पंचवटी की यात्रा – भाग १

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नारोशंकर मंदिर की छत अपने आप में स्थापत्य-कला के लिए प्रसिद्ध है. काफ़ी विदेशी पर्यटक इस मंदिर की छत का अध्धयन करने आते हैं. चट्टानों के नक्काशीदार टुकड़े सिर्फ उन टुकड़ों पर बने खांच में लग कर अभी तक खड़े है. मंदिर के अन्दर के सभा मंडप में एक नंदी और एक कछुए की मूर्ति है. कछुए की मूर्ति तो जमीन के सतह पर ही अंकित है. कुछ ऐसा-ही त्रैम्बकेश्वर मंदिर में भी देखने को मिलता है. मंदिर के बाहर के प्रांगन में भी कई कलात्मक आकृतियाँ हैं, जैसे की काल-सर्प की प्रतिमा. नारोशंकर मंदिर में कुछ समय बिताने के बाद हमलोग फिर से राम-तीर्थ की तरफ बढ़े.

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पुराने इंदौर की एक शाम – गलियों में खाने का ख़जाना

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और ऐसे ही एक शाम ढल चुकी थी. खजराना स्थित गणेश मंदिर में पूजन के पश्चात मेरे बड़े भाई के परिवार के सभी सदस्यों का मन पुराने इंदौर की इन्ही गलियों का लुत्फ़ उठाने का हुआ. मेरी तो जैसे की मौज हो गयी. संध्या के धुंधुलके से लिपटे हुए इंदौर के ऐतिहासिक राजवाड़े के बगल से होकर हमलोग सराफा की उन गलियों में पहुंचे. वहां की दुकानें बंद तो हो चुकी थीं, पर गलियाँ बड़े-बड़े बिजली के बल्बों की रोशनी से जगमगा रही थीं. खाने की दुकानें सज चुकी थीं और मानों सम्पूर्ण इंदौर के लोग उन गलियों में लगे बेहतरीन खाने का मजा लेने उमड़ पड़े थे.

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ब्रह्मगिरी की पदयात्रा , त्रैम्बकेश्वर

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सीढ़ियों ने अब बहुत ऊँचाई ले ली थी. विशाल चट्टान-नुमा ब्रह्मगिरी पर्वत अपने सम्पूर्ण विशालता को ले कर हमारे सामने था. उस ऊँचाई से त्रैम्बकेश्वर शहर कितना बौना और मनोहर लग रहा था. सीढियां पर्वत की सपाट सतहों से लग गयी थीं. इन सीढ़ियों में घाटी की तरफ लोहे की रेलिंग्स भी लगे हुए थे ताकि कोई फिसल कर घाटियों में न गिर जाये. उस पर अब बन्दर सामने आ गए. पहाड़ की ऊँची खड़ी सपाट सतह पर भी ये बन्दर चीखते-चिल्लाते ऐसे दौड़ते थे की मानो समतल धरती पर दौड़ रहे हों. कूद कर अचानक किसी पदयात्री के सामने आ जाना और उनके हाथ से खाना छीन लेने में इन बंदरों को महारत हासिल थी. पर अनुभवी यात्री अपने साथ इनके लिए भी कुछ खाद्य सामग्री ले कर चलते है. श्री दानी ने भी ऐसा ही किया था. उसने अपने थैले से बिस्कुट निकाला और बंदरों को निश्चिंतता से खिलाया. और इधर हम तीनों अनुभव-हीन यात्री अपनी छड़ियाँ पकड़े बंदरों से बच कर आगे चलते रहे.

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सप्त्श्रींगी देवी, नाशिक-त्रैम्बकेश्वर , की यात्रा

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जैसे ही मैं अंतिम सीढ़ी से उतरा, मेरे ध्यान स्थानीय लोगों की एक टोली पर गया, जो निचली सीढ़ी पर अजीबो-गरीब हरकतें कर रहे थे. मेरी पत्नी तो आगे बढ़ गयीं, पर मैं अपनी जिज्ञासा शांत करने हेतु उस टोली की ताराग चला गया. वहां एक स्त्री, जिसके बाल बिखरे हुए थे, बड़े जोरों से चिल्ला रही थी. वह हांफ भी रही थी और बड़ी बेचैन लग रही थी. वहीँ खड़े लोगों ने मुझे बताया कि उस स्त्री पर देवी आ गयीं हैं और वह तब-तक ठीक नहीं होगी, जब तक इस मंदिर के सामने उसकी पूजा न की जाये. उसके घरवाले भी वहीँ मौजूद थे. कोई ओझा उसकी तथाकथित पूजा कर रहा था. इस पूजा की पूजन सामग्री कोई भिन्न नहीं थी. वही अगरबत्ती, नारियल, फूल, मिठाई इत्यादि. पर एक बकरा भी वहीँ खड़ा था,

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हाजी अली दरगाह का बाज़ार , मुम्बई

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“बालू-शाही”, “गुड़पारा” तथा “बूंदी के लड्डू” भी दिखे. इनमें गुड़पारा ही विशेष था. बालूशाही और बूंदी के लड्डू तो अब तक जाने कितनी बार और कितने जगहों पर खा चुका था कि अब वहां चखने में तो कोई दिलचस्पी थी नहीं. दिमाग तो तब भी शकरपारा में ही दौड़ रहा था. आखिर इतना शक्कर और गुड़ इस प्रदेश में आता कहाँ से है? याद करने की कोशिश की तो याद आया शिर्डी से शनि सिग्नापुर का वो रास्ता, जिसके दोनों तरफ ईख के बड़े बड़े खेत देखे थे. गाँव वालों ने सडकों के दोनों तरफ ईख-के-रस की दुकानें लगायीं थीं. हर दुकान का नाम चाहे कुछ भी हो, पर टाइटल एक ही था..”रसवंती”.

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Crowning glory of Shekhawati: Haveli of Nadine Le Prince (Fatehpur)

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Then Lia brought us to the cultural center. It had mainly three sections. The first section was dedicated to paintings and the tribal art. Each frame was magnificent. Nevertheless, two pictures really attracted me. The first was the paining on goat skin, depicting of “Ram hunting”. The richness of its colour was excellent. It was done by an unknown tribal artist.

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Cherishing Shekhawati Cuisine: Food Tour

Cherishing Shekhawati Cuisine: Food Tour

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The all-India favourite dish called “पानीपूरी” (a flatbread filled with water) was also prevalent in Shekhawati. It has retained its charm over the masses because of its tangy taste and mouth-watering recipe. Many a times, this street food had to face the wrath of the puritans

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Classic Nawalgarh : Transport Museum in Poddar’s haveli

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Such passenger-carts had generally flat open surfaces on top so as to accommodate many passengers. I can think of only one plausible reason for such open carts, which can be attributed to the basic structure of our rain-based agrarian economy. As the people were busy during the rainy season, it prevented the mass from travelling from one place to the other in that season. But, just for the sake of fun, let’s imagine the scene of a drawing room of any transporter of 18th-19th Century. Their discussions on selecting the best model of the passenger-carts might have revolved around the durability of their design, availability of open space for carrying more number of people with their respective luggage and the probable cost of travel.

The bigger challenge, however, is to guess the complex mechanism of pricing their so-called “tickets”. How to fix the charge or the cost of travel, when the eating habits and the quantity of edible food of the animal differed from one transporter to another!

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Classic Nawalgarh : Special Frescos

Classic Nawalgarh : Special Frescos

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In medieval period, the inhabitation in Shekhawati was in the form of walled cities having gates at different directions. The role of the ruling royalty was to give protection to the citizen living under their dominions. Similarly, the role of the business families was to trade and pay taxes to the royalty for the maintenance and protection of the cities. However, the administrative structure was changing fast.

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