अमृतसर – रामतीरथ – श्री गुरुरामदास प्रकाश पर्व – घर वापसी

रामतीरथ

तीन – साढ़े तीन बजे पुनः आंख खुलीं तो सोचा कि बाज़ार में घूमा जाये। हॉल बाज़ार की दिशा में पैदल ही चल पड़ा।  मुख्य सड़क न पकड़ कर एक ऐसी गली में प्रवेश कर गया जो कपड़े का थोक बाज़ार था।  घूमते – घूमते जब थक गया तो एक टैंपो रोक कर पूछा कि किधर जा रहा है। वह स्टेशन जाने वाला था तो स्टेशन के लिये बोलकर उसमें ही बैठ गया।  होटल से निकला तो कुछ विशेष लक्ष्य नहीं था, पर बाज़ार में घूमते – घूमते मन बन गया था कि रामतीरथ चलते हैं।

लव-कुश के गांव के आधुनिक बच्चे!

त्रेता युग में कलयुगी बच्चे!

रामतीरथ के बारे में पढ़ा था कि यह स्थल अमृतसर से लगभग 11 किमी दूरी पर है।  प्रभु श्रीराम द्वारा परित्याग कर दिये जाने के बाद माता सीता यहां पर ऋषि वाल्मीकि के आश्रम में रही थीं और लव-कुश को जन्म दिया था। दोनों बच्चों की शिक्षा-दीक्षा ऋषि वाल्मीकि की ही देख-रेख में सम्पन्न हुई थी।

यह भी सुना था कि यहां संतानप्राप्ति की इच्छा लेकर महिलाएं आती हैं और मन्नत मांगती हैं जो पूरी भी होती है।  मुझे ऐसी कोई मन्नत नहीं मांगनी थी क्योंकि प्रभु श्री राम के आशीष स्वरूप दो पुत्र हमें प्राप्त हैं।   (मन्नत मांगता भी तो श्रीमती जी की ओर से तो सहयोग मिलने की कोई आशा थी नहीं ! )

रामतीरथ जाने के लिये अमृतसर रेलवे स्टेशन से हर पांच – सात मिनट में लोकल टाइप की बस मिल जाती है।   लगभग 10 मिनट की प्रतीक्षा के बाद मुझे भी रामतीरथ की ओर जाने वाली बस मिल गई।  अमृतसर में आकर जो एक विशेष सुविधा मुझे अनुभव हुई वह ये कि मैने 1975-76 में जो गुरुमुखी लिखनी-पढ़नी सीखी थी, वह अब बहुत काम आई।  उन दिनों मैने और पिताजी ने एक साथ गुरुमुखी सीख ली थी और नये – नये शौक के कारण आपस में थोड़ा-बहुत संदेशों का आदान-प्रदान कर लिया करते थे।

यहां अमृतसर में आ कर हर जगह गुरुमुखी लिपि में ही संकेतक लगे हुए दिखाई दिये। पर मैं उन सबका अपने लायक अर्थ निकाल ही लेता था।  रामतीरथ की बस आई तो उस पर भी जो गुरुमुखी लिपि में रामतीरथ का बोर्ड लगा था, उसे समझ कर उसमें जा बैठा।  “जा बैठा” कहना तो अतिश्योक्ति है, क्योंकि बैठने के लिये स्थान तो था ही नहीं।  महिलाओं को तो हर कोई अपने पास बैठाने को तैयार था, पर इस पुरुष के लिये दस मिनट बाद बोनट पर जगह मिली।  बोनट पर बैठे – बैठे ड्राइवर महोदय से बतियाना शुरु कर दिया और जब उसने बताया कि रामतीरथ आगया है तो मैं वहीं सड़क पर उतर गया।

अमृतसर रेलवे स्टेशन से रामतीरथ हेतु बसें मिलती हैं।

अमृतसर रेलवे स्टेशन से रामतीरथ हेतु बसें मिलती हैं।

आश्चर्यजनक सरोवर

यह गेट रामतीरथ के लिये नहीं है !

