लैंसडाउन : अहँ ब्रह्मास्मि के पथ पर कुछ क्षण

बाबा नागार्जुन की एक कविता है-

“अमल धवल गिरी के शिखरों पर
बादल को घिरते देखा है

छोटे-छोटे मोती जैसे
उसके शीतल तुहिन कणों को
मानसरोवर के उन स्वर्णिम

कमलों पर गिरते देखा है
बादल को घिरते देखा है ||”

सदियों से ही मनुष्य, पहाड़ों को देखकर रोमांचित होता रहा है, उनका विशाल आकार, आसमान चूमती चोटियाँ, बादलों से बातें करते लम्बे–घने चीड़, देवदार और चिनार के वृक्ष, विशाल ग्लेशियरों की कोख से निकल, झाग बिखेरती बल खाती नदियाँ, अचानक ही ना जाने कहाँ से, जैसे कोई जादू की शक्ति अपने आप में समेटे, विशाल पत्थरों का सीना चीर झाग बिखेरते झरने, कच्चे-पक्के रास्ते, सीढ़ी-नुमा खेत, हरियाली ऐसी कि लगे जैसे कुदरत ने सारी कायनात को ही हरे रंग की एक चुनर औढ़ा दी हो ! सफेद दूधिया परत में लिपटी इनकी चोटियों के मोहपाश में, उन तक पहुंचने और उन पर अपनी विजय की हसरत मन में लिए, इंसान रास्ते की सभी दुश्वारियों को झेल कर भी बार-बार उनकी तरफ आकर्षित होता रहा है | चाहे आप पौराणिक हिंदू ग्रँथ देख लीजिये या ग्रीक मिथाल्जी, सभी के देवी-देवता और भगवान आपको पहाड़ों पर ही मिलते हैं, चाहे फिर वह कैलाश पर्वत हो या माउंट ओलम्पस ! मगर हमारा दुर्भाग्य ! हमने अपने सभी देवी-देवताओं को पहाड़ों पर स्थापित तो कर दिया, पर उसकी वजह से पहाड़ों का जो अंधाधुंध विकास और अतिक्रमण हुआ है, उसके दुष्परिणामों की चिंता नही की | हम यह भूल जाते हैं कि कुदरत से इस अनावश्यक छेड़-छाड़ के गंभीर परिणाम भी हो सकते हैं, जैसा हम सब ने उत्तराखंड के केदारनाथ में आई भीषण विपदा में देखा | एक संतुलित और प्रकृति के साथ सामंजस्य रखते हुए पर्यटन के लिये, पहाड़ी क्षेत्रों का विकास और यहाँ जाने वाले पर्यटकों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता की आवश्यकता ही इसका एकमात्र हल है, क्योंकि पहाड़ों की कशिश हम इंसानों के लिए ना पहले कभी कम थी और ना ही अब कम हो पायेगी !

अतः ऐसे में जब हमे मौका मिला कि हम नये वर्ष के अवसर को किसी पर्वतीय क्षेत्र में जाकर मनायें तो हमने इस बार लैंसडाउन को चुना जो दिल्ली से ना तो अधिक दूर है और ना ही हमे पहले कभी वहाँ जाने का मौका मिला था | हालाँकि देहरादून में रहते हुए इस जगह का नाम तो हमारे लिए अपरिचित नही था पर मसूरी के इतना करीब होने की वजह से, इसकी तरफ कभी जा ही नही पाए थे | लैंसडाउन की ऑनलाइन बुकिंग कर के हमने इसके बारे में गूगल बाबा से कुछ जानकारी इकट्ठी की और निकल पड़े एक नये और अनजाने से शहर की तरफ…

दिल्ली से बाहर निकलते ही आपको NH 24 पकड़ कर गाजियाबाद होते हुए मेरठ की तरफ निकलना होता है और फिर मेरठ के बेगमपुल से मवाना की तरफ | यहाँ की चीनी मिलें पूरे भारत वर्ष में मशहूर हैं, और ये पूरा क्षेत्र ही उत्तर भारत की गन्ना बेल्ट के नाम से जाना जाता है | सड़क के दोनों तरफ मीलों दूर-दूर तक फैले हरे-भरे खेत और उनमे खड़ी ईख(गन्ने) की फ़सल, रास्ते भर आँखों को एक सुखद एह्सास सा देती जाती है | UP के अधिकतर हाईवे सिन्गल रोड है, और आप को बीच सड़क पर जाते हुए कितनी ही बुग्गीयां और ट्रालियां गन्ने से लदी-फदी हुई मिल जाएँगी जिनके ड्राईवर बिळकुल माशाअल्लाह ही होते हैं, उन्हें अपने दायें-बाये और पीछे क्या चल रहा है इससे कोई सरोकार नही, भले ही आप हॉर्न दें, डिपर मारें, बस वो तो नाक की सीध में आगे ही चलते जायेंगे, कभी किसी ट्रक के पीछे पढ़ा ये शेर इनके लिए बड़ा मौजूँ है-

“ दम है तो क्रास कर, वरना बर्दाश्त कर !”

