एक जिन्दा-दिल शहर मथुरा !!!

कोई शहर जिन्दा है, इसकी परख क्या हो? क्या कोई शहर अपनी इमारतों और सुविधायो के बल पर जिन्दा कहलाएगा?, या अपने निवासियों की जिन्दा-दिली के दम पर?, भई, अगर आप हमारी राय पूछो, हम तो उस शहर के निवासियों की जिन्दा-दिली को ही महत्व देंगे, जो तमाम दुश्वारियों को झेलते हुए भी, अपने शहर और अपने आप पर भी गर्व कर सकें| और अगर इस जिन्दा-दिली के साथ वो शहर, अपने खान-पान और तहज़ीब में भी बढिया हो, तो सोने पे सुहागा! इन कसोटियों पर कस कर देख लें, उत्तर-प्रदेश के अधिकांश शहर, देश भर के दूसरे शहरों से आप अव्वल पाएंगे, सड़क-बिजली-पानी और तमाम तरह की बुनियादी नागरिक सुविधाएँ, जिनमे शिक्षा, साफ़-सफाई, चिकित्सा-व्यवस्था और यातायात भी शामिल है…. सब भूल जाइये !!!, बस इस प्रदेश के शहर जिन्दा है तो अपने लोगों के कारण, अपने खान-पान के कारण और अपनी संस्कृति के कारण | हाँ, बीच-बीच में राजनेतिक उठा-पटक होती रहती है, कभी राम के नाम पर, कभी अम्बेडकर के नाम पर, तो कभी समाजवाद के नाम पर… सबकी राजनीतिक रोटियां सिंकती रहती हैं, दौर गुजरते रहते हैं, निज़ाम बदल जाते हैं, पर शहर, वो तो टिके रहते है, अपने लोगों से और अपने लोगों की जिजीविषा के बूते पर | और, फिर देश की रगों में रची-बसी गंगा-यमुनी तहजीब के अनुपम नज़ारे का एह्सास भी इसी प्रदेश के लोग ही तो पूरी संजीदगी से कराते हैं | तो बताईऐ फिर, उत्तर-प्रदेश के शहरों का, किन्ही अन्य राज्यों के शहरों से कोई मुकाबला हो सकता है ? कम से कम मैं तो ऐसा नही मानता…. वाकई में, इस प्रदेश के कई शहर आधुनिकता और परम्परा का अदभुत संगम नजर आते हैं, और निश्चित रूप से मथुरा भी ऐसा ही एक शहर है |

अभी पहाड़ों पर आई प्राकर्तिक या यूँ कहिये, प्राक्रतिक कम मानवीय ज्यादा, आपदा के कारण, जब हमारा किसी पर्वतीय षेत्र में जाना मुहाल हो गया, और बच्चों ने छुट्टियाँ समाप्त होने के ताने मारते-मारते जीना मुहाल कर दिया, तो हमने सोचा कि भले ही गरमी कितनी भी क्यूँ ना पड़ रही हो, पर इस दफ़ा किसी मैदानी जगह पर ही जाया जाये, आखिर जान है तो जहान है…

