हाजी अली दरगाह का बाज़ार , मुम्बई

दुनिया का प्रत्येक धार्मिक स्थल अपने आप में विशेष ही होता है और उसी तरह वहां पर लगने वाला बाज़ार भी विशेष होता है. यहाँ आप खास कर वैसी वस्तुएं देखते हैं, जो वहां के स्थानीय निवासी अपने धर्म-पूजा तथा साथ-ही जीवनोपयोग में लाते हैं, जो वहां की संस्कृति से खास जुड़ी होती हैं. मुझे तो कई बार ऐसी जगहों में लगे बाजारों में अधिक ही मजा आता है. मुंबई स्थित हाजी अली के दरगाह के बारे में तो आप जरूर जानते ही होंगे. ५ जून २०१६ को स्वान्तः सुखाय, दरगाह पर मत्था टेकने के बाद, मैं वहां के बाजार का नजारा करने निकला था. आइये आपके साथ बांटता हूँ, वहां के बाजार की चमक. हो सकता है कि भविष्य में आपको भी ऐसे बाज़ारों में रुक कर देखने की ख्वाहिश हो उठे या फिर जब आप हाजी अली जाएँ, तो मेरी कहानी याद आये.

हाजी अली

हाजी अली

सूफी दरगाहों पर चादर चढ़ाये जाते हैं. अतः कई सारी दुकानें दरगाह पर चढ़ाई जाने वाली “चादरों” की थीं. लाल, हरे और अन्य चटकीले रंग के यह चादरें भी तकरीबन एक जैसी दिखने वालीं हो गयीं है. उन पर हाजी अली दरगाह तथा मक्का-स्तिथ काबा का डिजाईन छपा हुआ था. पर यदि कोई चाहे तो हथकरघा पर हाथों से बुन कर तथा उस पर हाथों से अपनी डिजाईन दे कर चादर बनवाए. परन्तु ऐसा करने के लिए उसे किसी जानकार की सहायता लेनी होगी. वस्तुतः वहां की दुकानों में तो रोजमर्रा के इस्तेमाल की चादरें ही मिल रही थीं.

चादरों की दुकान

चादरों की दुकान

चादर के साथ लोग फूल भी पेश करते हैं. “गुलाब के फूल” ही अक्सर मिलते हैं. सुन्दर-सुन्दर गुलाब के फूल मनमोहक लगे. समझ में नहीं आता है की धार्मिक प्रतिष्ठानों के कारण होने वाले अर्चनाओं में फूलों के महत्त्व से कितना कारोबार होता है? अब यदि मुझे खेती करने का मन करे, तो मैं खाद्यान्न लगाऊं या फिर फूल. और यदि चुनना ही है तो फिर फूल ही क्यों न चुनुं? पर तत्क्षण मुझे माखन लाल चतुर्वेदी की कविता “पुष्प की अभिलाषा” याद आ जाती है. सूफी सभ्यता में “सेहरा” का बड़ा महत्त्व है. लगभग सारे रश्मों-रिवाज़ों में सेहरा मुख्य लगता है. सेहरा पहनने वाला तथा पहनाने वाला दोनों को आदर की दृष्टि से देखने की प्रथा है. फूलों की दुकानों में खूबसूरत गुंथे हुए सेहरे बड़े ताजे और कलात्मक थे. सेहरा गूंथना भी एक कला हो सकती है. सबके बस की बात नहीं है. एक-एक नाज़ुक फूल को घंटो बैठ के गूंथना मेरे से तो सच में नहीं हो सकेगा. यही सोच कर मैंने उस कलाकार को मन-ही-मन अपनी प्रशंसा दी जिसने एक सुन्दर सेहरा सुबह-ही-सुबह तैयार किया था और जो उस दुकान में अपनी ख़ूबसूरती बिखेर रहा था.