मगर ज़नाब, यदि NDTV वाले ‘विनोद दुआ साहब’ की जुबान में कहें तो ये भी छोटे शहरों का एक जायका है, और इसका जायका भी आप तक पहुँचाना ज़रूरी था ! इस मज़े या सज़ा का लुत्फ़ तो तभी है जब आप स्वयम इसका अनुभव करें | खैर, किसी तरह जगह बनाते-बनाते आप बिजनौर, नजीबाबाद होते हुए कोटद्वार पहुंच जाते हैं | पहाड़ी रास्ता शुरू होने से पूर्व, कोटद्वार उत्तराखंड का प्रमुख मैदानी शहर है, जो रेल और बस मार्ग से जुड़ा हुआ है | ऊपर पहाड़ों पर रहने वाले, अपनी सभी दैन-दिनी आवश्यकताओं के लिए इस शहर पर ही निर्भर हैं |

जो पर्यटक, पहाड़ी क्षेत्रों से परिचित हैं, वो जानते हैं कि पहाडो में चढाई से पहले किसी ना किसी स्थानीय देवी-देवता का मन्दिर अवश्य होता है, जिसकी उस क्षेत्र विशेष में मान्यता भी बहुत होती है | ये जगह भी इसका अपवाद नही, बल्कि यहाँ तो सिद्दबली हनुमान जी का आश्चर्यजनक रूप से काफी बड़ा और भव्य मन्दिर नदी के मुहाने पर ही है, और लैंसडाउन आने-जाने वाले अपनी सुविधानुसार कम से कम एक बार तो अवश्य वहाँ जाते ही हैं |

सिद्धबली का भव्य प्रवेश द्वार

सिद्धबली का भव्य प्रवेश द्वार

सिद्धबली हनुमान जी का मन्दिर

सिद्धबली हनुमान जी का मन्दिर

मन्दिर की अंदर से एक झलक

मन्दिर की अंदर से एक झलक

हमारे पास अभी समय था, सो हमने विचार किया कि लैंसडाउन की तरफ बदने से पहले एक बार यहाँ के दर्शन भी कर लिए जाएँ | मन्दिर की फोटो से आप इसकी भव्यता का अंदाजा लगा सकते हैं | लैंसडाउन का पहाड़ी रास्ता लग-भग 45 किमी का है और एक बार चढ़ाई की शुरुआत करते ही, सड़क के साथ-साथ चीड़ और देवदार के वृक्षों के घने जंगल शुरु हो जाते हैं | इन पेड़ों से छन कर भीनी-भीनी खुशबू साथ लिये ताज़ी मगर ठंडी हवा आपके नथुनों से गुज़रकर, जब आपके फेफड़ों में समाती है, यकीन मानिये, शरीर तो क्या आत्मा तक को भी तरोताजा कर देती है, और बाहर की ठंडी हवा के बावजूद, आप अपनी गाड़ी के शीशे नीचे करने को मजबूर हो जाते है | यहाँ का रास्ता और सड़क के तेज घुमाव दोनों रोमांचक है और सबसे अच्छा पक्ष ये है कि सड़क साफ़-सुथरी और अच्छी है, जिसका मुख्य कारण ये भी है कि लैंसडाउन में गढ़वाल रायफल्स का हैड-क्वार्टर है और इस वजह से अक्सर सेना की गाड़ियों की आवा-जाही होती रहती है | लैंसडाउन के रास्ते के अध-बीच ही सड़क पर ही एक छोटा सा गाँव पड़ता है ‘दुगड्डा’, जहाँ पहाड़ियों में से बहकर आता हुए निर्मल स्वच्छ पानी यात्रिओं, को अपनी गाड़ी रोक कर उसे पी कर देखने का आमंत्रण देता प्रतीत होता है | हमने भी कुछ पल यहाँ रुक कर, अच्छी तरह उस ठंडे पानी से मूँह-हाथ धोया और आगे के रास्ते के लिए निकल पड़े |

लैंसडाउन के रास्ते में

लैंसडाउन के रास्ते में

रास्ते का एक और मनोहारी दृश्य

रास्ते का एक और मनोहारी दृश्य

सेना की छावनी से गुजरते हुए रास्ते में ही गढ़वाल रायफल्स का मुख्यालय पड़ता है, सेना के जवान यहाँ-तहाँ आपको मुस्तैदी से चौकसी करते दिख जाते हैं. जिससे आप में एक गर्व की अनुभूति भी होती है और आपका मनोबल भी बढ़ता है |

