ब्रह्मगिरी की पदयात्रा , त्रैम्बकेश्वर

सभी जानने वाले लोग मना कर रहे थे कि ब्रह्मगिरी की पदयात्रा नहीं करूँ. कोई समझा रहा था कि मार्च की गर्मी बर्दाश्त नहीं होगी तो कोई कह रहा था कि इतनी कठिन यात्रा परिवार सहित नहीं की जा सकती. पर हम थे कि पदयात्रा करने के लिए अड़े हुए थे. यात्रा की कठिनाइयों के बारे में हमें कुछ ज्ञात तो था नहीं. उसी अज्ञानता के मारे ही हम अड़े हुए थे. अंत में जिद सफल हुई. श्री दानी नामक एक व्यक्ति हमारे साथ कर दिया गया, जो पिछले कई बार से ब्रह्मगिरी लाँघ चुका था. २६ मार्च २०१६ को तडके ६ बजे हमलोग नाशिक से रवाना हो लिए. नाशिक से त्रैम्बकेश्वर का रास्ता बहुत ही बढ़िया था. आसानी से हम सब त्रैम्बकेश्वर पहुँच गए. शहर अभी रात की नींद से उठ कर उबासी ही ले रहा था. इतनी सुबह वहां सिर्फ कुशव्रता तीर्थ पर ही चहल-पहल थी. लोग-बाग़ सुबह कुशाव्रत में गोदावरी स्नान कर रहे थे. यहीं स्नान करने के बाद यह सभी तीर्थयात्री त्रैम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग का दर्शन करेंगे अथवा इसी स्थान पर होने वाले पूजन-विधियों को संपन्न करेंगे, जिसके लिए वे दूर-दूर से यहाँ पधारें हैं.

कुशाव्रत तीर्थ

कुशाव्रत तीर्थ

कुशाव्रत को तीर्थराज का उपनाम प्राप्त है और इसकी बहुत महत्ता है. परन्तु हमारा आज का उद्देश्य तो ब्रह्मगिरी पर्वत के शिखर पर स्थित गोदावरी नदी का उद्गमस्थल देखना था. इसीलिए कुशाव्रत में हमारा ज्यादा मन नहीं लगा और हम सब जल्दी ही वहां से पुनः बाहर आ गए. यात्रा की तैयारी भी करनी थी. इस तरह की पदयात्रा के लिए कुछ तैयारियाँ आवश्यक होती हैं, जैसे कि पीने का पानी, कुछ भोजन-सामग्री, पैरों में उचित प्रकार के जूते, टोपी (गर्मी के दिनों में) और बरसाती (मानसून के दिनों में). जूते तो हमारे पास पहले से ही थे. बाकि सामग्री त्रैम्बकेश्वर के बाज़ार से खरीद ली गयी. ब्रह्मगिरी की पदयात्रा जहाँ से प्रारंभ होती है, उसी स्थान पर महाराष्ट्र पर्यटन विकास प्राधिकरण द्वारा संचालित “संस्कृति हॉलिडे रिसोर्ट” है. तय यही हुआ कि वहीँ पर कार खड़ी कर पदयात्रा शुरू की जाएगी. स्थानीय लोग ऐसा मानते हैं कि यात्रा शुरू करने के पहले भोजन नहीं करना चाहिए, हालाँकि शिखर पर जाते जाते भूख अवश्य लग जाती है. इतनी छोटी-छोटी तैयारियों के पर्यंत, उसी रिसोर्ट में बस सुबह की चाय पी कर, हम लोगों ने प्रातः ७.४५ में पदयात्रा आरम्भ कर दी.

संस्कृति हॉलिडे रिसोर्ट

संस्कृति हॉलिडे रिसोर्ट

शुरू में करीबन १०० मीटर का रास्ता सीमेंट से बना आरामदायक और चौड़ा था, जिसे देख कर हमें लगा कि नाहक ही लोग हमें पद यात्रा करने से मना कर रहे थे. हमारी पत्नीजी भी बहुत प्रसन्न थीं. ऐसे चिकने रास्ते पर तो आराम से पदयात्रा हो सकती थी. १०० मीटर के बाद रास्ता दायीं तरफ मुड़ा, जहाँ श्री दानी जी खड़े थे. उनके हाथ में तीन छड़ियाँ थीं. हम तीनों के लिए एक-एक छड़ी. आगे जरूरत होगी. खास कर बंदरों को दूर रखने के लिए. वैसे अभी तक रास्ते ने ऊंचाई नहीं पकड़ी थी, तो हमें लग रहा था कि बच्चों का खेल है. हाथ में आई छड़ी से पत्नी जी ने कई मुद्राएँ बनानी शुरू कर दिया, जैसे की महिषासुरमर्दिनी इत्यादि. और हम भी मस्ती में तस्वीरें खेंचते चले जा रहे थे. मस्ती का आलम यह था कि सामने खड़ा विशाल ब्रह्मगिरी पर्वत दिखाई ही नहीं दे रहा था.

