जम्मू से श्रीनगर राजमार्ग पर एक अविस्मरणीय यात्रा

जम्मू तावी की सड़क : सूर्योदय से पहले

सूर्योदय से कुछ पहले, आधे अंधेरे, आधे उजाले में, हैलोजेन लाइटों के प्रकाश में जम्मू की सड़कें इतनी सुन्दर लग रही थीं जितनी पहले कभी भी नहीं लगी थीं । पांच – सात मिनट चलने के बाद ही प्रीतम प्यारे ने कार सड़क के किनारे रोक ली और बोला, “मैं अभी आया। आप भी चाहें तो हल्का हो लें । रात भर की यात्रा करके चले आ रहे हैं।“ खिड़की में से बाहर झांक कर देखा तो दस-पन्द्रह सीढ़ी चढ़ कर एक झोंपड़ी नुमा भवन नज़र आया जिसे सुसभ्य, सुशिक्षित लोग सुलभ इंटरनेशनल के नाम से पुकारते हैं। पहले तो सबने ड्राइवर महोदय को मना कर दिया कि आप ही जाओ पर फिर अपनी अन्तरात्मा में झांका तो सबको लगा कि “यही वो जगह है, यही वो फिज़ा है” (जिसकी हम सब को बहुत जरूरत थी) |

सुलभ शौचालय

जब तक मेरा नंबर आ पाता, मैं सुलभ कांप्लेक्स के काउंटर पर जाकर खड़ा हो गया जहां एक सज्जन गुल्लक लिये बैठे थे। उनके पीछे एक बाबाजी का चित्र लगा था जिनकी एक आंख कुछ छोटी थी। मैने उस चित्र की ओर इशारा करके पूछा कि ये कौन हैं? उसने बताया – “हमारे जम्मू में एक पहुंचे हुए बाबा हैं, एक बार मेरी मां मुझे लेकर उनसे मिलने गयी। । मैं तीन-चार साल से नवीं कक्षा में फेल हो रहा था पर मेरी मां मेरी इतनी सी असफलता बर्दाश्त नहीं कर पाई और मुझे बाबा जी के आगे खड़ा कर दिया और बाबा जी से मेरी पढ़ाई, कैरियर और शादी के बारे में पूछने लगी। बाबा ने मुझसे पूछा कि बच्चा, क्या करना चाहते हो? मैने अपने दिल की बात बता दी कि बाबा, पढ़ने के तो नाम से ही उबकाई आती है, दिल घबराता है। आप मेरे लिये कुछ ऐसा बिज़नेस बताइये जिसमें कुछ भी करना न पड़े । बस कुर्सी पर बैठे रहो, सारी दुनिया काम करे और उलटे आपको काम करने के पैसे भी दे। बाबा कुछ क्षण सोचते रहे फिर बोले, “बेटा, फिर तो तू सुलभ शौचालय खोल ले।“ बस, मुझे उनकी बात भा गई और मैने ये काम शुरु कर दिया। इस शौचालय में जो कुछ भी है, सब बाबाजी का ही प्रसाद है।“

मेरे साथी अपना काम निबटा कर कार की ओर जा चुके थे अतः मैने भी उस युवक का साक्षात्कार वहीं पर लपेटा, फटाफट उस होनहार कारोबारी युवक को पैसे दिये और प्रसन्न वदन कार में आकर बैठ गया। कार की प्रसन्नता का भी पारावार न था, बड़ी अच्छी ’पिक अप’ का प्रदर्शन करते हुए तेजी से अपने गन्तव्य की ओर बढ़ चली ! और भला क्यों न हो? कार पर लोड भी तो कुछ कम हो गया था।


