जाने, मुम्बई निकट गणेशपुरी के गर्म पानी के स्रोतों का सत्य

सदियों से मनुष्य धरती की सतह को फोड़ कर निकलने वाले गर्म जल के सोते को देख कर विस्मय करता रहा है. कहाँ से यह गर्म पानी सतत रूप से आता होगा, इस प्रश्न का हल निकालने की चेष्टा बड़े-बड़े वैज्ञानिक करते रहे हैं. दूसरी तरफ साधारण मनुष्यगण उन गर्म जल के स्रोतों से कई अन्य प्रकार से अपना नाता तय करते रहे हैं. कभी तो धार्मिक रूप से और कभी औषधि प्रयोग के रूप से. चाहे कुछ भी हो, गर्म पानी के स्रोते सदा-सर्वदा मनुष्यों को लुभाते रहे हैं. मुझे भी जब, मुंबई के निकट गणेशपुरी नामक शहर में स्थित गर्म पानी केकुछ स्रोतों के बारे में पता चला, तो मुझ पर उन्हें देखने की धुन सवार हो गई. और इसी धुन में ११ सितम्बर २०१६ (रविवार) को मैं एकबार फिर से राष्ट्रीय उच्चपथ ४८ पर चल पड़ा, जो आगे चल कर मुंबई को दिल्ली से जोड़ने वाली राष्ट्रीय उच्च पथ ०८ ही कहलाती थी. दहिसर चेकनाका से सड़क मार्ग से वह क़रीबन ४५ किलोमीटर की यात्रा थी. चेकनाका पर प्रत्येक गाड़ी से ३५ रूपये का टोल चार्ज लिया जाता था. यह चार्ज फिर से लौटती बार भी देना पड़ता था. खैर दहिसर चेकनाका पर मुंबई म्युनिसिपल कारपोरेशन का भव्य दरवाज़ा हर आने-जाने वाले को मानों स्वागत और विदाई करता हुआ प्रतीत होता था. उसी आकर्षक दरवाज़े से पार हो कर मेरी गाड़ी आगे बढ़ी.

दहिसर चेकनाका पर मुंबई म्युनिसिपल कारपोरेशन का भव्य दरवाज़ा

दहिसर चेकनाका पर मुंबई म्युनिसिपल कारपोरेशन का भव्य दरवाज़ा

दहिसर नाके से क़रीबन ३० किलोमीटर तक का रास्ता बहुत ही बढ़िया था. इसे मुंबई-अहमदाबाद उच्च पथ भी कहते हैं. इस पर गाड़ी ऐसी चलती है, मानों सड़क पर मक्खन बिछा हो और चक्के उस पर फिसलते जाते हों. मानसून के समय यहाँ की हरियाली ने और सुबह की ठंडी हवाओं ने मेरी यात्रा को और भी मनोहर बनाना शुरू कर दिया था. उस पर से वसई क्रीक पर बने पुल से पार करते समय चारों तरफ़ से पहाड़ों से घिरे हुए क्रीक में बहते हुए जल के आकर्षण से वशीभूत हो गया. पर वहीँ रुक कर फ़ोटो उतारने के सिवा और मैं कर भी क्या सकता था. वहाँ से वसई-विरार मुनिसिपलिटी शुरू हो जाती है. सुदूर क्षितिज पर हरे रंग के पत्तों से घिरी पर्वत श्रृंखलाएं दिखने लगती हैं और सड़कें यदा-कदा घाटों के बीच से चढ़ती-उतरती जाती हैं. वसई और विरार के इलाके को पार करने के बाद एक शिरशाट नामक गाँव आता है, जहाँ से राष्ट्रीय उच्च पथ छोड़ना था. यहीं ध्यान देना पड़ता है क्योंकि फ्लाईओवर के नीचे से राज्यकीय उच्च पथ का रास्ता दाहिने जाता था. यदि यहाँ ध्यान चूका तो निरर्थक सीधे काफी आगे तक जा कर पुनः वापस लौटना पड़ेगा.

 वसई क्रीक का एक दृश्य

वसई क्रीक का एक दृश्य

शिरशाट से १५ किलोमीटर की दूरी पर गणेशपुरी शहर स्थित था. यहाँ से सिंगल लेन वाला शिरशाट – वज्रेश्वरी राज्यकीय उच्चपथ शुरू हो गया. कई जगहों पर इस रास्ते के दोनों तरफ़ बरगद के बड़े-बड़े वृक्ष थे, जिनसे बड़ी-बड़ी जड़ें लटक रहीं थीं. मैंने देखा कि कई आदिवासी वृक्षों से गिरने वाले टहनियों और पत्तों को इकठ्ठा कर रहे थे, जिन्हें बाद में शायद बाज़ार में बेच दिया जायेगा. इस इलाक़े में पक्की ईंटें बनाने वाले भट्टे भी थे. साथ ही कई दुग्ध-शालायें भी थीं. उसगांव नामक एक गाँव भी इस रास्ते पर पड़ता है, जहाँ से लोग उसगांव डैम पर जा सकते हैं. १५ किलोमीटर पर गणेशपुरी का मुहाना बायीं तरफ़ खुलता है, जहाँ गणेशपुरी की दिशा दर्शाते हुए बड़े-बड़े बोर्ड लगे हुए हैं ताकि यात्रियों को कोई असुविधा नहीं हो.

