माँ चंडी देवी, हरद्वार की यात्रा

फेस्टिवल्स की भरमार, परीक्षाओ के दौर और ऑफिस का प्रेशर अब कुछ काम होने लगे थे। साथ ही में तीन दिन की सरकारी छुट्टी भी आ रही थी जिसमे वैसाखी का त्यौहार और उसमे पवित्र गंगा स्नान का अपना ही महत्त्व है। सर्व सहमति से यह तय हो गया की शुक्रवार को, जिस दिन कुछ समय के लिए वैसाखी भी रहेगी और गुड फ्राइडे भी होगा, हम लोग दिल्ली से हरद्वार की यात्रा पर निकलेंगे। दिनांक 14 अप्रैल को सुबह चलने और दिनांक 16 अप्रैल वापिस आने का समय निर्धारित किया गया। अपनी सुन्दर, सस्ती और टिकाऊ विश्वसनीय वैगन-र का पेट पेट्रोल (रुपये 2100/-) से भरने के पश्चात हमने अपनी यात्रा का शुभारम्भ किया। अब आप लोग सोचेंगे की हरद्वार यात्रा के विषय में पहले ही दो पोस्ट प्रकाशित कर चूका हूँ तो इस बार फिर से क्यों, तो प्रिय पाठकों इस बार कुछ नया करने की चाह में हम लोग माँ चंडी देवी के मंदिर और माँ अंजनी देवी के मंदिर जाकर उनके दर्शन करके आये थे तो सोचा आप लोगों के साथ भी साँझा कर लूँ।

हरद्वार पहुँच कर रेलवे स्टेशन में रुपये 30/- प्रतिदिन के हिसाब से कर पार्किंग कर दी गयी और साथ ही हर की पौढ़ी पर रूपये 1650/- प्रतिदिन के हिसाब से एक वातानुकूलित (जिसकी आवश्यकता नहीं थी) कक्ष भी बुक कर लिया गया। पहला दिन तो सफर करने, गंगा पूजा और आरती में शामिल होने व् खाने पीने में ही बीत गया और बाकी बचा समय अपने कमरे में बुद्धू बक्से के सामने बिता दिया गया।

गंगा माँ की एक झलक

गंगा माँ की आरती

अगले दिन (शनिवार) की शुरुआत पवित्र गंगा स्नान के साथ हुयी और अब बारी थी माँ चंडी देवी के मंदिर जाकर दर्शन करने की। इन दिनों पहाड़ी मौसम के हिसाब से सुबह से शाम तक कड़क धूप खिली हुयी थी और रात भर ठंडी-ठंडी बयार बहती थी, कहने का मतलब है की मौसम कुछ-कुछ खुशनुमा था और श्रद्धालुओं की रेलम-पेल तो पूछो ही मत। हर की पौढ़ी से लगभग एक किलोमीटर पैदल चलने पर माँ मनसा देवी के मंदिर की चढ़ाई जहाँ से शुरू होती है वहीँ पर आपको विक्रम ऑटो वाले मिल जाते है जो आपको माँ चंडी देवी के मंदिर ले जाने के लिए आतुर रहते है। एक से पुछा तो उसने आने और जाने दोनों का किराया बताया रूपए 500/- जो की जेब और समझ के हिसाब से अनुचित था।

दुसरे से बात की तो तीन सबारी जानकार रुपए 150/- में एक तरफ जाने का तय हुआ, लो जी बन गयी बात और हम झट से उसमे बैठ कर अगले 15 मिनट में माँ चंडी देवी उड़न खटोला टिकट घर के बाहर पहुँच गए। यहां प्रति व्यक्ति टिकट दर रुपये 163/- है जिसमे उड़न खटोले से जाना और आना दोनों हो जाता है, बस आपको धैर्य के साथ अपनी बारी की प्रतीक्षा करनी पड़ती है, जिसमे एक से दो घंटे का समय लग जाता है।

