वज्रेश्वरी के गर्म पानी के स्रोतों का आश्चर्य

कौन जान सकता है कि धरती के अन्दर क्या पक रहा है? पर कहीं ना कहीं तो कोई ज्वाला जरुर भड़क रही होगी, जो धरती की सतह को फोड़ कर कभी ज्वालामुखी से पिघले हुए मैग्मा बन कर निकलती है तो कभी गर्म पानी की सतत बहने वाली धारा के रूप में बाहर आ कर हमें आश्चर्यचकित कर देती है. मुंबई महानगर के बिलकुल नजदीक ऐसे गर्म पानी के सोतों को देखने की ख्वाहिश ले कर मैं निकला था. गणेशपुरी के सोतों के देखने के बाद मैं वहाँ से लगभग २ किलोमीटर दूर स्थित वज्रेश्वरी नामक शहर में आ गया. यह एक छोटा शहर है, जो मन्दाकिनी नामक पर्वत की तलहटी में बसा हुआ है. मन्दाकिनी पर्वत के उठान के बारे में कहा जाता है कि वह पश्चात् काल में हुई किसी ज्वालामुखी विस्फोट के कारण बना था. इस शहर के ठीक मुख्य चौक पर विशाल किलेनुमा “वज्रेश्वरी योगिनी देवी का मंदिर” है. इस शहर का नामकरण यहाँ की अधिष्ठात्री देवी वज्रेश्वरी के नाम पर हुआ है. कई स्थानीय निवासियों ने, जिनके मकान या जमीन मंदिर के निकट हैं, वहाँ गाड़ी पार्किंग का व्यवसाय खोल रखा है, जो उनकी आमदनी का एक बड़ा स्रोत है. ऐसे ही एक पार्किंग में गाड़ी खड़ी कर मैं वज्रेश्वरी मंदिर के दर्शन करने के लिए चला.

वज्रेश्वरी देवी का मंदिर के सामने का दृश्य

वज्रेश्वरी देवी का मंदिर के सामने का दृश्य

मंदिर के सामने फूल-माला, साड़ी-ओढ़नी, पूजन सामग्री इत्यादि की दुकानें लगी हैं. वहीँ पर आस-पास के इलाके में जाने के लिए ऑटोरिक्शा और तांगे भी मिलते हैं. काफी चहल-पहल बनी रहती है. चप्पलें इत्यादि रखने के लिए आमतौर पर फूल-माला बेचने वाले दुकानदार सहयोग करते हैं, क्योंकि ऐसा उनके व्यवसाय के लिए भी फायदेमंद होता है. पर मंदिर प्रबंधन ने मुख्य दरवाज़े को पार करने के बाद किनारे पर चप्पल-जूता स्टैंड भी बना रखा है. मंदिर का मुख्य दरवाज़ा ऊँचाई पर है, जहाँ तक जाने के लिए ५२ सीढियाँ चढ़नी पड़ती हैं. कई श्रद्धालु-भक्त इन सीढ़ियों पर चढ़ते समय प्रत्येक कदम पर कपूर की बत्तियां जलाते हैं. ऐसा वे तब करते हैं, जब उनकी कोई मन्नत पूरी हो जाती है. मानसून में तो सीढियाँ भींगी और ठंडी थीं, परन्तु गर्मियों में यह धूप से तपती रहती हैं. लगभग आधी ऊँचाई सीढियाँ चढ़ने पर एक सुनहरे रंग का कछुए की प्रतिमा लगी है, जिसे भगवान् के कूर्म-अवतार का प्रतीक माना जाता है.