नेट पर मैने जब जांच – पड़ताल की थी तो श्रीनगर और जम्मू के बीच की दूरी 293 किमी बताई गई थी। मुझे लगा था कि अगर 60 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से भी चलें तो लगभग 5 घंटे में श्रीनगर पहुंच जायेंगे। परन्तु हमें श्रीनगर पहुंचने में लगभग 12 घंटे लगे। राष्ट्रीय राजमार्ग 1 A पर चलते हुए आधा घंटा ही हुआ होगा कि हमें इस बात का आभास होने लगा था कि जम्मू की सुरक्षा का उत्तरदायित्व हमारी थल-सेना बड़ी मुस्तैदी से संभाले हुए है। जम्मू काश्मीर में सर्दियों में राजधानी जम्मू में रहती है और गर्मियों में श्रीनगर में शिफ्ट हो जाती है। पूरे प्रशासनिक अमले को जम्मू से श्रीनगर और श्रीनगर से जम्मू स्थानान्तरित करने में लाखों – करोड़ों रुपये खर्च हो जाते हैं पर क्या करें? बेचारे मंत्री और अधिकारी गण न तो श्रीनगर में सर्दियों में रह सकते हैं और न ही गर्मियों में जम्मू में। इस शिफ्टिंग को सेना की सुरक्षा के घेरे में अंजाम दिया जाता है। इस राष्ट्रीय राजमार्ग के विश्वप्रसिद्ध ट्रैफिक जाम की मूल वज़ह यही मानी जाती है।

पर मुझे लगता है कि ट्रैफिक जाम की असली वज़ह वे सब टैक्सी और कार चालक हैं जिनको पहाड़ी सड़कों पर चलने के कायदे-कानूनों के प्रति मन में कोई सम्मान नहीं है। सड़क पर एक बस या ट्रक रुका हुआ देख कर हम उसके पीछे अपनी गाड़ी रोकने के बजाय बगल में से आगे निकलने का प्रयास करते हैं और इस प्रकार एक के बजाय दो पंक्ति बन जाती हैं और सामने से आने वालों के लिये मार्ग अवरुद्ध कर देते हैं। मुझे आश्चर्य होता है कि जिन अधिकारियों के कंधों पर यातायात व्यवस्था को सुचारु बनाये रखने का उत्तरदायित्व है, वह इस अराजकता को देख कर भी इसका उपाय क्यों नहीं करते। सबसे अच्छा उपाय तो यही है कि हर वह वाहन जो लाइन तोड़ कर आगे आये, उससे कम से कम पांच हज़ार रुपये जुर्माना वसूल किया जाये, न दे तो सब लोगों के सामने उसके मुंह पर खींच कर दस-बीस झापड़ रसद किये जायें ताकि उसे जीवन भर के लिये सबक मिल जाये। यह उपाय मैने कैंपटी फाल वाली सड़क पर प्रयोग में लाया जाता देखा है। एक मारुति 800 वाला सौ- दो सौ वाहनों को पंक्ति में लगा देखने के बावजूद ज्यादा स्मार्ट दिखने के प्रयास में लाइन तोड़ कर आगे निकला और कम से कम पचास वाहनों से आगे चलता चला गया। उन वाहनों में हम भी थे जो अपनी कार में बैठे जाम खुलने की प्रतीक्षा कर रहे थे। अचानक महिलाओं के रोने-धोने की और पुरुषों के चीखने चिल्लाने की आवाज़ें आने लगीं। कार में से उतर कर आगे जाकर देखा तो उस मारुति 800 वाले को कार में से बाहर खींच कर उसकी जबरदस्त धुलाई की जा रही थी और उसके साथ की महिलाएं उसे बख्श देने के लिये रो रही थीं। खूब पिटाई करके उसे मज़बूर किया गया कि वह गाड़ी बैक करे और पंक्ति में जाकर खड़ा हो। यदि ऐसा इमोशनल अत्याचार एक दो के साथ करना पड़े तो कर देना चाहिये क्योंकि इससे बाकी जनता को जीवन भर के लिये सबक मिल जाता है और एक समस्या का स्थाई निदान हो जाता है। खैर !    

हमारी ही करतूत से लगते हैं जाम

हमारी ही करतूत से लगते हैं जाम

स्थानीय ग्रामीण लोग वाहन चालकों की नासमझी के मजे लेते हुए

जम्मू से निकलते ही हमने प्रीतम प्यारे को बता दिया था कि हमारा पहला विराम पटनी टॉप में लगेगा। रास्ते में कुद से पतीसा भी लेंगे। घुमक्कड़ डॉट कॉम पर मनु प्रकाश त्यागी की कलम से लिखा गया मजेदार वृत्तान्त मैं पढ़ चुका था जो न सिर्फ पटनीटॉप के बारे में, बल्कि कुद और वहां की पतीसे की दुकानों के बारे में बारे में मनोरंजक जानकारी लिये हुए था। मेरे विचार में सौ किमी की दूरी के लिये अधिकतम दो घंटे पर्याप्त होने चाहिये थे परन्तु सड़क पर मिलने वाले भीषण ट्रैफिक जाम हमारी गति को मंद कर रहे थे।