गुरुदेव सिद्धपीठ

गुरुदेव सिद्धपीठ

गणेशपुरी में प्रवेश करते ही श्री भीमेश्वर सद्गुरु नित्यानंद संस्था द्वारा संचालित “गुरुदेव सिद्धपीठ” का दर्शन होता है. श्रीनित्यानंद सिद्धयोग के एक बहुत बड़े महात्मा हुए जिन्होंने १९३६ से १९६१ तक गणेशपुरी में ही तप-योग-मनन किया था. इनके शिष्य का नाम मुक्तानंद था, जिन्होंने गणेशपुरी में एक विशाल सिद्धपीठ तथा श्री भीमेश्वर मंदिर की स्थापना की. इस दोनों महात्माओं की समाधी भी गणेशपुरी में ही स्थित है. गुरुदेव सिद्धपीठ में सुरक्षा-जांच के बाद प्रवेश करने दिया जाता है. गुरुदेव की भव्य प्रतिमा वहाँ स्थापित है. उस हौल में बड़ी शांति रखी जाती है. श्रद्धालु-भक्तगण वहाँ बैठ कर मनन और ध्यान करते हैं. परन्तु यह सिद्धपीठ दिन के १२ बजे से दोपहर ३ बजे तक दर्शन के लिए बंद रहता है. संध्या को भी ६ बजे के बाद यहाँ दर्शन समाप्त हो जाता है. यदि मुक्तानंद जी की समाधि का दर्शन करना हो, तो वह सिर्फ शनिवार-रविवार को अल्प समय के लिए खुलता है. इस सिद्धपीठके अन्दर फोटोग्राफी पूर्णतया निषिद्ध है.वहीँ पर एक छोटा मंदिर “ग्राम-देवी” को समर्पित है, जहाँ जा कर लोग पूजन-भजन कर सकते हैं और तस्वीरें भी ले सकते हैं.

ग्राम देवी का मंदिर

ग्राम देवी का मंदिर

मैंने अपनी गाड़ी सिद्धपीठ के सामने खड़ी करने के बाद वहाँ का दर्शन कर लिया. अब मुझे गर्म पानी के स्रोतों की तलाश थी. पता चला कि स्रोते सिद्धपीठ से लगभग १.५ किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं. गाड़ी वहाँ तक जा सकती थी. पर मैंने पैदल ही चलने का निश्चय किया ताकि मैं उस मुफस्सिल टाउनशिप को भी अच्छी तरह से देख सकूं. लोकोक्ति है की रामायण काल में भगवान् राम के गुरु महर्षि वशिष्ठ ने यहाँ एक गणेशजी की मूर्ति की स्थापना की थी और तपस्या भी की थी. ऐसा माना जाता है कि उसी से इस स्थान का नाम गणेशपुरी पड़ा. छोटी सी बस्ती के रूप में बसे इस शहर में एक जंगल भी था, जिसे महाराष्ट्र सरकार के वन-विभाग ने गणेशपुरी उपवन नाम दिया था.

भीमेश्वर मंदिर के सामने फूलों की दुकानें

भीमेश्वर मंदिर के सामने फूलों की दुकानें

उसी उपवन के किनारे-किनारे चलते हुए मैं एक विशाल मंदिर के प्रांगन तक पहुँच गया. यह “भीमेश्वर मंदिर” था. दूर-दराज से भक्तजन यहाँ दर्शन करने आते हैं. कहते हैं कि संत नित्यानंद इसी मंदिर के पास तपस्या किया करते थे. इस मंदिर में संगमरमर के पत्थरों का उपयोग हुआ था. पर यहाँ भी फोटोग्राफी निषेध थी. इसके बड़े से हौल में बैठ कर यहाँ भी श्रद्धालु-गण शांति बना कर ध्यान मग्न थे. मध्यान्ह आरती का समय हो गया था. धीरे-धीरे आरती की प्रक्रिया शुरू हुई और घंटे-घरियाल बजने लगे. सारा वातावरण गूँज उठा और श्रद्धालु-भक्तगण आरती में मग्न हो गए.यहाँ प्रतिदिन पांच बार आरती होती है, जिसमें प्रथम काकड़ आरती प्रातः ०४.०० बजे और अंतिम शयन आरती रात्रि ०९.०० बजे आयोजित की जाती है.

