Amarnath Yatra – Jammu to Baltal base Camp

सुबह 3:30 बजे अलार्म बजा। मैंने शुशील को उठाया और उसे राजू के बेटे तनु के साथ दोबारा बस की टिकट लेने यात्री निवास भेज दिया उनके जाते ही मैं नहाने के लिए चला गया। थोड़ी देर बाद ही सुशील का फ़ोन आया और उसने बताया की बसें नहीं आई और टिकट नहीं मिल रही है। मैंने उसे कहा की तुम बाहर से कोई प्राइवेट गाड़ी पता करो और 6 सीट बुक करवा दो मैं भी थोड़ी देर में वहीँ आ रहा हूँ। थोड़ी देर बाद सुशील का फिर फ़ोन आया और उसने बताया की उसने एक मिनी बस में सीटें बुक करवा दी हैं और वो वापिस कमरे पर आ रहा है । सरकारी बस का किराया 510 रुपये था जबकि यहाँ 650 रुपये। हमें 6:30 पर आने को कहा गया। ये सभी प्राइवेट गाड़ियां ,सरकारी काफिला निकलने के बाद ही चलती हैं और यात्री निवास से सरकारी काफिला 5 बजे निकल जाता है। सरकारी काफ़िला सुरक्षा बालों की निगरानी में चलता है जबकि प्राइवेट वाहन अपनी मर्जी से चलते हैं।

5:30 तक हम सब लोग तैयार हो चुके थे और कमरा छोड़कर सब लोग 6 बजे मुख्य चौराहे पर आ गए जहाँ से सभी प्राइवेट छोटी बसें और जीपें चलती हैं। हम लोग उस टूर ऑपरेटर के पास गए जहाँ से सीटें बुक करवाई थी। उसने सामने कड़ी एक मिनी बस की तरफ इशारा करके कहा उसमे बैठ जाओ। हमने पुछा यह बताओ बस चलेगी कब ? उसने कहा जब भर जाएगी तो चल पड़ेगी। अभी दस सीटें भरी हैं 12 ख़ाली हैं। हमें लगा की इसका जाना तो मुश्किल है क्योंकि बालटाल की सवारी बहुत कम थी अधिकतर लोग पहलगाम जाने वाले थे। हमने वहां टाइम खराब करने की बजाय दूसरे टूर ऑपरेटरों से पता करना शुरू कर दिया। मुझे कुछ आशंका हो रही थी की कहीं हमारा आज का दिन बेकार न चला जाय । एक बोलेरो वाले से बात की उसने एक हजार रूपए एक सवारी के मांगे और साथ में यह शर्त कि पूरी भरेगी तो जायेंगे। उससे मोलभाव किया 800 रूपए एक सवारी का तय हो गया। बाकि तीन सवारी उसने एक हजार रूपए में ही बिठाई। थोड़ा तनाव दूर हुआ। ठीक 7:30 बजे हमारी गाड़ी जम्मू से चल दी।यहाँ , भगवती नगर से बालटाल व पहलगाम के लिए प्राइवेट गाड़ियां 8-9 बजे तक मिलती रहती हैं। यदि हम कल सुबह की ट्रैन से आने की बजाय रात की ट्रैन से भी आते तो सुबह 5-6 बजे तक यहाँ आराम से पहुँच जाते और हमारा एक दिन बच सकता था। चलो एक चीज नयी पता चली ,अगली बार रात की ट्रैन से ही आएंगे।

जम्मू से उधमपुर के बीच सड़क को चार लेन बनाया जा रहा है। 65 किलोमीटर में से लगभग 50 किलोमीटर पर काम पूरा हो चूका है। शानदार मार्ग बना है इस पर चलते हुए मालूम ही नहीं होता की पहाड़ी रास्ता है। गाड़ियां आराम से 80 की स्पीड से चलती हैं। लेकिन बीच -२ में अभी पुराना रास्ता भी है जिस कारण लगातार स्पीड नहीं बन पाती। उधमपुर हम 9:30 से पहले ही पहुंच चुके थे। वहां एक जगह रुक कर गाड़ी की टंकी फुल करवाई गयी फिर कूद ,पटनीटॉप होते हुए नॉनस्टॉप बटोट पहुंचे। बटोट के पास हमने सरकारी काफिले को क्रॉस कर लिया। हमारी गाड़ी में हमारे अलावा दो नवयुवक जम्मू के पास के थे और पहली बार अमरनाथ जा रहे थे, तीसरे यात्री जो थोड़े बुज़र्ग थे ,असम से आये थे।

