केदारताल यात्रा

Table of contents for केदारताल यात्रा

  1. केदारताल यात्रा
  2. केदारताल यात्रा

भाग 1

जिस नंबर पर आप संपर्क करना कहते हैं वो अभी स्विच ऑफ है या नेटवर्क छेत्र से बहार हैऋषिकेश में शुबह के 4:30 बज रहे थे और मेरी इस यात्रा के साथी प्रशांत ने मुझे यहीं मिलना था लेकिन उसका फ़ोन स्विच ऑफ आ रहा था। मै दिल्ली से 16 जून की रात को चला था और प्रशांत देहरादून से आकर रात बिताने के लिए ऋषिकेश में किसी होटल में ठहरा हुआ था और सुबह हम दोनों को मिलकर उत्तरकाशी की ओर रवाना होना था। प्रशांत ने मुझे रात को ही बता दिया था की वो किस होटल में ठहरा है लेकिन मुझे होटल का नाम याद नहीं था, बस इतना याद था की होटल त्रिवेणी घाट के पास है। अब समझ में नहीं आ रहा था की क्या किया जाए। सुबह सुबह सड़क पर एकदम सन्नाटा था और मै इधर उधर टहल कर टाइम पास करने लगा की तक़रीबन बीस मिनट बाद मेरे फ़ोन की घंटी बजी, देखा की प्रशांत का ही फ़ोन है। मै प्रशांत के बताये हुए रस्ते पे चल पड़ा और कुछ ही मिनटों में उसके होटल के कमरे में पहुँच गया।

वहां कमरे में हम दोनों फटा फट नाहा धो कर चलने के लिए तैयार हो गए और अपना अपना रग सैक उठा कर बहार मेंन रोड पर आ गए लेकिन सड़क पे अभी भी इक्का दुक्का वाहन ही चल रहे थे। करीब दस मिनट बाद हमें एक ऑटो मिला जिससे हम नटराज चौक तक आ गए। ऋषिकेश में नटराज चौक काफी जानी मानी जगह है और यहाँ से तकरीबन सभी जगहों के लिए गाडी मिल जाती है। हम चौक के पास ही बने जीप स्टैंड पे पहुंचे तो वहां उत्तरकाशी जाने के लिए जीप खड़ी थी जो सवारियों का इंतज़ार कर रही थी। ड्राइवर ने हमारा सामन गाडी की छत पे बाँध दिया और हम दोनों वहीँ एक ढाबे पर चाय पीने बैठ गए। तकरीबन आधे घंटे में जीप फुल हो गयी और हम ठीक सात बजे राष्ट्रीय राजमार्ग 34 से उत्तरकाशी की ओर निकल पड़े। उत्तरकाशी ऋषिकेश से करीब 170 किलोमीटर दूर है और जीप से ये रास्ता तय करने में तकरीबन साढ़े पांच से छै घंटे का समय लग जाता है।

ऋषिकेश हालाँकि गर्मियों में काफी उमस वाली जगह है किन्तु ढालूवाला पार करते ही हवा में एक खुशनुमा सा बदलाव आ जाता है और जून के महीने में भी सुबह के समय हलकी सी ठण्ड होती है। जीप ड्राइवर ने काफी तेज़ वॉल्यूम में गढ़वाली गाने चला रखे थे और हम मौसम, पहाड़ी नज़ारों तथा संगीत का मज़ा लेते हुए आगे की ओर बढ़ चले थे। लगभग दो घंटे का सफ़र तय करने के बाद हमारी गाडी चम्बा क्रॉस कर रही थी और चम्बा से करीब एक घंटे की दूरी पर एक छोटी सी जगह पर ड्राइवर ने नाश्ते के लिए गाडी रोकी। इस जगह का नाम तो मुझे याद नहीं लेकिन एक छोटी सी पहाड़ी नदी के किनारे तीन या चार ढाबे बने हुए थे। छोटी सी जगह थी लेकिन थी बहुत खूबसूरत।  यहाँ पर हमने गरमा गरम परांठे और चाय का नाश्ता किया और फिर आगे की ओर बड़ चले। दोपहर एक बजे हम लोग उत्तरकाशी पहुँच गए।