<भीमेश्वर मंदिर भीमेश्वर मंदिर[/caption]

बाहर उस दिन बारिश भी हो रही थी. भीमेश्वर मंदिर के सामने फूलों की दुकानें लगीं थीं. मालिनों ने बारिश से बचने के लिए रंग-बिरंगे छाते लगा लिए थे, जिनसे उन दुकानों की सुन्दरता और भी निखरी जाती थी. फूलों के माले बेचने वाले दुकानों से जो माले लटक रहे थे, वे भी वर्षा-जल से धुल कर अपनी रंगों की छटा बिखेर रहे थे. बारिश जब बंद हुई, तब मैंने उनकी कुछ तस्वीरें लीं.उस भव्य मंदिर के साथ ही एक “भीमेश्वर महादेव शिव मंदिर” भी था, जो कुछ प्राचीन लग रहा था. यहाँ लोगों को पूजन करने की पूर्ण अनुमति थी. स्थानीय लोग यहाँ प्रस्थापित नंदी के कानों में अपनी मनोकामनाएं कह रहे थे. मान्यता है कि ऐसा करने से उनकी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं.

भीमेश्वर महादेव शिव मंदिर

भीमेश्वर महादेव शिव मंदिर

महादेव मंदिर से निकलते ही ऊँची चाहरदिवारियों से घिरा एक दालान है, जिसमें चार कुंड बने हुए थे. यहीं गणेशपुरी का विख्यात गर्म पानी का सोता था. प्रथम कुंड में गर्म पानी का सोता है, जिसे सीमेंट से बनी चैम्बर से घेर दिया गया है. लोग इसमें अपनी मनोकामनाओं की पूर्ती के लिए सिक्के डालते हैं. यही विश्वास उन सभी में व्याप्त होता है कि इस सोते में सिक्के डालने से मन की अभिलाषा पूरी होती है.

गर्म पानी का सोता जिसमें लोग सिक्के डालते हैं

गर्म पानी का सोता जिसमें लोग सिक्के डालते हैं

इस सोते से पानी प्रथम कुंड में भरता है. फिर पानी बह कर द्वितीय और क्रमशः तृतीय और चतुर्थ कुंड में चला जाता है. तत्पश्चात पानी बह कर दालान से बाहर निकल कर नदी में चला जाता है. इसीलिए प्रथम कुंड में सबसे गर्म पानी मिलता है. क्रमशः गर्मी अगले कुंडों में घटती चली जाती है. दालान में स्त्रियों और पुरुषों के लिए अलग-अलग कपड़े बदलने की व्यवस्था भी है.कई लोग उन कुंडों में स्नान कर रहे थे. लोग-बाग़ किनारे पर बैठ कर पहले पैरों को पानी में डालते थे और फिर तापमान स्थिर होने के बाद कुंड में स्नान हेतु उतरते थे.मैंने भी पानी में पैर डाला. सच में पानी बहुत गर्म था. अचानक उस गर्म पानी में उतरने से थोड़ी जलन हो सकती है.

गणेशपुरी के चार कुंड

गणेशपुरी के चार कुंड

चित्र ६: भीमेश्वर मंदिर>

इस प्रकार गणेशपुरी का पहला गर्म सोता मैं देख चुका था. परन्तु मेरा मन अभी भी नहीं भरा था. मैंने पहले कहीं पढ़ रखा था कि वहाँ एक नदी भी बहती है और उस नदी के तट पर भी गर्म पानी का एक सोता है. उस तट पर जो सोता था उसका नाम लोगों ने “अग्निकुंड” रखा था. कहते हैं कि उसका पानी इतना गर्म है कि कच्चे चावल की पोटली तो पतले कपड़े में बाँध कर अग्निकुंड में रखो तो कुछ ही मिनटों में चावल पक जाते हैं. इसीलिए कुछ देर वहाँ बिताने के बाद मैं मंदिर परिसर से बाहर आ गया और किसी दूकानदार से नदी तट का रास्ता पूछ कर उसी तरफ़ बढ़ चला. उस नदी का नाम तन्सा नदी था. रास्ता कच्चा था और मानसून में नदी के किनारे लगे हुए सारे वृक्ष और पौधे हरे-भरे और विकसित थे. अग्निकुंड का मार्ग पकड़ कर मैं नदी के तट पर आ तो गया, पर वहाँ मालूम हुआ कि बरसात में नदी फूली हुई है और अग्निकुंड का रास्ता पूरी तरह से जलमग्न है. आलम यह कि मैं अग्निकुंड तक पहुँच नहीं पाया और वापस लौट चला.