जम्मू से श्रीनगर के बीच पटनीटॉप सबसे ऊंचाई पर है। उधमपुर से चढ़ाई शुरू होती है और पटनीटॉप तक खूब चढ़ाई है। पटनीटॉप पहुँचने से पहले ही ठंडी हवाओं से यह अहसास हो जाता है कि हम टॉप पर पहुँचने वाले हैं। कूद के बाद से ही ऐसा शुरू हो जाता है। सड़क के दोनों तरफ लगे लम्बे -लम्बे देवदार के पेड़ों से प्राकृतिक सुंदरता में चार चाँद लग जाते हैं। बादल आपसे बस एक हाथ दूर ही होते हैं। पटनीटॉप पहुँचने के एक दम बाद उतराई शुरू हो जाती है जो बटोट तक चलती है।
जम्मू से आगे पुरे रास्ते में जगह-जगह अमरनाथ यात्रियों के लिए लंगर लगे हुए हैं। खाने-पीने की कोई समस्या नहीं। क्योंकि हम लोग नाश्ता करके नहीं आये थे और अब तक हमें काफी भूख लग गयी थी। हमने गाड़ी वाले से कहा की किसी लंगर पर गाड़ी रोक दो, नाश्ता करना है। ड्राइवर ने बटोट से थोड़ा आगे एक लंगर पर गाड़ी रोक दी। लंगर राजपुरा के पास का था। लंगर में डोसा, पानी पूरी, आइस क्रीम, कुल्फी, कोल्ड ड्रिंक, जलजीरा, दाल चावल, रोटी सब्ज़ी, पॉपकॉर्न, हलवा, खीर और गरमा गरम चाय सब कुछ मिल रहा था। जितना चाहे प्यार से खाओ पर झूठा बचाना सख्त मना है। खाओ मन भर, न छोडो कण भर। वहां ड्राइवर सहित सभी लोगों ने नाश्ता किया, गर्मागर्म चाय पी और पौने घंटे बाद ठीक 12 बजे दोबारा से यात्रा शुरू कर दी। इसी भंडारे में हमने नाश्ता किया थे। क़ुछ तस्वीरें:

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बटोट के बाद रामबन पहुँचने से पहले ही चिनाब नदी सड़क के साथ साथ , दायीं तरफ, काफी गहरी घाटी बना कर चलती है। रामबन पहुँच कर चिनाब नदी को एक पुल से क्रॉस करने के बाद सड़क और नदी अपनी साइड बदल लेते हैं यानि अब चिनाब नदी सड़क के बायीं तरफ बहने लगती है। चिनाब नदी काफी गहरी और तेज बहने वाली नदी है।

चिनाब नदी

चिनाब नदी

चिनाब नदी

चिनाब नदी

बनिहाल रेलवे - दायीं तरफ नयी बनी 13 किलोमीटर लम्बी सुरंग का मुख दिख रहा है

बनिहाल रेलवे – दायीं तरफ नयी बनी 13 किलोमीटर लम्बी सुरंग का मुख दिख रहा है

बटोट से आगे रामबन ,रामसु, बनिहाल होते हुए ठीक तीन बजे जवाहर सुरंग के पास पहुँच गए। यहाँ 8-10 लंगर एक साथ हैं और आने जाने वाली अधिकतर सभी गाड़ियां यहाँ खाने-पीने के लिए रुकती है। यहाँ काफी भीड़ रहती है क्योंकि यहाँ से आगे रास्ते में लंगर नहीं है। सिर्फ मणिगाम, बालटाल या पहलगाम यात्री कैंप में ही हैं। यहाँ रुकते ही हमसे ड्राइवर ने कहा की आप लोग खाओ- पियो मैं थोड़ा सोऊंगा। उसके सोने के कारण यहाँ एक घंटा लग गया। ठीक चार बजे यहाँ से चले।