ऐसे ही एक विलक्षण और ऐतिहासिक ट्रैफिक जाम में पंकज और मैं कार से उतरे और काफी आगे तक जाकर जायज़ा लिया कि करीब कितने किलोमीटर लंबा जाम है। यातायात पुलिस के सिपाहियों को जाम खुलवाने के कुछ गुरुमंत्र भी दिये क्योंकि सहारनपुर वाले भी जाम लगाने के विशेषज्ञ माने जाते हैं। हम अपनी कार से लगभग १ किलोमीटर आगे पहुंच चुके थे जहां गाड़ियां फंसी खड़ी थीं और जाम का कारण बनी हुई थीं। आगे-पीछे कर – कर के उन तीनों गाड़ियों को इस स्थिति में लाया गया कि शेष गाड़ियां निकल सकें। वाहन धीरे – धीरे आगे सरकने लगे और हम अपनी टैक्सी की इंतज़ार में वहीं खड़े हो गये। सैंकड़ों गाड़ियों के बाद कहीं जाकर हमें अपनी सफेद फोर्ड आती दिखाई दी वरना हमें तो यह शक होने लगा था कि कहीं बिना हमें लिये ही गाड़ी आगे न चली गई हो। ड्राइवर ने गाड़ी धीमी की और हमें इशारा किया कि हम फटाफट बैठ जायें क्योंकि गाड़ी रोकी नहीं जा सकती। जैसे धोबी उचक कर गधे पर बैठता है, हम कार के दरवाज़े खोल कर उचक कर अपनी अपनी सीटों पर विराजमान हो गये। पांच सात मिनट में ही पंकज का दर्द में डूबा हुआ स्वर उभरा! “मैं तो लुट गया, बरबाद हो गया।“ मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि पंकज एक मिनट के लिये भी मेरी दृष्टि से ओझल नहीं हुआ था तो फिर ऐसा क्या हुआ कि वह लुट भी गया और मुझे खबर तक न हुई। रास्ते में ऐसा कोई सुदर्शन चेहरा भी नज़र नहीं आया था, जिसे देख कर पंकज पर इस प्रकार की प्रतिक्रिया होती। गर्दन घुमा कर पीछे देखा तो पंकज भाई आंखों में ढेर सारा दर्द लिये शून्य में ताक रहे थे। उनकी पत्नी चीनू ने कुरेदा कि क्या होगया, बताइये तो सही तो बोला, “मेरा मोबाइल कहीं गिर गया।“

कार रोक कर गाड़ी के फर्श की, बैगों की, पंकज ने अपनी सभी जेबों की तलाशी ली गई पर मोबाइल नहीं मिलना था तो नहीं मिला। पता नहीं, सुलभ पर गिरा या चलती कार में उचक कर बैठते समय पैंट की जेब से बाहर सरक गया था। आधा घंटे तक पंकज का मूड ऑफ रहा। फिर थर्मोकोल के गिलासों में पेप्सी पी-पी कर हम सबने ग़म गलत किया और आगे की राह पर बढ़े।

साढ़े आठ के करीब समय हो चुका था । पंकज के बच्चे की भी आंख खुल गई थी और वह भूख से कुनमुना रहा था। चीनू के एक बैग में उसकी पूरी रसोई का जुगाड़ था। मिल्क पाउडर, चीनी, बिजली की केतली, अंतहीन नाश्ता, कल रात के बचे हुए परांठे आदि। हमारे पास भी पूरियां, करेले की सब्ज़ी, चिप्स, चौकलेट, टॉफी, खट्टी-मीठी गोलियां आदि भरपूर मात्रा में थीं। कार रोक कर खाने पीने के दोनों बैग बूट में से निकाल कर आगे ही रख लिये गये। केतली का तो उपयोग हो नहीं सकता था क्योंकि बिजली का कनेक्शन कहां से लाते? अतः किसी चाय की दुकान की प्रतीक्षा होने लगी ताकि पानी उबाल कर बच्चे के लिये दूध बनाया जा सके। जैसे ही एक ऐसी दुकान दिखाई दी, गाड़ी रोक कर इस कार्य को भी सम्पन्न किया गया। [

