे दिल में खयाल आता है,
कि जैसे तुझको बनाया गया है मेरे लिये !
तू अब से पहले डर्बी में रह रही थी कहीं,
तुझे हिंदुस्तान लायेंगे मेरे लिये !!!  :)

कारों के सभी चित्र Eternal Mewar से साभार ...

कारों के सभी चित्र Eternal Mewar से साभार …

1930Ford 1934-RollsRoycePhantom 1946Buick 1959-Morris MGTCलिये !”

 

इस गाड़ी का तकनीकी नाम है GLK21 ! वाह, बड़ाई सोणा नाम है!  सन्‌ 1924 के दिनों के तो इंसान भी आज कल मुश्किल से ही मिलते हैं, ये बेचारी तो कार है।  वर्ष 2000 के आस-पास मेवाड़ घराने के मन में ये खयाल आया कि हम अपनी कारों की एक प्रदर्शनी क्यूं ना लगा दें। कम से कम प्रवेश टिकट के पैसों से ड्राइवर की तनखाह तो निकलेगी!  तो फिर यह खयाल भी हाथ के हाथ आया कि कार देखने के लिये लोग तो तब आयेंगे जब कार बढ़िया हालत में हों ।  ऐसे में अपने जीवन के फाइनल बसंत देख रही इस कार को पुनः युवा बनाने का अभियान शुरु हुआ।

Hofmanns of Henley, UK की राय ली गई और उनके तकनीकी निर्देशन में गाड़ी के एक-एक अंग का प्रत्यारोपण शुरु हुआ।  गाड़ी के पहिये न्यू ज़ीलेंड से मंगाये गये।  गीयर बक्से की मरम्मत के लिये इंग्लैंड की उसी कंपनी के इंजीनियर आये जिन्होंने इसे बनाने की ज़ुर्रत की थी।  यह कुछ ऐसा ही था कि शादी के स्वर्णजयंती वर्ष में कोई व्यक्ति अपने श्वसुर को पत्र लिख कर कहे कि आपकी सत्तर साल की बिटिया का ब्लड transfusion होना है, जरा आकर सहायता करें।  जैसे श्वसुर अपने दामाद को “ना” नहीं कर पाते ऐसे ही Hofmanns of Henley कंपनी के श्रीयुत्‌ ग्राहम ने भी मना नहीं किया और गाड़ी के रेडियेटर और गीयर बाक्स को बिल्कुल नये जैसा बना कर दे दिया।

धन्य हैं मेवाड़ के महाराणा और धन्य हैं इंग्लैंड के इंजीनियर !   आज ये गाड़ी उदयपुर की सड़कों पर पूरी शान से दौड़ती है।   आपको शायद मालूम हो कि रॉल्स-रॉयस कार की सबसे बड़ी पहचान उसका रेडियेटर ही होती है जिसका डिज़ाइन आज तक भी नहीं बदला।  O & M विज्ञापन एजेंसी के मालिक ने एक बार लिखा था कि इस गाड़ी को जब बनाया जाता है तो इसकी बॉडी पर stethescope लगा-लगा कर देखा जाता है कि इसमें कहीं कोई आवाज़ तो नहीं आ रही है!

पांच बार प्राइमर और नौ बार पेंट का कोट चढ़ाया जाता है, अन्दर कहां, क्या, कैसे चाहिये – यह सब आपकी फर्माइश के हिसाब से बनाया जाता है।  ऐसा नहीं कि जो कंपनी वालों को पसन्द आया, लगा दिया। इतना ही नहीं, गाड़ी की हैड लाइट के एंगिल, direction, focus वगैरा सारे समायोजन ड्राइवर अपने आस-पास लगाये गये लीवर से ही कर सकता था।  जे हुई ना कुछ बात !

चलो जी, ये तो रही रॉल्स – रॉयस की कहानी !   अब आइये मॉरिस पर !  इस गाड़ी से मिलेंगे तो ये सबसे पहली बात जो आपके कानों में गुनगुनायेगी, वह है, “अभी तो मैं जवान हूं!”  इसे ये भ्रम पालने का पूरा हक बनता भी है।  1924 की GLK21 Rolls Royce के मुकाबले ये तो 1959 की स्पोर्ट्स कार है।  आज कल लोग अपने घरों और कार्यालयों में split AC लगवाते हैं पर इस कार में split windscreen लगे हुए हैं।  जे हुई ना कुछ बात !