गढ़वाल रायफल्स

गढ़वाल रायफल्स

शीघ्र ही आप लैंसडाउन में पहुंच जाते हैं, एक छोटा सा चौक, जिसे गाँधी उद्यान कहा जाता है, ये गाँधी बाबा भी ना… पूरब से पश्चिम हो या उत्तर से दक्षिण, हर जगह अपनी उपस्थिति दर्ज करा ही जाते हैं… जय हो !, खैर यहाँ आपको बहुत सी जीपें दिख जाएँगी, जो बस या रेल यात्रियों को कोटद्वार से लैंसडाउन तक लाती हैं | चौक के आस-पास कुछेक दुकाने हैं जो इसे एक लघु बाज़ार का रूप देती हैं, यहाँ अक्सर काफी चहल-पहल रहती है, क्योंकि यह, यहाँ का इकलौता बाज़ार भी है | इसमें आपको स्थानीय निवासी और पर्यटक खरीदारी करते मिल जायेंगे, सेना के जवान भी अपने छुट्टी के पल इसी बाज़ार में घूम-फिर कर बिताते हैं |

गाँधी उद्यान, लैंसडाउन  का प्रमुख चौक

गाँधी उद्यान, लैंसडाउन का प्रमुख चौक

हमारी मंज़िल “Hill View Shanti Raj Resort“, अभी यहाँ से लगभग 3 किमी और दूर है, और हम भीड़ भरे रास्ते से जगह बनाते हुए ‘धुरा रोड’ की और बढ़ जाते हैं, ये 3 किमी का रास्ता हमारे लिए तो अत्यंत ही रोमांचक निकला, क्यूंकि यहाँ अभी कच्ची सडक है, और आपको बहुत ध्यान से चलना पड़ता है, मगर रोमाँच के शौकीनों के लिए ये रास्ता तो बिन माँगे ही किसी मुराद के पूरा हो जाने के जैसा ही है ! विशाल पहाड़ और सड़क के किनारे से लेकर मीलों दूर तक, ऊँची चोटियों से लेकर गहरी खाईयों तक में, शान से खड़े, हरे भरे चीड़ और देवदार के पेड़ रास्ते भर आपके साथ-साथ ही चलते हैं | लैंसडाउन में अभी भी नैसर्गिक सुन्दरता यहाँ-तहाँ बिखरी पड़ी है क्योंकि यहाँ की प्रकृति अभी भी raw और unexplored है, बाकी पर्वतीय क्षेत्रों की तरह इसका अंधाधुंध व्यासायिक दोहन नही हो पाया है, जिसका बहुत हद तक श्रेय, सेना की उपस्थिति को जाता है | वैसे, यदि लैंसडाउन के इतिहास की बात की जाये तो समुद्र तल से 1700 मीटर ऊँचे और दिल्ली से लगभग पोंने तीन सौ किमी दूर इस स्थान की खोज़ 1884 में हुई और इसका नाम तात्कालिक वायसराय लार्ड लैंसडाउन के नाम पर किया गया, और तब से ही यह स्थान सेना के लिये अंग्रेजों की पसंद बन गया |

31 दिसम्बर का दिन, नव वर्ष की पूर्व संध्या, पर ठंड दिल्ली के मुकाबले कम ही है, जल्दी ही आपका रिजोर्ट आ जाता है और एक रोमांचक सफर के सुखद अंत पर आप चैन की सांस ले सकते हैं | अभी तक जितनी सादगी, सरलता और शालीनता से आपका परिचय रास्ते भर हुआ है, उसी का विस्तार आपको इस रिजोर्ट ’हिल विऊ शान्ति राज’ में भी दिखता है, जब आप पाते हैं कि ये पूरा रिजोर्ट, दिनेश बिष्ट और उनके भाइयों द्वारा मिल कर चलाया जा रहा है | किचन से लेकर सर्विस तक का सारा काम पूरा परिवार मिल-जुल कर ही करता है | देहरादून में Polytechnic कर रहे दिनेश के भतीजे को, मेहमानों को खाना सर्व करते और झूठी प्लेटें तक इकट्ठी करते देख, इस परिवार की सादगी और आपसी भाई-चारे का एक सुखद एह्सास होता है | दिल्ली जैसे शहर से आकर, और टूटते परिवारों के दौर में, एक बार तो आपको ये सब कुछ अज़ीब सा लग सकता है, पर फिर आपको बहुत जल्दी ये एह्सास हो जाता है कि यहाँ होटल जैसा कुछ नही, बल्कि घर जैसा एक सुखद पारिवरिक अनुभव है, अपना आर्डर देने कस्टमर खुद ही किचन में भी आ सकता है, जैसा और जो खाना चाहे. अपनी पसंद से, अपने सामने बनवा भी सकता है ! और एक घुम्मकड़ और पेटू परिवार इससे ज्यादा और क्या चाह सकता है ????