रामतीरथ हेतु इस गेट से विपरीत दिशा में जाना होता है!

जिस जगह में उतरा था, वहीं बाईं ओर एक गेट बना हुआ देख कर मुझे लगा कि मंदिर के लिये यही प्रवेश द्वार होगा।  पर एक व्यक्ति ने बताया कि मैं उल्टी दिशा में जा रहा हूं, रामतीरथ मंदिर तो दाईं ओर जाने वाली सड़क पर कुछ आगे जाकर है।  वहां जाने के लिये वाहन कोई नहीं था पर बताया गया कि बिल्कुल पास में ही है, पैदल ही जाया जा सकता है।  बल्कि उन्होंने इशारा करके हनुमान जी की एक विशालकाय मूर्ति की ओर इशारा किया जो मकानों और पेड़ों के पीछे से झांक रही थी और कहा कि मंदिर वही है।

मूर्ति का मुंह दूसरी दिशा में था अतः यह मूर्ति हनुमान जी की है, यह भी वहां पहुंचने के बाद ही ज्ञात हुआ।  खरामा- खरामा चलते हुए मैं मंदिर तक पहुंचा पर मंदिर से दो ही कदम आगे एक विशालकाय सरोवर दिखाई दिया जो सूखा हुआ था। अच्छा गहरा सरोवर था, जिसमें शायद दस सीढ़ियां बनी हुई थीं पर पानी एक बूंद भी नहीं था।  उतना विशालकाय सरोवर मैने शायद अपने जीवन में पहले कभी नहीं देखा होगा।  स्वर्णमंदिर के अमृत सरोवर से भी तीन – चार गुना बड़ा सरोवर !

सरोवर के उस पार बस्ती में जाने वाले लोग शॉर्ट कट अपनाते हुए वे दस सीढ़ियां उतर कर पगडंडी का प्रयोग कर उस पार जाते हैं, वापिस दस सीढ़ियां चढ़ कर उधर की बस्ती में पहुंच जाते हैं।  मुझे लगा कि जब तक सूर्यास्त नहीं हुआ है, इधर – उधर देख लूं, कुछ फोटो खींच लूं।  मंदिर में लौटते समय आऊंगा।  सरोवर के दोनों दिशाओं में आमने सामने के भवनों पर हनुमान जी की लगभग 250 फीट की मूर्तियां स्थापित हैं ।

रामतीरथ जाने वाली सड़क पर हनुमान जी की मूर्ति नज़र आती है।

रामतीरथ चौराहे से मंदिर/सरोवर तक लगभग १ किमी लंबी सड़क

सरोवर के उस पार भी हनुमान जी की एक विशालकाय मूर्ति !

इस सूखे सरोवर के उस पार भी हनुमान जी की एक विशालकाय मूर्ति !

सीढ़ियां उतर कर उस सूखे सरोवर को पगडंडी के रास्ते पार करके मैं सामने वाली उस बस्ती में पहुंचा तो लगने लगा कि किसी दूसरी ही दुनिया में पहुंच गया हूं। यह कहना ज्यादा सही लगता है कि वह सरोवर एक टाइम मशीन था, जिसमें प्रवेश किया तो कलयुग था पर जब उस पार जाकर मशीन से बाहर निकला तो त्रेतायुग में आ गया था।  सीता मैया की झोंपड़ी जिसमें वह रहती थीं,  रसोई जिसमें वह खाना बनाया करती होंगी, वह सरोवर जिसमें स्नान-ध्यान चलता होगा, वह कुआं जो सीता मैया के लिये उनके अनन्य सेवक हनुमान जी ने खोद कर दिया था, सब कुछ ऐसा लग रहा था कि बस!  शब्दों में व्यक्त कर पाना मेरे लिये कठिन हो रहा है।

पराकाष्ठा यह है कि सीता मैया की रसोई के पास सरोवर की सीढ़ी पर एक झुमका पड़ा दिखाई दिया तो मन में एकदम ख्याल आया कि शायद ये झुमका उस समय से यहीं पड़ा हुआ है जब रावण द्वारा हरण कर लेने के बाद वह आकाश मार्ग से लंका ले जाये जाते समय रास्ते में यह सोच कर अपने आभूषण गिरा रही थीं कि शायद इनको देख कर किसी को उनका अता-पता मिल सके ।

 

एक तिहाई सरोवर सूखा और दो तिहाई पानी से लबालब भरा हुआ !

