देल्ली – कोट्द्वार सड़क विवरण – मंदिर दर्शन – नदी के किनारे पिकनिक – सुल्ताना डाकू का किला – गढ़ मुक्तेश्वर

पहली बार बाइक पे जाना था तो रूट भी कुच्छ अलग चुना – फरीदाबाद >> देल्ली >> गाजिआबाद >> मेरठ >> मवाना बाई-पास >> मीरापुर >> बिजनौर >> नजीबाबाद >> कोटद्वार

कोटद्वार >> नजीबाबाद >> चांदपुर >> गज्रौल्ला >> गढ़ मुक्तेश्वर >> पिलखुआ >> देल्ली >> फरीदाबाद

ऑफिस से हाफ डे लिया, और गाजिआबाद आधे घंटे में पहुच गया! मेरे पास CB Twister है, 110 CC, अच्छी pick-up, दो पहिये वाहन को ज्यादा तेज़ चलाना मैं पसंद नहीं करता, सो 70 की रफ़्तार काफी थी, ज्यादा ट्राफिक नहीं था सो देल्ली से डेढ़ घंटे में मैं मेरठ के बाई-पास पहुच गया! रास्ते में मोदीनगर के आस पास सड़क कही कही खराब मिली, बाकि तो ठीक ही थी! मवाना की तरफ जाने के लिए मेरठ शहर से न होते हुए मैंने हरिद्वार के लिए बाई-पास वाली रोड पकड़ी और तीसरे फ्लाई ओवर के निचे से सीधे हाथ को मेरठ केंट की ओर मुड गया, फिर मेरठ के गंगा नगर इलाके से होते हुए मवाना रोड पे पहुच गया! इस रस्ते से मुझे मेरठ बस अड्डे और बेघुम पुल जाने की जरुरत नहीं पड़ी जोकि भीड़ भाड़ वाला इलाका है, सो समय भी काफी बच गया! मवाना रोड पे पहुच कर मैंने पहला स्टॉप लिया और एक Thumbs-up पी!5 मिनट से ज्यादा नहीं रुका होऊंगा, फिर बाइक उठाई और कुच्छ ही मिनटों में मवाना बाई-पास रोड पे था, फिर ध्यान आया एक फोटो लेने का, यहाँ से बिजनौर 48 किलो मीटर था!


मवाना बाई-पास ख़तम होने तक यह 41 km ही शेष बचा था!

बिजनौर जाते हुए रस्ते में मीरापुर पड़ता है! यहाँ कुच्छ होटल/ढाबे हैं, जहाँ खाने पिने के लिए बस्सें रूकती हैं! एक तीरह आता है, सीद्धे रोड मुज्ज़फर नगर को जाती है जो की 31 km है वहां से, और अगर दायें हाथ को मुड जाओ तो 26 km चलके बिजनौर आ जायेगा! मैं दायें मुड गया!

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दायें मुड़ते ही एक होटल दीखता है नाम है Monti millions, यहाँ रुका एक फ़ोन करना था, होटल में बागीचा बड़ा सुन्दर लगा!

बिजनौर की तरफ चलते ही मौसम और हवा में फर्क महसूस होने लगा! गंगा जी के जो दर्शन होने वाले थे! बिजनौर में दाखिल होने से पहले गंगा जी का बैराज पुल पड़ता है! यहाँ से बिजनौर 11 km और नजीबाबाद 46 km रह जाता है! इस गंगा सेतु का नाम है चौधरी  चरण सिंह मध्य गंगा बैराज! लगभग 2 मिनट यहाँ रुक कर गंगा जी को प्रणाम किया! फिर आगे बढ़ गया बिजनौर को!

बिजनौर में दाखिल होते ही लगा की पहुच गए! यहाँ काफी कुच्छ बदल गया है पहले से! अब तो एक srs multiplex भी खुल गया है यहाँ! नजीबाबाद के लिए srs के सामने से ही बायीं तरह मुड़ना पड़ता है! Valentine day था उस दिन पर इन शहरों में इस दिन का प्रभाव नहीं दिखता, न हाथो में हाथ डाले जोड़े और नाही फूलो से सजी दुकानें ही दिखी! वैसे में खुद इस दिन में विश्वास नहीं रखता, मेरे तो सब दिन मेरे अपनों के लिए हैं न की कोई एक निर्धारित दिन!