चलते-चलते कई घंटे हो चुके थे और मेरी गणना के अनुसार पटनीटाप अब तक आ जाना चाहिये था। ड्राइवर महोदय से पूछा कि पटनीटॉप कितनी दूर है। बोला, “अगले टर्न पर आ रहा है। पर इस समय वहां आपको कुछ नहीं मिलेगा। न बर्फ और न ही हरियाली। सीधे चले चलते हैं।“ हम भी जिद पर अड़ गये कि नहीं, हमें तो जाना है। उसने कहा कि ठीक है। पर जाम की वज़ह से काफी देर हो चुकी है। हद से हद एक घंटा रुक कर आगे बढ़ चलें तो टाइम से श्रीनगर पहुंच पायेंगे।“

पटनीटॉप की सड़क पर मुड़ते ही बैरियर मिला तो ड्राइवर ने कहा कि पर्ची के पैसे दे दीजिये। पंकज भाई बोले, “सारे टोल-टैक्स, बैरियर, ड्राइवर के खाने – पीने, पार्किंग सहित रेट तय हुआ था। पैसे आप ही को देने हैं। प्रीतम भुनभुनाते हुए बोला, “मैं कब मना कर रहा हूं। छुट्टे पैसे नहीं हैं, इसलिये आपसे उधार मांग रहा हूं, आप मेरे बिल में से काट लेना।“ पंकज ने संतुष्टि के साथ कहा, “ऐसा है तो ठीक है, ये लो 100 रुपये उधार !” हमारी श्रीमती जी ने बड़ी श्रद्धापूर्ण दृष्टि से पंकज की ओर देखा और फिर आंखों ही आंखों में मुझसे बोली, “देखा, इसे कहते हैं समझदार इंसान ! कुछ सीख लो आप भी !” अट्ठाइस वर्ष पुरानी शादी हो तो मियां बीवी बिना मुंह से कुछ बोले भी एक दूसरे की सारी बातें समझने लगते हैं।

नाग देवता मंदिर के आस-पास गाड़ी रोक कर ड्राइवर ने कहा, “चाय वगैरा जो भी पीनी हो, आप यहां पी लें । एक ओर पहाड़ी थी और दूसरी ओर खाई। खाई की तरफ चार-पांच खोखे टाइप दुकानें थीं । एक ठीक-ठाक सी दुकान देखकर चाय मंगाई, बच्चे के लिये दूध गर्म किया। सड़क पर पड़ी कुर्सियों पर बैठ गये। दुकानदार ने अपनी दुकान के आगे लकड़ी का काउंटर बना कर न जाने कौन – कौन सी जड़ी-बूटियां सजाई हुई थीं । शायद वह चीजें कहवा बनाने के काम आती हैं। ड्राइवर को चाय के लिये पूछा तो उसने मना कर दिया, अभी पांच मिनट पहले के घटनाक्रम के बाद उसका मूड कुछ बिगड़ सा गया था। नाग देवता मंदिर की ओर जाने के लिये जो गली है, उसके मुहाने पर प्याज़ की पकौड़ियां तलता हुआ एक व्यक्ति मिला। उसकी कढ़ाई में जो तेल था, वह काला नहीं, पारदर्शी था। साफ सुथरा का सामान देख कर मैने दो प्लेट पकौड़ी तैयार कराईं और ले जा कर उस मेज़ पर टिका दीं जहां हमारे परिवार वाले चाय की चुस्कियां ले रहे थे। पहले तो सब ने कह दिया कि इतनी सारी पकौड़ी क्यों ले आये? पर फिर खाने लगे तो दो प्लेट का और आर्डर कर दिया। अनारदाने की चटनी के कारण ये पकौड़ी कुछ विशेष स्वादिष्ट लग रही थीं।   