एक तिहाई सरोवर सूखा और दो तिहाई पानी से लबालब भरा हुआ !

 

सीता मैया के लिये हनुमान जी द्वारा खोदा गया कुआं

सीता मैया के लिये हनुमान जी द्वारा खोदा गया कुआं ।

एक बड़ी विचित्र चीज़ जो वहां दिखाई दी।    जिस स्थान पर पगडंडी थी, सरोवर का वह क्षेत्र सूखा हुआ था, पर इस ओर आकर दिखाई दिया कि केवल आधा सरोवर ही सूखा हुआ है। सरोवर की आधी लंबाई के बाद एक बांध जैसा कुछ बनाया हुआ है और उस बांध के बाद आधा सरोवर पानी से लबालब भरा हुआ है।

और आगे बढ़ा तो पता चला कि ये सरोवर वास्तव में अंग्रेज़ी के L आकार में है जिसकी एक भुजा में पानी की कोई कमी नहीं है और दूसरी भुजा को भी बांध बना कर बराबर – बराबर दो हिस्सों में बांट दिया गया है, आधा बिल्कुल सूखा और बाकी आधा पानी से लबालब भरा हुआ।  यहीं सरोवर के तट पर मुझे एक छोटा सा भवन दिखाई दिया जिसके बाहर दीवार पर चॉक से लिखा हुआ था कि वह भगवान वाल्मीकि का मंदिर है।

अन्दर एक बच्चा मौजूद था जो लव-कुश की ही आयु का रहा होगा पर उसने अपना नाम रजत बताया।  उसने बड़े चाव से मुझे दिखाया कि यहां बैठ कर लव-कुश पढ़ते थे, यहां सीता मैया के पांव के निशान हैं।  मुझे लगता है कि इस स्थान के साथ जुड़ी अनेकानेक किंवदंतियों को देखते हुए वहां के लोगों ने ऐसे अनेकानेक भवन बना लिये हैं। अब इनमें से authentic कौन सा है, कहना कठिन है।  पर हां, जो सीता माता का कुआं वहां पर देखा, वह जरूर अपने आप में विशिष्ट लगा।

एक डेढ़ घंटे वहां घूमते – फिरते, झोंपड़ियां देखते – देखते एक पर्यटक परिवार दिखाई दिया।  उस ग्रुप की एक महिला को मोबाइल पर बात करते देख कर सहसा झटका लगा।  मैं त्रेतायुग से एक झटके से वापस अपने कलियुग में आ गया।  बस, फिर उसके बाद वापस पगडंडी के मार्ग से शुष्क सरोवर में से होते हुए मैं उस स्थान पर आया जहां मुझे मंदिर दिखाया गया था।  जैसे ही मंदिर में प्रवेश किया, वहां लाइट चली गई।  लाइट कब आयेगी, इसका कुछ भरोसा नहीं था, अंधेरा भी हो चुका था अतः वापस बस पकड़ने के लिये हाइवे तक पैदल ही आया। कुछ ही देर में बस मिल गई जिसने मुझे बस अड्डे पर छोड़ दिया।

 

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यहां पर लव-कुश ने प्रभु श्री राम के अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को बन्दी बना कर रखा था।

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सीता मैया की कुटिया में जाने हेतु मार्ग