नजीबाबाद से पहले किरतपुर पड़ता है! नजीबाबाद में दाखिल होने से पहले दायीं तरह के छोटी सी नहर दिखती है, एक पेट्रोल पम्प भी है, यहाँ से कोटद्वार 27 km रह जाता है! इस नहर के साथ और पेट्रोल पुमप की बगल से एक सड़क गयी है, यह कोटद्वार के लिए बाई-पास है! मैं इसी पे हो लिया!

डेढ़ बजे दिल्ली से चला साढ़े पाँच बजे नजीबाबाद पंहुचा!. यहाँ मेरा ददिहाल भी है और मेरी ससुराल भी! मैं घर पंहुचा, थका नहीं था, पर नहाकर ताज़ा होने का मन किया! बाइक पे धुल मिटटी से नहीं बच पते हैं, पर कुच्छ भी कहो मजा पूरा आता है! मेरा इस तरह अचानक पहुचना बीवी के लिए अच्छा surprise था! फिर उस दिन की समाप्ति एक अच्छे से रेस्तरा में एक अच्छे से dinner के साथ की!

अगले दिन मेरे साले साब के साले साब आये हुए थे! बस हम तीनो ने प्रोग्राम बनाया कोटद्वार पिकनिक का! A Boyz day out. पिच्छली बार मैं जब आया था तो अपनी कार यहीं छोड़ गया था, जिसके आभाव में मुझे इस बार बाइक पे आना पड़ा था! मैंने अपनी कार ( ritz) उठाई और तीनो निकल पड़े कोटद्वार की ओर! कोटद्वार पहुचते ही हमने खाने के लिए सामन लिया और एक बड़ी कोल्ड्रिंक के साथ निकल पड़े पहाड़ो की तरफ!

कोटद्वार जाओ और सिध्बली और दुर्गा देवी मंदिर के दर्शन न करो तो क्या कोटद्वार गए! हमने भी पहले दुर्गा देवी मंदिर की और गाडी ले ली, और माता के दर्शन किये!

फिर लौटते हुए सिद्धबली मंदिर गए!

इन दो मंदिरों के बारे में और पढने के लिए मेरे पिछले पोस्ट को पढ़े:- कोटद्वार के दुर्गा देवी और सिध्बली मंदिर

सिद्धबली मंदिर के दर्शन के बाद हमने अपने पिकनिक के लिए कोई जगह तलाशनी शुरू की! कोटद्वार में सड़क के साथ नदी चलती है! और कहीं भी सड़क से निचे उतर के आप नदी किनारे पिकनिक कर सकते हैं. हमारा भी ऐसा ही प्लान था! मगर गाडी पार्क करने के लिए उपयुक्त स्थान धुन्ड़ना जरुरी था, जो हमें शीघ्र ही मिल गया! और हम गाड़ी पार्क करके सड़क से निचे उतरकर नदी की और चल दिए!

इसी पुल के नीचे हमें पिकनिक के लिए बढ़िया जगह भी मिल गयी! हम नदी के किनारे पहुचे ही थे की हमें हाथी की पोटी दिखाई दी! यहाँ हाथी कभी कभी दिख जाते हैं, पर ज्यादा नहीं!

पानी साफ़ सुथरा ही था, काफी ठंडा भी था! एक बड़े से पत्थर को हमने अपना डाइनिंग टेबल बनाया और खाने का सामन खोलके सब कुच्छ निपटा दिया!

पेट पूजा के बाद नदी के ही पानी से हाथ धोकर, कुच्छ आस पास के फोटो लिए और कुछ बड़े पत्थरो पर चढ़ने की कौशिश की! अच्छा खासा समय बिता चुके थे हम, कोई ढाई या तीन ही बजे होंगे! सोचा वापस चला जाये! सो निकल पड़े वापस नजीबाबाद की ओर! वापसी में मैं सोच रहा था की कभी बाइक से कोटद्वार से आगे जाऊंगा! आपको बता दू की कोटद्वार से आगे पौड़ी होते हुए यह रास्ता श्री नगर से मिलता है जो की चार धाम यात्रा की शुरुआत है! सो आप चार धाम यात्रा के लिए कोटद्वार होते हुए भी जा सकते हैं! जब हरिद्वार रूट पे कावड़ियों का आना जाना रहता है तब लोग अक्सर यह रूट पकड़ते हैं!