घुमक्कड़ अपनी वामांगिनी के साथ

मंदिर के दर्शन कर हम आगे बढ़े तो एक विशाल प्रकृति-निर्मित पार्क में जम्मू कश्मीर टूरिज़्म कार्पोरेशन की हरी हरी झोंपड़ियां (huts) देख कर टैक्सी रोक दी गई और हम सब बर्फ की उम्मीद में इधर – उधर भटकने लगे। बर्फ मिली तो जरूर पर मिट्टी और घास में सनी हुई। उस बर्फ से खेलने का ख़याल भी मन में नहीं आया, बस उन हट्स के आस-पास दस-पांच फोटो ऐसे खींची गईं मानों हम उस हट में ही सप्ताह भर से रह रहे हों। वहां से बाहर निकले तो देखा कि एक पान वाला अपनी चलती फिरती दुकान सजा कर खड़ा है। उसकी बोहनी कराने के लिये हमने दस-दस रुपये के मीठे पान खाये। मैने बहुत कोशिश की कि एक पान प्रीतम प्यारे को भी खिलाया जाये ताकि कम से कम एक घंटे के लिये तो उसका मुंह बन्द हो सके पर ड्राइवर ने मना कर दिया तो मैने वह पान डैश बोर्ड पर रख दिया जहां मेरा मोबाइल और टोपी रखी थी। रात्रि में श्रीनगर पहुंच कर जब अपनी टोपी उठाई तो उसका हाल-बेहाल था। पान का गुलकन्द टपक – टपक कर मेरी फर की टोपी को बरबाद कर चुका था।

कोई आकर्षक नज़ारा पटनीटॉप में हम देख पाने में असमर्थ रहे। पटनीटॉप से वापस राष्ट्रीय राजमार्ग 1A पर आते समय हमें बहुत सारी बर्फ सड़क के दोनों ओर एकत्र की हुई दिखाई दी पर वह सब कीचड़ की संगति में रहने के कारण बेकार हो चुकी थी और उसमें सौन्दर्य तलाशना उतना ही कठिन था जितना सरकारी कार्यालयों में कर्त्तव्यपरायण और ईमानदार अधिकारी और कर्मचारी खोजना।  

चिनाब नदी के उस पार पहाड़ों पर सीढ़ीनुमा खेत

चिनाब नदी के किनारे किनारे कई मील के सफर के दौरान मैं चलती कार में से फोटो खींच कर अपना मन लगाये रहा और पीछे के सीट पर ये तीनों सज्जन और सज्जनियां बैग में से निकाल निकाल कर कभी बिस्कुट तो कभी नमकीन तो कभी परांठे तो कभी पूरी तो कभी चिप्स खाते रहे। जब कभी मैं उनकी ओर गर्दन घुमाता तो कोई न कोई थैली मेरी ओर भी बढ़ा देते ।

अरे हां, रास्ते में बहुप्रतीक्षित कुद भी आया था मगर प्रीतम प्यारे ने सुझाव दिया कि वापसी में घर के लिये पतीसा पैक कराते ले जाइयेगा, अभी रुकने का कोई फायदा नहीं है। हमने भी प्रतिरोध नहीं किया।

जवाहर टनल से कुछ ही किलोमीटर पहले हमारे टैक्सी चालक महोदय ने एक बड़े खतरनाक मोड़ पर बने हुए ढाबों के आगे कार खड़ी कर दी। यहां से बरनिहाल हाइडिल प्रोजेक्ट के अन्तर्गत बने हुए एक बांध का विहंगम दृश्य दिखाई देता है। ढाबे का नाम शायद लक्ष्मी ढाबा था जो बकौल प्रीतम प्यारे, अपने राजमा-चावलों के लिये जगत् विख्यात है। “जम्मू से श्रीनगर अगर सड़क से जाना हो तो इस ढाबे पर बिना राज़मा-चावल खाये आगे जाना पाप है।“ हम सब ने कहा कि हमारा तो पेट भरा हुआ है, आप खा लो। पर हम वहां के प्राकृतिक दृश्य देखने के मूड से बाहर निकल आये। ढाबे में बहुत भीड़ थी और एक प्लेट राजमा-चावल में नपने से नाप कर पूरे 50 ml. घी डाला जाता देख कर लगा कि यह highly lubricated भोजन शरीर में जायेगा तो पेट के रास्ते में ट्रैफिक जाम जैसी कोई समस्या तो आ ही नहीं सकती! बल्कि पेट के ढलवां रास्ते में ब्रेक फेल होने का भी खतरा है। खाना पेट में बिल्कुल नीली बत्ती वाली वी.आई.पी. कार की तरह सरपट दौड़ता चला जायेगा। (कई-कई किलोमीटर लम्बी गाड़ियों की कतार देखते-देखते दिमाग़ में ट्रैफिक जाम कुछ ज्यादा ही समा गया था शायद इसलिये खाने में भी वही उपमा सूझ रही थीं )!