Near Uttarkashi

Near Harsil

केदारताल ट्रेक के लिए परमिट आवशयक है और मेरे एक मित्र ने पहले ही हमारे परमिट का इंतज़ाम करवा रखा था। हमे उत्तरकाशी से बस वो परमिट उठाने थे। जिस व्यक्ति से हमे परमिट लेने थे उसका उत्तरकाशी में एडवेंचर ट्रैवल का काम है तो हमने उन्ही से एक पोर्टर और एक गाइड का इंतज़ाम कर लिया।  हमारे गाइड कपिल ने सुझाव दिया की हमें सारा राशन और ज़रुरत के बाकी सभी चीज़ें भी यहीं उत्तरकाशी से ही ले लेनी चाहिए कियोंकि गंगोत्री में सारा सामन मिलने की कोई गारंटी नहीं है और जो मिलेगा भी वो दुगने दाम पे मिलगा। हमने कपिल का सुझाव मानते हुए उत्तरकाशी से ही राशन और ज़रुरत का सारा सामन ले लिया और दोपहर का खाना खाने के बाद गंगोत्री जाने वाली गाड़ी का इंतज़ार करने लगे। सुदूर पहाड़ी इलाकों में पब्लिक ट्रांसपोर्ट की बहुत दिक्कत होती है, कई बार तो कई घंटों इंतज़ार करना पड़ता है, खैर करीब पौना घंटा इंतज़ार करने के बाद हमे एक जीप मिल गई जिसमे बैठ कर हम गंगोत्री के लिए रवाना हो गए। गंगोत्री उत्तरकाशी से 100 किलोमीटर की दूरी पर है और लगभग ढाई से तीन घंटे में सफर तय किया जा सकता है लेकिन हमारे जीप ड्राइवर ने सवारी बिठाने और उतारने के चक्कर में ये सफर चार घंटे का कर दिया और हम शाम सात बजे गंगोत्री पहुँच गए।

हमारा गाइड और पोर्टर हमारे साथ नहीं आये थे, गाइड कपिल ने कहा था की वो हमें गंगोत्री में ही मिलेंगे। हमने गंगोत्री पहुँचते ही सबसे पहले रात रहने के लिए होटल में एक कमरे का इंतज़ाम किया। दिल्ली से मै एक जीन्स और टीशर्ट में चला था लेकिन गंगोत्री में कमरे में घुसते ही सबसे पहले गरम इनर और जैकेट बैग से बहार निकाली। यहाँ इतनी ठण्ड थी की हाथ सुन्न पड़ने लगे थे। गंगोत्री मंदिर में आरती समाप्त चुकी थी लेकिन कल सुबह हमे बहुत जल्दी ट्रेक शुरू करना था इसलिए हम आज ही अपनी सकुशल यात्रा के लिए माँ गंगा का आशीर्वाद लेने मंदिर चले गए। माँ गंगा का आशीर्वाद लेने के बाद हम सूर्य कुंड के रस्ते वापस अपने होटल पहुंचे और कपिल का इंतज़ार करने लगे। मेरे पास idea का कनेक्शन है और यहाँ गंगोत्री में आकर मेरा फ़ोन बेकार हो चूका था कियोंकि यहाँ केवल Airtel और BSNL का ही नेटवर्क काम करता है। किस्मत से प्रशांत के पास Airtel का कनेक्शन था इसलिए हमने अपने घरवालों से संपर्क किया और उन्हें बताया की अब अगले चार पांच दिन तक कोई बात नहीं हो पायेगी। कुछ ही देर में कपिल भी हमारे कमरे में आ पहुंचा और उसने बताया की सुबह आठ बजे से पहले हमारा निकलना संभव नहीं है क्योंकि फॉरेस्ट ऑफिस जहाँ हमने अपने परमिट की एंट्री एवं बाकि की औपचारिकताएं पूरी करानी है वो आठ बजे से पहले नहीं खुलेगा। खैर हमने एक ढाबे पे रात का खाना खाया और कमरे पे वापस आकर दो दो रज़ाइयां ओड कर सो गए।

Gangotri temple

Prashant at Gangotri temple

Near Gangotri

Marsh orchid near Gangotri

View from our hotel room at Gangotri

13 Comments

  • देवेंद्र कोठारी जी का धन्यवाद जो हमे आपकी यह यात्रा पढ़ने मिली । बढ़िया शुरुआत की है । बस यूं लिखते रहिये ….

  • Pooja Kataria says:

    Namaste Harish ji, Welcome aboard!
    A very simple yet beautiful post. I enjoyed reading every bit of it and wished that I could read further.
    Hopefully, I will get to see the other part soon.
    Rgds

    • Harish Bhatt says:

      Pooja Ji, thanks for taking the time out to read and comment. I am glad you liked the post. Hopefully the remaining parts will be here soon :-)

  • Devendra Kothari says:

    बहुत अच्छे हरीश भाई,
    केदारताल पर हिंदी में काफ़ी कम यात्रा वृतांत है। निःसंदेह आपके इस प्रयास से बहुत से घुमक्कड़ मार्गदर्शित होंगे।
    आपका दिल से धन्यवाद और इंतजार है, अगले भाग का

  • अमन मल्लिक says:

    मजा आ रहा है…लिखते रहिये….

  • बहुत बढ़िया लिखा है सर…

  • Subhendu Prakash Chakravarti says:

    Harishji, I think you have come out of your double razais and have started trekking. When will we be hearing the next part? Eagerly waiting for it.

    • Harish Bhatt says:

      Subhendu Ji, There is some technical issue with the submission of the next part which is causing the delay. I hope it will be here soon. Thank you for taking the time out to read and comment.

  • Shyam Raj singh says:

    I think I am also travelling with you while reading your article

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