मंदिर के गेट पर अंकित मंदिर का इतिहास

मंदिर के गेट पर अंकित मंदिर का इतिहास

मंदिर के मुख्य दरवाज़े के ऊपर एक नक्कारखाना है, जहाँ से पश्चात् काल में संगीतकार धुनें बजाते होंगे. बाहर से यह मंदिर एक छोटे किले के रूप में दीखता है. इस किला-रुपी मंदिर की कहानी मराठा-पोर्तुगीस युद्ध से जुड़ी हुई है. १७३९ के पहले पोर्तुगीस शासक वसई के किले से शासन करते थे. लोगों के बीच उनकी क्रूरता की कहानियाँ थीं. तब पेशवा बाजी राव-प्रथम के छोटे भाई चीमा जी अप्पा ने वसई किले को फ़तह करने के लिए डेरा डाला. लगभग तीन वर्षों के युद्ध के बाद भी किला फ़तह नहीं हो सका. तब चीमा जी अप्पा ने देवी वज्रेश्वरी का पूजन किया. लोकोक्ति है कि पूजन के बाद देवी ने स्वप्न में उनको वासी किले को जीतने का तरीका बताया. बताये हुए तरीके से युद्ध करने से वसई किला मराठों ने जीत लिया और पोर्तुगिसों को खदेड़ दिया. जीत के बाद चीमा जी अप्पा ने वज्रेश्वरी देवी का मंदिर बनवाया. मंदिर के मुख्य दरवाज़े पर उनकी वीरता की कहानी सुनहरे अक्षरों में आज भी अंकित है.

मंदिर परिसर से मंदिर का दृश्य

मंदिर परिसर से मंदिर का दृश्य

मुख्य दरवाज़े को पार कर और खम्बे-युक्त मंडप से हो कर मैं मुख्य मंदिर के गर्भ-गृह तक पहुँच गया. मुख्य मंदिर पत्थरों से बना था, जबकि खम्बा-युक्त मंडप में सीमेंट की बनावट लग रही ठी. मुख्य मंदिर में गर्भ-गृह के सामने भी गोलाकार गुम्बद वाला एक चौकोर मंडप था, जिसमें झाड़-फानूस लटक रहे थे. इस मंडप में पत्थरों से बने तीन नक्काशीदार कलात्मक दरवाज़े थे, जिसमें नारद मुनि की प्रतिमा मुख्य मानी जाती है. गर्भ-गृह के दरवाज़े के दोनों तरफ़ जय-विजय की प्रतिमा थी. जय-विजय को भगवान् विष्णु का अंगरक्षक/दरबान माना जाता है.

मंदिर का मंडप

मंदिर का मंडप

मंदिर के गर्भ-गृह में वज्रेश्वरी देवी की मूर्ति है, जिसमें उनके हाथों में तलवार और गदा है. उनके साथ रेणुका देवी की भी मूर्ति है, जो भगवान् परशुराम की माता थीं. तीसरी प्रतिमा सप्त्श्रींगी देवी की है, जो महिषासुर-मर्दिनी थीं. वहीँ महालक्ष्मी का भी विग्रह है. वज्रेश्वरी देवी की कहानी वज्र नामक अस्त्र से सम्बंधित है. कहानी के अनुसार हजारों वर्ष पूर्व, इस इलाक़े में, कल्लिका नामक एक राक्षस रहता था, जिसके दुराचरण से सभी ऋषि-मुनि परेशान थे. उसकी यातनाओं से परेशान हो कर महर्षि वशिष्ठ ने एक यज्ञ किया, जिससे देवी प्रसन्न हो गयीं. पर उसी यज्ञ में देवताओं के राजा इंद्र को आहुति नहीं दी गई, जिसके कारण उन्होंने क्रुद्ध हो कर अपने “वज्र” नामक अस्त्र से प्रहार कर दिया. वज्र को आता देख कर सभी देवी की शरण में आ गए. उन्हें अपनी शरण में ले कर देवी ने सभी की रक्षा की और साथ में काल्लिका राक्षस को भी मार डाला. एक दूसरी कहानी के अनुसार इंद्र ने अपना वज्र कल्लिका राक्षस पर चलाया था. जब राक्षस ने वज्र को भी निष्क्रिय करने की कोशिश की, तो देवी ने वज्र में समां कर कल्लिका का वध कर दिया. इसी वजह से इन देवी का नाम वज्रेश्वरी प्रसिद्ध हुआ. वहाँ फोटोग्राफी निषिद्ध थी. पर मंदिर में शांति का अहसास होता था. लोगों के आने-जाने का सिलसिला सतत चलता रहता था. दूर-दूर से लोग वहाँ आ कर पूजन स्वरुप फूल और नारियल चढ़ाते थे. कुछ लोग यहाँ साड़ियाँ भी चढ़ाते हैं, जो बाद में मंदिर प्रांगन में श्रधालुओं के लिए रखी रहती हैं.