बस अड्डे से बाहर निकल कर पैदल आगे बढ़ा तो बाज़ार में लगभग हर दुकान पर मोमबत्तियां जलती हुई देखीं जैसा कि दीवाली पर होता है।  तभी आकाश में आतिशबाजी होती दिखाई दी।  सहसा ध्यान आया कि आज गुरु रामदास जी का प्रकाशपर्व है और यह सारी आतिशबाजी वहीं स्वर्णमंदिर परिसर में हो रही है।  बस, फिर क्या था।  लगभग भागते हुए मैने स्वर्ण मंदिर की ओर बढ़ने की चेष्टा की। पर मुझे लग रहा था कि अभी स्वर्णमंदिर दूर है और पूरा अमृतसर उधर ही उमड़ा जा रहा है।  एक रिक्शा रोक कर मैं पांच मिनट में स्वर्ण मंदिर के घंटाघर वाले गेट के पास उतरा। (उसने भी तीस रुपये मांगे थे जबकि बात बीस रुपये में तय हुई थी पर मेरे पास झकबाजी करने के लिये समय नहीं था अतः तीस रुपये ही दे दिये)।

जान बची और लाखों पाये

 

बेइंतहाशा भीड़ देख कर मंदिर के भीतर जाने की हिम्मत नहीं हुई।  अचानक वहीं संकरी सड़क पर यात्रियों का एक रेला सा आया और बिना इच्छा के मैं धकेला जाने लगा।  Stampade में फंस रहा हूं, यह अनुभव करते हुए मैं किसी तरह से भीड़ में से अपने को अलग करते हुए सड़क के किनारे पहुंचा और प्रयास पूर्वक एक चबूतरे पर खड़ा हो गया।  शुक्र यही रहा कि वहां किसी भी व्यक्ति के साथ किसी प्रकार की कोई दुर्घटना नहीं हुई।

रेला आया और चला गया।  आतिशबाजी समाप्त हो चुकी थी पर पूरा स्वर्णमंदिर परिसर लाखों बल्ब के प्रकाश में जगमगा रहा था। सड़क पर खड़े होकर सिर्फ घंटाघर, प्रवेश द्वार और वह कमरे दिखाई देते हैं जिनमें प्रथम तल पर म्यूझियम है। स्वर्ण मंदिर व परिक्रमा पथ देखने के लिये कोई ऊंचा स्थान चाहिये था।  मन बहुत बेचैन हुआ। काश, मैं किसी तरह से इस दृश्य को किसी ऊंचे भवन से देख सकूं और अपने कैमरे में सहेज सकूं ।  अपने होटल की टैरेस से भी प्रयास किया किन्तु पूरा दृश्य नज़र नहीं आ रहा था क्योंकि कुछ और भवन आगे अड़ गये थे।  परेशान सा मैं इधर – उधर भटकने लगा।  एक चार-मंजिला शोरूम स्वर्णमंदिर के ठीक सामने उपस्थित था। हद से हद मना ही तो कर देंगे, यह सोच कर मैं शोरूम में प्रविष्ट हुआ। एक सिक्ख युवक दिखाई दिया तो पूछा कि क्या मैं दो-चार फोटो लेने के लिये उनकी छत पर जा सकता हूं?

उस युवक ने अपने पिता से पूछा तो मैने पुनः उनसे विनती की कि कुछ फोटो खींचने की इच्छा है अगर वह कृपा कर दें तो!  उन्होंने अपने बेटे को आदेश दिया कि इनको ऊपर ले जाओ।  दुकान में लिफ्ट लगी हुई थी अतः वह युवक मुझे लिफ्ट में अपने साथ सबसे ऊपर छत पर ले गया, जहां उनके परिवार के ढेरों सदस्य – महिलाएं, बच्चे, और शायद कुछ मेहमान भी मौजूद थे। वहां से स्वर्ण मंदिर की ओर देखा तो आंखें चौंधिया गईं ।  क्या अद्‌भुत दृश्य था।  जो दृश्य अमृतसर वालों को भी साल में एक – आध बार ही देखने को मिलता होगा, संयोगवश आज मुझे उपलब्ध हो गया था।  मुझे वास्तव में ऐसा लगा कि आज मेरी तो लाटरी लग गई है।   मैं छत की मुंडेर पर कैमरा टिका कर उस अद्‌भुत नज़ारे को देखता रहा, फोटो खींचता रहा।