लैंसडाउन की मनोहारी शाम

लैंसडाउन की मनोहारी शाम

बाएँ विशाल जंगल, दायें  रिसोर्ट और बीच में गाँव की तरफ जाता रास्ता, तीनों आपसी सामंजस्य में एक दुसरे के पूरक

बाएँ विशाल जंगल, दायें रिसोर्ट और बीच में गाँव की तरफ जाता रास्ता, तीनों आपसी सामंजस्य में एक दुसरे के पूरक

प्रकृति के सानिध्य में

प्रकृति के सानिध्य में

रिसोर्ट में सबसे बड़े भाई शिवचरण बिष्ट के साथ

रिसोर्ट में सबसे बड़े भाई शिवचरण बिष्ट के साथ

रिसोर्ट में लगे हुए टेन्ट

रिसोर्ट में लगे हुए टेन्ट

यहाँ-वहाँ कुछ नौजवान लडके-लडकियाँ खुले में ग्रुप बनाकर बैठे हैं, कुछ इधर-उधर घूम रहे है, कुछ छोटे बच्चे खरगोशों के पीछे भाग रहें हैं, कुछ तोते और चिड़ियाँ भी हैं, दूर तक फैला, खुला विशाल क्षेत्र, चारो तरफ चीड़ के पेड़, आपको जंगल में मंगल का नज़ारा देता है | एक कप गरमा-गरम अदरक वाली चाय, आपकी रास्ते की सारी थकान उतार देती है | यहाँ कोई रिसेप्शन या हॉल नही है, केवल सोने के लिए कमरे हैं, और आप खुले में बाहर बैठ कर पूरी तरह से प्रकृति को जी सकते हो | चाय पीते-पीते आपका कमरा तैयार हो जाता है | रिजोर्ट की ही तरह कमरा भी बहुत साधारण है, साधारण प्लास्टर की हुई दीवारें, टीन की छत, जिन पर अंदर से लकड़ी की सीलिंग लगी है, कमरे के साथ अटैच्ड टॉयलेट के अलावा, एक डबल बैड, दो सोफा-नुमा कुर्सियां, एक छोटी मेज़ और टीवी | कमरे में जाकर कपड़े बदलते हैं, पर कमरे में मन ही नही लगता, वो तो कमरे से बाहर निकलना चाहता है | मोबाइल के सिग्नल अक्सर यहाँ नही मिलते, BSNL अपवाद है | टीवी कोई देखना नही चाहता क्योंकि सारी प्रकृति तो बाहर बिखरी पड़ी है, वो कमरे में तो आएगी नही, अपितु हमे ही उसके पास जाना पड़ेगा, यदि कमरे की चार-दीवारों में ही बैठना होता, तो अपने घर सा सुख कहाँ ? असली नजारे देखने हैं तो बाहर निकलो, मिलो दूसरों से… धीरे-धीरे आपकी सबसे जान-पहचान होने लगती है, ज्यादातर युवा तो दिल्ली या गुडगाँव से ही हैं, कुछ हमारी तरह आज ही आये हैं, कुछ कल | पर जहाँ से अभी तक कोई भी बाहर ही नही गया ! कारण पूछा, तो कहने लगे बाहर क्या देखना है ? सब कुछ तो यहीं है, इतनी खूबसूरती तो यहीं बिखरी पड़ी है | इस रिजोर्ट के चारों तरफ कोई चारदीवारी नही है, बस बांस की खपच्चियों की दो-ढाई फुट ऊंची बाढ़ है, जिससे बगल का सारा जंगल भी इसी का भाग लगता है, और इस को और विशाल बना देता है |

इसी की बगल से दो कच्चे रास्ते, और आगे के गांवों की तरफ जा रहे है, कुछ लडके-लडकियाँ जिन्होंने शायद पहले कभी गाँव या जंगल नही देखा, घूमने जाना चाहते हैं, दिनेश का भतीजा जो रसोई के काम से शायद अब निवृत हो गया है, उनके साथ गाइड बनकर चलने को तैयार है, अपने साथ एक छड़ी और टॅार्च लेकर | छाता, छड़ी और टॅार्च ये ऐसी चीज़े हैं, जिन्हें लिए बिना कोई पहाड़ का वासी बाहर नही निकलता, जाने कब इनकी जरूरत पड़ जाये…. और इधर हम, लोगों से परिचय करते-करते रात के प्रोग्राम की उधेढ़-बुन में लगे हैं, रिजोर्ट के एक कोने की तरफ एक छोटा सा टेंट लग रहा है और उधर किचन के पीछे एक लड़का लकड़ियाँ फाड़ रहा है | दिनेश से पूछने पर पता चलता है आज इनके रिजोर्ट का एक साल पूरा होने की ख़ुशी में इन्होने अपने गाँव वालों और कुछ दूसरे जानकारों को पार्टी दी है, जिनसे साल भर बिज़नेस मिलता है | लकड़ियाँ रात को बोन-फायर के लिए काटी जा रही हैं, एक दूसरे किनारे पर डी-जे लग रहा है, कमरों के सामने की तरफ थोड़ी खुली सी जगह पर 3-4 लडके एक टेंट खड़ा कर रहे हैं, जो वैसा ही है, जैसा अक्सर मिलिट्री वालों के पास या फिर जंगल सफारी करने वालों के पास होता है | हमारे देखते ही देखते उन्होंने दो टेंट खड़े करके उनमे सामान रखना शुरू कर दिया- गद्दे, रजाई, टीवी, हीटर और बिजली का बल्ब ये देख कर के तो NCC के दिन याद आ गये | दिनेश से बात की, भैया हमे कमरा नही चाहिए, हमे तो यहीं सेट करो… आखिर एडवेंचर हो तो पूरा हो ! और फिर आखिर, जिनके लिए टेंट लगाया गया था, उन्हें टेंट के नुक्सान और कमरे के फायदे गिनाकर हमारा कमरा दे दिया गया | सबसे मज़ेदार तो उन्हें ये बताना था कि कई बार रात को यहाँ लक्कड़बग्गे भी आ जाते है, आखिर जंगल इसके साथ ही लगा हुआ है, इस बात ने मास्टर स्ट्रोक का काम किया और अपनी चाहत के अनुसार हम टेंट में शिफ्ट हो गये, आखिर जीवन में ऐसे मौके कितनी बार मिलते हैं…?

