शिव और सावन – एक मनोरम स्मृति।

सावन के महीने का आगमन दिल्ली में हो गया था किन्तु बारिश की बूंदो का इंतजार अब भी बाकि था, लग ही नहीं रहा था की इस बार दिल्ली में बारिश होगी भी या नहीं। आख़िरकार है तो यह दिल्ली ही न, रोजाना यहाँ वहां की खबरों को सुनते हुए यह पता चल जाता था की सलमान की एक-एक फिल्म 100 करोड़ कमा रही है किन्तु पूरी दिल्ली में 100 लीटर भी पानी बरस जाये तो गनीमत होगी। बेचारा मन यह सब नहीं जानता अतः उसे शांत करने के लिये सोचा की क्यों न किसी पर्वतीय स्थल में जाकर थोड़ा समय बिता लिया जाये और साथ के साथ वर्षा ऋतू का आनन्द भी उठा लिया जाये। बातो ही बातो में तय हो गया की इस बार हम अगले तीन दिनों के लिए हरिद्वार, ऋषिकेश और नीलकंठ महादेव के मंदिर की पावन यात्रा का लाभ उठाएंगे और बोनस के रूप में वर्षा ऋतू का भी आनंद प्राप्त कर लेंगे.

योजना को आगे बढ़ाते हुए दिनांक 11 जुलाई 2014 को प्रातः 6 बजे हम तीन लोग (मैं, माताश्री और बहन जी) अपनी वैगनआर पर सवार होकर निकल पड़े हरिद्वार की तरफ और सीधे पहुँच गए राजनगर, गाजियाबाद जहाँ एक लम्बा जाम हमारी प्रतीक्षा कर रहा था. दिल्ली की गर्म धूप और उस पर लम्बा जाम, अगले दो घंटो के लिए यह दोनो हमारे सफर के साथी बन गए और गाड़ी का इंजन व् ऐसी आन कर सिवाय गाड़ी के अंदर बैठे रहने के अलावा हमारे पास और कोई चारा नहीं था. इसी दरम्यान हमने अपने घर से लाये गए नाश्ते को निबटाया और फिर आराम से यहाँ-वहां अन्य पथिकों को देखते हुए समय बिताने लगे. लगभग दो घंटो के पश्चात जाम के खुलते ही हमने सरपट गाडी दौड़ा दी और 100 -125 किमी चलने के बाद सीधे चीतल ग्रैंड होटल में जाकर ही ब्रेक लगे.

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यहाँ एक-एक ठंडी लस्सी का ग्लास पीने और कुछ देर आराम करने के बाद अपनी आगे की यात्रा हमने फिर से प्रारम्भ कर दी. यहॉ यह बताना चाहूंगा की चीतल ग्रैंड एक फुल्ली ऐसी होटल है जहाँ अंडर-ग्राउंड फ्री कार पार्किंग के साथ-साथ आप अपने परिवार के साथ पेट भरकर हर प्रकार का खाना चख सकते है. क्वालिटी भी अच्छी है और माहौल भी बढ़िया है. किन्तु रेट किसी बजट प्रेमी को थोड़ा कष्ट दे सकते है. खैर हमारा बिल तो सेवा कर सहित केवल लगभग रु 180 ही आया और थकान भी मिट गयी. पिछले कुछ वर्षो में इस होटल में काफी परिवर्तन या फिर विकास हुआ है. यहां से आगे बढ़ते हुए बहुत से खेत-खलियान और ट्रेक्टर हमारे पथ साथी बने रहे किन्तु बारिश की बुँदे अब भी नहीं दिखी थी. दिल्ली-हरिद्वार राजमार्ग अत्यधिक सुगम तो नहीं है किन्तु नियंत्रित गति में चलेंगे तो ज्यादा बुरा भी नहीं लगेगा, हाँ वर्षा ऋतू में अवश्य ही यात्रा कष्टदायी हो सकती है.

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और ऐसे ही बतियाते हुए हम लोग हरिद्वार तक पहुँच गये