पूजन का समय-सारणी

पूजन का समय-सारणी

मुख्य मंदिर के बाहर प्रांगन में कपिलेश्वर महादेव मंदिर, दत्त मंदिर, हनुमान मंदिर इत्यादि कुछ और मंदिर हैं. पीपल के एक वृक्ष की भी पूजा होती है, क्योंकि उसका आकार गणेश मूर्ति से मिलता-जुलता है. कुछ महत्वपूर्ण लोगों की समाधियाँ भी उसी प्रांगन में हैं, जिन्होंने मंदिर के बनने में अपनी भूमिका अदा की थी. मुख्य मंदिर के बगल से सीढ़ियों वाला एक रास्ता उस पर्वत की चोटी पर जाता है. लगभग १५० सीढियाँ चढ़ कर चोटी पर मैं भी गया. वहाँ से आस-पास का इलाक़ा बड़ा मनभावन दीखता है. चोटी पर एक बड़ा मंडप भी बना हुआ है, जिसमें १७वीं शताब्दी के एक संत की समाधी है. उस मंडप में बैठ कर मैंने अपनी थकान दूर कर ली और फिर नीचे उतर गया क्योंकि मंदिर देखने के पश्चात् मुझे गर्म पानी के सोतों को देखने की उत्सुकता थी.

चोटी पर स्थित समाधि - मंडप
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चोटी पर स्थित समाधि – मंडप

मंदिर की ५२ सीढ़ियों से नीचे उतरने के बाद मुख्य चौराहे से अक्लोली गाँव जाने का रास्ता खुलता है. अक्लोली गाँव वहाँ से लगभग १.५ किलोमीटर की दूरी पर था. वहाँ जाने के लिए महाराष्ट्र ट्रांसपोर्ट कारपोरेशन की बस, ऑटोरिक्शा अथवा घोड़ों द्वारा खींचे जाने वाले तांगे उपलब्ध थे. गाड़ी भी जा सकती थी. परन्तु मैंने पैदल-यात्रा करने का निश्चय किया. रास्ते में कुछ होटल भी हैं, जिससे यह जाहिर होता है कि गर्म कुंडों के कारण कई यात्री यहाँ आते होंगे. आश्चर्य तो तब हुआ जब इस छोटे से गाँव के रास्ते में एक वृधाश्रम और एक सनेटोरियम भी मिला. काफी दूर तक रास्ता तन्सा नदी के किनारे-किनारे चलता है. नदी और हरे-भरे खेत के बीच से चलने में बड़ा आनंद आ रहा था. मस्ती से चलते चलते मैं लगभग आधी दूरी भी तय कर ली थी. परन्तु एक तांगेवाला पीछे पड़ गया. उसके कई बार मनुहार करने के कारण मैंने अंतिम कुछ दूरी उसके तांगे पर सवार हो कर पूरी की. हालाँकि सौदा मेरे घाटे का रहा क्योंकि सिर्फ आधी दूरी तय करने पर भी पूरी दूरी के पंद्रह रुपये ही देने पड़े.

