Mumbai

जीवदानी माता का मंदिर और अरनाला द्वीप के क़िले का परिचय

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किले के उत्तरी द्वार पर किले का मुख्य दरवाज़ा जो, समुद्र की तरफ़ खुलता था. किसी जमाने में उस समुद्री तट पर पुर्तगाली और ब्रिटिश नौसेना तैनात रही होगी. उस दिशा में समुद्र दूर-दूर तक फैला दिखाई देता था और यह साफ़ दिख रहा था कि सामरिक दृष्टि से अर्नाले के किले का महत्त्व कितना था. इसी दरवाज़े के ऊपर मराठों की पुर्तगालियों पर विजय के बारे में एक शिलालेख भी अंकित था. साथ ही किले की दीवारों पर शेर और हाथी जैसे प्रतीक चिन्ह भी उकृत थे.

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वज्रेश्वरी के गर्म पानी के स्रोतों का आश्चर्य

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एक-दूसरे पर जल के छीटें फेंकना, हंसी-मज़ाक करना, पानी के बीच अपनी फोटो खिंचवाना इत्यादि जल-क्रियाओं से लोग खुशियाँ मना रहे थे. तैरना जानने वाले लोग तो उस नदी के बीचो-बीच तैर रहे थे. कुछ स्त्रीयां नदी के तट पर बैठ कर अपनी-अपनी अंजुलियों में किनारे पर आई हुईं छोटी-छोटी मछलियों को पकड़ने की चेष्टा कर रहीं थीं.

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जाने, मुम्बई निकट गणेशपुरी के गर्म पानी के स्रोतों का सत्य

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इधर छिटपुट हो रही बारिश से मेरा तन-बदन भींग चुका था. उस भींगे हुए ठंडे मौसम में ईच्छा होने लगी कि गर्म पानी के सोतों में स्नान किया जाए. आखिर इतनी दूर मैं उन्हीं के लिए तो आया था. पर मैं महादेव मंदिर वाले उन सार्वजनिक कुंडों में डुबकीनहीं लगाना चाहता था. किंकर्तव्यविमूढ़ता की उस परिस्तिथिति में तन्सा नदी के तट से जैसे निकला, वैसे ही एक पुराने ब्रिटिश समय की कोठी नज़र आई. उत्सुकता शांत करने हेतु मैं कोठी तक चला गया. इस कोठी का नाम रत्नाबाद था. वर्तमान में इसे “गर्म-पानी स्नान तथा हेल्थ रिसोर्ट” के रूप में परिवर्तित किया गया था.

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मुंबई की गुफाएँ – जोगेश्वरी देवी की खोज में

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इतने में कुछ विदेशी पर्यटक आ गए. बड़े-बड़े कैमरों के साथ. वे भी हनुमान मंदिर की तरफ जा रहे थे. मैं भी उनके पीछे चल पड़ा. वो रास्ता एक बड़े-से आँगन से हो कर जाता था, जिसके दोनों तरफ गुफ़ाएँ बनीं हुईं थीं. मेरे पुरोहित ने बताया था कि वर्तमान का वो आँगन पूर्व-काल में गुफ़ा ही था, जिसकी छत कालांतर में गिर चुकी थी. अगर वह गुफा का हिस्सा था, तब तो एक जमाने में वह गुफा बहुत-ही विशाल रही होगी. खैर आँगन से गुजर कर हम हनुमान-मंदिर पहुँचे और वहां दर्शन किया. मंदिर एक गुफा में बना हुआ था. कोई ज्यादा लोग नहीं थे. वहां से तुरंत ही सभी निकल पड़े और फिर गणेश मंदिर तक आये. वह नजदीक ही था. वह भी एक गुफा में बना हुआ था.

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मुंबई की गुफाएँ – मंडपेश्वर और महाकाली

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यह भी कहा जाता है कि जब-जब शासन बदला, तब-तब इस गुफा का विभिन्न प्रकार से उपयोग किया गया. कभी तो यहाँ सैनिकों के टुकड़ियाँ निवास करती थीं, तो कभी शरणार्थी-गण. यह भी समझा जाता है कि प्रत्येक शासन काल में यह गुफा उजड़ी और फिर नए सिरे से बसी. लोग यह भी मानतें हैं कि विश्व युद्ध के समय भी अंग्रेज सैन्य-बल यहाँ बसा हुआ था. इनका यह मतलब निकलता है कि मंडपेश्वर गुफाएं हमेशा से लोगों द्वारा आबादित रहीं हैं.

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संजय गाँधी राष्ट्रीय उद्यान, मुंबई की पदयात्रा – “कान्हेरी गुफा”

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पर एक बात थी. कान्हेरी पहाड़ का वह स्थान बिलकुल वीरान था. इतना वीरान कि गुफाओं के अन्दर अकेले जाने में ऐसा महसूस हो कि कोई वहां पहले से मौजूद है, जो आपको निरंतर देख रहा है. उस वीरानी में मन में कई ख़याल आते हैं. जैसे कि क्या वहां जाने वाले का कोई सम्बन्ध पश्चात काल में उस गुफा से था और उसी सम्बन्ध के सहारे वह इस जीवन में भी वहां लौट कर आया हो? उस अंतिम गुफा में बैठ कर मैंने अपनी एक कविता का प्रथम अन्तरा लिखा. इस कविता के दूसरे अंतरे बाद में मुंबई के अन्य गुफाओं की यात्रा में पूर्ण हुए.