कोटद्वार से नजीबाबाद आते आते हमारा प्लान सुल्ताना डाकू का किला देखने का बन चूका था सो गाड़ी उसी तरफ ले ली!

यह किला मैं पहले भी एक बार कई साल पहले देख चूका था! इस शहर के आस पास काफी मशहूर है यह किला सुल्ताना डाकू की वजह से! मैंने अपने बचपन में सुल्ताना डाकू की काफी कहानिया सुनी थी! सुल्ताना एक बहादुर डाकू था जिसे पकड़ना उस समय नामुमकिन था! उस समय की पुलिस ने उसे पकड़ने की लगातार कौशिशे की थी! मैं इस किले को दोबारा देखना चाहता था! काफी कम लोग जानते हैं इस किले के बारे में! हलाकि सुल्ताना डाकू का अपना एक इतिहास है, यहाँ तक की एक फिल्म भी बनी है सुल्ताना डाकू पे, जिसमें सुल्ताना डाकू का किरदार दारा सिंह जी ने निभाया था!

कीलें में घुसते ही दाई तरफ हमने गाड़ी पार्क की और किले की सीडियां चढ़ गए! बड़ी और मोटी दीवारों के बीच एक बड़ा सा मैदान हैं जो अब बच्चो के क्रिकेट खेलने के काम आता है! यह किला नजीबाबाद के उत्तरी भाग में है! इस किले को अपने वक़्त के नवाब, नवाब नाजीबुद्दोला ने बनवाया था, जिनके नाम पर इस शहर का नाम भी नजीबाबाद पड़ा था! सुल्ताना डाकू ने यह किला अपने छुपने की जगह के तोर पे इस्तेमाल किया! सुल्ताना अपने समय का माना हुआ डाकू था जोकि 1920 के आस पास उत्तर प्रदेश में मिलने वाले भाट्टू काबिले का था! हलाकि भाट्टू कबीला लूट खसोट और खून खराबे के लिए कुख्यात था, मगर सुल्ताना जहा तक हो सके खून खराबी से बचता था! कहा जाता है वोह अपने घोडे चेतक और कुत्ते जिसका नाम वीर बहादुर था, से बड़ा लगाव रखता था! डाकुओ के कबीले में पैदा होने के कारण वोह डाकू बना था! आजादी से पहले का 1920 एक अलग ही दुनिया थी! भाट्टू अपने आप को महाराणा प्रताप का वंशज मानते थे मगर अंग्रेज सरकार ने उन्हें डाकुओ का कबीला ही करार दिया!

भाट्टू में जो सबसे बड़ा बदमाश होता था वोह सबसे अच्छी दुल्हन ले जाता था! चोरी के गुर्र तो उन्हें बचपन में ही सिखा दिए जाते थे! एक भाट्टू अपने मुह में चाकू, चाबी और चुराए हुए माल जैसे गहने आदि को सालो छुपा सकता था! एक पंचायत होती थी जो पुलिस के हाथो मारे गए डकैतों के परिवारों को देखती थी, हर भट्टू अपनी लूट का कुच्छ हिस्सा इस पंचायत को देता था! ऐसे लोगो के बीच सुल्ताना पैदा हुआ था! उसकी गरीबी उसे नजीबाबाद के किले में ले आई थी!

फ्रेडी यंग ने सुल्ताना को नैनीताल के पास के जंगलो में पकड़ा! जुलाई 1924 में जब सुल्ताना मरा तो अपनी उम्र के दुसरे दशक का दूसरे चरण में था! उसने खुदको पुलिस को सौपा और उन्ही के हक में सारा बयान दिया! ऐसा उसने अपने लड़के के लिए किया, जिसकी परवरिश का जिम्मा फ्रेडी यंग ने लिया, उसे अपना नाम देकर! सुल्ताना नहीं चाहता था की उसके बाद उसकी औलाद उसके नक़्शे कदम पे चले!