मथुरा में द्वारकादीश मन्दिर

मथुरा में द्वारकादीश मन्दिर

श्री प्रेम त्यागी अपनी पत्नी के साथ यमुना की पूजा करते हुए

श्री प्रेम त्यागी अपनी पत्नी के साथ यमुना की पूजा करते हुए

सो छुट्टी-वुट्टी का हिसाब लगा कर, हम और हमारे पारिवारिक मित्र श्री परमिन्द्र त्यागी जी, दोनों परिवारों के कुल सात जन, हम सबने 21 जून 2013 को, मथुरा, वृन्दावन और आगरा का रुख किया…. ब्रज भाषा का शहर… कान्हा की जन्म और कुछ समय तक की कर्म-स्थली भी…. तो उनके नाम से जुड़ा ये शहर जिसे बाल्मीकि ने मधुपुर कहा, और जो बोद्ध साम्राज्य के समय सूर्यसेन नगरी के नाम से विख्यात थी… दिल्ली से लग-भग 150 किलोमीटर की दूरी पर है… वैसे हमे अपनी कार से जाने में कुल सादे तीन घंटे लगे, बीच में पड़ने वाले शहर ‘पलवल ‘ पर 85 रुपैये का टोल- टैक्स लगता है, जो सड़क की हालत और पूरे हाईवे पर किसी भी किस्म की शुविधा के अभाव में जबरन वसूली जैसा ‘जजिया कर’ सा लगता है | ऊपर से टोल-कर्मचारी जिस तरह से एक गाड़ी को क्लियर करने में 5 मिनट लगा रहा था, आप को एसी कार में भी गुस्से से पसीना आ सकता है | खैर, जैसे-तैसे वहाँ से निकल कर आप आराम से मथुरा में दाखिल होते है, लगभग और एक-डेढ़ घंटे की ड्राइव के बाद } दिल्ली से मथुरा का एकदम सीधा रास्ता है, बस चलते चले जाना है… नाक की सीध में , और बस आप पहुंच गये सीधे मथुरा, अपने कान्हा से मिलने…

एक छोटा और भीड़-भाड़ से भरा, बिलकुल ही आम हिन्दुस्तानी शहरों जैसा लगेगा आपको मथुरा | कुछ भी तो अलग नही, वही लोग, रिक्शे, भीड़ ट्रेफ्फिक और गंदगी| यकीन मानिये , पहली नजर में, सब कुछ वैसा ही, जैसा आप अपने पीछे, अपने शहर में छोड़ कर आये थे |खैर, नई जगह होने के कारण, रास्ता पूछ-पूछ कर, हम उस होटल में पहुंच ही गये , यहाँ हमारी बुकिंग थी | अब तक शाम के 8 बज रहे थे , रात गहरा रही थी , और बच्चों को भूख भी | हमारा होटल पुराने बस-अड्डे के पास था , और यह षेत्र मथुरा के व्यस्तम इलाकों में से है | बाज़ार में खूब चहल-पहल थी, रंग-बिरंगी चीजों से लदे-फदे हमारे हिन्दुस्तानी कस्बों के जैसे शहर होते हैं, सब बिलकुल वैसा ही | वैसे, यदि आप पहले से अपने मन में मथुरा की कोई काल्पनिक छवि अपने मन में बसा कर आये हों,तो शायद आप ये सब देख कर निराश भी हो सकते हैं, ये सोच कर कि भला ये शहर मेरे शहर से अलग कैसा ! जिसके पीछे मैं इतनी दूर से चल कर आया हूँ ! मगर , हमे अपने हिन्दुस्तानी चरित्र पर पूर्ण विश्वास है और पूरी आशा है कि भले कुछ हो जाये हमे निराशा हाथ नही लगेगी और यही विश्वास मन में रखते हुए हम अपने होटल का रास्ता पूछते-पूछते वहाँ पहुंच ही गये |

मगर ये क्या ? होटल देखते ही सबकी आशाओं पर तुषारापात!!! होटल के साथ लगी दीवार के साथ शराब का ठेका और पीने वालों के लिए अहाता… वो भी ग्राहकों से अटा पड़ा! अब ऑनलाइन बुकिंग में ये खतरा तो होता ही है | आप किसी भी होटल या गेस्टहाउस की साईट पर जाकर सिर्फ कमरों की फोटो देख सकते है या सुविधाओं के बारे में ही जान पाते है } लोकेशन और आस-पास के बारे में तो जा कर ही पता पड़ता है |और, ऊपर से हम दो परिवार – वो भी बच्चों के साथ , भई ये तो सम्भव नही ऐसी जगह रहना, पता पड़े पूरी रात सड़क पर हुडढंग ही होता रहे , आखिर हम यूपी वाले जो ठहरे, इतना तो अपने भई लोगों पर विश्वास है ही | सो होटल वाले से बात की, भई ऐसी जगह तो परिवार के साथ रहना सम्भव नही| हाँ, ये बात और है कि यदि मैं और त्यागी जी अकेले आये होते, और वो भी किसी और उद्देश्य से तो बात और थी. फिर तो सम्भवतः हम भी लाइन में खड़े मिलते | पर, इस दफा तो हम सपरिवार, कान्हा से मिलने आये थे | अतः वहाँ की बुकिंग कैंसिल कर किसी और मनभावन जगह की तलाश में निकल पड़े | बेचारा होटल मालिक कहता ही रह गया कि मथुरा में इस रेट पर एसी कमरे आपको कहीं और नही मिलेंगे| मगर एक घुमक्कड़ यदि घूमना जानता है तो रात बिताने के लिए जगह दूंदना भी !!! ये वो बेचारा होटल मालिक और उसका मैनेजर शायद नही जानते थे!