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कृष्णागिरी उपवन, संजय गाँधी राष्ट्रीय उद्यान- मुंबई पदयात्रा

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परन्तु मुझे आकर्षित किया उनके केलों ने. खूब सुन्दर और पुष्ट केले थे. मुझे केले खरीदता देख कर एक स्त्री ने मुझे समझाया कि मैं खीरे ले लूं और केले छोड़ दूँ. पर मैं कहाँ मानने वाला था. बस जैसे ही मैंने केले ख़रीदे, वृक्षों की डालों से तेजी-से उतर कर करीबन २०-२५ बंदरों ने मुझे घेर लिया. घबरा कर मैंने केले वहीँ जमीन पर फेंके, जो क्षण-भर में ही बंदरों द्वारा लूट लिए गए. अब उस डंडे से लैस व्यक्ति ने बंदरों को भगाने के लिए डंडा भाजना शुरू किया. बन्दर भाग गए. अब यह तो नहीं पता कि डंडे से भागे या केले चट कर के भागे. मैंने उन दोनों स्त्रियों को समझाने की कोशिश की कि जब यहाँ बंदरों का उत्पात है तो केले बेचते ही क्यों हो. दोनों स्त्रियाँ मुस्कुरायीं क्योंकि आज उन्हें एक और शहरी आदमी मिला था, जो जंगल में बिना देखे चलता था.

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विश्व विपासना पैगोडा, मुंबई की यात्रा

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सुरक्षा-जाँच वाले कमरे की छत से जो रौशनी की बल्ब्स लटक रहे थे, उनकी डिजाईन देखने योग्य थी. जाँच के पश्चात पैगोडा की निचली मंजिल पर पहुंचे, जहाँ देखने के लिए कई स्थल थे. सीढ़ी के दोनों तरफ कलात्मक चबूतरे थे. एक चबूतरे पर बड़ा-सा घंटा लिए हुए मनुष्यों की प्रतिमाएं थीं और दुसरे चबूतरे पर घरियाल लिए हुए मनुष्यों की प्रतिमाएं थीं. इसलिए पहले को Bell-tower और दुसरे को Gong-tower कहा जाता था. यह दोनों स्थल लोगों में बहुत प्रिय थे क्योंकि इन पर चढ़ना मना नहीं था. लोग इन पर चढ़ कर अपनी सेल्फी ले सकते थे और साथ ही इन्हें बजा भी सकते थे.

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हाजी अली दरगाह का बाज़ार , मुम्बई

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“बालू-शाही”, “गुड़पारा” तथा “बूंदी के लड्डू” भी दिखे. इनमें गुड़पारा ही विशेष था. बालूशाही और बूंदी के लड्डू तो अब तक जाने कितनी बार और कितने जगहों पर खा चुका था कि अब वहां चखने में तो कोई दिलचस्पी थी नहीं. दिमाग तो तब भी शकरपारा में ही दौड़ रहा था. आखिर इतना शक्कर और गुड़ इस प्रदेश में आता कहाँ से है? याद करने की कोशिश की तो याद आया शिर्डी से शनि सिग्नापुर का वो रास्ता, जिसके दोनों तरफ ईख के बड़े बड़े खेत देखे थे. गाँव वालों ने सडकों के दोनों तरफ ईख-के-रस की दुकानें लगायीं थीं. हर दुकान का नाम चाहे कुछ भी हो, पर टाइटल एक ही था..”रसवंती”.

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For long time I was thinking of visiting Mumbai properly. It isn’t that I haven’t been to Mumbai but it was mostly a day…

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Daulatabad Fort – Maharashtra Yatra (Part 10)

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Aurangzeb funded his resting place by knitting caps and copying the Qu’ran, during the last years of his life, works which he sold anonymously in the market place. Here are also buried Azam Shah, Aurangzeb’s son, Nizam-ul-Mulk Asaf Jah, the founder of the Hyderabad dynasty, his second son Nasir Jang, Nizare Shah, king of Ahmednagar, Tana Shah, last of the Golkonda kings and a host of minor celebrities.

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Shani Shingnapur : The Humble Abode of Shani Dev, the Lord of Justice

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Shani Shingnapur is perhaps the most popular place for all Shani Dev devotees. Shignapur is situated at a distance of 6 kms from Ghodegaon on Aurangabad-Ahmednagar highway. Its distance from Aurangabad is 84 kms, 75 km from Shirdi and from Ahmednagar it is 35 kms. From Ghodegaon, there is a motorable tar road up to the idol of Shri Shaneshwar and is open in all the seasons.

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