मनमोहक सेहरा

मनमोहक सेहरा

फिर एक दूकान दिखी जिसमें “इत्र” या “अतर” मिल रहा था. यह इत्र फूलों के नैसर्गिक तेल को डिस्टिल करके बनाये जाते हैं. मूल रूप से बनने वाले इत्रों में अल्कोहल या और केमिकल नहीं लगाया जाता. पहला इत्र कहाँ बना? क्या मिश्र की सभ्यता ने इसे शुरू किया? अब यह तो मुझे पता नहीं. पर हाल ही में मैंने पढ़ा था की उत्तर प्रदेश के कन्नौज में सोंधी मिटटी के गंध वाला भी इत्र बनाया जाता है जिसकी बड़ी मांग है. मुझे लगता है कि एक जमाना ऐसा भी बीता होगा जिसमें अलग अलग शाही खानदान को उनके अलग अलग फूलों से बनने वाले इत्र से जोड़ा जाता होगा.

इत्रों की दुकान

इत्रों की दुकान

आगे आई “टोपी” की दुकान. यह टोपी कहीं भी पीछा नहीं छोड़ती. अंग्रेजी सभ्यता के आने बाद हम लोग तो टोपी या मुरेठा बांधना भूल गए है. अन्यथा हम सब आज अपने अपने यहाँ चलने वाले टोपियाँ पहनते. यह बात मुझे सर्वप्रथम राजस्थान में समझ में आई, जहाँ मैंने पगड़ियों की विविधता देखि थी और जब मेरा महारास्त्रियन पद्धति से नाशिक में आधिकारिक स्वागत किया गया तब फिर से दुहरायी गयी. सामाजिक प्रक्रिया में हर मनुष्य और कौम दुसरे से भिन्न दिखना चाहती है. इसी प्रकार टोपियों का भी चयन हो चुका है. लेसदार, नक्काशीदार गोल टोपी शायद मुसलमानी सभ्यता से जुड़ गयी है. हालाँकि टोपियों के विभिन्नताओं के मामले में अजमेर के दरगाह के बाज़ार की बात निराली थी. हाजी अली में उतनी वैरायटी नहीं थी.

टोपी की दुकान

टोपी की दुकान

इलायचीदाना या मुकुंदाना अब सभी जगह मिलने लगे हैं. हाजी अली में इनका प्रचलन किस दौर एवं किस-विधि शुरू हुआ होगा, यह एक अनुसन्धान का विषय हो सकता है. मगर मैं यह देख कर हैरान था कि कैसे ये नन्हा-सा मीठा मीठा दाना लगभग सभी धार्मिक स्थलों में फैल गया है. जहाँ भी जाओ, यह जरूर मिलेगा. क्या सरकार को पता भी है कि इसका व्यापार कितने टनों का है? कितने लोग इस साधारण से दिखने वाले वस्तु के निर्माण में लगे हुए है? साथ ही टंगे थे, वो कच्चे सूत के धागे, जिसे हम “बद्धी” के नाम से जानते थे. हाथों में या बाहों में धागे बांधना अब एक सर्वव्यापी प्रक्रिया हो गयी है. अब आइये जरा खाने-पीने की सामग्रियों का मुआयना किया जाये.

प्याज़ के छोटे छोटे तले हुए समोसे आपको मिलेंगे एकदम दरगाह के सामने वाली दुकान में. वैसे तो वहां बड़ा पाव, प्याज़ की पकोरियां भी मिल रही थीं. पर बीस रुपये में ६ के हिसाब से मिलने वाले इन समोसों के देख कर मेरे मन में इनका स्वाद चखने का ख्याल आया. पहले तो मुझे मालूम ही नहीं था की ये प्याज़ के समोसे हैं, वो तो जब मैंने खाया तब पता चला. यक़ीनन मैंने समोसे तो सैंकड़ो खाए होंगे, पर प्याज़ के समोसे सबसे पहले वहीँ मिले.