कहानी पूरी फ़िल्मी है, पर तभी तो इसपे फिल्म बनी! शाम होने को थी, हमने चलना मुनासिब समझा!

अगली सुबह देल्ली के लिए निकलना था, और रूट पहले ही निर्धारित हो चूका था – चांदपुर, गजरोला और गढ़ मुक्तेश्वर होते हुए!cज्यादा जल्दी नहीं निकल पाया जैसा की सोचा था, फिर भी करीब 6 बजे सुबह बाइक उठाई, और चल पड़ा नजीबाबाद से! हलकी सी ठण्ड थी सुबह, और बाइक पे तो और ज्यादा लगती है! मगर मज़ा आ रहा था, खुली सड़क, सड़क किनारे हरे भरे लहलहाते खेत! वाह! मुझे बाइक पे ही घूमना चाहिए! संदीप भैया की टोली में शामिल होना ही पड़ेगा! जो लोग संदीप भैया से वाकिफ नहीं हैं उनके लिए http://jatdevta.blogspot.in/

बिजनौर में घुसते ही सेंट मरीज़ स्कूल के सामने एक सड़क बायीं और मुडती है, इससे चांदपुर सीधे पहुच जा सकता है, बिना किसी ट्राफिक में फसे! मैं बाएँ मुड़ा और जल्दी ही चाँदपुर पहुच गया! कुछ भूख सी लगी तो एक लेस के चिप्स का हरे वाला पेकेट खरीद लिया, यह मुझे काफी पसंद है, हलकी फुलकी भूख में! मैं सफ़र में खुले खाने से अच्छा पेकेट बंद खाना पसंद करता हूँ, हाँ कोई मशहूर खाने की जगह हो या फिर मुझे यकीन हो की यहाँ का खाना मुझे बीमार नहीं करेगा, तो मैं जरुर खाता हूँ! सफ़र में ख्याल रखना अच्छी बात है, अगर घुमक्कड़ी का पूरा मजा लेना है तो!

खेर जल्दी ही मैं चांदपुर पार कर चूका था! चांदपुर तक सड़क ठीक थक ही थी! मगर चांदपुर से आगे गजरोला तक कही जगह सड़क बन रही थी या उसकी मरम्मत चल रही थी, जिसके चलते मुझे ख़राब रास्ता मिला और कुछ समय भी ज्यादा लगा! पर कुछ किलोमीटर के बाद रास्ता सही हो गया था! गजरोला से देल्ली के लिए मैं शहर के बिच से दाई ओर मुड़ा, तो देखा मस्त हाईवे था, जिसे देखते ही मैं पीछे निकला ख़राब रास्ता भूल गया! गजरोला से ये सीधी सड़क डेल्ही के अक्षरधाम मंदिर के सामने तक आती है! इस हाईवे के बारे में नैनीताल ओर मोरादाबाद जाने वाले तो परिचित होंगे ही! रेड लाइट न की बराबर ओर नॉनस्टॉप! चांदपुर के बाद मैं सीधा गढ़ मुक्तेश्वर रुका!

नेशनल हाईवे 24 पे स्थित गढ़ मुक्तेश्वर गंगा के यहाँ से गुजरने के कारण प्रसिद्ध हैं! यहाँ पर प्रति वर्ष कार्तिक महीने की पूर्णिमा को मेला लगता हाई जिसमे लगभग 8 लाख श्रद्धालु आकर गंगा-स्नान करते हैं! दश्हेरा पे भी यहाँ एक बड़ा मेला लगता हैं!

गढ़ मुक्तेश्वर का नाम मुक्तेश्वर महादेव के मंदिर के कारण पड़ा, जोकि गंगा मैया को समर्पित हैं, जिनकी पूजा यहाँ पे स्थित 4 मंदिरों में होती हैं! यह स्थान अपने 80 सती स्तंभों के लिए भी प्रसिद्ध हैं, जो की प्रत्येक किसी हिन्दू विधवा के सती होने के स्थान के प्रतीक हैं! इन स्थानों पे जाने का समाय नहीं निकाल पाया पर जल्दी ही जाना चाहूँगा!