श्री गुरु रामदास जी के प्रकाश पर्व पर स्वर्णमंदिर की शोभा

श्री गुरु रामदास जी के प्रकाश पर्व पर स्वर्णमंदिर की शोभा

उस युवक ने ऊपर छत पर आकर मुझे बांस की एक सीढ़ी दिखाते हुए कहा था कि यदि मैं चाहूं तो इस सीढ़ी से ऊपर ममटी तक भी जा सकता हूं।  उस समय तो मुझे सीढ़ी पर चढ़ने के नाम से घबराहट हो रही थी पर दस – पांच मिनट बाद लगा कि यदि और ऊपर जाया जा सके तो और बेहतर दृश्य मिल सकता है।  सीढ़ी पर पांव रख कर ऊपर चढ़ने लगा तो वह बुरी तरह से कांपने लगी। आहिस्ता-आहिस्ता एक- एक डंडे पर पैर रखते हुए मैं लगभग आधी ऊंचाई तक चढ़ गया और वहां से जो दृश्य मिला वह मेरे मेरे दिल में हमेशा – हमेशा के लिये अंकित हो गया है।

A short video of Golden Temple prepared by me.

घर वापसी

कैमरे की बैटरी को पूरी तरह से खाली करके और मैमोरी कार्ड को पूरी तरह से भर कर मैं सीढ़ी से वापस उतर आया और लिफ्ट पकड़ कर वापस नीचे शोरूम में आया।  अपना आभार व्यक्त करने के बाद अपने होटल में गया।  कमरे में आकर महसूस हुआ कि पैरों की हालत दर्दनाक थी, पूरे शरीर की हड्डियां भी शबद कीरतन करने लगी थीं।  आज शायद पूरे दिन में मैं इतना अधिक पैदल चला था जितना अपने सहारनपुर में महीने भर में भी चलने की जरूरत नहीं पड़ती।  गर्म पानी लेकर नहाया, रात को एक हलवाई की दुकान पर जाकर कढ़ाये का गर्मागर्म दूध पिया ।

वैसे अमृतसर वासी दूध और लस्सी के ही नहीं बल्कि पानी पताशे और चाट के भी बहुत अधिक शौकीन हैं।  मुझे अमृतसर में जितने अधिक पानी पताशे वाले सड़कों पर नज़र आये, उतने मैने और किसी भी शहर में नहीं देखे।   खैर, मैने तो गिलास भर दूध पिया और दूध पीकर निर्मल आनन्द की प्राप्ति हुई।   थकान बहुत अधिक हो चुकी थी, अतः  रिसेप्शन पर बोला कि मुझे सुबह पांच बजे उठा दिया जाये ।  उन्होंने ’पक्का वायदा’ किया कि ठीक है, मुझे सुबह पांच बजे उठा दिया जायेगा।   उसके बाद मैं कमरे में आकर सो गया।   जूते उतारने, कपड़े बदलने की भी हिम्मत नहीं थी ।  आधी रात को आंख खुली तो  लेटे – लेटे जूतों में पैर का अंगूठा फंसा कर जूता पैर में से फर्श पर गिरा दिया,  हाथ बढ़ा कर कमरे की लाइट ऑफ कर दी।

इन सारी हरकतों को मैं अपने घर में करने की हिम्मत नहीं कर सकता था,   पर वहां भला मुझे किसका डर था?   श्रीमती जी तो मुझसे 500 किमी दूर थीं!   मेरे बिस्तर पर कैमरा, लैपटॉप,  बैग, कपड़े,  कंघा,  ईयरफोन, कमरे की चाबी, कुर्ता पायजामा सब कुछ पड़ा हुआ था।  यह सुविधा भला अपने घर में कहां !   घर पर तो सब काम सलीके से करना पड़ता है!   चलो, खैर !  ये तो मेरे दिल का दर्द है जो अपने दोस्तों के बीच में बैठा हूं तो बांट लिया।  वह भी इसलिये कि घुमक्कड़ साइट पर हमारी श्रीमती जी कभी आती ही नहीं अतः मामला सुरक्षित है!