यात्रा की शुरुआती क्षण

यात्रा की शुरुआती क्षण

यह एक वन-क्षेत्र था, जो वन विभाग त्रैम्बकेश्वर के अंतर्गत आता था. वन-विभाग ने इस क्षेत्र में पाए जाने वाले पक्षियों और विशेष वृक्षों के बारे में जगह-जगह सुचना-पट लगाया था. लोगों को वन्य-जीवन तथा वृक्षों की गुणवत्ता बताने के लिए भी कई बोर्ड लगे हुए थे, जिन्हें पढ़-पढ़ कर हम और भी खुश होते थे. रास्ता धीरे-धीरे ऊँचा होते जा रहा था, पर ऊंचाई का अबतक हमें विशेष अनुमान नहीं हो रहा था. तबतक हमारी नज़र उस बोर्ड पर पड़ी, जिसमें ब्रह्मगिरी पदयात्रा की कुल संभावित दूरी का वर्णन था. ३.६ किलोमीटर एक साइड से. यह पढ़ कर थोड़ा माथा ठनका. क्या हम सब लोग इतनी दूर पैदल चल पाएंगे? पत्नी जी, जो थोड़े देर पहले महिषासुरमर्दिनी बन रहीं थीं, अब घबरायीं. पर ढाढस बढाने पर आगे चल पड़ीं.

सूचना पट

सूचना पट

हमारे साथ-साथ कुछ स्थानीय महिलाओं ने भी यात्रा आरम्भ की थी, पर वे सब हमसे आगे निकल गयीं थीं. आगे जा कर वे विश्राम करने लगीं. और जब हम पार हुए, तो हमें लकड़ी की छड़ी पकड़े देख कर हमारे ऊपर हँसने भी लगीं. पर हम क्या करते? पत्थरों से बनी सीढ़ियों वाला रास्ता था. और अब सीढियां ऊँची होती जा रही थीं. पर उन स्त्रीयों की तो दाद देनी पड़ेगी जो ब्रह्मगिरी पर्वत पर चढ़ कर पानी के गागरे भारती हैं और फिर उन गागरों को सर पर रख कर अपने-अपने घरों को ले जातीं हैं.

ब्रह्मगिरी पर्वत से गागर भर लातीं स्त्रीयां

ब्रह्मगिरी पर्वत से गागर भर लातीं स्त्रीयां

थोड़ी दूर जा कर हमने देखा कि एक रास्ता “गंग्द्वार” की तरफ जा रहा था. श्री दानी के इशारे पर हम लोगों ने इसे लौटती बार में पूरा करने का निश्चय किया और आगे बढ़ गए. आगे बरगद श्रेणी के कई वृक्ष लगे थे जिनसे फल गिर रहे थे. कहीं-कहीं तो कुछ कैक्टस भी लगे हुए थे. कुछ चट्टानें, जो ऊपर से खिसक कर आ गयीं थीं, फोटोग्राफी के लिए अच्छा लोकेशन बना रहीं थीं. किसी पेड़ के नीचे हनुमान जी की पत्थर की प्रतिमा तो कहीं किसी प्राचीन धर्मशाला के अवशेष. मुझे आकर्षित किया “मुक्ता आई मंदिर” ने, जो निरा साधारण और टिन के बने शेड में था. श्री दानी ने बताया कि निवृत्तिनाथ की बहन का नाम मुक्ता बाई था और यह प्रदेश गोरखनाथ संप्रदाय के लोगों के लिए विशेष है.

मुक्ता आई मंदिर

मुक्ता आई मंदिर

सीढ़ियों ने अब बहुत ऊँचाई ले ली थी. विशाल चट्टान-नुमा ब्रह्मगिरी पर्वत अपने सम्पूर्ण विशालता को ले कर हमारे सामने था. उस ऊँचाई से त्रैम्बकेश्वर शहर कितना बौना और मनोहर लग रहा था. सीढियां पर्वत की सपाट सतहों से लग गयी थीं. इन सीढ़ियों में घाटी की तरफ लोहे की रेलिंग्स भी लगे हुए थे ताकि कोई फिसल कर घाटियों में न गिर जाये. उस पर अब बन्दर सामने आ गए. पहाड़ की ऊँची खड़ी सपाट सतह पर भी ये बन्दर चीखते-चिल्लाते ऐसे दौड़ते थे की मानो समतल धरती पर दौड़ रहे हों. कूद कर अचानक किसी पदयात्री के सामने आ जाना और उनके हाथ से खाना छीन लेने में इन बंदरों को महारत हासिल थी. पर अनुभवी यात्री अपने साथ इनके लिए भी कुछ खाद्य सामग्री ले कर चलते है. श्री दानी ने भी ऐसा ही किया था. उसने अपने थैले से बिस्कुट निकाला और बंदरों को निश्चिंतता से खिलाया. और इधर हम तीनों अनुभव-हीन यात्री अपनी छड़ियाँ पकड़े बंदरों से बच कर आगे चलते रहे.