माता के जिस स्वरूप की हम बात कर रहे है उसका थोड़ा व्याख्यान करना तो बनता है। तो प्रिय पाठकों माँ चंडी देवी का मंदिर नील पर्वत पर स्थित एक सिद्ध पीठ के रूप में प्रसिद्ध है। कहा जाता है की आठवीं शताब्दी में प्रसिद्ध हिन्दू धर्म गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा माता की मूर्ति की स्थापना यहाँ पर की गयी थी। इस स्थान से जुडी एक पौराणिक कथा यह है की शुम्भ-निशुम्भ नामक राक्षसों, जिन्होंने इंद्रा का साम्राजय अपने अधिपत्य में ले लिया था, का वध करने के बाद माता चंडी देवी, जिनकी उत्पत्ति देवी पारवती के अंश से हुयी थी, यहाँ पर कुछ समय के लिए विश्राम करने हेतु रुकी थी।

माता का सौंदर्य इतना विस्मयकारी था की शुम्भ उनकी तरफ आकर्षित हो गया और स्वयं का विवाह प्रस्ताव ख़ारिज हो जाने के पश्चात एक भयंकर युद्ध का प्रारम्भ हुआ जिसका साक्षी यह नील पर्वत बना और अंततः काल ने शुम्भ-निशुम्भ और चण्ड-मुंड जैसे पापी राक्षशों को निगल लिया। कहा जाता है की माता के मंदिर में जाकर जो भी मन्नत मांगी जाए वह अवश्य ही पूरी होती है।

इस बार नवरात्री में माता के दर्शन करने थे जो हरद्वार जाकर अच्छे से हो गए और माता के मंदिर प्रांगण से हरिद्वार और माँ गंगा के बड़े ही मनोरम दृशय भी दिखाई देते हैं। उड़न खटोले की यात्रा भी दिलों की धड़कन बढ़ा देती है क्यूंकि ऊंचाई बहुत अधिक है और उस पर धीरे धीरे चलता उड़न खटोला, बस सांस रोक कर मंजिल तक पहुँचने का इंतजार रहता है।

माँ चंडी देवी मंदिर से एक मनोहारी दृश्य

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रोप वे

यहीं पर दो सौ मीटर के दायरे में माता अंजनी देवी और उनके पुत्र हनुमान जी का भी मंदिर है जिसे माँ-बेटे का मंदिर भी कहा जाता है। प्रसाद के रूप में आप चाहें तो एक दौना लड्डू (4 पीस, मूल्य केवल रूपए 20/-) चढ़ा सकते है। यहां भी दर्शन करने के बाद और कुछ समय विश्राम करने के बाद अब हम लोग वापिस उड़न खटोले से पहाड़ी से नीचे उतर आये। फिर से विक्रम ऑटो में बैठ कर (रुपये 150/-) हम लोग अब वापिस हर की पौढ़ी लौट आये। दोपहर का खाना खाने के बाद कुछ देर अपने कमरे में विश्राम किया और शाम 4 बजे चाय पीने के बाद माताश्री और बहना ने स्थानीय बाजार में कुछ खरीदारी करने और मैंने माता मनसा देवी जाने का तय किया। शाम 6 से हम लोग फिर गंगा माता के मंदिर के समीप सीढ़ियों पर जाकर बैठ गए जहाँ पहले से ही मौजूद जनसैलाब माता की आरती की प्रतीक्षा कर रहा था।

गंगा घाट पर

भीड़-भाड़ और कौतुहल से भरपूर हर की पौढ़ी में गंगा आरती में शामिल होने के पश्चात रात का भोजन किया और जान-पहचान वालों के लिए कुछ मिठाइयां खरीदी। देखते ही देखते दो दिन कब बीत गए पता ही नहीं चला और तीसरे दिन रविवार को हम लोग सुबह का नाश्ता करने और घर के लिए गंगा जल की केन भरने के बाद 10.30 बजे दिल्ली के निकल गए। हालाँकि रस्ते में जगह जगह निर्माण कार्य और सड़क की मरम्मत का काम चल रहा था जिसके फलस्वरूप आने और जाने में हर बार 7 घंटे का समय लग गया। संभवतः माता रानी के आशीर्वाद से हम लोग सकुशल अपने निवास स्थान पर शाम 6 बजे पहुँच गए और इस प्रकार हमारी इस सुखद यात्रा का समापन हुआ। अगले दिन से अपनी नियमित दिनचर्या का पालन भी तो करना था।