और फिर एक घंटा लगा, अपनी पसंद की ठहरने की, कोई और जगह दूंदने में| वैसे यहाँ आराम से जगह मिल जाती है… शहर भर में चप्पे-चप्पे पर होटल, गेस्टहाउस और धर्मशालाएं हैं… एसी, नॉन एसी, कूलर वाले हर तरह के कमरे मिल जाते हैं |ज्यादातर गेस्टहाउस और धर्मशालाएं हैं , जिनमे खाने की सुविधा नही है और ये बदिया ही है , क्यूंकि जब आप बाहर खाना खाते हो, स्थानीय लोगो से मिलते हो, तो शहर का मिजाज भी तभी समझ पाते हो |और यहाँ के हमारे अनुभव का, यदि यकीन मानिए तो, मथुरा गजब का शहर है…. सिर्फ धार्मिक कारणों के कारण ही नही, अपितु अन्य दुसरे कारणों से भी, भई धार्मिकता तो इसके प्राणों में है ही, कान्हा की आखिर जन्म-भूमि जो ठहर्री, उससे तो आप इसे जुदा कर के देख ही नही सकते, सबकुछ कृष्णमय है इस छोटे से शहर में, … होटल, लॉज, दुकाने सब के साथ कान्हा का नाम जुड़ा नजर आएगा | ये तो वस्तिक्वता है और होनी भी चाहिए, यदि एक शहर अपने नायक से अपने को जोड़ता है तो इसका अर्थ यही है कि वो अपनी पहचान, अपनी अस्मिता उस से जोड़ कर रखना चाहता है, और यह शहर अपने आराध्य में ही अपने स्व को लुप्त करना चाहता है…, उसकी पहचान में ही अपने आपको खोजना चाहता है, इसलिए ये अकारण नही कि जैसे ही आपके पांव बृज की इस भूमि पर पड़ते हैं, आप कृष्णमय हो जाते हैं, हर बच्चे में आपको कान्हा नजर आता है, और हर युवा ग्वाल-पाल…

विश्रामघाट पर नौका विहार

विश्रामघाट पर नौका विहार

यमुना में बहता पानी और साथ में बहकर आते पेड़

यमुना में बहता पानी और साथ में बहकर आते पेड़

यदि आधुनिक दुनिया की सबसे बड़ी खोज,पहिया और उस पहिये पर पेट्रोलियम से चलती, यहाँ-वहाँ धुयाँ उड़ाती और बेसुरे राग में अकारण ही चिल्लपों मचाती, हमारे इस विकसित युग की हक़ीकत, इन मोटर-गाड़ियों के शोर को कुछ पल भूलकर अपनी आत्मा को परमात्मा से एकाकार हो जाने दें… तो कोई आश्चर्य नही कि आप उस बांसुरी की धुन को भी महसूस कर पायें, जिसके ऊपर कभी गोपियाँ दीवानी थी और कवियों ने तो उस पर महा-ग्रँथ तक रच डाले ! तो फिर यहाँ सब कुछ कृष्णमय होना ही है… मथुरा और कान्हा दोनों ही इस प्रकार एकाकार हो चुके हैं कि एक के बिना दूसरे की कल्पना भी असम्भव है…और ये भी एक जमीनी हक़ीकत है कि इस शहर में जीविकापार्जन का मुखय श्रोत आज भी या तो मथुरा रिफायनरी है या फिर धार्मिक पर्यटन | तो ऐसे में देश-विदेश से आये तीर्थयात्रियों और पर्यटकों को सब कुछ कृष्ण के नाम से सरोबार मिले तो उन्हें तनिक भी आश्चर्यचकित नही होना चाहिए! पर कोरी धार्मिकता से इतर, मथुरा जिन्दादिली का शहर है अपने लोगों से |