कुछ देर गढ़ मुक्तेश्वर रुक कर, गंगा जी को प्रणाम करके, बढ़ गया देल्ली की ओर! सड़क बहुत अच्छी होने के कारण जल्दी ही फरीदाबाद पहुच गया! अब आपके सामने जल्दी ही किसी और यात्रा विवरण के साथ प्रस्तुत होता हूँ! तब तक घुमक्कड़ी जिंदाबाद!

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  • Wow Vinay.

    This is an absolute mixture of road review, spiritual , historical , story, picnic and filmy post.

    All in one ……………. ( delhi ki chaat yaa mumbai ki bhel ) everything mixed thoroughly to get spicy and chatpatta swaad……………..

    Thoroughly enjoyed…………………

    • Thanks Vishal ji,
      I was planning to split it into two, but Vibha suggested me to make it one. And see, it is better than before. First it had 53 pics, I reduced the number to 26 by selecting the best of all.

      Suggestions from all ghumakkar mean a lot. I am learning Ghumakkari and writting about Ghumakkari by reading all posts on Ghumakkar. Now Ghumakkar.com has been part of my life.

      I am glad that you enjoyed this post.

  • Mukesh Bhalse

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  • SilentSoul

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  • Suneel Kumar

    Nice Explanation of Sultana daku

  • D.L.Narayan

    Very interesting blog, Vinay. I thought that Sultana was a woman until you mentioned that Dara Singh played the role of the dacoit in a Hindi film. I wish you also mentioned some facts about who built the fort before it became Sultana’s adda.

    I have a general comment to make regarding signboards. In the first one, the board is partly covered by a commercial banner. In the third one, the signboard is partly obscured by trees and it is placed on the left, instead of overhead. This is not only a huge inconvenience for motorists but can also cause accidents because the attention of drivers is distracted. As tax payers it is our right to demand that stringent standards should be in place to ensure safety and convenience for all users.

    • Thanks for your kind words.
      I have mentioned in the story that it was built by Najibuddholla, the Nawab of Najibabad.
      You are realy very good-hearted, thats why you are thinking about others, and suggesting for mankind.
      Kindly suggest that how we can demand…

      • D.L.Narayan

        When I read about Najeebuddoulah, I only read the bit about Najibabad being named after him. Proves that my Hindi is not upto the mark. I apologise for the inadvertent error, Vinaybhai.

        Regarding road safety concerns , NHAI has a page dedicated for online complaints/suggestions and one can also upload pictures there (http://www.nhai.asia/register/rgr/traffic.asp). Their jurisdiction is, however, limited to National Highways.

        There is an NGO working on improving road safety called ArriveSafe (http://www.arrivesafe.org/contact.php) which states, among other things, “to work as a pressure group to create political will and help improve road safety situation.”

        @ Nandan: Since roads are the preferred travel mode for ghumakkars, do you think that an “insight” article is needed for this topic?

        • No need to apologise, Sir. You just skip one line, so its OK.
          Great, Thanks for giving so useful knowledge..I will see these websites.
          Many thanks again.

  • Stone

    Very nice post Vinay, one can sense that you thoroughly enjoyed your journey.
    I really like the way you mixed the pictures with the context.

    Thanks for sharing.
    Keep traveling!!!

    • Thanks for liking my post.
      Last week I was in Mussoorie, soon you will read about that.
      :)

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  • @ Vinay – Long time Vinay. Glad to see your post. Sultana Daku was new to me. What happened after Freddie Young adopted his son. Even I thought that Sultana is a woman.

    This route is definitely far from the maddening crowd. I have used it few times and every time I used to curse the Meerut Beghyumpur Pul mess. Now you have given a great detour which I would certainly try. NH 24 is on my monthly trip agenda :-)

    @ DL – Seems like you are getting insider news. It was planned for this month but the gentlemen who was to write this got busy with other things. It is coming from a similar org as you mentioned. Save Life Foundation. Since we could not get it in time, Jaishree came for my rescue with another of her brilliant posts. Just a few days more.

    • Thanks Nandan, I don’t know much as the story finishes here.
      Yes this is the best way to kill beghumpul jam, must try once.

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  • sachin kaushik

    good story

  • yasar alam

    vinay bhaiyya bht badhiya lga kahani padh kr

    awesome man