प्याज़ के समोसे

प्याज़ के समोसे

दरगाह से कुछ दूर पर मुझे दिखा “सोहन हलवा”. पहले इसे मैंने अजमेर में देखा था. इसकी शुरुआत का श्रेय बादशाह अकबर को जाता है. अजमेर से चले सोहन हलवे को देख कर मैंने दूकानदार से पूछ ही लिया कि यह हलवा कहाँ से आता है? उत्तर सुन कर आश्चर्य भी नहीं हुआ क्योंकि उस दूकानदार को सिर्फ इतना मालूम था कि वो इस हलवे को कहाँ से थोक भाव में खरीदता था. वहीँ पास में मुझे दिखा “करांची हलवा”. प्लास्टिक की छोटी छोटी लिहाफों से लिपटे हुए गुलाबी रंग के हलवे के मासूम से दिखने वाले टुकड़े मुझे बहुत ललचाये. परन्तु मैं चख नहीं पाया. कभी किसी और ज़गह पर इसके खालिस स्वाद का आनंद लूँगा. उस पर आलम यह था कि मैंने इस तरह के हलवे का तो नाम भी नहीं सुना था. करांची तो पाकिस्तान में एक मशहूर शहर है. क्या यह हलवा वहां की पैदाइश है? कैसे इसका नाम करांची हलवा पड़ा?

करांची हलवा

करांची हलवा

वहां के बाजार में “शकरपारा” मिलेगा इसकी तो मैंने कल्पना भी नहीं थी. मुझे यह बचपन की यादें ताज़ा करने वाली मिठाई लगी. जब मैं अपने घर से छुट्टियों के बाद वापस स्कूल की तरफ लौटता तो मेरे साथ घर के बने पकवान-चबेने इत्यादि काफी मात्रा में होते थे, उसमें यह भी एक था. जब सारी निमकियाँ-ठेकुए-चूरे इत्यादि ख़तम हो जाते, तो अंत में शकरपारा निकलता था. उस वक़्त जब मैंने इसे देखा तो अपने आप को किसी तरह संभाल पाया. मैं क्या लिखूं? क्या मैं इस टोकरी में रखे एक-एक दाने के बदले अपने हज़ार आँसू दूँ, तो क्या चलेगा?

शकरपारा

शकरपारा

“बालू-शाही”, “गुड़पारा” तथा “बूंदी के लड्डू” भी दिखे. इनमें गुड़पारा ही विशेष था. बालूशाही और बूंदी के लड्डू तो अब तक जाने कितनी बार और कितने जगहों पर खा चुका था कि अब वहां चखने में तो कोई दिलचस्पी थी नहीं. दिमाग तो तब भी शकरपारा में ही दौड़ रहा था. आखिर इतना शक्कर और गुड़ इस प्रदेश में आता कहाँ से है? याद करने की कोशिश की तो याद आया शिर्डी से शनि सिग्नापुर का वो रास्ता, जिसके दोनों तरफ ईख के बड़े बड़े खेत देखे थे. गाँव वालों ने सडकों के दोनों तरफ ईख-के-रस की दुकानें लगायीं थीं. हर दुकान का नाम चाहे कुछ भी हो, पर टाइटल एक ही था..”रसवंती”. अपनी जूनून में कभी-कभी भूल भी हो जाती है. खास कर उस वक़्त जब आपके पास उन्मुक्त समय की काफी कमी हो. ऐसा ही मेरे साथ हुआ. एक पीली-सी मिठाई ने आकर्षित तो किया. मैं उसके नजदीक भी गया. उसकी तस्वीर भी ली. परन्तु उसका नाम भी नहीं पूछा. अब तस्वीर को देख कर इसे मैं एक नाम दे रहा हूँ, “घेवर”, क्योंकि ये घेवर के टुकड़े के जैसा ही दीखता है. अब पता नहीं कि स्वाद में कैसा होगा? यदि घेवर ही हुआ तो कहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश का प्रभाव तो नहीं?