नौका से खींचा गया विश्रामघाट का विहंगम दृश्य

नौका से खींचा गया विश्रामघाट का विहंगम दृश्य

नौका विहार को तैयार हम

नौका विहार को तैयार हम

भीड़-भढ़क़का, छोटी और तंग सड़कें, यहाँ-वहाँ पड़े कूड़े के ढेर, घंटो बिजली का गुल होना, मगर सब जाने दीजिये… ये शहर जिन्दा है क्यूंकि इस शहर की जिन्दादिली इसके लोग हैं, एकदम मस्त खुशगवार और धार्मिकता से औत-प्रोत… शहर में चप्पे-चप्पे पर छोटी-छोटी हलवाई की दुकाने |ढूध, दही, लस्सी और अपने विश्वविख्यात पेड़ों के अलावा ये शहर तो कचोडी और जलेबी की दुकानों से भी अटा पड़ा है| हर दस कदम पर ऐसी ही कोई छोटी सी दूकान… और खाने वालों की भीड़! ऐसा नही की खाने वाले सभी पर्यटक या तीर्थयात्री होते हैं, बल्कि हर जगह हमे स्थानीय लोग ही इन दुकानों पर मिले… और एक मजेदार बात, यहाँ अधिकांश दुकानों पर बैठने की सुविधा भी नही है…..बस पत्ते के कटोरे में कचोडी लीजिये या समोसा, उस पर आलू का बिना हल्दी का झोल, साथ में पेठे की कुछ मीठी सी सब्जी… जो चटनी का काम भी करती है, और यदि मीठे की इच्छा हो तो वो भी इसी तरह के दोने में| देखिये ये शहर तो पर्यावरण का भी कितना ख्याल रखता है, और अपने कुटीर उद्योगों का भी ! और चाय, लस्सी या दूध के लिए मिटटी के कसोरे(कुल्हड़), या जो भी आपके षेत्र में इनका नाम हो, हाजिर हैं ! दुर्भाग्यवश हम शहर वालों को ये नेमतें सिर्फ किसी अच्छी शादी की दावत में ही मिल पाती हैं| खैर हमारे लिए तो ये एक मजाक का सबब बना रहा कि शायद यहाँ कोई घर का खाना ही नही खाता, क्यूंकि घर पर बनाने से हैं भी किफ़ायती… दस से बारह रूप्पिया में दो कचोडी और साथ में आलू का झोल तथा पेठे की सब्जी. पांच रुपए में एक बड़ा सा जलेबी का पीस! बीस रूपये और खर्चो, तो कुलढ़ में ऐसी गाडी लस्सी कि उसके आगे हल्दीराम और बीकानेर वाला भी पानी मांगे !!!तीस- पैंतीस रुपल्ली में ऐसा नाश्ता, हम एनसीआर में रहने वालों के लिए तो सपना ही था| मजा आ गया भई मथुरा में तो ! वैसे, यहाँ के किसी होटल वगेरा में यदि आपको सब्जियां कुछ मीठी सी लगे तो हैरान मत होईएगा, क्यूंकि यहाँ गुजरात से बड़ी संख्या में तीर्थयात्री आते हैं, जो ऐसा खाना ही पसंद करते है | सडकों पर जगह-जगह बिकता ढोकला भी मथुरा में गुजराती लोगों की आमद को दर्शाता है… और वैसे भी मथुरा और द्वारिका दोनों कृष्ण से जुड़े हैं | अतः गुजरात में भी कृष्ण जी की वही धूम है जो उत्तर प्रदेश में! पुराणों में कृष्ण को सोलह कला परिपूर्ण बताया गया है जो कि किसी भी अवतार के लिए सर्वाधिक है, ऐसे में कान्हा और उनसे जुड़ा शहर कुछ तो अधिक मधुर होगा ही…