सुबह पांच बजे आंख खुली, आधा घंटे में नहा धोकर अपने बैग वगैरा पैक किये।  कमरे में, बाथरूम में कहीं कोई सामान छूट तो नहीं गया है, देखा। रिसेप्शन के पास सोफे पर सोये हुए व्यक्ति को जगाया और इस बात के लिये उसकी खिंचाई की कि उसे सुबह पांच बजे मुझे जगाने की ड्यूटी दी गई थी पर वह खुद पड़ा हुआ सो रहा है।   उसने अपनी सूजी हुई नाक दिखाई ।  मैने पूछा, “क्या हुआ?”   बोला, 101 नंबर कमरे के बजाय 201 नंबर वालों को सुबह पांच बजे दरवाज़ा पीट – पीट कर उठा दिया था।   बस, सरदार जी ने एक घूंसे से ये हाल कर दिया।

मैने उसे सांत्वना दी,  बाकी भुगतान करके सड़क पर आया और  स्वर्णमंदिर की ओर एक बार फिर शीश नवाया,  रिक्शा पकड़ कर स्टेशन पहुंचा ।  प्लेटफार्म नंबर १ से अमृतसर-हरिद्वार जनशताब्दी सुबह सात बजे मिलने वाली थी।  स्टेशन पर ही एक बर्गर और एक चीज़ सैंडविच खरीद कर भोग लगाया और गाड़ी आकर खड़ी हुई तो पुनः C1 में अपनी सीट ग्रहण कर ली। थकान अभी भी बहुत अधिक थी, अतः वापसी यात्रा लगभग सोते हुए ही पूर्ण की।  साढ़े बारह बजे के लगभग सहारनपुर स्टेशन पर उतर कर बैंक की राह ली !

अमृतसर की यह यात्रा इस अर्थ में विशेष रही कि मुझे कहीं पर भी कुछ नकारात्मकता का सामना नहीं करना पड़ा। जिस किसी से भी बात हुई, सबका व्यवहार बहुत अच्छा, स्वागतपूर्ण लगा। यदि धार्मिकता हम सबको ऐसी ही मृदुता, निश्छलता, सकारात्मकता से ओत-प्रोत कर देती है तो ऐसी धार्मिकता को कोटि-कोटि प्रणाम !   आपने इस लंबे सफर में मेरा बखूबी साथ निभाया, इसके लिये आप को भी कोटिशः अभिनन्दन !  नमस्कार!

31 Comments

  • Prakash Yadav says:

    Bahut Khoob Sushant Ji….
    Ek Baat to Hai ki Harmandar Saahib mein jo hai woh aur Kahin Nahin….

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  • Mukesh Bhalse says:

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  • parveen says:

    excellent

  • Surinder Sharma says:

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    • Dear Sharma Ji,

      Thank you very very much. I will try to provide a link to my video of Golden Temple which I had made. Three different and knowledgeable persons (You, Nandan and Tridev Charan Ji) have referred to Amritsar as Ambarsar. Is the original name of modern Amritsar is Ambarsar ? Please enlighten me.

      Regards,

      Sushant Singhal

      • Surinder Sharma says:

        AMBARSAR

        • Surinder Sharma says:

          Ambarsar is folk name people used from centuries. But there was story crows dip in water and they became White Hans (Swan). Rajni, youngest daughter of Rai Duni Chand, was sitting with her sisters admiring some new clothing they all had received from their father. The girls were ecstatic and exclaiming how good their father was to them. Rajni observed that all gifts are ultimately from God. Their father was merely an instrument of His greatness. Unfortunately for her, he overheard her comment and became very angry.