सोहन हलवा

सोहन हलवा

अगली दुकान “घरों को सजाने वाली वस्तुओं” की थी. कुरआन की आयतें और असूलों को बयान करती हुईं. इनमें दो तरह के डिजाइनों ने मुझे आकृष्ट किया. एक मैं दोनों हथेलियों को फैला कर रहमत की दुआ मांगे जाने का डिजाईन था तो दूसरी में दो-दो दो-मुँही तलवार का डिजाईन था. इस दो-मुँही तलवार को जाफरानी नेज़ा भी कहते हैं. मुगलों के समय यह बहुत ही प्रचलित हुआ था. धार्मिक स्थल चाहे कोई भी हो, यदि उसमें परिवार का प्रवेश है, तो बच्चे भी होंगे. आम-तौर पर छोटे बच्चों को ना तो सूफिज्म और ना ही किसी भी “-इज्म” से मतलब है. उनका तो बस यही होता है की घुमाने ले गए हो तो क्या खरीदोगे? और यदि मचल गए तो कुछ न कुछ तो खरीदना ही पड़ेगा. इसीलिए मैंने देखा है कि हरेक धार्मिक स्थलों पर लगने वाले बाज़ारों में से एक हिस्सा इन नन्हे शैतानों का जरूर होता है, हालाँकि ये कोई वास्तव के शैतान तो जरा भी नहीं होते.

बच्चों के खिलोने

बच्चों के खिलोने

अगली दुकान मुझे मिली “घड़ियों” की. सस्ती, सुन्दर; पर टिकाऊ की गारंटी नहीं. यहीं आ कर मुझे समाज के विभिन्न आर्थिक तबकों का अनुभव हुआ. यह घड़ियाँ भी तो किसी-न-किसी को खुशिया देती होंगी. कोई तो खुश हो जाता होगा. या फिर कई दिनों तक आसरा देख कर एक ऐसी सस्ती घड़ी खरीद पता होगा. मेरे देश की कितनी तहें हैं इसका तो फैसला ही अब तक नहीं हुआ.

एक और दूकान जो आजकल चल पड़ी है, वो है “लड़कियों के बैगों” की. इन्हीं बैगों में सारा यूनिवर्स समां सकता है. कब और किसे, कौन सा बैग पसंद आ जाए इसका अंदाज़ तो शायद कोई भी नहीं लगा सकेंगे, हालाँकि सबके सम्मान मैं मुझे ऐसा नहीं सोचना चाहिए. मोबाइल बैग, स्लिंग बैग, बैग के अन्दर का बैग इत्यादि देख कर मैं मुस्कुराये बगैर नहीं रहा. परन्तु अगर कोई स्त्री साथ में न हो, तो ऐसे दुकानों के बाहर ज्यादा देर खड़े हो कर रिसर्च करना तो ज्यादा ही खतरनाक था, जबतक की आप स्वयं ही दूकानदार न हों. अतः मैं वह से चल पड़ा. वैसे, अजमेर का बाज़ार इस वस्तु के लिए भी काफी बड़ा है. यहाँ तो उतनी विभिन्नता नहीं थी.

बैगों की दुकान

बैगों की दुकान

हमारा देश काफ़ी बड़ा और विभिन्नताओं से भरा हुआ है. कहीं तो केले दर्ज़न से मिलते हैं और कहीं किलो से. उसी प्रकार पूरी-हलवा कहीं तो प्लेट से मिलेंगे तो कहीं किलो से और कहीं गिन कर. बचपन में मैं एक बार बक्सर गया था. यह करीब १९८५ की बात थी. वहां मैंने पहली बार किलो के मोल से पूरी खरीदी थी. क्या बड़े-बड़े साइज़ की पूरियां थीं. उसके बाद हज़रत निजामुद्दीन (नई दिल्ली) में २ फ़ीट के डायमीटर वाला पूरी चखा था. फिर हाजी अली में देखा २ फ़ीट डायमीटर वाली पूरियां – सूजी के हलवे के साथ. इनके सामने बक्सर की पूरी तो बहुत छोटी थी. खाने का मन था, पर पेट में जगह नहीं थी. अतः चल पड़ा.