मथुरा में कचोडी, जलेबी  की मशहूर दुकान में

मथुरा में कचोडी, जलेबी की मशहूर दुकान में

मथुरा जाकर हमारी तो जानकारी में और भी इजाफा हुआ… क्यूंकि अभी तक तो हम इस शहर को सिर्फ बोधों और कान्हा से ही जुड़ा मानते थे, परंतु यह शहर तो सिख धर्म से भी सम्बंदित है, गुरु नानक के अलावा कई अन्य सिख-गुरु तथा अन्य महापुरुष भी जहाँ आये हैं और उनकी याद में शहर में गुरुद्वारा भी सुशोभित है | वैसे, मथुरा तो अपने मन्दिरों के लिए विश्व-विख्यात है ही, और कान्हा से प्रेम करने वालों के लिए यहाँ विश्राम-घाट, द्वारकादीश मन्दिर, जन्म-भूमि आदि हैं ही, जिनका अपना धार्मिक महत्व है| पर धार्मिकता से इतर विश्राम घाट.पर नौका-विहार अदभुत है | विश्रामघाट, द्वारकादीश और जन्मभूमि ये तीनो जगह आस -पास ही हैं और आप रिक्शा या फिर पैदल ही भीड़भाड़ में चलते हुए जा सकते हैं | तो , सबसे पहले हम द्वारकादीश मन्दिर पहुंचे और फिर वहाँ से पैदल ही चल कर विश्रामघाट| उत्तरांचल में आई परलेयकारी बाद के कारण यमुना अपने दोनों सिरों तक वेग-प्रवाहित थी, नदी के विशाल किनारों तक बहता पानी और उस गति-शील पानी में बह कर आते हुए पेड़ इत्यादि… जो वहाँ बैठे पंडो के भी अनुसार एक सुखद अनुभूति थी, क्यूंकि नदी की परिभाषा के अनुसार तो यमुना अब जीवित नदी रही नही क्यूंकि हम मनुष्यों ने अपने स्वार्थ में अंधे होकर गंगा-यमुना तथा अन्य दूसरी नदियों को भी इतना विषाक्त कर दिया है कि अब उनमे जलीय प्राणी का जिन्दा रहना असम्भव है|

कभी ऐसे ही कल-कल बहती यमुना का चित्र सामने रख, सुभद्राकुमारी चोहान ने कहा होगा-

‘यह कदम्ब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे,

मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे ||’

यमुना में नौका विहार के बाद हमने जन्मभूमि जाने का प्रोग्राम शाम का रखा क्यूंकि मथुरा के मन्दिर दिन के समय बंद हो जाते हैं | अतः हम हम अपना मनपसन्द दोपहर का भोजन करने और क्चोरियों का रसावादन करने अपने पसंद के ठीये पर पहुंच गये|

शाम का हमारा समय जन्मभूमि में और मथुरा के बाजारों में गुजरा जिसका विस्तृत वर्णन फिर किसी अगली पोस्ट पर !