          Rai Duni Chand married her to a leper with a taunt that he would see how her God would help her lead a normal life. The leper was severely disfigured and a foul smell came from his body. The poor girl had accepted her fate ungrudging and worked hard to maintain herself and her crippled husband. She kept repeating the name of God, and was certain that he was testing her with this turn of events. She was forced to beg for a living. Still she bathed and fed her leper husband, never losing faith. One day, she reached the site of a pool on her way to a neighboring village. Placing the basket containing her husband by the side of the pool, she had gone oft on an errand, most probably to look for food. In the meantime, her crippled husband had seen a black crow dip into the water of the pool and come out white. Amazed at this miracle, the man crawled up to the edge of the pool and managed a dip. He found himself completely cured. When his wife returned, she was amazed to find her husband in good health. He was handsome and whole. At first, she was alarmed and suspected that he might be a different person. He had, however, kept one finger with leprosy marks un-dipped. He showed her the diseased finger as proof of his identity. The couple thanked God, and went to the Guru to seek his blessings. ( From Wiki)

          So Amritsar (Sarover of Amrit) is real name but people pronounce Ambarsar.

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  • Kavita Bhalse says:

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  • Ritesh Gupta says:

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  • Amitava Chatterjee says:

    Very well written story.

    The story of ‘Sita and Luv and Kush’ at Amritsar is new to me – I was not aware of the place. We stayed there for few days and will surely visit there in our next visit.
    When I was thinking to ask whether you have taken permission from Mrs. Singhal or not – it was clear from the next line.

    Like you, I have never learned Hindi and my hindi is very poor. I can read Hindi because I know Sanskrit and can still manage, though very slowly…my son’s hindi is already better than me…enjoyed the post…there was some debates but I think that is healthy and hope you don’t mind for that…

    Do take care of yourself and keep travelling, we will wait for your next

  • Mahesh Semwal says:

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  • D.L.Narayan says:

    Thanks, Sushant for the darshan of Ram Tirath, the place where Maa Sita Devi spent her exile and brought up her twins. Also enjoyed the story of the attendant who gave the wake up call at the wrong address and ended up with a swollen nose. The videos too are amazing.

    It is sad that the income of the Ramtirath temple is insufficient to maintain it. What makes it worse is a banner at the entrance which has images of ostensibly holy men on it. I wonder why they spent the money on a banner but find it hard to mobilise the funds required to carry out essential maintenance.

  • Vipin says:

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  • Nandan Jha says:

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  • Nirdesh says:

    Hi Sushantji,

    Thanks for taking us out on Amritsar tour. Ramtirath was news to me. Maybe next time.

    Taking off from DLs comment about the banner in front of the temple, this is de rigueur for every temple across India.

    I just dont understand why. Other paraphernalia includes tonnes of cable wire hanging all around with nails stuck in the stone work. If not holy men on banners, it will be local politicians. The banner will have the most garish colour clashing with the surroundings. There will be an ugly telecom ad board stuck in the ground in front of the door. There will be uglier tinshed shops sharing walls with the temples. The notice boards put up by the local committe, police station, ASI will be even more prettier embellishments. Recently, I saw this in front of the Kedarnath temple in one of the recent posts, temples in Hampi, and everywhere else.

    Someone please make this stop.

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  • B K JHA says:

    Really enjoyed, the style of telling all about of journey. You experienced after visiting the place but i enjoyed more than you only by going through your live and interesting description.

    • Dear Mr. Jha.
      Thank you very much for coming to the post and liking it. You may like it more if you start reading the story from the start. There are 5 or six posts related to this trip.
      Best,
      Sushant Singhal

  • Arun says:

    Great post sir…enjoyed thoroughly.

    Regards,
    Arun

  • Mahesh Punde says:

    Hi SUSHANTJI,
    Enjoyed your post and get inspired to visit Amritsar at once. I must appreciate your command over the language. You have shown your skills to attract people to read your post. Your sense of humour is also very nice. Keep it up Sushantji.

  • Dear Mahesh ji,
    Thank you very much for your kind words of appreciation. I am happy to find you sufficiently motivated to.visit Amritsar.
    It is the last episode of my Amritsar series. If you go through earlier posts also, you may find them useful while visiting there.

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