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दोपहर के दो बज रहे थे और धूप अपने चरम वेग पर थी. हरिद्वार पहुँचते ही सबसे पहले मैंने अपनी कार का फ्यूल टैंक दोबारा से फूल करवा लिया था क्यूंकि सफर में फ्यूल की जरूरत बहूत होती है न जाने फिर कब, कहाँ और कितने घंटे रनिंग इंजिन और ऐसी के सहारे जाम में बिताने पड़े. उसके बाद कार को हरिद्वार रेलवे स्टेशन की पार्किंग जिसका शुल्क रु 30 /प्रति 12 घंटे था में ही छोड़ दिया और साईकिल रिक्शा से सामान सहित सीधा हर की पौड़ी स्थित होटल पुरोहित में रु 1200 / प्रति दिन मूल्य का एक ऐसी रूम अगले दो दिनों के लिए बुक कर लिया। ऐसी और टीवी चल रहे थे, बिस्तर भी साफ़ था बाथरूम में पानी सफ्लाइ की कोई समस्या नही थी, साथ ही में एक छोटी सी बालकोनी थी जिससे बाहर का बाजार दिखाई दे रहा था अंततः रूम ठीक-ठाक था, किन्तु आफ सीजन में शायद रेट थोड़े और कम हो जाते होंगे.
कुछ देर रूम में ही आराम करने के बाद शाम को तकरीबन 5 बजे हम लोग माता मनसा देवी के दर्शन हेतु निकल पड़े किन्तु वहां जाकर पता चला की मेंटेनेंस वर्क के कारण रज्जु मार्ग तो बंद पड़ा है. सबका चेहरा उत्तर गया किन्तु माता का बुलावा था अतः हमने पैदल चलने का तय किया और हांफते-2 पसीने में भीगते हुए 50 मिनट के भीतर माता के मंदिर तक की दूरी तय कर ली. दर्शन अच्छे से हो गए और मुझे मेरे पसंदीदा पकोड़े और जलेबी चाय के साथ खाने को मिल गए जो की बाहर ही मंदिर प्रांगण में उपलब्ध छोटे-2 ढाबो में आपको मिल जाते है. माता का मंदिर ज्यादा ऊंचाई पर स्थित नही है और यहां तक पैदल मार्ग में लगाने वाला नार्मल समय 35 मिनट तक ही होता है, रज्जु मार्ग से केवल 2 -3 मिनट लगते है. माता को प्रणाम करने और पेट पूजा के पश्चात अब हम लोग वापिस चल दिए माँ गंगा के दर्शन करने हेतु हर की पौढ़ी।

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शाम के 7 बज रहे थे और घाट पर बहुत ही चहल -पहल वाला माहौल था क्यूंकि माता की आरती का समय जो हो चला था, जिसे जहाँ जगह मिली वो वहीँ बैठ गया और जो बैठ न सका वो खड़ा ही रह गया. यहाँ भी माँ गंगा के दर्शन और पूजा दोनों ही अच्छे से हो गए और घूमते-फिरते हुए रात्रि का डिनर करने के पश्चात हम वापिस अपने रूम में आकर सुस्ताने लगे. लेकिन मेरा मन हमारी गाडी के प्रति थोड़ा भयभीत था, आखिरकार एक अनजान शहर में हमसे लगभग 2.5 किमी दूर जो पार्क हो रखी थी. मैंने मन बना लिया की एक बार ज़रा उसे निहार आता हु तब बाद में इत्मीनान से सो जाऊंगा। इस पूरी गतिविधि में मुझे 1 घंटे का समय लग गया और मैं वापिस अपने रूम में आकर सबके साथ टीवी देखने में मशगूल और अंततः निद्रा मग्न हो गया.

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जी भर कर सोने के बाद जब आँख खुली तो एक खूबसूरत पहाड़ी सुबह बारिश की फुहारों के साथ हमारा इन्जार कर रही थी. सुबह के 5 बजे थे हमे गंगा स्नान के लिए जाना था, और फिर उसके बाद नीलकंठ महादेव जी के दर्शन भी तो करने थे. हर कार्य समय पर होता चला गया और ठीक 7 बजे हम अपनी कार में सवार होकर निकल पड़े अपने अगले सफर की और. हरिद्वार शहर का राजमार्ग उस पर चलते छोटे-बड़े हर प्रकार के वाहन और आकाश से बरसता पानी एक अद्भुत दृश्य की संरचना कर रहे थे. इसी प्राकृतिक सुंदरता को निहारते हुए हम प्रवेश कर गए एक ऐसे पहाड़ी मार्ग में जो संकरा होने के साथ-२ घुमावदार भी था. यह मार्ग सीधे आपको नीलकंठ महादेव मंदिर तक लेकर जाता है किन्तु यहां ड्राइव अत्यंत ही सावधानी पूर्वक करनी पड़ती है क्यूंकि श्रद्धालु पैदल और वाहन दोनों प्रकार की यात्रा कर रहे होते है और साथ में जंगली हाथियों से सामना होने की चिंता अलग से। यह एक वनीय क्षेत्र है और हाथी संरक्षित भी अतः सावधानी बरतना अति आवश्यक है। नीचे घाटी में तीव्र वेग से बहती माँ गंगा का विशाल रूप भी आपको मोहने के लिए पर्याप्त है. सुबह से कुछ खाया-पीया तो नही था अतः रास्ते में ही एक पहाड़ी के किनारे उपलब्ध टी-स्टाल से चाय बनवा कर साथ लाये गए बिस्किट का सेवन किया और फिर से आगे बढ़ चले. यहां सबसे ज्यादा परेशान करते है आपको टैक्सी वाले जिनका एक निश्चित समय होता है सवारी को ऋषिकेश से नीलकंठ तक दर्शन करवा कर वापिस लाने का और इसलिए वो आपकी कार को उस संकरे और घुमावदार पहाड़ी मार्ग पर भी ओवरटेक करने से बाज नही आते और यदि आपने उन्हें जगह नही दी तो हॉर्न दे-देकर आपका चलना मुश्किल कर देते है. वैसे सावन माह में हरिद्वार में भीड़ थोड़ा ज्यादा हो जाती है क्यूंकि आम पर्यटकों के साथ-2 आपको कांवड़िया मंडली से भी दो चार होना पड़ता है. और शिवजी के मंदिर में तो आप तैयार रहिये एक जबरदस्त मुकाबले के लिए. किन्तु इनकी श्रद्धा की आगे हम भी नतमस्तक हो लिए और भगवान नीलकंठ के दर्शन उपरांत चारो तरफ तैरते बादल और रिमझिम बरसती वर्षा का आनंद लेने लगे.