 टेंट के भीतर की एक झलक

टेंट के भीतर की एक झलक

रिसोर्ट के भीतर ही बिखरी हुई प्राक्रतिक छटा

रिसोर्ट के भीतर ही बिखरी हुई प्राक्रतिक छटा

रिसोर्ट के बगल से ही जाते गाँव के रास्ते पर

रिसोर्ट के बगल से ही जाते गाँव के रास्ते पर

रिसोर्ट के कमरे, बहुमंजिली होटलों के दौर में एक सुखद अनुभव

रिसोर्ट के कमरे, बहुमंजिली होटलों के दौर में एक सुखद अनुभव

शांतिराज रिसोर्ट का लैंड स्केप

शांतिराज रिसोर्ट का लैंड स्केप

दिनेश के कुछ स्थानीय दोस्त भी इंतजाम देखने और मदद करने के किये पहुंच चुके थे, उनसे घुलने-मिलने में बिलकुल वक्त नही लगा | देहरादून का हमारा अतीत बहुत काम आ रहा था, अब यहाँ मेहमान और स्टाफ वाली कोई बात ही नही थी, सब एक साथ रात के लिए उत्सुक थे, उन्ही में से एक लड़का पुष्पराज गाने बजाने का शौकीन था, दिल्ली-गुडगाँव के लोग देखकर तो वो कुछ वैसे ही रोमांचित था ! बस, हम दो चार बन्दों ने उसे तैयार किया कि रात डीजे के बाद अपनी महफ़िल जमनी चाहिए, सो साहिब वो चला गया तबला और हारमोनियम लेने…..

पहाड़ के लोगों का हमारा अनुभव बताता है कि “सूरज अस्त और पहाड़ मस्त”, बस अब इंतजार था तो रात के गहराने का | आठ बजते ही डीजे शुरू हो गया, लकड़ियाँ सुलगने लगीं और फिर सभी मेहमान अपने कमरों में ताले लगाकर बाहर आ गये | अलग-अलग ग्रुपों में मेजों पर लोगों ने अपना-अपना सामान जमा लिया और फिर रात 12 बजे तक जो मौज-मस्ती और नाच-गाना चलता रहा उसका वर्णन शब्दों में करना मुश्किल है… सब दोस्त थे जैसे बरसों के बिछुड़े बस आज ही मिले हों, कौन किस ग्रुप में था पता नही.. पर मजाल है कि कोई इस लिए मायूस हो जाये कि उनका सामान खत्म हो गया है ! जो हमारा है वो सबका है…. क्या रिजोर्ट के गेस्ट और क्या दिनेश के गाँव वाले और दोस्त, सब ऐसे लग रहे थे जैसे किसी सांझे दोस्त की बारात में हों !

रिसोर्ट के कमरे का .दृश्य

रिसोर्ट के कमरे का .दृश्य

बोनफायर का आनंद और नये साल के जश्न की धूम

बोनफायर का आनंद और नये साल के जश्न की धूम

बहुत मुश्किल से रात 12 बजे dj बंद करवाया गया, पहाड़ की नीरवता और सरलता के आगे dj पर बजते गाने एक सांस्कृतिक अतिक्रमण का आभास देते है, मगर शायद ये होटल इंडस्ट्री की एक मज़बूरी भी है, और विवशता भी…और फिर यह भी मानना पड़ेगा कि प्रत्येक व्यक्ति की अपनी प्राथमिकता और रुचि होती है, जैसे कि हर पर्यटक, एक यायावर या घुमक्कड़ नही हो सकता ! नये साल का विधिवत आगमन हो चुका था… मुबारकबादों का दौर शुरू हुआ और फिर गाँव के लोगों को गले मिल-मिल विदा दी गयी, सुबह उनके गाँव में आने के वादे के साथ… लग रहा था मेहमान तो वो हैं और हम मेजबान, आखिर हमें छोड़ कर तो वो ही जा रहे थे !

