mountains

Valparai Series – Part 2

Valparai Series – Part 2

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The estates brought prosperity for the new settlers but ‘development’ also meant massive deforestation of once pristine forests with the attendant depletion of indigenous fauna and flora. In those days
of abundant natural wealth, this was not a matter of concern.

In recent times, the Nature Conservation Foundation – an NGO, has engaged the estates in a successful conservation programme to maintain wildlife corridors and regenerate the forest. Consequently, you never quite know who you might meet in and around those Valparai tea gardens!

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Valparai Series – Part 1: An Introduction

Valparai Series – Part 1: An Introduction

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Green Hills has a restaurant that is dingy and uninviting but their food is delicious.  Some of the home stays provide meals, some do not have this facility.  There are several restaurants, food stalls and messes along the one and only main road where you can enjoy a cheap and delicious meal.  Besides this there are umpteen bakeries serving hot snacks, cakes and locally grown tea.  The problem arises for strict vegetarians who will not eat vegetarian food in a non veg establishment, and as we all know there are many such good folk not just in Tamil Nadu but all over India.   I have seen only one place near the Gandhi Bus Stand – the Sabari Mess – which proclaims itself to be “Veg Only“.   No personal experience but you can not go too wrong with the local food.  We dined at the Plaza on the main road opposite the Police Station.  It was consistently good with excellent service and spotlessly clean.     For us, once we are on to a good thing, we are reluctant to experiment with something new so as with the home stay, the staff at Plaza now also treat us as long lost friends.  I did notice a Mary Matha Mess in the adjoining building on the first floor which seemed to be popular.  Mess in these parts  means restaurant or a place where meals are served.

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गढ़वाल घुमक्कड़ी: तपोवन – रुद्रप्रयाग – दिल्ली

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रास्ते में हम लोग लोग थोड़ी देर रुद्रप्रयाग में रुके और फिर चल दिए श्रीनगर की ओर. श्रीनगर पहुँचते पहुँचते हमें काफी देर हो चुकी थी और आज रात इससे आगे जाने का कोई साधन नहीं दिख रहा था. कोई जीप या बस मिलने की तो संभावना बिलकुल भी नहीं थी क्योंकि यहाँ हिमाचल की तरह रात को बसें नहीं चलती. ऐसे में हमारे चालक साब ने हमें रात श्रीनगर में ही बिताने का सुझाव दिया और हमें रात गुजारने का एक ठिकाना भी दिखाया. हमने ठिकाना तो देख लिया पर अब किसी का भी यहाँ रुकने का मन नहीं था और सब जल्द से जल्द घर पहुँचना चाहते थे. उत्तरांचल में वैसे तो रात को कोई वाहन नहीं चलते पर सब्ज़ी फल आदि रसद पहुँचाने वाले ट्रकों की आवाजाही रात भर चालू रहती है, सोचा क्यों ना इसे ही आजमाया जाए. आज शायद किस्मत हम पर मेहरबान थी, थोडा पूछ्तात करने पर ही हमें एक ट्रक मिल गया जो हरिद्वार तक जा रहा था. ट्रक चलने में अभी लगभग आधा घंटा बाकी था और सुबह सिर्फ आश्रम में ही भोजन किया था इसलिए एक ढाबे पर जाकर थोड़ी पेट पूजा की गई.