जब इस कार की मरम्मत (गंदी बात !   मरम्मत नहीं, जीर्णोद्धार !  मरम्मत से तो ऐसा लगता है जैसे किसी शरारती बच्चे की पिटाई हो रही हो! )  का ख़याल महाराणा जी के दिल और दिमाग में कौंधा तो उस समय ये कार अपनी बदहाली पर ऐसे आंसू बहाया करती थी कि पत्थर दिल कपिल सिब्बल साहब का दिल भी पसीज जाये ।  इसको तो बाबा रामदेव के आश्रम में भेज कर पूरा कायाकल्प करा दिया गया।

बॉडी भी, इंजन भी, पेंट भी, अन्दर गद्दियां भी – सब कुछ ठीक करने में आठ महीने का समय लग गया। पर जब ये आश्रम से निकल कर बाहर आई तो महारानी ने तुरंत इसे नज़र का टीका लगाया।  चार सिलेंडर, ४० हॉर्स पावर और बैक गीयर समेत ४ गीयर वाली ये मॉरिस कार आज कल उदयपुर की इस विंटेज व क्लासिक कार कलेक्शन की शान है। इसकी हैड लाइटें – सुभान अल्लाह!

अगर आप चाहें तो आपको कैडिलेक और ब्यूक गाड़ियों के बारे में भी जानकारी दी जा सकती है पर इनमें से कोई सी भी गाड़ी बेचने का महाराणा का कतई कोई मूड नहीं है।  इसलिये इतना जान लेना काफी है कि ये सभी कारें इस संग्रहालय की शान हैं, जब सड़क पर चलती हैं तो ऐसे ही लोग इनको हसरत भरी निगाहों से देखते हैं जैसे, जैसे, जैसे …….   (चलिये आप ही बताइये !)

यहीं इस संग्रहालय में एक विशिष्ट रेस्टोरेंट भी बनाया गया है जहां पर आप सामान्य से मूल्य पर राजस्थानी आतिथ्य का आनन्द ले सकते हैं ।  थाली सिस्टम है, बरफी समेत शायद हमने 150 रुपये प्रति थाली दिये थे और भरपेट स्वादिष्ट भोजन किया था जिसमें बढ़िया वाली बर्फी भी शामिल थी।  सबसे अच्छी बात ये थी कि बैरे खाना ऐसे खिलाते हैं जैसे हम उनके घर आये हुए अतिथि हों ।   आतिथ्य सत्कार इसी को कहते हैं शायद !    इस रेस्टोरेंट को बड़े अच्छे ढंग से सुसज्जित किया गया हो, ऐसा नहीं है ।  हमें भोजनागार में घुसते हुए जैसी अनुभूति हुई थी, खाना खाने के बाद उससे बेहतर अनुभूति लेकर हम बाहर निकले थे।

इस संग्रहालय में रक्खी हुई कारों को देखने का मेरा बहुत मन था पर मेरे साथ में जो तीन अपने थे, उनको ऐसी चीज़ों में कोई रुचि नहीं थी।   काश मेरे दोनों बेटे यदि मेरे साथ वहां पर होते तो हम पूरा दिन उन कारों को ही निहारते रहते और उनके बारे में सवाल कर कर के संग्रहालय वालों को पसीने छुड़ा देते।    पर लोकतंत्र में जैसी सरकार बहुमत कहे,  देश को वैसी ही सरकार मिलती है।  बहुमत की राय थी कि नाथद्वारा मंदिर देखना है तो ठीक है जी, वहीं चलो !

बहुत नाम सुना था इस मंदिर का ।  बनास नदी के तट पर, उदयपुर के उत्तर -पूर्व में, उदयपुर से 48 किलोमीटर दूर,  भगवान श्रीकृष्ण का 17वीं शताब्दी का मंदिर है,  यहां पर दिन में विभिन्न समय पर भिन्न – भिन्न रूपों में दर्शन कराये जाते हैं – कभी शिशु रूप में तो कभी बाल रूप में ।   यहां का और वापसी का वर्णन शीघ्र ही आपकी सेवा में लेकर उपस्थित हो सकूंगा !   तब तक के लिये नमस्कार, प्रणाम, शब-ब-खैर, गुड नाइट एवं वळक्कम्‌ !