जवाहर सुरंग के पास लगे लंगरों का नजारा

जवाहर सुरंग के पास लगे लंगरों का नजारा

जवाहर सुरंग के पास लगे लंगरों का नजारा

जवाहर सुरंग के पास लगे लंगरों का नजारा

जवाहर सुरंग के आस पास के पहाड़ों का नजारा

जवाहर सुरंग के आस पास के पहाड़ों का नजारा

जवाहर सुरंग के आस पास के पहाड़ों का नजारा

जवाहर सुरंग के आस पास के पहाड़ों का नजारा

यहाँ से श्रीनगर 100 किलोमीटर दूर है। मतलब कि किसी भी हालत में 6 बजे से पहले श्रीनगर नहीं पहुँच सकते थे। श्रीनगर से 30 किलोमीटर आगे मणिगाम यात्री कैंप है। जहाँ से किसी भी गाड़ी को 6 बजे के बाद बालटाल की तरफ नहीं जाने दिया जाता। सभी को वहीँ रुकना पड़ता है। वहां ठहरने के लिए टेंट किराये पर मिलते हैं और खाने पिने की लिए 4-5 लंगर हैं । सही लंगरों में खाना स्वादिष्ट ,साफ सुधरा व् विभिन्न प्रकार का मिलता है। पंजाबी ,गुजराती व् दक्षिण भारतीय व्यंजन मिल जाते हैं।

“यहाँ मणिगाम कैंप में रोकने का मुख्य कारण यात्रियों की सुरक्षा है क्योंकि यहाँ से लेट चलकर अँधेरे होने से पहले किसी भी हालत में बालटाल पहुंचना मुश्किल है और रात के समय पहाड़ी पर ड्राइविंग काफी मुश्किल है , दूसरा कारण रात के समय सड़क पर सुरक्षा बलों की गश्त बंद हो जाती है और यह रास्ता काफी संवेदनशील इलाकों से होकर गुजरता है जैसे गांदरबल ,कंगन, गुंड आदि और जरा सा भी तनाव हो तो इन इलाकों में यात्रियों की गाड़ियों पर पथराव होना आम बात है। पिछले साल वापसी में हमारी बस पर इन्ही इलाकों में तीन पत्थर फेंके गए थे लेकिन बचाव हो गया था इसीलिए यात्रियों को जोखिम में डालने की बजाय यहाँ मणिगाम कैंप में ठहरा दिया जाता है।”