२ फ़ीट डायमीटर की पूरी

२ फ़ीट डायमीटर की पूरी

साधारणतया जब आप किसी ऐसे इलाके से गुजरते हैं जो जंगलों और वादियों के बहुत नजदीक हो, तो वहां स्थानीय रूप से उत्पादित फल इत्यादि जरूर मिलते हैं. परन्तु हाजी अली जैसे मशहूर स्थान पर मुझे “ईमली” बिकते हुए मिलेंगे, ऐसा मैंने नहीं सोचा था. मुहँ में पानी आ गया. दुकानदारिन भी मुस्कुराये बगैर नहीं रह सकी, जब मैंने उसके खोमचे का फोटो खीचने का आग्रह किया. उसने सोचा कि पता नहीं ये कैसा आदमी है, जिसने कभी ईमली नहीं देखा. और मैंने भी इससे सहमती जतायी की मानो मैंने पहले कभी ईमली नहीं देखा. बगल की दुकानदारिन तो लगभग खिलखिला कर हँस पड़ी, जब मैंने उसके बेरों की तस्वीर लेनी चाही. पता नहीं उसने मराठी में क्या कहा और अपने मन में क्या सोचा? शायद उसके तरुण जीवन में पहला ऐसा मनुष्य आया होगा, जिसने उसके “बेर” से भरे खोमचे की तस्वीर ली हो. भाषा की कठिनाई और समय का अभाव, ये दोनों नहीं होते तो मैं कुछ देर बैठ कर एक ईमली और एक बेर खा कर उनसे उनके व्यवसाय के बारे में जरूर पूछता. पर ये भी हो सकता है कि तस्वीर तो बहुतों ने ली हो, पर हास्यप्रद मैं ही होऊंगा, इसीलिए वो हँस पड़ी हो. इसीलिए मैं और आगे चला गया.

सह्याद्री पर्वत-श्रृंखला के जंगल जामुन, आम इत्यादि फलदार वृक्षों से भरे पड़े है. स्थानीय जनजातीय लोग जंगलों में से फल ले कर उसे शेरोन में बेचते है. जामुन का सीजन था. अतः जामुन यहाँ भी मिल रहा था. अंत में जब खीर-ककड़ी के खोमचे शुरू हुए तो मुझे लगा कि अब सैर समाप्त हो गयी. अंत में एक बात और- हाजी अली में अहाते के अन्दर की दुकान में नारियल भी मिलता है. इस दरगाह पर नारियल चढ़ाना मान्य है.

10 Comments

  • Arun Singh says:

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    • Uday Baxi says:

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  • Tanusree Dey says:

    Mr. Bakshi–Please kindly write in English. Everyone doesn’t understand Hindi .

  • Hiralal ji says:

    Nice ! But not for N.veg. though tempting .

    • Uday Baxi says:

      Dear Hiralal ji

      Non-veg was also there, but dishes were like common full meal-type. On that occasion I was interested in writing about something unique, e.g. Karanchi Halwa, Sohan halwa, poori of the size of two feet diameter, etc. But one day, in some other post, I will definitely write about certain special meal type dishes of any unique place.

      Regards

  • jaishree says:

    bahut hi umda tarike se likha apne. hum sabhi in bazaro ki chahal pahal se aakarshit hote hai, pr unka shabd chitran karna aur vo bhi thoda gudgudane, thoda darshnik, thoda parytkiya, itna asaan nahi. Jo dekha use likhna aur jo mahsoos kiya use likhns, in dono me sahi talmel bithana ek kala hai. Badhai..

    • Uday Baxi says:

      dear Jaishree ji

      hausla afjai ke liye aapko bahut-bahut dhanyavaad. Mujhe yeh jaan kar bahut khushi hui ki aapko yeh lekh pasand aayaa.

      Phir se dhanyavaad.

  • Nandan Jha says:

    Let me start with a confession. I have never been to Haji Ali Dargah at Mumbai and I must have been to Mumbai, many times (15 times, probably more). I was there a few months back too. So note to myself, next time I am in the city, I should find a way to visit the Dargah.

    Now to the food and social commentary of the market. Very beautifully done and very engaging.

    Karchi Halwa (even though it is more of a Barfi) is also called Bombay Halwa. I do not know the story behind the name, but may be Karachi-Mumbai was a high traffic sea route before 1947 so may be it came from Karchi.

    That big poori is very common in melas, esp in those place where a significant audience is among Muslims. I have seen it at Nauchandi Mela (Meerut) as well at Moradabad Mela.

    All in all, a very sweet and savoury treat.

    • Uday Baxi says:

      Thanks for your detailed comments. Whenever you plan to come to Mumbai, please do visit Haji Ali (if time permits). Please do intimate your plans at Mumbai so that I can arrange a meeting too.

      Regards

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