तांगे की यात्रा

तांगे की यात्रा

तांगे ने मुझे अक्लोली गाँव के मुख्य चौराहे पर उतार दिया, वहाँ से तन्सा नदी लगभग १०० मीटर मात्र की दूरी पर थी. नदी के तट पर बसे हुए गाँव के कुछ परिवारों ने वहाँ टिन के छप्परों वाली छोटी-छोटी झोपड़ियाँ लगा रखीं थीं. उन झोपड़ियों में लोहे के पायों वाली बहुतेरी खाटें लगीं थीं ताकि आगंतुक परिवार वहाँ ठहर कर नदी में स्नान के पश्चात् कपड़े इत्यादि बदल सके. तट पर जाने के लिए उसी गाँव के मध्य से एक गलियारा खुला हुआ था, जिससे गुज़र कर मैं तन्सा नदी के तट पर आ गया. उस नदी के तट पर किसी अन्य मार्ग से ऑटोरिक्शा तक पहुँच जा सकता था. जिसकी वज़ह से ऑटोरिक्शा चालकों ने अपने-अपने ऑटोरिक्शा को नदी में ही उतार दिया था और उसकी धारा में उन्हें धो रहे थे. उसी नदी की धाराओं में कुछ कारें और कुछ मोटरसाइकिलें भी धुल रहीं थीं. ऐसे में प्रतीत होता है कि पर्यावरण की सुरक्षा का किसी को ध्यान ही नहीं था.

तन्सा नदी का एक दृश्य

तन्सा नदी का एक दृश्य

वहाँ पर असंख्य लोगों की भीड़ थी. किनारे पर जल का बहाव और ऊँचाई दोनों कम थे, जिसकी वज़ह से लोग नदी की धारा में कमर तक जा कर मस्ती से डुबकियाँ लगा रहे थे. एक-दूसरे पर जल के छीटें फेंकना, हंसी-मज़ाक करना, पानी के बीच अपनी फोटो खिंचवाना इत्यादि जल-क्रियाओं से लोग खुशियाँ मना रहे थे. तैरना जानने वाले लोग तो उस नदी के बीचो-बीच तैर रहे थे. कुछ स्त्रीयां नदी के तट पर बैठ कर अपनी-अपनी अंजुलियों में किनारे पर आई हुईं छोटी-छोटी मछलियों को पकड़ने की चेष्टा कर रहीं थीं. सम्पूर्ण वातावरण बच्चों की किलकारियों से, महिलाओं की खिलखिलाहट से और पुरुषों के मौज़ों से गुंजायमान था. ऐसा लगता था कि आसपास के गाँवों और शहरों से परिवार-जन उस दिन तन्सा नदी की धाराओं में अठखेलियाँ करने आये हुए थे.

तन्सा नदी-तट पर बने गर्म पानी के कुंड

तन्सा नदी-तट पर बने गर्म पानी के कुंड

नदी के तट पर सीमेंट से घेर कर चार कुंड भी बने हुए थे. इन कुंडों में गर्म पानी के स्रोत थे, जिनसे धरती के अन्दर से लगातार गर्म पानी निकलता रहता है. वैज्ञानिक ऐसा मानते हैं कि धरती के अन्दर ज्वालामुखी के प्रक्रियाओं द्वारा उत्पन्न चट्टानों में फँसी हुई जलधारा के धरती को किसी कमज़ोर स्थान पर फोड़ कर निकलने से इस प्रकार के गर्म स्रोतों का प्रादुर्भाव होता है. इस प्रकार के जल में सल्फ़र की मात्रा होती है, जो चर्म-रोग की समस्या से निज़ात देता है. कई लोग नदी के किनारे उन कुंडों में स्नान कर रहे थे. आश्चर्य था की एक तरफ़ नदी की ठंडी धारा बह रही थी और उसी के किनारे पर गर्म पानी का सोता भी था. मैं उन कुंडों के पास चला गया और अपने पैर गर्म पानी में डाले. पानी इतना गर्म था कि यदि सावधानी ना बरती जाए तो पैरों में फोले हो सकते हैं.