ट्रक पर वापस लौटे तो देखा की चालक के साथ वाली सीट पर पहले ही दो लोग बैठे हुए थे. ऐसे में वहाँ हम तीनों का एक साथ बैठना संभव और सुरक्षित नहीं था. इसलिए दोनों की बुरी हालत देखकर मैं ट्रक के पीछे चला गया जहाँ कुछ अन्य लोग पहले से ही लेटे थे. इस ट्रक के ऊपर एक बरसातीनुमा दरी थी जो शायद सब्जियों को धूल और बारिश से बचाने के लिए डाली गयी थी और नीचे खाली प्लास्टिक के डब्बे रखे हुए थे जिनमे सब्जियाँ रखी जाती हैं. इन्ही हिलते डुलते प्लास्टिक के डब्बों के ऊपर हम सभी मुसाफ़िर लेटे हुए थे. ट्रक चलने पर कुछ समय तो बड़ा मजा आया पर जैसे जैसे रात गहराती गयी और नींद आने लगी तो इन हिलते हुए डब्बों पर सोना बड़ा दुखदायी लग रहा था क्योंकि एक तो ये डब्बे आपस में टकराकर हिल रहे थे और टेढ़े मेढ़े होने की वजह से चुभ भी रहे थे. खैर मेरे लिए तो ये सब रोमांच था, लेकिन रोमांच धीरे धीरे बढ़ने लगा जब इन्द्रदेव अर्धरात्रि में जागे और हम पर जमकर मेहरबान हुए. तिरछी पड़ती हुई मोटी मोटी बारिश की बूँदे हमारे ऊपर एक शॉवर की तरह पड़ रही थी जो एक मंद मंद शीतल रात को एक बर्फ़ीली सी महसूस होने वाली रात में बदलने के लिए काफी थी. ऐसे में ऊपर रखी हुई दरी ने ठण्ड से तो नहीं पर भीगने से तो बचा ही लिया. ठण्ड में किटकिटाते हुए, बिना सोये जैसे तैसे करीब चार बजे के आस पास ट्रक चालक ने हमें हरिद्वार में एक सुनसान मोड़ पर उतार दिया. जितना दर्द मेरे शरीर में उस ट्रक में सवारी करते हुए हुआ उतना पूरी यात्रा कहीं नहीं हुआ, शरीर इतना अकड़ गया था कि ट्रक से बाहर निकलने के लिए भी हिम्मत जुटानी पड़ रही थी. ठण्ड के मारे बुरा हाल था, सुनसान गलियों से होकर गुजरते हुए हम लोग बस स्टेशन की ओर बढ़ने लगे. ऐसे में रास्ते में एक चाय का ठेला देखकर चेहरे पर कुछ ख़ुशी आयी, भाईसाब के हाथ की गर्मागरम चाय और बंद खाकर शरीर में कुछ ऊर्जा आई. फिर तो बस जल्दी जल्दी कदम बढ़ाते हुए हरिद्वार बस स्टेशन पहुँचकर, दिल्ली की बस पकड़ी तो लगभग दस या ग्यारह बजे तक दिल्ली पहुँच कर ही राहत की साँस ली. यात्रा समाप्त!

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गढ़वाल घुमक्कड़ी: भविष्य बद्री

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देवभूमि गढ़वाल के कुछ छिपे हुए रत्नों को तलाशती तीन दोस्तों की कभी ना भुला पाने वाली रोमांचक घुमक्कड़ी की दास्तान…जिसमे हमने कुछ बेहतरीन नज़ारे देखे, कुछ अनोखे और सोच बदलने वाले अनुभवों से गुजरे, कुछ खुबसूरत दोस्तों से मिले, कुछ बेहतरीन ठिकानों पर रात गुजारी और बहुत कुछ सीखने को मिला…

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गढ़वाल घुमक्कड़ी: जोशीमठ – तपोवन – बाबा आश्रम

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पैदल घूमते घामते प्रकृति को निहारते हुए सलधार पहुँचे और सबसे पहले वसुधारा की पद यात्रा से सबक लेकर एक दुकान पर रुककर आगे की यात्रा के लिए कुछ चने और मीठी गोलियाँ रख ली. सलधार से भविष्य बद्री तक का रास्ता ज़्यादातर जगह जंगल के बीच से गुज़रते हुए जाता था जहाँ कई जगह राह मे दो रास्ते सामने आ जाते थे जो हमारी दुविधा का कारण बन बैठते. ऐसे मे कई बार या तो स्थानीय लोगो की मदद से और कई बार बस किस्मत के भरोसे ‘अककड़ बक्कड़’ करके हम लोग जैसे तैसे सुभाईं नामक गाँव तक पहुँचे जहाँ से भविष्य बद्री की दूरी लगभग 1 ½ किमी ही रह जाती है.

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गढ़वाल घुमक्कडी: बद्रीनाथ – माणा – वसुधारा – जोशिमठ

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चलो अब चलते हैं मुचुकूंद गुफा, ‘अरे नही यार ये तो बहुत उपर लगता है’ दीपक बोला. ‘अरे नही भाई, पास ही तो है’, मैं बोला. ‘3 किमी तो दूर है भाई, फिर हम लोग वसुधारा नही जा पाएँगे, देख लो’, पुनीत बोला. बात सबको ठीक लगी, हम लोग वसुधारा को नही छोड़ना चाहते थे, गुफ़ाएँ तो सबने देख ही ली थी अब वसुधारा के दर्शन करने को सब बड़े बेकरार थे. इसलिए बिना समय गवाए हम लोग नीचे भीम पुल की ओर बढ़ चले. भीम पुल के पास आकर सबसे पहले एक बड़ी भ्रांति टूटी जो थी ‘सरस्वती के लुप्त हो जाने की’, हमने तो सरस्वती दर्शन से पहले केवल यही सुन रखा था की यह नदी अब विलुप्त हो चुकी है और शायद भूमिगत होकर बहती है.