बहरहाल, मथुरा शहर में धूल, मिटटी, गंदगी, मक्खियाँ, जहाँ-तहां विचरती कान्हा की सखियों गायों से बचते और जेठ की दुपहरी में अपने पसीने से भीगे बदन की परवाह ना करते हुए, आप घूमने का माद्दा रखते हो तो यकीन मानिये, मथुरा एक बेहतरीन शहर है| ये आपको बताता है कि वाकई में शहर किसे कहते हैं | मेट्रो सिटिज में, जहाँ लोग रहना भूल चुके है, क्यूंकि वहाँ की दिन-चर्या और तरक्की की अंधाधुन्द दोड़ में वो अपने स्व को भी भुलाकर बस भागते ही चले जा रहें हैं| उन सभी पाठकों से मेरा विन्रम निवेदन है कि कभी किसी छोटे शहर में भी अपने परिवार के साथ घूमने जाएँ, पर एक पर्यटक की भांति नही, बल्कि एक यायावर की तरह,,, विश्वास रखिये आप निराश नही होंगे| अपितु आपका तन-बदन और आत्मा और ज्यादा समर्द्ध होकर आपके सामने आयेंगे| लेकिन समाप्त करते-करते एक बात… मथुरा के मन्दिर बेहतरीन हैं, लोग शानदार हैं, मथुरा के पेड़ो का कोई जवाब नही…पर मन्दिरों में मूर्तियों के आगे विराजमान इन पंडों से बचकर रहें, आप यदि कुछ ज्यादा ही धार्मिकता में बह गये तो अपने कर्म-कांडों के जाल में ऐसा फान्सेगे आपको, कि आप वापिसी के किराये के भी मोहताज हो जायेंगे….

और यदि इनसे बचने की कला आपने सीख ली तो कम बजट में घूमने वालों के लिये इससे बढिया कोई और शहर नही! वैसे अपनी पसंद के शहरों में एक शहर का नाम और जुड़ गया है… बोलो बांके बिहारी लाल की….. जय

अगली पोस्ट में आपको गोकुल की गलियों में थिरकते कान्हा से मिलवायेंगे….

46 Comments

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    • avtar sngh says:

      Thank you very much for your kind and encouraging words. It happens, some times we do not get the people, as we expect. Moreover, we expect humbleness and politeness from the people associated with religious places, but they are pity humans too. But i can understand the disappointment one feels, after getting such an experience. Any way, its life, and we meet numerous people…. some are good, some bad…. I wish in future, God will definitely be with your side.
      Sorry, writing in English, as my own laptop has been with the service dept. of the company and this one is not supporting Hindi fonts.
      Thanx once again for your comment.

  • Wow! Great post. You made it tempting to visit Mathura that I haven’t done so far.
    Thanks.

    • avtar sngh says:

      Thanx for your comment. I must advice you to visit there, As such smaller cities have more to offer than we expect. Thanx again.

  • abheeruchi says:

    Welcome to Ghumakkar.
    Hum log jab Delhi me the to jab man kiya tab vrindavan ke liye nikal padte the .post padhte padhte saari yaadein taaza ho gayi.vrindavan to kai baar gaye mathura,gokul,barsane ek hi baar gaye as a tourist.
    Apke post ke through ek baar phir ghum lenge.
    Keep travelling,keep writing.
    Waiting for next in series.

  • Amitava Chatterjee says:

    What a wonderful, thought provoking post, I just read this morning.

    You have a great sense of humor, style & grace and I love the way you described UP & its’ cities/ Mathura, including other cities is awesome…yes, in NCR we won’t find those shops & qualities anymore or very rare.

    Once in a year, we also visit the place. Thank you for sharing.

    and finally, welcome to Ghumakkar…we would love to read your stories

    • avtar sngh says:

      Thanx a lot for your kind words. I do agree metro cities have commercialized up to such an extent that they are rapidly loosing their uniqueness. Now, they are focusing only on brands. So for novelty one has to visit small places. Thanx again.

  • tarun says:

    jay jya shreeenath ji Avtaar ji. radhe radhee

    Bahut hiii Sundar varnan kiya he aapne mathura ka. Aur photos bhi bahut sundar aaye he. Yamuna to apne pure ufan par bah rahi he.

    mathura me aap kis Hotel me ruke.. uske kiraye adress ke bare me hame puri jankari de taki jab kabhi mathura jana ho to hum bhi vaha ruk sake.

    Jay jay shreeenath ji

    • avtar sngh says:

      Thanx for the nice words tarun jee. You like the post, it is pleasure for me. As for as the place is concern, rest assure, mathura has many places to stay, If you insist for the same place, I will send you the place’s name and telephone numbers too.

  • Avtar Ji..
    Welcome to Ghumakkar..
    Very nice post..
    I too visited Mathura,Vrindavan and Agra last year with my family. Your post refreshed my memories.