खाना तैयार था, सबने तय किया की अपने-अपने कमरों में खाना खा कर आधे घंटे में हमारे टेंट में बैठेंगे पुष्पराज की टोली के साथ, फिर, आधे एक घंटे के बाद जो समां बंधा, उसके क्या कहने ! क्या पुराने फ़िल्मी गीत, गज़लें, पहाड़ी गीत, बद्री-केदार के भजन, सब कुछ तो गाते रहे वो, और हम लोग झूमते रहे, समय की कोई बंदिश नही थी, और फिर पता नही रात के कितने बजे बरसात आने लगी… कहीं बर्फ़ ना पड़नी शुरू हो जाये, इस वज़ह से पुष्पराज ने अपने दोस्तों के साथ विदा ली और हमसे ये वादा कि अगली बार आकर फिर ऐसी ही मंडली जमायेंगे ! नये साल की शुभकामनाएं देते हुए सब अपने-अपने कमरों में चले गए |

पुष्पराज और उसकी टोली के साथ पहाड़ी गीत-संगीत

पुष्पराज और उसकी टोली के साथ पहाड़ी गीत-संगीत

रात तो बेहतरीन थी, मगर पहाड़ों की सुबह का नज़ारा ही कुछ और होता है, शांत, पावन, शुद्ध… बस कुदरत खुद बोलती है और इंसान शांत भाव से मंत्रमुग्ध हो उसे निहारता ही रहता है… आप चित्रों में शायद उस शान्ति और पवित्रता को महसूस कर पायें ! टेंट से बाहर आकर देखा कई जोड़े इधर-उधर टहल रहे हैं, हर कोई टेंट में रुकने का अनुभव जानना चाहता था !

पिछली रात की हल्की बरसात के बाद तो जैसे सारा नज़ारा कुछ और ही हसीन हो गया था, अगले 2-3 घंटे हम जंगल में यूँ ही निरूदेश्य भटकते रहे… कभी-कभी लगता है शायद प्रकृति के सानिध्य में भटकना यूँ इतना निरूदेश्य भी नही होता… दरअसल इस भटकन में इंसान अपने आप को ही खोज़ रहा होता है, अपने शरीर से लेकर आत्मा तक का सफर, अपने स्व और निज को त्याग कर प्रकृति की सर्वश्रेष्ठता को स्वीकार करना, यह तभी सम्भव है जब आपके सामने जो है, उसके मुकाबले आप को अपना होना ही क्षीण लगे, इक तुच्छता का एहसास आपको अपनी ही सीमाओं को तोड़कर, विशालकाय अनंत तक बिखरी सुन्दरता और उसमे समाये हुए तमाम जीव-जन्तुओं और पेड़-पौधों के समकक्ष ला खड़ा करता है, अब आप उस पर विजय नही पाना चाहते अपितु उसका एक अंग बन जाना चाहते हैं, अब बात ‘मैं’ की नही है, अब बात सामंजस्य और सहअस्तित्व की है, आपके साथ खड़े पचास से सौ फुट ऊंचे पेड़ और विशाल पर्वत श्रंखलायें ना तो आपको तुच्छता का अहसास करती हैं और ना आपको कोई चुनौती सी देती प्रतीत होती हैं, ऐसे में उन्हें देख आपको अपनी लघुता को देख कोई हीन-भावना महसूस नही होती, बल्कि आप को गर्व महसूस होता है कि आप भी इस कायनात का इक अभिन्न हिस्सा हैं, इसके ज़र्रे-ज़र्रे में बिखरी नुहार बार-बार अपनी तरफ आमन्त्रण सी देती प्रतीत होती है…. “अहँ ब्रह्मास्मि” का भाव शायद कुछ ऐसे ही क्षणों की अंत:करण यात्रा से उपजता हो, समय का अब यहाँ कोई अर्थ नही | वो क्षण, जब अनंत से निकला पल फिर से उस अनंत में ही विलुप्त हो जाता हैं, इसकी खोज ही तो मनुष्य की सबसे बड़ी जिजीविषा रही है, और मृगमरीचिका की ही भांति वो उसे परेशान भी करती रही है | सम्भवत: इसीलिए हमारे सभी ऋषि-मुनि जंगलों में ही रहे और प्रकृति की गोद में बैठ ब्रहमाण्ड के उन अनसुलझे सवालों से दो-चार होते रहे… जो बातें और ज्ञान हमने कुछ पल की खोज़ में जानने की चेष्टा कर डाली, उसके लिए तो उन्होंने अपना पूरा जीवन ही जंगलों और पहाड़ों में बिता दिया… अकारण नही कि उत्तराखंड की धरती को देवभूमि कहलाने का सौभाग्य प्राप्त है !