लक्ष्मी डाबे के राजमा-चावल

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ड्राइवर महोदय की सलाह मानते हुए हमने यह सोच कर एक प्लेट का आर्डर किया कि दो-दो चम्मच हम चारों ही खा लेंगे क्योंकि रास्ते भर खाते हुए आने के कारण भूख तो है ही नहीं। एक प्लेट खा कर लगा कि चलो, एक और मंगवा लेते हैं। फिर दो प्लेट का और आर्डर दे दिया । बैरा हमें मन्द स्मित के साथ निहार रहा था । शायद यह उसके लिये रोज़ मर्रा का दृश्य होता हो। ढाबे के पृष्ठ भाग में जाकर मैने बरनिहाल बांध के कुछ फोटो भी खींच लिये।

बगलियार हाइडिल प्रोजेक्ट प्रगति की ओर

कार जैसे-जैसे जवाहर टनल की ओर बढ़ रही थी, झकाझक सफेद बर्फ से ढकी पीर पंजाल पर्वत श्रृंखला हमें लुभाये चली जा रही थी। मेरा कैमरा चलती कार में से ही क्लिक-क्लिक करता चल रहा था। प्रीतम प्यारे ने कहा भी कि यहां फोटो खींचने के लिये कुछ नहीं है। आगे आपको ऐसे-ऐसे सीन मिलेंगे कि बस।

कुछ ही क्षणों में हम सुरंग के मुहाने पर थे। जम्मू और काश्मीर में दो ही चीज़ें सबसे अधिक इफरात में दिखाई दे रही थीं – एक तो बर्फ से लदे पहाड़ और दूसरे भारतीय सेना के जवान! जवाहर सुरंग के आस-पास फोटो खींचने की इच्छा थी पर अनुमति नहीं थी, चलती गाड़ी में से ही जो मिला, सहेज लिया और एक दशमलव दो किलोमीटर लंबी सुरंग में प्रविष्ट हो गये। यह सुरंग निश्चय ही सिविल इंजीनियरिंग का एक नायाब नमूना है। रेल मार्ग के लिये भी कुछ वर्ष पूर्व एक सुरंग बनानी आरंभ की गई थी जिसके लिये दोनों ओर से खुदाई आरंभ हुई । पर जब दोनों ओर से खुदाई करते करते meeting point आया तो पता चला कि गणना में कुछ गलती हो गई है और दोनों ओर की सुरंग की ऊंचाई अलग – अलग है। वह प्रोजेक्ट अभी तक पूरा नहीं हो पाया है।

जवाहर सुरंग पार करने के बाद पहाड़ से उतरना शुरु किया ही था कि प्रीतम प्यारे ने टाइटेनिक प्वाइंट पर गाड़ी पार्क कर दी। इस टाइटेनिक प्वाइंट का वर्णन और कुछ चित्र मैं गूगल अर्थ पर भी देख चुका था। जिस समय हम वहां पहुंचे, केवल एक परिवार वहां मटरगश्ती करता दिखाई दिया। चाय की दुकान थी, मगर बन्द थी। जब हमारी ’जनानियों’ ने प्रीतम प्यारे को आवाज़ लगा कर चाय के बारे में पूछा तो वह न जाने कहां से उस बन्द दुकान के दुकानदार को पकड़ लाया। उसने अपनी दुकान का अद्भुत दरवाज़ा उठाया, छलांग लगा कर अंदर गया और चाय बना कर दी जिसे पीकर हमारी दोनों महिलाएं ऐसे ही तेजस्वी और ओजवान् हो गईं मानों किष्किंधा पर्वत से हनुमान जी ने संजीवनी बूटी लाकर सुंघाई हो।