    • a s pahwa says:

      Thanx for the kind words. I will try my level best to meet your expectations in my coming posts too. Thanx again

  • SilentSoul says:

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    • a s pahwa says:

      Thanx sir, what a beautiful poetic name you selected for yourself. It is unfortunate that your experience did not turn out well. But thats life, dear…
      I have already submitted my next post to Ghumakkar, now it is up to them, when will they public it. Thanx again…

  • Saurabh Gupta says:

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    • a s pahwa says:

      I too belonged to UP. So such things do not bother me much…. Driver to apni gaadi ke hum khud hee hote hain…. aur pnde to pnde thaire… any way, thanx for your encouraging words… next part is in Mr. Jha’s hand…

  • Abhishek Kashyap Trainman says:

    Wah ji tussi pehli hi post me chha gaye ji..
    heartily swagat hai ji aapka.
    aur aapki post aur lekhan shaili to bas dilo dimag tak impact kar gayi.
    aage aur bhi intejaar rahega aapke lekho ka hum sab ko.
    aur aapke likhe hue ek ek shabd jaise bol rahe the kayi kahanaiyaan.
    “the real life is still somewhere is in smaller cities only.”
    aur rahi baat Mathura ki to ye mera 2nd fav city hai, cause it is my birthplace, and i got a opportunity to spend again 4 year of my life here 2006 to 2010 as a scholar of GLA University .
    ye shahar mujhe bahut jyada pasand hai apni shanti aur simplicity ke liye.
    Pando ke sath kisi ka experience achha nahi hota. aaj dharm me jitni bhi visangitiyaan hai uske jimmedar yahi log hai bas.
    aur aapki Jindadili bhi dikhi is post me. aapke jaise logo ka besabri se intejaar rehta h mujhe.
    aage bhi please likhte rahiyega. be in touch. wish 2 meet u too :)
    lots of wishes.
    Sat Shri Akaal- Jai Siya Ram

    • a s pahwa says:

      Thanx Abhishek, definitely India lives in villages and in small countries. You got it right the simplicity of Mathura is its real character. Its really great to know that it is your birth place, so if you like the post then it is really meaningful for me, as people in general, do not write outsider’s verdict about their own city. Be in touch…stay blessed!!!

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  • Rakesh Bawa says:

    Avtar Singh Ji welcome to Ghumakkar with this lively post. Remembering Sushant Ji from your style but I don,t have good experience Mathura as a city. I found it to be not well maintained according to tourist point of view, sorry to say.

  • sanjay tyagi says:

    bahut vadhia likha hai sardaar saab!!

  • h.l. singh says:

    padhkar majaa aa gaya..thanks a lot

  • Ritesh Gupta says:

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    • a s pahwa says:

      Thanx for the super comment ritesh ji. Apart from ‘KHAN’ its ‘PAAN’ also loved by every one. I think I lost the words for it..ha ha ha… thanx again

  • Vipin says:

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    • a s pahwa says:

      Yeah I agree, India lives in its villages and small cities. You like the post, it is a great pleasure for me. Hope you will definitely send your kind words in future too, Thanx again

  • avtar sngh says:

    Thanx for your comment. I definitely think, one must have to visit such places. These small cities has more to offer than we expect. Thanx again.

  • avtar sngh says:

    Thanx for the kind words. I will try my level best to meet your expectations in my coming posts too. Thanx again

  • Nandan Jha says:

    Welcome aboard Avtar.

    What a fabulous start. I am not a fan of Mathura City so the context was not very inviting but the content was so fulfilling that I am now thinking of skipping lunch. The write up is pacy but at the same time it throws deep-insights.

    You have received such a warm and big response. Your next story is scheduled for July 29 and all of us hope to read more from you. Wishes and Good luck.

    • Avtar Singh says:

      Thanks a ton Mr. Nandan for giving me this wonderful opportunity to come in contact with such an elite club of travelers. It is really a privilege for me .
      It is also heart-whelming to hear from you that you are posting my next article on 29th of this month.
      I wish this association of ours will last long! Amen.