प्रकृति की गोद में शुद्ध वातावरण में नाश्ता शहरी लोगों के लिए अविश्वसनीय पल

प्रकृति की गोद में शुद्ध वातावरण में नाश्ता शहरी लोगों के लिए अविश्वसनीय पल

रिसोर्ट की बगल से पडोस के गाँव की तरफ जाता रास्ता

रिसोर्ट की बगल से पडोस के गाँव की तरफ जाता रास्ता

वैराग्य की ये भावनाएं आप पर और अधिक हावी हो जाएँ, इस से पहले ही आपको आपका परिवार याद दिलाता हैं कि अब वापिस चलो भूख लग रही है, और आप अपने भीतर से अंदर तक की इस अंतर्गमन यात्रा को बीच में ही विराम देकर, अपने मन को वहीं भटकता छोड़ अपने शरीर को, उस लोक से इस लोक में यानि रिसोर्ट वापिस ले आते हैं | नाश्ता करके जब बाहर आये, तो कल रात के वो साथी जिन्हें आज वापिस जाना था, बाहर ही मिल गये, सबसे गले मिले, विजिटिंग कार्ड लिए दिए गए और ये वादा भी की सब टच में रहेंगे, फोटो शेयर करने है, और यदि सम्भव हुआ तो फिर कोई ऐसा प्रोग्राम बनायेंगे | एक दूसरे से विदा लेते, सच में ) ऐसा महसूस हुआ जैसे अपने घर से हमारे सगे रिश्तेदार जा रहे हो, इसमें बहुत बड़ा योगदान इस रिजोर्ट का भी था, जाने वालों को तिलक लगा कर, मीठा खिला कर, उनकी मंगलमय यात्रा की कामना की गई और फिर अगली बार अपने और मित्रों सम्बंधियो के साथ फिर आने की आशा, और फिर जाते-जाते ‘हिल विउ’ के नाम के एक-एक चाबी के सुंदर छल्ले, जो उन्हें यहाँ की सुखद याद दिलाते रहें और जो अभी नही जा रहे थे, वो मन्त्र मुग्ध होकर इन क्षणों को महसूस कर रहे थे ! कुछ नये मेहमान भी अब आने शुरू हो चुके थे, और हम निकल चले कुछ आसपास की उन जगहों को देखने जहाँ पर्यटक अक्सर जाते है जैसे टिप एंड टॉप, भुल्ला लेक, एक दो चर्च और गढ़वाल रायफल्स का म्यूजियम आदि, कुल जमा दो तीन घंटो में ही आसपास की कुछ जगहें देख लीं, और कुछ जानबूझ कर छोड़ दी, जिस से अगली बार यहाँ आने का रोमांच बना रहे | जल्दी से घूम-घाम कर, दोपहर का खाना खाने हम रिजोर्ट में वापिस आ गये | एक महत्वपूर्ण बात, यहाँ अधिकतर रिजोर्ट या होटलों का कोई फिक्स मेन्यु नही होता और ना आपकी पसंद की हर चीज़ आपको हर समय तैयार मिल सकती है, 3 से 4 घंटे पहले ही आपका आर्डर ले लिया जाता है, जिस से लैंसडाउन की मार्किट से सामान लाया जा सके, और यदि कोई खास चीज़ ना मिल पाए तो वक्त रहते उसे बदला जा सके i पहाड़ी क्षेत्रों की विषम परिस्थितियों और छोटे बाज़ारों को देखते हुए, ये जायज है | बहुत सम्भव है, यदि आप इस क्षेत्र में आयें तो आपको यहाँ के होटलों में वो सब सुख-सुविधाएँ ना मिलें, जिनके हम शहरी लोग अभ्यस्त हो जाते हैं पर यहाँ की प्रकृति, इसके कण-कण में फैला अनछुया सौन्दर्य और इस जगह की सादगी, हमें उन सब कमियों को नज़रंदाज़ करने पर मजबूर कर देती है |

टिप एंड टॉप, लैंसडाउन का मशहूर पर्यटक स्थल

टिप एंड टॉप, लैंसडाउन का मशहूर पर्यटक स्थल

भुल्ला ताल का स्वागत द्वार

भुल्ला ताल का स्वागत द्वार

भुल्ला ताल, एक प्रमुख आकर्षण

भुल्ला ताल, एक प्रमुख आकर्षण

भुल्ला ताल में धुप सेंकती बतखों का फ़ोटो

भुल्ला ताल में धुप सेंकती बतखों का फ़ोटो

लेंसडाउन में अंग्रेजों द्वारा बनवाया गया चर्च

लेंसडाउन में अंग्रेजों द्वारा बनवाया गया चर्च

विदाई का समय , पूर्ण भारतीय संस्कृति का अनुपालन

विदाई का समय , पूर्ण भारतीय संस्कृति का अनुपालन

अब हमारा भी लौटने का समय आ चुका था, और यहाँ हमे अपने बिताये पलों में जिसकी बड़ी शिद्दत से कमी महसूस हुई थी, वो थे बहुत ही मस्त और औघड़ हस्ती के मालिक और मेरे बहुत ही ख़ास मित्र श्री प्रेम त्यागी जी, यदि वो भी अपने परिवार के साथ हमारे साथ यहाँ होते, तो शायद ये पल कुछ और यादगार हो जाते, मगर इस बात का सकून था कि हमने अकेले ही एक बेहतरीन स्थान और शानदार रिसोर्ट ढूँढ निकाला था, और फिर अगली दफा जब उन्हें साथ ले कर आयेंगे तो केवल यहाँ ठहरना नही होगा बल्कि एक पूरी जंगल सफ़ारी होगी, साथ ही जाना होगा ताडकेश्वर मन्दिर, लेप्पर्दस केव और ना जाने कई और अनजाने स्थान… दिनेश ने गले मिलते हुए वादा लिया कि बहुत जल्दी फिर यहाँ आना है, क्यूंकि अगले कुछ महीनों में वो यहाँ ज़िप लाइन के साथ-साथ कुछ और एडवेंचर स्पोर्ट्स भी शुरू करवाने वाला है, उसे ना कहने का तो कोई सवाल ही नही था और फिर एक पक्के वाले वादे के साथ सबसे विदा लेते हुए हमने अपनी गाड़ी उस रास्ते पर बढ़ा दी जो हमे इस जंगल से निकाल कर एक और कंकरीट के जंगल में पहुंचा देगा, जहाँ हमारा घर है….