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Kinnaur-The land of apples (Part 2)

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After about two and a half hours we reached Reckong Peo,or Peo, as it is popularly known. Peo is situated at an altitude of around 2200 metres above sea level and is at the base of the Kinner Kailash massif. From here, Kalpa was a short 20 minute drive and by lunch time we reached Kalpa. Our plan was to halt at the PWD rest house, which turned out to be a cottage with an excellent view of the mountains. Staying in Kalpa can be compared to living in the lap of nature. Overlooking the Kinner Kailash range, this is one of the most picturesque  hill stations one can ever visit. This quaint town was once the headquarters of Kinnaur district before it was replaced  by Reckong Peo. The collector’s office has now been taken over by the HP Irrigation Department while the old SP office is now a small police outpost. The old building of the District Hospital is visible behind the new building of a recently constructed Primary Health Centre.  From Kalpa, one can spot the famous Shiva Linga, nestled in the middle of the Kinner Kailash massif. It is a 2 day trek from Kalpa for the strong and sturdy.

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Mystical monsoon visit to Nahan, Paonta Sahib and Dakpatthar – Part II

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There was a stretch of over 5 kms with heavy traffic jam for a brief half an hour well into the middle of our journey just before we reached Roorkee. We had no inkling as to what cause the whole furore. But then 1 hour of slow snail-pace driving and we came to the action point. And almost all of a sudden, we realized we were driving into what seemed like a muddy pond. A lot of on-lookers were standing in higher and safer grounds on both sides of the road. And they were hooked on to the passing vehicles enjoying the drivers’ and passengers’ consternation in the hope of experiencing the cruel enjoyment of seeing a water-logged stranded car with helpless passengers inside. At least 50 odd two-wheelers were seen tugging along their vehicles wading through waist-deep mud and slosh with little children in festive clothes sloshing and pushing the two wheelers from the back, yelling and cheering each other.

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गढ़वाल घुमक्कडी: रुद्रप्रयाग – कार्तिक स्वामी – कर्णप्रयाग

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उपर के नज़ारों ने शरीर को तरो ताज़ा कर दिया था, इसलिए उतरते वक्त ज़्यादा समय नही लगा और उतरते ही पैदल यात्रा आरंभ. कुछ एक किलोमीटर ही चले थे कि दोस्तों को थकान लगने लगी, सोचा चलो जो साधन मिल जाए आगे तक उसी मे चल पड़ेंगे. अब चलते चलते हर एक आगे जाने वाली गाड़ी को हाथ दिखाकर रोकने की कोशिश करते रहे, पर सब बेकार. किस्मत से थोड़ी देर बाद एक ट्रक आता हुआ दिखाई दिया, आधे मन से इसे हाथ दिखाया और ये क्या! ट्रक तो थोड़ा आगे जाकर रुक ही गया था.

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Whirlwind Trip to Vancouver – Part 2

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Stanley Park is an urban park surrounding the city, a two minute walk from my hotel in Canada Place. I spent an early morning taking a stroll, watching the runners practice for the upcoming half marathon, mommies walking around with their babies in strollers, and tourists walking excitedly with their cameras, posing and taking pictures of everything. In fact, two of my lab mates signed up to run the half-marathon the day after their conference presentations, and it was inspiring to see people travel across the coast to talk at conferences, and then change into their gym clothes from the formal suits and go about running miles all around the city. Hats off to their energy, although this gave me some more time to sleep late.

Stanley Park is huge, and when I say it is huge, I mean it. If you have been to Central Park in New York City, this is even bigger than that, a paved path running around its circumference. Lined with tall trees, lush greenery, and full of enthusiastic people jogging around, Stanley Park is ranked the 16th best park in the world and the 6th best in North America.

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वाटरटन नेशनल पार्क और यु.एस. बोर्डर (भाग १)

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वाटरटन नेशनल पार्क यु.एस. के मोंटाना प्रान्त और कैनेडा के अलबर्टा प्रान्त के बोर्डर पर स्थित है. लाखों लोग यु.एस. और कैनेडा से हर साल नेशनल पार्क घूमने आते हैं. फोर्ट सस्केच्वन से वाटर टन पार्क की दूरी ६०० की. मी. है.

कैलगरी शहर के बाद सबवे पर लंच के लिए रुकते हैं. सबवे की संसार में 37,207 से ज्यादा लोकेशन हैं. भारत में 282 लोकेशन हैं. सबवे सेक्टर 15 फरीदाबाद में भी है. विदेश में शाकाहारी भोजन के लिए सबवे अच्छा आप्शन हैं. मेनू में पहले सफ़ेद या ब्राउन ब्रेड, उसके के बाद सौस, खीरा, टमाटर प्याज, शिमला मिर्च, (कच्ची कटी हुई) आदि डाल कर सब त्यार कर दिया जाता है.  भारत में यह ८० रूपये से शुरू होता है, विदेश  में ४ से ६ डॉलर का है.

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