पर्वत की सतहों पर दौड़ते बन्दर

पर्वत की सतहों पर दौड़ते बन्दर

जल्दी-ही वो स्थान आ गया, जहाँ पर्वत को भीतर से काट कर उसी के चट्टानों की सीढियां बनायीं गयीं थीं. ऊँची ऊँची घुमावदार सीढियां एकाकेक काफी ऊँचाई ले लेतीं हैं. यह सबसे कठिन भाग है. मुझे ऐसा लगता है कि इन सीढ़ियों से करीबन १००० फ़ीट की ऊँचाई चढ़ जाती है. इस भाग में पैरों और फेफड़ों पर काफ़ी असर होता है. उस पर मार्च की गर्मी भी थी. इतनी सीढ़ियों की चढ़ाई के बाद तो पत्नी जी ने एकदम से यात्रा समाप्त करने की इच्छा जाहिर कर दी. एक बार और ढाढस बंधाया गया. खैर वहां पर स्थानीय लोगों द्वारा लगाया एक दुकान भी था, जिनमें कुछ खाद्य सामग्री, नींबू-पानी इत्यादि मिल रहे थे. हम भी वहीँ रुके और नींबू-पानी लिया. वहां काफी ठंडी हवा चल रही थी, जिसने श्रम और गर्मी से परेशान लोगों को फिर से पुनारुत्साहित कर दिया.

पर्वतीय सीढ़ियाँ

पर्वतीय सीढ़ियाँ

सीढियां तो ख़तम हो गयीं थीं. पर गोदावरी उद्गम-स्थल वहां से भी करीबन १.२ किलोमीटर पर था. रास्ता लम्बा, उबड़-खाबड़ और धीरे-धीरे ऊँचाई लेता हुआ था. पांव फिसलते थे. अतः रुकते-रुकते और फिर धीरे-धीरे चलते हुए, हम सब लोग शिखर के नजदीक पहुंचे. शिखर के कुछ पहले ही हमने पुराने ज़माने के बने तीन जल-संग्रह व्यवस्था देखे. आश्चर्य होता था कि इतनी ऊंचाई पर किसने और कब ऐसी व्यवस्था बनाई? पर आजकल के मनुष्यों ने उस में भी पानी की बोतलें इत्यादि डाल कर उन्हें गन्दा कर दिया था.

पर्वतीय जल-संग्रह

पर्वतीय जल-संग्रह

वहां से आगे चल कर, थके-मांदे हम लोग शिखर पर पहुँच गए. सच में वहां पहुँच कर जो आनंद आया उसका वर्णन करना संभव नहीं. लगा कि कितना बड़ा काम कर डाला है. बस ख़ुशी में हमने अपनी-अपनी छड़ियाँ हवा में लहराना शुरू कर दिया. वहां थोड़ी समतल जमीन है. उसी जमीन पर खड़े हो कर हम सुस्ताने लगे और एक-दुसरे को उसके हिम्मत और कोशिशों के लिए धन्यवाद देने लगे. जहाँ हम खड़े थे, वहां से बाएं गोदावरी का उद्गम स्थल था और दायीं तरफ शिवजी को समर्पित वो मंदिर था, जहाँ से गोदावरी नदी ने समुद्र की तरफ बहने की बजाय स्थल की ओर बहने का रूख किया था. इसकी भी अपनी एक कहानी है.

शिखर की खुशियाँ

शिखर की खुशियाँ

थोड़ी देर के बाद हमलोग गोदावरी का उद्गम स्थल की तरफ चले. उद्गम स्थल पूरे ब्रह्मगिरी पर्वत के दूसरे किनारे पर है, शिखर से थोड़ा नीचे. अतः वहां जाने के लिए कुछ दूर ढलान पर पैर दाब कर चलना पड़ता है. यहाँ की सीढियां टूटी-फूटी हैं. इसीलिए जमीन पर पैर स्थिर कर के नीचे उतरना चाहिए. उद्गमस्थान के पास छोटी-छोटी झोपरियाँ है, जिनमें शायद दुकान लगता होगा, जो उस दिन खली थे. वहां एक ब्रह्मगिरी मंदिर, गौतम ऋषि तपस्या स्थल (गोदावरी उद्गम स्थल) और एक नया बना चक्रधर मंदिर है. ब्रह्मगिरी मंदिर में एक शिवालय है, जिसमें ठीक वैसा ही विग्रह है जैसा त्रैम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग में है. यहाँ बंदरों का प्रकोप बहुत है, जिनसे सावधान रहना चाहिए.