37 Comments

  • SilentSoul says:

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    • Avtar Singh says:

      Many thanx Silent Soul for your kind words…. I would love to visit Tarkeshwar, as you suggest. I am just returned from there, but could not go there as roads were not in good condition, and we had Micra, which is not suitable for such roads…. I hope, by God’s grace, next time….

  • ashok sharma says:

    beautiful post,that photograph of sunset is exceptionally nicely taken.

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    • Avtar Singh says:

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  • Very well written post equally supported by beautiful pictures.

    Have been to Lansdowne , never heard about this resort .

    Keep writing …………………….

    • Avtar Singh says:

      Thanx Mahesh Ji for your appreciation… I read your post on D-L-Ggn. Nicely composed and well written and it helped me a lot…
      Yeah, you might not be aware of this resort as it is outskirt of LD and it is just 3 years old.
      I just returned from there on my 3rd visit of the place, which also surprises us itself!!!

  • Nandan Jha says:

    I have same feelings as SS. The treatment to text is similar to what we used to read in old hindi , literary magazines like Yojna/Kurukshetra etc. You indeed have a way with words, especially when it comes to soul-seraching kind of subject.

    • Avtar Singh says:

      Thanx Nandan ji for your kind words. I am feeling speech less and humbled for your comments.

      I will send you a post on the same place in English soon.

  • Abhee K says:

    Beautiful post.Loved reading it.

    Thanks for sharing

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  • Sanjay Tyagi says:

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  • Saurabh Gupta says:

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    • Avtar Singh says:

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      • Saurabh Gupta says:

        I don’t think Nandan Ji will object on the information of resort as it is beneficial for fellow ghumakkar.

        Nandan Ji : Need your permission please.

        • Nandan Jha says:

          Saurabh – Please call me Nandan. :-)

          @ Avtar – A honest hotel review is the most beneficial thing for any traveler. I look forward to it.

          • Avtar Singh says:

            I will try my level best to be unbiased about the place and the owners, but I have visited there thrice so I can understand their problems etc. more deeply than just other guests of the resort. But I am quite sure, this place is ideal for those who love nature and calmness and ready to ignore services which they may find in big city resorts. Before the review I will send my post on it during my Mansoon visit, in English. Thanx

  • Vipin says:

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    • Avtar Singh says:

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  • Very Nice description with beautiful pictures avtar ji. I never got a chance to visit this place.

  • Nirdesh Singh says:

    Hi Avtarji,

    Lansdowne is just incidental in this post. I loved the Hindi writing and it does remind me of my school books.

    Especially liked th eparagraph where you described how we discover ourselves when we walk among the mountains and woods.

    Good Going. Thanks for sharing!

  • Sumit Nirmal Kumar says:

    Namaskaar Avtaarji,

    I have been to Lansdowne but your article is much better than my visit to the place. You have forced me to plan a trip for my family to this place which I dint like the last time. Really liked the way you have put across the place in your words.
    Keep up the good work
    Sumit.

    • Avtar Singh says:

      Thanx Sumit ji for your kind words. Sir, its entirely up to what would be your expectations for the place. If you compare the kind of luxury, one may find in Mussoorie or in Shimla, then it will definitely be disappointing. But if you want to explore the raw nature, then it definitely have lot to offer. Good luck for your visit.

  • AUROJIT says:

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    • Avtar Singh says:

      Hi AUROJIT
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  • AUROJIT says:

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    • Avtar Singh says:

      Its perfectly OK Aurojit. Although for a moment I was in a dilemma for this word, which was totally alien to me….

  • Prem says:

    Dear Avtar j
    After reading your reveiew about your Journey at Lansdowne , we ( including my friends ) enjoyed the review and feeling that we are there ……
    and i am also full agree that if a person realy need to see the beauty of nature , flora n fauna of nature , he should stay at place beyond city ( in between the nature ) , and after reading your review we hope that you stayed at Hill View Shantiraj Resort in that way , we will plan soon with my friends group.
    thanks for very nice sharing…

    • Avtar Singh says:

      Thanx Prem ji for your kind words. Soon I will share a review of this resort for all the ghumakkars. I do hope, after reading that, it will help you to make your mind about, to choose or to avoid that place. Till then, enjoy Ghumakkri….

  • anand says:

    waha ji waha aapka lekh padkar ,,,sachmuch aanand aaya .ek ajib si satunsti mili ,

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