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क्या मनोहारी दृश्य था, विशाल पहाड़ पर फैली हरियाली, उन पर सीढ़ीनुमा खेत और चेहरे को छूते बादल। हवा तो जैसे ऑक्सीजन का शुद्ध स्त्रोत प्रतीत हो रही थी और थकान मानो छू-मंतर थी. हालांकि मां थोड़ा थक जरूर गयी थी किन्तु एक नया तीर्थ करने के बाद खुश भी हो गयी थी, और ज्यादा ख़ुशी तो इस बात की हो रही थी की हम अपने प्रिय गृह नगर पौड़ी गढ़वाल में थे। यहां एक बात और कहना चाहूंगा की नीलकंठ में कार पार्किंग की वैसे कोई ख़ास समस्या नही है किन्तु सीजन होने के कारण हमे तो पार्किंग मिली नही इसलिए अपने दिल्ली वाले स्टाइल में उसे सड़क के किनारे पार्क कर दिया अब दुसरो को तकलीफ हो तो मुझे क्या।।।।

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अब बारी थी यहाँ से चलने की, मन तो चाह रहा था की कुछ देर और बिता लिया जाये किन्तु हमे ऋषिकेश भी जाना था और दोपहर का भोजन भी करना था जिसकी प्रतीक्षा में अब हम ज्यादा समय नही बिता सकते थे। सेकंड गियर में ही गाड़ी ढलान पर सरपट दौड़ रही थी इसलिए मैंने आगे चल रही गाड़ी के ही पीछे चलना उचित समझा और लगभग 2 घंटो के पश्चात हम ऋषिकेश पहुँच गए और सबसे पहले एक अच्छा सा होटल देखकर खाने पर टूट पड़े। खा-पीकर थोड़ा टहले और यहां-वहां की सुंदरता का अवलोकन करते हुए लक्ष्मण झूला पहुँच गए किन्तु अब शरीर थक कर चूर हो रहा तह इसलिए ज्यादा समय न लेते हुए हम फिर वापिस अपने हरिद्वार स्थित रूम की तरफ चल दिए. कुल मिलाकर आज का दिन भी बहुत अच्छा रहा और समय का सदुपयोग भी खूब हुआ. वर्षा के जिस स्वरूप के दर्शन हमे करने थे वो भी हुए और मजा भी खूब आया। हरिद्वार में चप्पे-२ पर पुलिस कर्मी आपकी सहायता के लिए तैनात मिलते है, या फिर कांवड़ यात्रा के कारण यह सारी वयवस्था थी, मुझे इस विषय में ज्यादा नही पता किन्तु उनके साथ मेरा अनुभव ठीक ही रहा.

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शाम के 6 बजे तक हम लोग अपने रूम में वापिस आ चुके थे और सिवाय लेटने के अब हमारे पास कोई काम नही था. रात्रि 8 बजे डिनर के लिए थोड़ी देर बाहर गए और फिर अपने रूम में आकर निद्रामग्न हो गये. अगले दिन दिल्ली के लिए प्रस्थान भी तो करना था.

अगले दिन भी बारिश की फुहारे हमारे स्वागत में बाहर खडी हमारा इन्तजार कर रही थी, प्रातः काल की शुरुआत गंगा स्नान करने से हुयी और 8 बजे तक हम कार में सवार होकर दिल्ली के लिए निकल चुके थे। वापसी का सफर भी शानदार रहा और रास्ते से मात्र रु 300 के 10 किलो आम की पेटी पैक करवा ली। राजमार्ग पर सड़क किनारे आपको लकड़ी के हाउसहोल्ड सामान बेचने वाले भी मिल जाते है और उनसे मोलभाव करने पर खरीददारी भी कर सकते है, जैसे हमने रु 1000 मूल्य की दो चेयर केवल रु 700 में ख़रीद ली थी.

इसी तरह आनंद लेते हुए हम वापिस दिल्ली पहुँच गए और यहाँ आकर हमने अपनी इस छोटी एवं सुगम यात्रा को विराम दिया. अगले यात्रा वृतांत तक सभी घुमक्कड़ सदस्यों मेरा नमस्कार।

23 Comments

  • Avtar Singh says:

    Hi Arun

    Nice write up indeed!
    Congratulations for that!!!
    There is no off season in Haridwar, you will find the same rush of pilgrimage right through the year. Although one can see huge pool of heads during Sawan because of Kanvarias, but the city has great potential to contain everyone in itself.

    This May, we too spent a few days in Haridwar, your post resurge all the memories once again!

    A good post showing excellent narrative skill, along with beautiful pics and most important thing, three continuous posts in Hindi on Ghumakkar….. Amazing indeed!!!

    • Arun says:

      Oh My Godthe very first comment on my post from my dearest hindi writer Avtar Ji. am I dreaming? If no, then mera to ho gaya re good day.

      Avtar Ji thanks for rewarding me by these valuable words. I am so happy after knowing that you have read all my three posts and I must say that just to follow the foot steps of our brilliant ghumakkars-cum-hindi writers, I always try to create my posts in hindi.

      Well, thank you once again for encouraging this new boy to write more and more.

      Regards,
      Arun

  • Arun Ji, Fisrt thing first! You write really well! This post is a nice description of your tour. Now one thing that I could not see is the “Caption” with the photographs. You may also share the place of “Cheetal Grand”, this may help travellers going to Hardwar by road. Have you not watched Ganga Aarti?

    Keep travelling and keep writing :)

    Thanks

    • Arun says:

      Another good comments from a experienced traveler really made my day….

      Anupam Ji I have not used captions on photos because in my point of view this short travelogue has worked enough itself to describe the pics as well as locations.

      As I wrote in post, after crossing Raj Nagar, Ghaziabad and covering distance of 100-125 KMs, the travelers may find Cheetal. Lots of sign boards are also there on the way to Haridwar to make aware the travelers that Cheetal is so and so km ahead.

      Of course we got the chance to watch this divine Aarti and to enjoy it we decided to keep our camera and phones switched off, thats why I have not added it in my post.

      Thank you once again.

      Regards,
      Arun

  • Arun says:

    Oh My God…the very first comment on my post from my dearest hindi writer Avtar Ji…. am I dreaming? If no, then mera to ho gaya re good day.

    Avtar Ji thanks for rewarding me by these valuable words. I am so happy after knowing that you have read all my three posts and I must say that just to follow the foot steps of our brilliant ghumakkars-cum-hindi writers, I always try to create my posts in hindi.

    Well, thank you once again for encouraging this new boy to write more and more….

    Regards,
    Arun

  • MUNESH MISHRA says:

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    • Arun says:

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  • Arun , Very nice write up. It is smooth as butter and sweet as honey. Direct Dil se. I could not stop reading after I start. Keep it up. You should have post more picture of Maa Ganga. Picture of Neelkanth temple is also missing.

  • Arun says:

    Thanks for your appreciation Naresh.

    Yes I know the pics’ quantity is not good, but due to the rainy season and large groups of kanvariyas we kept our camera and phones in our pockets all the time. Whenever we got some free space from long queues, heavy rush, drizzling etc., we started clicking the beauties.

    Well thanks once again.

    Regards,
    Arun

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    • Arun says:

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  • Shefali Arora says:

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  • Nandan Jha says:

    Short, sweat and a very warm log of a family travel. Just like Ganga, the narration is fluid. Information about hotel rates, parking rates and other stuff would be helpful for fellow Ghumakkars. Thank you Arun.

    • Arun says:

      All the credit goes to you Nandan Sir for innovating a new idea i.e. travel and share the experience with all…

      Thanks for your appreciation.
      Arun

  • Deo Guru Chaturvedi says:

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  • Arun says:

    Thanks for your appreciation Sir…

  • VINOD KUMAR SHARMA says:

    WRITTEN VERY GOOD IN VERY SIMPLE LANGUAGE & HELP US IN OUR TOUR TO HARIDWAR & RISHIKESH. PHOTOGRAPHY IS ALSO EXCELLANT

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