जवाहर सुरंग पार करते ही घाटी का पहला नजारा

जवाहर सुरंग पार करते ही घाटी का पहला नजारा

हम श्रीनगर 6 बजे पहुंचे और हमें मनीगांव पहुँचते -पहुँचते 7:30 बज गए। पुलिस वालों ने इशारा कर गाड़ी कैंप में ले जाने को कहा और गेट के पास पहुँचते ही ड्राइवर ने गाड़ी फिर सीधी कर ली। पुलिस वालों ने गाड़ी रोक ली और ड्राइवर को गुस्सा करने लगे। ड्राइवर बोला, साहेब, इनकी सोनमर्ग के होटल में बुकिंग है यह रात वहीँ रुकेंगे। पुलिस वालों ने हमसे कन्फर्म किया, हमने भी हाँ कह दी और उसने हमें जाने दिया। यहाँ से बालटाल 70 किलोमीटर की दुरी पर है और रास्ता ज्यादातर पहाड़ी है। यानि की कम से कम अढ़ाई घंटे लगने थे। जहाँ एक तरफ इस समय जाना रिस्की था वहीँ दूसरी तरफ सुबह समय की बचत भी थी। सुबह अधिक वाहन होने से बहुत जाम लग जाता है और इस समय सड़क पर कोई गाड़ी नहीं थी सिर्फ दो चार लोकल गाड़ियों को छोड़ कर।
मणिगाम से आगे निकलते ही ड्राइवर ने गाड़ी एक चाय की दुकान पर रोक ली। सबने वहां चाय पी और गर्मागर्म पकोड़े खाए। जम्मू पहुँचने के बाद पहली बार खाने-पिने पर कुछ जेब खर्च किया। चाय पकोड़े बढ़िया थे। फिर चले और 10 बजे सोनमर्ग पहुँच गए, यहाँ भी एक बैरियर है। पुलिस वाले ने फिर गाड़ी रोक ली और कहा इस समय बालटाल जा रहे हो , गाड़ी यहीं लगाओ ड्राइवर ने उसकी कुछ जेब गरम की और उसने हमें आगे जाने दिया। यहाँ से बालटाल 14 किलोमीटर दूर है। अभी तक हमारी सारी यात्रा जम्मू -श्रीनगर- लेह मार्ग पर ही थी।
आगे एक जगह मुख्य मार्ग से दायीं तरफ बालटाल के लिए रास्ता मुड़ता है वहां फौजियों ने गाड़ी रोक ली , बोले कहाँ जा रहे हो, हमने बताया बालटाल। बोले- तुम्हे मणिग्राम से इतनी लेट आने कैसे दिया। मैंने जबाब दिया सर वहां से तो पांच बजे ही निकल गए थे लेकिन रास्ते में गाड़ी ख़राब होने से बहुत समय ख़राब हो गया इसीलिए लेट हो गए हैं। वो बोले चलो ठीक है अपने-२ पंजीकरण दिखाओ। हमने बैग से निकालकर दिखा दिए लेकिन असम वाले बाबू को पंजीकरण मिल नहीं रहा था। कहीं संभाल कर रख दिया था। फौजी बोला क्यों ड्रामा करते हो बोल दो कि नहीं है। असम वाले बाबू बोले – असम से आ रहा हूँ क्या बिना पंजीकरण के आऊंगा। थोड़ी देर बाद उसका फॉर्म मिल गया और हम फिर से अपनी मंजिल की तरफ चल पड़े। बालटाल पहुंचते ही फिर से चेक पोस्ट पर गाड़ी को रुकवा लिया और फिर ड्राइवर की झाड पड़ी क्योँ अपनी और यात्रियों की जान जोखिम में डालते हो , सारी रात गाड़ी चलाने का शौक है. यहाँ भी गाड़ी ख़राब होने का बहाना लगाया और आखिरकार रात 10:30 बजे हम बालटाल पहुँच गए। वहां पहुँच कर हमारे सारे सामान की तलाशी ली गयी और हम कैंप में प्रवेश कर गए। बहुत से टेंट वाले बुलाने लगे।
यहाँ बाकि तीन लोग तो किसी टेंट में चले गए लेकिन हम लोग थोड़ा आगे आ गए। हमने सलाह की कि अब कया करें ? टेंट में ठहरें या अपने लंगर की तरफ चलें। यहाँ मैं सभी पाठकों को बताना चाहूँगा की हम लोग बर्फानी सेवा मंडल ,कैथल वालों के पिछले 15 सालों से मेंबर है। उनका भंडारा दोमेल में लगता है जो बालटाल बस स्टैंड से दो किलोमीटर आगे है। हम इसी दुविधा में थे कि अपने भंडारे पर चलें या टेंट में ठहरें। वैसे में हमेशा भंडारे पर रुकना पसंद करता हूँ। इसके कुछ कारण हैं एक तो जगह साफ सुथरी होती है , बिस्तर साफ मिलते हैं , शौचालय व स्नानघर साथ ही होते हैं , गरम पानी की सुविधा उपलब्ध रहती है और अपनेपन का एहसास भी होता है। जबकि टेंट में ऐसी कोई सुविधा नहीं होती। बिस्तर काफी गंदे होते हैं।
बालटाल से दोमेल तक बहुत भण्डारे हैं। हमने फ़ैसला किया की दोमेल चलते हैं ,रास्ते में अन्य भण्डारे में पता कर लेंगे यदि जगह मिल गयी तो ठीक है नहीं तो चलते -२ अपने भण्डारे पर पहुँच जायेंगे। लेकिन वहां जाने की नौबत नहीं आई , हमने जिस पहले भण्डारे में पता किया उन्होंने प्यार से बुलाकर कहा आओ पहले खाना खाओ अभी बिस्तर लगा देते हैं ,फिर आराम से सो जाना। भंडारा पंजाब के मलोट शहर का था। हमने खाना खाया और बिस्तर पर दो-दो कम्बल लेकर सो गए।