ब्रह्मगिरी मंदिर

ब्रह्मगिरी मंदिर

इस मंदिर के ठीक बगल में गूलर के वृक्ष के नीचे गोदावरी का उद्गम स्थल है. कहा जाता है कि ऋषि गौतम तथा उनकी पत्नी अहल्या बाई ने गो-हत्या का पाप धोने के लिए इसी गूलर वृक्ष के नीचे तपस्या कर के शिवजी को प्रसन्न कर लिया था. और उसी वरदान के फलस्वरूप शिवजी की जाता में बहने वाली गंगा ने गोदावरी रूप में यहाँ से उद्गम लिया. आजकल यहाँ पूजन की व्यवस्था है. स्थानीय पुजारी बाल्टी से गोदावरी का जल निकल कर गाय की धातु-मूर्तियों पर जलाभिषेक करते हैं. यहाँ आ कर बहुत शांति का अनुभव होता है. मंद मंद बहने वाली वायु सारी थकान मिटा देती है.

गोदावरी उद्गमस्थल पर पूजन

गोदावरी उद्गमस्थल पर पूजन

हम लोगों ने भी वहां पूजन किया और फिर चल पड़े थोड़ी दूर पर स्थित शिव मंदिर की तरफ. उस शिव मंदिर तक जाने के रास्ते में एक अजीब वस्तु दीखती है. रास्ते के दोनों किनारों पर पत्थरों-ठीकरों के बने छोटे छोटे टीले. श्री दानी का कहना था कि ऊपर आने वाले युवक-युवतियां यहाँ बैठ कर इस तरह के टीले बनाते हैं. खैर बनाते होंगे, पर देखने में एक नयी चीज़ थी.

गूलर का वृक्ष जिसके नीचे से गोदावरी निकलती है

गूलर का वृक्ष जिसके नीचे से गोदावरी निकलती है

कहा जाता है कि उद्गम स्थल से निकल कर गोदावरी जब समुद्र की तरफ चल पड़ी, तब देवताओं में खलबली मच गयी. यदि गोदावरी समुद्र में जा मिलती तो इतनी बड़ी जनसँख्या का क्या होता जो उसकी किनारों पर बनी सभ्यताओं में बसती हैं? अतः गोदावरी को धरती की तरफ रूख कराने के लिया देवतागण शिवजी की शरण गए. कहा जाता है कि शिव जी ने घुटनों के बल बैठ कर अपनी जटा को धरती पर पटका, जिस से गोदावरी के बहाव बदल गया और गोदावरी नदी स्थल के तरफ बह चली. उद्गम स्थान से निकल कर, ये सबसे पहले गंग्द्वार में दर्शन देती है और फिर कुशाव्रत में धरती पर आ जाती है. पर जिस स्थान पर शिव जी ने इस नदी को धरती की तरफ बहने के लिए प्रेरित किया था, आज वहां एक मंदिर बना हुआ है. गुफानुमा इस मंदिर में शिवजी के घुटनों से धरती पर पड़ा हुआ निशान और उनकी जटा की चोट से धरती पर पड़े निशान की पूजा होती है.

शिव मंदिर

शिव मंदिर

हमलोगों ने भी वहां पूजा-अर्चना की. तत्पश्चात उसी मार्ग से लौटे, जिस से आये थे. लौटती यात्रा अक्सर कठिन नहीं लगती और फिर ये तो पहाड़ की चोटी से उतरने का मसला था. इसमें सिर्फ एक सावधानी बरतनी थी, जिस से कि पैर फिसले नहीं. और इस तरह उतरते हुए हमलोग गंग्द्वार के मुहाने पर पहुँच गए. करीब १ बजे दोपहर में मैंने गंग्द्वार का दर्शन किया और फिर वहां से नीचे उतरते समय श्री रामकुंड और लक्षमण कुंड का दर्शन करते हुए ०१.४५ अपरान्ह में संस्कृति हॉलिडे रिसोर्ट वापस पहुँच गए और पद-यात्रा समाप्त की.
उसके बाद जो खुल कर भूख लगी, उसका तो कहना की क्या था? आखिर हम लोगों ने मार्च की गर्मी के बावजूद परिवार सहित ब्रह्मगिरी फ़तेह जो कर लिया था.

4 Comments

  • Arun Singh says:

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