अब तक हम कार के सफर से उकताने लगे थे। खास कर मुझे तो अपनी कमर में अकड़न का ऐहसास हो रहा था ऐसे में टाइटेनिक प्वाइंट पर हम आवश्यकता से अधिक देर रुके रहे और अपने अस्थि तंत्र की एक्सरसाइज़ करते रहे। बर्फ का यहां पर भी वही हाल था – घास और कीचड़ में सनी हुई।
टाइटेनिक प्वाइंट से आगे बढ़े तो शाम होने को थी और श्रीनगर पहुंच कर होटल ढूंढने की चिन्ता मन पर सवार होने लगी थी। हरियाली कहीं भूले भटके ही दिखती थी, चिनार के विश्वप्रसिद्ध पेड़ भी बिल्कुल गंजे थे। सड़क किनारे के भवनों पर सेना के जवान दिखाई देते रहे। काफी लंबा सफर अभी भी बाकी था अतः कहीं भी रुके बिना सीधे श्रीनगर पहुंचने का मन कर रहा था। काज़ीगुंड में फिर प्रीतम ने गाड़ी रोक दी और कहा कि यहां से कहवा पीते हुए चलेंगे। मैं चाय नहीं पीता पर कहवा पी लिया, अच्छा ही नहीं, बहुत अच्छा लगा।

श्रीनगर पहुंचते पहुंचते सूर्यास्त हो चुका था। ड्राइवर ने डल झील की मुख्य सड़क बुलेवार्ड रोड के समानान्तर न्यू खोनाखान रोड पर ममता होटल के आगे कार खड़ी की और कहा कि आप इस होटल को देख लें, अगर पसन्द न हो और और होटल भी देख लेंगे। मेरे मन में कल्पना थी कि डल झील के सामने होटल होगा, रात को पानी में झिलमिलाती हुई लाइटें दिखाई देंगी । पर यहां मुझे न तो वह लोकेशन पसन्द आई और न ही वहां रुकने का मन किया। पर होटल के रिसेप्शन पर गये तो उसने कह दिया कि कमरे उपलब्ध नहीं हैं। इसके बाद जब मैने जोर देकर कहा कि बुलेवार्ड रोड पर चलते हैं तो हम सब कार में वापस बैठे और वहां कई होटल में भटके। पर पंकज को इन होटलों के रेट बहुत ज्यादा अनुभव हुए। बोला, “सिर्फ रात – रात की ही तो बात है, सुबह तो हम घूमने निकल ही जायेंगे। कल शाम को कोई और दूसरा अच्छा होटल देख लेंगे।”   मैने उसकी भावना को समझते हुए खो्नखान रोड पर ही अच्छा होटल तलाशने हेतु सहमति व्यक्त कर दी और काफी भटकने के बाद हमें एक साफ – सुथरा होटल – कोहिनूर मिल ही गया जिसने पंकज की जानदार सौदेबाजी के बाद,  800 रुपये प्रतिदिन पर हमें दो कमरे देने स्वीकार कर लिये।   कमरे में सामान टिका कर, गर्म पानी में दिन भर की थकान मिटा कर हम पुनः बुलेवार्ड रोड पर गये और ड्राइवर के सुझाव पर ही “पंजाबी तड़का”  नामक शुद्ध शाकाहारी भोजनालय में खाना खाने पहुंचे।  खाना हमें इतना रुचिकर प्रतीत हुआ कि अगले दिन सुबह का नाश्ता भी हम वहीं करने का निश्चय करके अपने होटल में वापिस आ गये।

श्रीनगर में हमारा मनपसन्द भोजनालय

मित्रों,  इस यात्रा में हमारे सहयात्री बनने के लिये आपका हार्दिक आभार । अगली किश्त में लेकर आ रहा हूं श्रीनगर के विश्वप्रसिद्ध बाग और डल झील में भ्रमण  का किस्सा  !  तब तक के लिये प्रणाम !  गुड डे, वणक्कमैया !  आदाब और सत सिरी अकाल !

35 Comments

  • SilentSoul says:

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        • D.L.Narayan says:

          Heard that there was a mild earthquake in Kashmir recently,,,, ???? ??? ???? ?? ???? ????? ????? ???? ????