जय माता दी।

  • Animesh Das

    bahut khubsurat post hai arun ji….short trip ka maza hi kuch aur hota hai….aapki post pad ke man khush ho gaya……

    • Arun Singh

      अनिमेष जी,
      पोस्ट को पढ़ने और सराहने के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया।
      अरुण

  • Muskan

    what a religious place to be connected to god and self….
    thank you for sharing!!!

    • Arun Singh

      मुस्कान जी,
      हरद्वार एक ऐसा स्थान है जहाँ पर जाकर आध्यात्मिक रूप से तन और मन दोनों को ही शांति मिलती है। आरती के समय भी ऐसा समा बंधता है की पूछिए ही मत। पोस्ट को पढ़ने और सराहने के लिए धन्यवाद।
      अरुण

  • बहुत अच्छा लेखन हैं आपका , अरुण जी। जब भी मैं गंगा आरती के बारे में पढ़ती हूँ तो मुझे रोमांचक लगता हैं। ज़िन्दगी में एक बार देखने कि आशा हैं, देखते हैं कब वह सपना साकार होगा।

    आपकी पर्यटन की और कहानियाँ पढ़ने की आशा हैं।

    • Arun Singh

      अर्चना जी,
      आप किसी भी मौसम में हरद्वार यात्रा का लुत्फ़ उठा सकती है। मात्रा 3-4 दिनों का भी कार्यक्रम यदि आप बनाएंगी तो नीलकंठ मंदिर, मनसा देवी मंदिर, चंडी देवी मंदिर और ऋषिकेश जैसे प्रमुख स्थानों पर घूम कर आ सकती हैं। परिवहन और ठहरने की भी कोई समस्या नहीं है।
      पोस्ट को पढ़ने और सराहने के लिए धन्यवाद।
      अरुण

  • My first car was a Wagon-R too and I did a lot of trips on this trusted set of wheels. I must have been to Haridwar a lot of times but could never make it to Mansa Devi or to use the ropeway. Looks like, I will make use of logs like these in my Banprashta :-).

    Thank you Arun for the warm and positive log on Haridwar.

    • Arun Singh

      _/_ Nandan Sir,

      As far as I am concerned, a well traveled person like you never reaches Vanaprastha…please leave it for us. Metal wise not sure, but yes wagonr is a great machine. Try once the thrill of rope-way during off-season since Haridwar and its temples becomes unmanageable during festivals and puts more burden on pockets too.

      Thanks for your time and consideration!

      Arun

  • Pooja Kataria

    Arun Ji,
    I have read your post few days back but could not find time to say anything about it.
    It is remarkable that you visited quite a few places in just two days and had time to relax too. Short trips are always nice and especially when the destination is so beautiful and divine.
    I remember visiting Haridwar and Rishikesh during my school days and attended ganga Arti though my memories have fade away about my then experience but through your post I feel like re living those moments.
    I never got a chance to visit Chandi Devi Mandir so I thank you that through this travel post I could read about it.
    Many thanks!

    • Arun Singh

      Pooja Ji, thanks for liking the post.
      Of course short trips are always nice e.g. last time randomly we got a chance to visit Neelkanth Mahadev Temple, which is almost 50-60 KMs away from Haridwar. At that time we had covered all the hilly areas including Rishikesh in a single go within 03 days as well as we had spent a quality time by watching Maa Gangaa Aarti and taking holy bath at Har ki Pauri. The travelogue is available on ghumakkar and you can read and enjoy it as well at any time.

      Thank you again!