तन्सा नदी और अग्निकुंड जाने का मार्ग

तन्सा नदी और अग्निकुंड जाने का मार्ग

इधर छिटपुट हो रही बारिश से मेरा तन-बदन भींग चुका था. उस भींगे हुए ठंडे मौसम में ईच्छा होने लगी कि गर्म पानी के सोतों में स्नान किया जाए. आखिर इतनी दूर मैं उन्हीं के लिए तो आया था. पर मैं महादेव मंदिर वाले उन सार्वजनिक कुंडों में डुबकीनहीं लगाना चाहता था. किंकर्तव्यविमूढ़ता की उस परिस्तिथिति में तन्सा नदी के तट से जैसे निकला, वैसे ही एक पुराने ब्रिटिश समय की कोठी नज़र आई. उत्सुकता शांत करने हेतु मैं कोठी तक चला गया. इस कोठी का नाम रत्नाबाद था. वर्तमान में इसे “गर्म-पानी स्नान तथा हेल्थ रिसोर्ट” के रूप में परिवर्तित किया गया था.

रिसोर्ट के अन्दर गर्म पानी के सोता

रिसोर्ट के अन्दर गर्म पानी के सोता

वहाँ के अटेंडेंट ने मुझे गर्म पानी का एक और सोता दिखाया जो उस प्रॉपर्टी के परिसर में ही था. उस सोते से निकलते पानी को सीमेंट से बने हौदे में जमा कर स्नान-गृह में भेजा जाता था. स्नान-गृह पक्का और साफ़-सुथरा था. वहाँ बाकायदा बाथ-टब भी बना हुआ था. पर एक बात है. वह स्थान बिलकुल निर्जन था. उस निर्जनता में, मानसून की बारिश के दौरान, पुरानी कोठी में बने स्नान-गृह के बाथ-टब में स्नान करते समय एक अजीब एहसास होता है, ऐसा कि मानों कोई अनजान रहस्य वहीँ मौजूद हो और जिसे हम देख भी ना सकें. संभवतः मेरा भ्रम होगा, परन्तु उस रहस्यमय एहसास ने मुझे जल्दी ही वहाँ से निकलने के लिए मजबूर कर दिया. स्नान तो मैं कर ही चुका था, बस जल्दी से कपड़े बदले और उस निर्जनता से बाहर निकल गया. हालाँकि अटेंडेंट ने बताया था कि सर्दियों में उस रिसोर्ट के सारे कमरे हमेशा बुक रहते हैं. परन्तु अच्छा होता यदि कोई उस दिन मानसून में भी अपने साथ होता. चहल-पहल होती रहती तो फिर शायद ज्यादा देर तक वहाँ रहा जा सकता था.

रिसोर्ट के अन्दर गर्म पानी का सोता से स्नान की व्यवस्था

रिसोर्ट के अन्दर गर्म पानी का सोता से स्नान की व्यवस्था

मैंने गणेशपुरी के दो सोतों के बारे में पढ़ा था. पहला महादेव मंदिर में और दूसरा अग्निकुंड तन्सा नदी में था. यहाँ आकर मैंने तीसरा सोता भी देखा, जिसके कारण एक रिसोर्ट भी चल रहा है.गणेशपुरी आने के लिए रेलमार्ग से विरार अथवा वसई रोड स्टेशन तक आने के बाद लोकल बस या टैक्सी/ऑटो से भी आया जा सकता है. ठहरने और खाने-पीने के लिए यहाँ कई होटल इत्यादि हैं. नित्यानंद संस्थान द्वारा भी ठहरने और कैंटीन की व्यवस्था की जाती है. यदि गर्म पानी के सोतों में स्नान करना हो तो सबसे अच्छा मौसम सर्दियों का होगा. परन्तु यदि धार्मिक मन से नित्यानंद संस्थान में दर्शन करने के लिए आना हो, तो कोई भी मौसम ठीक होगा. खैर धरती से निकले गर्म पानी में स्नान करने के बाद भूख बड़ी खुल कर लगती है. स्नानोपरांत नित्यानंद संस्थान द्वारा चलाये जाने वाले कैंटीन में शुद्ध शाकाहारी थाली का सेवन करने के पश्चात् मैं पैदल चलते हुए सिद्धपीठ के पास खड़ी अपनी गाड़ी के पास आया और इसी इलाक़े में गर्म पानी के कुछ और सोतों की खोज में चल पड़ा.

2 Comments

  • Nandan Jha says:

    And we come to know of one more place which is hidden from the onslaught of tourists. Thank you Uday.

    • Uday Baxi says:

      Yes. Ganeshpuri is not so famous with general tourists, specially from far off places. But Locals do travel to these hotsprings. Additionally, it is like a mecca for people, who follow the siddha panth, sadguru Nityanand and sadguru Muktanand.

      Thanks a lot.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *