jim corbett

कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान

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बहरहाल हम सब जीप पे सवार हो के अन्दर गये ।एक अजीब सा सन्नाटा छाया हुआ था। कभी कभी किसी पक्षी की आवाज़ सन्नाटे को तोडती थी। तभी कुछ दूर स्पॉटेड हिरनों का झुण्ड दिखाई दिया। जैसे जैसे आगे बढे अन्य हिरन भी दिखे। बन्दर भी खूब थे। किन्तु बाघ अब भी नज़र नही आ रहे थे।अचानक ड्राईवर ने ब्रेक लगाया और चुप रहने का इशारा किया,हमे लगा बाघ होगा किन्तु कच्ची सड़क पार करता हुआ लगभग 10/12 फीट लम्बा किंग कोबरा अपना फन फैलाये बीच में खड़ा था। यु तो कई बार देखा था किन्तु उसके प्राकृतिक निवास में देखकर रोंगटे खड़े हो गये थे। लगभग 5 मिनट में हमें हतप्रभ कर नागराज जंगल में अंतर्ध्यान हो गये। हम और आगे बढे, कुछ दुरी पर जंगली हाथियों का एक झुण्ड दिखाई दिया।

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जिम कॉर्बेट पार्क – गर्जिया देवी का मंदिर और कॉर्बेट जल प्रपात

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गर्जिया देवी का मंदिर रामनगर से रानीखेत जाने वाली सड़क पर रामनगर से 15 किलोमीटर दूर है.यह मंदिर कोसी नदी के किनारे एक पहाड़ी के शीर्ष पर बना हुआ है. यह नैनीताल जिले का एक मुख्य मंदिर है जहाँ हर वर्ष कार्तिक पूर्णिमा पर हजारो श्रदालु माता के दर्शनों के लिए आते है. वसंत पंचमी पर भी यहाँ भक्तों की भीड़ जुटती है. यह मंदिर माता पार्वती को समर्पित है.

मंदिर की दूरी सिर्फ 15 किमी ही थी परन्तु पहाड़ी रास्तों पर इन 15 किमी की दूरी तय करने में अच्छा खासा समय लग जाता है. हमे भी पहुँचते पहुँचते अँधेरा हो गया था. मंदिर के रास्ते में पड़ने वाली दुकाने भी बंद होने लगी थी. हमने एक दुकानदार से पूछा कि क्या मंदिर खुला होगा उसने सकारात्मक उत्तर दिया. मंदिर तक पहुँचने के लिए कोसी नदी पर बने एक पुल पर से गुजरना होता है. शाम हो चुकी थी इसलिए मंदिर का रास्ता भी सुनसान सा ही था. मंदिर एक पहाड़ के शिखर पर स्थित है. जहाँ सीढ़ियों पर चढ़कर जाना होता है. मंदिर काफी उंचाई पर है. मंदिर पहुँच कर प्रसाद चढ़ाया और माता का आशीर्वाद लिया. मंदिर से वापस होटल पहुंचे. जहाँ रात्रि भोजन कर कल की सफारी की कल्पनायों में खो गए.

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Corbett and I

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it is not possible for those who have never lived in the upper reaches of the Himalayas to have any conception of the stranglehold that superstition has on people who inhabit that sparsely populated region…with us we had fifteen of the keenest and the most cheerful hillmen…one of these men, Bala Singh, a Garhwali, had been with me for years….i noticed that Bala Singh was sitting apart near the camp fire with a blanket over his head and shoulders. After breakfast I walked over to him,….Bala Singh saw me coming and made no attempt to greet me, which was very unusual, and to all my questions he returned the one answer — that he was not ill. That day we did our two-mile march in silence…it was quite apparent that whatever had happened to Bala Singh was affecting the other fourteen men, for they were performing their duties without their usual cheerfulness…after a lot of hedging and evasive answers I eventually got Mothi Singh’s story, which, when it came, was short and direct…’while we were sitting round the camp-fire last night and singing… the demon of Trisul entered Bala Singh’s mouth and he swallowed him

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