तन्सा नदी की धारा में निकले गर्म पानी के दो सोते

तन्सा नदी की धारा में निकले गर्म पानी के दो सोते

कुंड में स्नान कर रहे एक व्यक्ति ने मुझे बताया कि वहाँ कुल मिला कर सात सोतें हैं. चार सोते तो नदी के तट पर ही थे, जिनके ऊपर लोगों की सुविधा के लिए सीमेंट के कुंड बना दिए गए थे. अन्य तीन सोते बिलकुल नदी की धारा के बीच में स्थित थे. किनारे से देखने पर नदी की धारा के बीच में ही तीन अलग-अलग सीमेंट के कुंड बने हुए दीखते थे. यह कुंड गर्म पानी से सोतों के ऊपर बने थे. पर वास्तव में धरती के अन्दर से इन सोतों से गर्म पानी निकलता था और ऊपर से नदी की ठंडी धारा बहती थी. ऐसा आश्चर्य मैंने पहले कभी भी नहीं देखा था की नदी बह रही हो और उसी में गर्म पानी से सोते भी हों.

तन्सा नदी की बीच धारा में गर्म पानी का एक सोता

तन्सा नदी की बीच धारा में गर्म पानी का एक सोता

इनमें से एक कुंड तो बिलकुल नदी के मध्य में था, जहाँ सिर्फ़ तैराक ही जा सकते थे. पर जो कुंड नदी के किनारे से थोड़ी दूरी पर ही थे, उनमें सभी जा सकते थे. उनमें से एक कुंड महिलाओं ने अपने अधीन कर लिया था और दूसरे को पुरुषों ने. मैं भी नदी की धारा में चला गया. वहाँ पर पानी सिर्फ़ एड़ी भर था. पानी में चल कर मैं नज़दीक वाली दोनों कुंडों के समीप गया. जो कुंड पुरुषों के पास थे, उन पर चढ़ने से गर्म पानी का सोता दीखता था, जिसमें से भाप निकल रही थी. पैर डालने पर पानी की तेज गर्मी का अनुभव भी हुआ. अब यह आश्चर्य नहीं तो और क्या है कि नदी की ठंडी धाराओं के मध्य में धरती से गर्म पानी भी निकल रहा है. लोकोक्ति है कि जिन दानवों का देवी ने वध किया था, उनके गर्म रक्त की धारा इन सोतों से निकली थी, वही कालांतर में गर्म पानी के सोतों में परिवर्तित हो गई.

तन्सा नदी में भगवान् का जलाभिषेक

तन्सा नदी में भगवान् का जलाभिषेक

सोतों से थोड़ी ही दूरी पर नदी-तट पर लोगों के नदी-स्नान हेतु एक पक्का घाट भी बना हुआ है. उस दिन उस घाट पर स्वामीनारायण समुदाय के भक्त-जन आये हुए थे, जिनकी विशेष परंपरा के अनुसार भगवान् स्वामीनारायण का जलाभिषेक वहाँ सम्पन्न हो रहा था. खैर, मैं काफ़ी देर तक वहाँ खड़ा रह कर भगवान् के जलाभिषेक और तन्सा नदी पर स्थित उन सोतों को देख कर आस्था और क़ुदरत की इन करिश्माओं के बारे में सोच-सोच कर विस्मय करता रहा. अचानक ख्याल आया कि शाम ढलने के पहले मुंबई वापस भी तो पहुंचना था. बस पैदल चल कर वापस वज्रेश्वरी आया गया, जहाँ एक पार्किंग स्थल पर मेरी गाड़ी लगी हुई थी. अब यदि कोई ट्रेन से यहाँ आना चाहे तो उसे वसई या विरार स्टेशन पर उतरना होगा. वहाँ से ऑटो या बस की सवारी ले कर वज्रेश्वरी तक पहुंचा जा सकता है.

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