श्रीनगर और बालटाल के बीच के रास्ते की कुछ तस्वीरें:

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20 Comments

  • MUNESH MISHRA says:

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  • Nandan Jha says:

    For a seasoned traveler like you, I guess it was not that hard but for someone who is new to this whole process, it would have meant waiting for more time at Jammu and then spending another night at the Manigram. May be one should start by 6 from Jammu so that one can cross Srinagar in time.

    Good to read that most of the Udhampur highway is done. When is the train connection coming ?

  • Nandan Jee, as long as we were using our own vehicle or hired one in previous years , we never stop at Manigram and cross it before 5 PM but the SRTC buses ply too slow to cross Manigram before cut off time.
    Rail link between Banihal & Barmula via Anantnag and Srinagar is already working. Missing link between Katra to Banihal is expected to start in 2016. Then it will be very easy to reach Srinagar with comfort.

  • Arun says:

    Another great post from your side to all the ghumakkars. Its shocking to know that the defense staff has easily accepted Bribe and violated the rules by allowing all of you to travel late night on such a risky hilly area, that’s why we are not coming out from the dark well of corruption…..

    Thanks for sharing.

    Jai Shiv Shambhu…..
    Arun

  • Thanks Arun Ji,
    The person who took bribe from driver was from JK police not from Defence . It is regular practice in all state . He was not supposed to stop us before Baltal , he did it intentionally for some earning.

  • Dear Naresh,

    Another good one, surely is going to help the future pilgrims, also very nice pics. Yes, I have seen these open practice by J&K Police, perhaps the worst police in India, both in terms of harassing and taking bribe.

    Will certainly read your next log in this series too.

    Thanks.

  • Thanks Anupam ji for sparing some time to read the post and motivating me by your encouraging words.

  • SilentSoul says:

    great going… and hats off to those Langar people, who spend their hard money to comfort others.

  • Stone says:

    Sehgal Sahab, got your email about the new post and I read it as first thing in the morning.
    You’re such an inspirational person, hats off to your devotion and dedication.

    You mentioned about your association with one of bhandara group, so a quick question (kind of extension of SS sir’s comment) , who are these people serving at these bhandaras? Are they professionals (cooks etc) or normal people doing ‘sewa’ out of devotion?

    Thanks a lot for sharing such an informative series with us once again.
    Now looking forward to next post.

  • Thanks Mr. Stone for your quick response and encouraging comment.
    In every langar , there is a mixture of both as you asked . Cooks are always professionals and they along with other helpers are hired on payment for Yatra period. But management people and few others do it this sewa just for devotion.
    Our contribution is just to collect donation from near and dear and send it to management but I have a wish to do sewa for 8-10 days in our langar. Last year I did it for two days but for another reason as it was strike in J&K and we were not able to move out from Baltal
    Jai bhole ki

  • Mukesh Bhalse says:

    Naresh ji,

    Very detailed narration and interesting too. Pictures are really great. I really appreciate the people who organize bhandaras for the service of yatries, I recall a great saying which perfectly fits here – Helping hands are a thousand times better than praying lips.

    Thanks for sharing with us such a beautiful post.

  • Getting appreciation from a Senior writer and adherent Shiv bhakat is priceless.
    Thanks Mukesh jee for your nice words.

  • Anil Sharma says:

    Naresh jee once again good post. Pictures are very beautiful. Waiting for the next post. Thanks for sharing.

  • h kubavat says:

    superb……..

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