  • Nirdesh Singh says:

    Hi Avtar,

    Great beginning at Ghumakkar!

    Mathura is the land of my ancestors. Our village is about 80 kms north east of Mathura. During childhood days we would first come to Mathura bus stand and then take another bus to our village. Only memories of the city were the filthy bus stand. Few years back as part of official work, I got to spend some time in the city. It is still the dirtiest place. All these tourists come to visit Krishnajanmbhoomi but the city has zero facilities. Roads are nonexistent. Only part which has some semblance of an urban city is the cant area.

    I think you have been too polite in saying Mathura is a live place. I loved your writing but I just cannot bring myself to say that it is a zinda dil place.

    UP has all blighted urban places. Again few cities in UP look like cities otherwise they are all hellish – some parts of Noida, Gomti Nagar of Lucknow and some parts of Allahabad. Otherwise it is all filth, stink and pollution.

    Now if you go to cities in Karnataka and Hyderabad – whether they are big cites or district centres, they are clean and look like cities. Bus stands in Karnataka look like airport terminals, no smell, announcements going on. Buses are clean, run on time. People are more civilized.

    Anyway, great post! Look forward to more and maybe I will change my perception about UP cities and its people!

    • Avtar Singh says:

      First thing first, so thank you very much Mr. Nirdesh for your nice and generous words for the post.

      As for as the condition of Hindi belt cities are concerned, I do echo with your view feelings. I spent most of my early life in the different cities of UP and I too know the factual positions. It is a general rule that if the people of the land are divided on religion, cast and language, This is the one of the main reason for the poor show of the entire Hindi belt area and particularly UP.

      I wish the day will come when people elect their representative for the kind of work they did for the welfare of society irrespective of their other above said factors.
      Nevertheless I like the city and particularly its natives. which also covers you, of course.

  • Rakesh Bawa says:

    Lagta hai Avtar Singh Ji mujhe reply dena bhool gaye, Mathura ko itna achha nhi kaha shayad isisliye. Be a sport man.

    • Avtar Singh says:

      Rakesh Bawa ji first of all I offer my sincere apology regarding the reply. You know, I am new to this site and still learning to know the procedure of comments and replies etc. I definitely wrote my reply, but it showed as comments. Nevertheless I am obliged to get passionate reader like you. As for as your comment about the cleanliness and all other civic facilities are concerned, I do agree, Govt agencies are legging far behind but some cities have something more to offer and certainly Mathura is one of them. What you feel in Mathura, can not in Vrindavan, although it has clean roads, lavish temples and nearly five star ashrams.
      The one more city for which I longing for several years, is Banaras, and believe me this too does not score much on civic front but one day I will definitely go to this place too,

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    • Avtar Singh says:

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  • mayamrig says:

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    • Avtar Singh says:

      Respected ???? ??? ??, ?? ???? ?????? ?? ??? ????? ?? ???? ???? ???? …… ???? ??? ????-???? ???????!!! ?? ???? ?? ?????? ?? ????? ???? ?? ??? ??????? ??? ?????…… ???? ???? ?? ?? ??one ???? ?? | ?? ?? ???? ???? ?? ?? ??? ????? ??? ?? , ?? ?? ?? ???-????? ????? ?? ??? | ?? ?? ???????? ?? ?? ??? ????? ?? ?????? ??? ??? |?? ?? ??? ??? ?? ???? ????-???? ???????!!!

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    • Avtar Singh says:

      one of the best comment I ever got ! ???? ?????????? ! ?? ???? ???? ????????? ????? ??? ??? , ????-???? ??????? TridevCharan ?? …

  • Anil says:

    Dear Avataar singh ji,
    namskaar
    ghumakkar par likhe anubhaw bahut upyogi hote hai sabhi gumne walo ke liye. yah aur bhi ubyogi ho sakta hai yadi aap log us shahar me Accommodation deatail bhi likhe.

    Dhnywad

    Anil

    • Avtar Singh says:

      Yes I agree. You are absolutely right Mr Anil.
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      Thanx for the comment !

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