  • Surinder.sharma says:

    Very nice description, photos so good. Rs5000 fine is ok for violiting traffic line, but Dhulai little bit odd behind family members. But Indian Police is master in this act.
    Thanks and regards.

    • Sharma Ji, Thanks a lot. I am away from my home and from my laptop, so could not convey my sense of gratitude earlier. Hope you wouldn’t mind it.

      There are diehard professional drivers and neo rich car wallas who have absolutely no regard for law of the land. I have seen people crossing red light on a crossing and when a traffic police officer whistles, they throw Rs. 100/- out of window and move on. I don’t think people of such attitude can be corrected except by performing a good dhulai ! Anyway, thanks again.

      Sushant Singhal

  • Ritesh Gupta says:

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  • AUROJIT says:

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  • Neeraj Jat says:

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  • D.L.Narayan says:

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    Absolutely loved the anecdote of the attendant at the Sulabh complex. Is it real or is it apocryphal ?
    I mean, people hardly interact with them, let alone finding out everything about them,such as:
    1.He failed 9th class 3 or 4 times.
    2, He had a mother who took him to a Godman.
    3. The Godman granted his wish for a job where he is paid to do nothing other than sitting.

    I hope that the Government will not charge entertainment tax from ghumakkars because you have given us much more entertainment than even classics like Chupke Chupke and Bawarchi.
    Just can’t wait for the next installment. Till then,I will keep reading and re-reading the 3 posts you have written so far.

    PS: What is the best medicine for LISA (Laughter Induced Stomach Ache)?
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    • Dear DL,

      Absolutely loved your comment but couldn’t reply earlier since I am away from my home and my laptop. Frankly, this episode doesn’t belong to that particular Sulabh Complex. While writing, an old memory sprang up into my mind and I used it. I hope all authors have this much liberty ! :)

      As regards your stomachache, I am referring the matter to a gynecologist friend of mine. She may recommend you for a thorough check up. It could be something other than LISA also so let’s play safe ! hahahahaha.

      The thought of govt. levying entertainment tax merely because of my posts is definitely worrisome. Let me talk to Pranav Mukherjee. Oh my God ! He is no more the FM of India ! What to do now!

  • Sharma Shreeniwas says:

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  • kavita Bhalse says:

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  • vinaymusafir says:

    jaam lagana amaanviya apraadh hai par hinsa to sahi nahi rahegi, 5000 ka jurmana bhi adhik hi sunaayi deta hai. Main khud is galti ke vipaksh mein hoon.

    Apki lekhan shaili ka jawaab nahi. Apko padhke shayad hamari lekhni mein bhi kucch sudhaar aaye.
    Yatra ke aarambh mein hi mobile khone ki baat padhke dukh hua.

    Yuhi likhte rahiye aur hamein ghumaate rahiye.

    • Dear Vinay Musafir,

      Thank you very much. I am not an authority to decide about the quantum of penalty. It is for the law-makers to decide. But I feel that punishment should be severe in order to be effective and prohibitive. People should not be able to afford the punishment. If they can easily afford it, it is of no use.

      Indian Penal Code was made in year 1860 perhaps. The Govt. has not revised the amount of fine ever since. We are subsidizing crime at the cost of law abiding citizens.

  • Sanjay Kaushik says:

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  • Sanjay Kaushik says:

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    • Surinder Sharma says:

      Dear Sanjay Kaushik,
      Nice Idea U turn. My friend just come from Shri Tirupati Balaji temple and He told same method there. If someone break line, Security Persons send him back to line again.

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  • Nandan says:

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  • anjan says:

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  • Harish Bhatt says:

    Sanjay Ji,

    I have become a big fan of your writing style. Your special comments on wrong doings of the people on the roads which causes traffic jams and other problems and your suggestion to straighten them out tells a lot about your personality and outlook. I will not comment on your hilarity as by now every reader on ghumakkr knows about it. Thank you so much and I eagerly await the progress in the story.

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  • rajesh priya says:

    rok nahi pa rahe hain hun dono apne aapko,shant atma ji ne thik hi kaha hai fatte ukhar diye aapne.baad me comment denge abhi to bas chala aapka aage ka bhag padhne

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  • Praveen Wadhwa says:

    Very funny.
    Thanks for this post.

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