16 Comments

  • Surinder Sharma says:

    Great post, nice informaiton about cars. Will wait for Shri Nathduara Mandir.

  • D.L.Narayan says:

    Thanks, Sushant, for the guided tour of the Royal garages of Mewar. While one cannot but admire these beautiful vintage cars, one can’t help but look back at those times when things were really bad for the hapless subjects of these kingdoms. Why have cars when there were no roads? These expensive toys must have been driven only on palace grounds with fuel imported at great expense. This money could have been better spent on improving the lot of their subjects.

    These royals lived a life of luxury with the privy purses given by the British and abdicated their responsibility to their subjects. Sad to think that they were the descendants of warrior kings like Rana Sanga and Rana Pratap. Ah well, all that is history now. All that remains are the palaces and the cars.

    • Dear DL,
      As a matter of fact, I had scheduled this post for yesterday evening but till 5 p.m., there was nothing in it. First, I deferred it for a week but then, as a second thought, hastily put everything in it and uploaded it. I behaved like a student who didn’t study for the whole year and on the day of exam, tried to hastily scan his notes, while going to the examination centre !

      But you are sooooooooooooo forgiving, ki bas kya bataaun !!! Thanks for being there.

      Heartiest good wishes for your birthday – one day in advance.

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  • bhupendra singh raghuwanshi says:

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  • Praveen Wadhwa says:

    Beautiful cars. In USA also here are many car enthusiastic who are always on the lookout for abandoned vintage cars and then they go to great pain to restore these.

  • SilentSoul says:

    A unique post with unique pictures… tks SS ji

  • Beautiful Cars Sushant jee ,

    Just now I have arrived from Rajasthan and still the hangover is there and I am continuing with your series now.

    @ Praveen jee : I think rather than pain the word “passion” is more suitable .

    • Dear Vishal,

      Thanks for coming to my latest series and liking it. Which part of Rajasthan have you been recently? When are we going to see the related posts?

      As far as ‘pains’ and ‘passion’ is concerned, in this particular case ‘pain’ seems perfect to me. ‘ Taking great pains’ is an idiom which conveys the exact meaning which Mr. Praveen Wadhwa wished to convey.

      Taking pains = making a lot of sincere efforts
      I have a great passion for it = I am very much attached to it emotionally.
      I feel very passionate about it = I feel strongly about it.
      Giving someone much pain = Causing a lot of sorrow to someone with one’s action / inaction.

      Maharana took a lot of pains in restoring these cars because he was very passionate about them.

      Hope that makes clear. Basically, ghumakkar is not a forum to find faults with fellow writers’ language and grammar. 90% of the authors would go away if we start doing it.

  • Mukesh Bhalse says:

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  • Nandan Jha says:

    When we were there, we were assigned a guide (more like a local mechanic) and this guy was really exceptional. He took great care in showing us each car and made it very interactive by challenging us on why the exhaust is like this or where is the hand brake or why the fuel tank is top-mounted unlike the regular scheme , so on and so forth. For one of the RR car, he explained that one R is Black where as the other R is Red. This was done since one of the Rs had completed his age by then.

    I think what worked in our favor was that we traded this time against the shopping time so while we learnt and engaged with machines, our better half were busy buying the bandhej and block-printing and what not.

    Of course the Thali at Garden is fabulous. There is a park right outside this place, I am missing the name, and it is a great place to just have some relaxing walks and rest. It is a pretty big park with a small zoo and few structures inside, looks like very old park with tall trees and thick foliage. Yeah, it is called ‘Sajan Singh Park’ or something close.

    Thank you Priye Sushant for the refresher.

  • Abheeruchi says:

    Hello Sushant ji,

    Very nice and beautiful post.

    Nandan ji – Park name is Sajjannivas Bagh , generally referred as Gulab bagh.

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