पुराने इंदौर की एक शाम – गलियों में खाने का ख़जाना

मध्य भारत के शहरों में एक शहर है इंदौर. चतुर्दिक फैलता हुआ यह शहर मध्य प्रदेश राज्य की व्यावसायिक राजधानी मानी जाती है. मुंबई से किसी भी मामले में कम नहीं. मुंबई की समुद्र से निकटता को यदि छोड़ दिया जाय, तो ऐसा कुछ भी नहीं जो इंदौर में नहीं. दो ज्योतिर्लिंगों के नजदीक और नर्मदा नदी के तट पर बसा यह एक पुराना शहर है, जो मध्य काल में होलकर मराठाओं की राजधानी रह चुका है. हर पुराने शहर की तरह इस शहर को भी दो भागों में पारिभाषित किया जा सकता है- नया इंदौर और पुराना इंदौर. जहाँ एक तरफ नया इंदौर आधुनिक युग की रंगीनियों से जगमगाता है, वहीँ दूसरी तरफ पुराना इंदौर अतीत की यादें समेटता हुआ आधुनिक जीवन जी रहा है. इस शहर की शामें बड़ी सुहानी होती हैं. लोग-बाग दिन-भर के अपने-अपने कामों से निपट कर शाम होते ही आनंद की चाह लिए शहर को गुलज़ार कर देते हैं. ऐसे में बहुत सारे लोग चल पड़ते हैं पुराने इंदौर के ओर, जहाँ की तंग गलियों में शाम होते ही खाने का एक निराला संसार बस जाता है. ६ मई २०१६ को मैं इंदौर शहर में था और ऐसे ही एक शाम ढल चुकी थी. खजराना स्थित गणेश मंदिर में पूजन के पश्चात मेरे बड़े भाई के परिवार के सभी सदस्यों का मन पुराने इंदौर की इन्ही गलियों का लुत्फ़ उठाने का हुआ. मेरी तो जैसे की मौज हो गयी. संध्या के धुंधुलके से लिपटे हुए इंदौर के ऐतिहासिक राजवाड़े के बगल से होकर हमलोग सराफा की उन गलियों में पहुंचे. वहां की दुकानें बंद तो हो चुकी थीं, पर गलियाँ बड़े-बड़े बिजली के बल्बों की रोशनी से जगमगा रही थीं. खाने की दुकानें सज चुकी थीं और मानों सम्पूर्ण इंदौर के लोग उन गलियों में लगे बेहतरीन खाने का मजा लेने उमड़ पड़े थे.

सर्राफ़ा की गलियों में लोगों की भीड़

सर्राफ़ा की गलियों में लोगों की भीड़

उन्हीं लोगों के साथ हम भी कूद पड़े. कहाँ से शुरू करें यही सबसे बड़ी मुसीबत थी क्योंकि दूर-दूर तक खाने का खज़ाना फैला हुआ था. इतनी दुकानें थीं कि सौ की गिनती कम पड़ने लगे. सोचा कि क्यों न मिठाइयों से शुरू किया जय. मिठाइयों का नाम लेते ही, “केसरिया रबड़ी” की दुकान पर नज़र पड़ी. खालिस दूध को पूरी तरह घोंट कर, केसर और चीनी मिला कर बनी ये रबड़ी ४०० रुपये प्रति किलो के दर से मिल रही थी. बस एक प्लेट खाने से तबियत हरी हो गयी और सब तरफ मिठाइयाँ –ही-मिठाइयाँ नज़र आने लगीं. कहीं कलाकंद की बहार थी, तो कहीं गाज़र के हलवे और फिर कहीं रस मलाई, कहीं हापूस आम से बना आम-पाक तो और कहीं श्रीखंड मिल रहे थे. कलाकंद तो इसी इलाके की देन है.

केसरिया रबड़ी

केसरिया रबड़ी

पर वहीँ नज़दीक में नज़र पड़ी, “रबड़ी के मालपुए” पर. शुद्ध घी में बने हुए और चीनी की चाशनी में तैरते हुए वे मालपुए सभी को ललचा रहे थे. सुना था की मालपुआ तो बंगाल का पकवान है, फिर मध्य प्रदेश में कैसे? खैर, खाने वालों को अब इन सब बातों से क्या मतलब. तैरते हुए रस-भरे मालपुओं ने तो मुझे बचपन की होली की याद दिला दिया. सच में इन पारंपरिक मिठाइयों का स्वाद निराला है.

रस से भरे मालपुए

रस से भरे मालपुए

पारंपरिक मिठाइयों की बात करें, तो उन गलियों में जलेबी-इमरती के साथ-साथ सबका प्यारा, राज-दुलारा “गुलाब-जामुन” भी मिल रहा था. गरम-गरम और नरम-नरम गुलाब-जामुन के स्वाद के दीवानों की संख्या तो लाखों में होगी, और जैसे कि मैं. अब यह तो नहीं पता कि इस प्यारी-सी मिठाई में गुलाब कहाँ है और जामुन कहाँ. पर इस मिठाई में जो खासियत है, वो औरों में कहाँ? जहाँ कलाकंद, केसरिया रबड़ी, गाज़र के हलवे, मालपुए ३५०-४०० रुपये किलो के भाव से थे, वहीँ गुलाब-जामुन २५० रुपये किलो और मिठास ऐसी की खाने वाला उँगलियों से चासनी तक चाट जाये.

गरम-गरम गुलाब-जामुन

गरम-गरम गुलाब-जामुन

हलवों में गाज़र का हलवा आजकल सभी बाजारों में छा गया है. इसलिए उसके बारे में क्या लिखूं? पर बात तो “मूंग के हलवों” में है. इसकी नजाकत के क्या कहने हैं? सभी से यह हलवा सही से बनता भी नहीं है. कभी तो मूंग की दाल को भूनना कठिन हो जाता है, तो कभी ये पतला तो कभी गाढ़ा हो जाता है. पर इंदौर की गलियों में अभ्यस्त हाथों से बना यह हलवा ठीक वैसे ही था जैसे कि किसी पारंपरिक हवेली में बना हो. शुद्ध घी से तरबतर इस हलवे की मिठास ऐसी कि हौले से दिल में समां जाये.

मूंग का हलवा

मूंग का हलवा

वैसे तो मिठाइयों की श्रेणी में कुल्फी-फलूदा, आइसक्रीम इत्यादि भी आतीं हैं, पर कहाँ तक इनकी बात करूँ. वहां तो गलियों के खाने के खोमचों-ठेलों और दुकानों से भरा एक छोटा-शहर ही बसा हुआ था. अब नमकीन स्ट्रीट-फ़ूड को ही लें. दक्षिण भारतीय डोसा की दूकान भी वहां थी. यदि आप भारतीय ढंग से बनी चाइनीज़ खाना पसंद करते हों, तो उसकी दुकान भी वहां थी. क्या-क्या नहीं था-कई प्रकार के दोसे-बड़े, फिर मंचूरियन, नूडल्स, फ्राइड राइस इत्यादि. यह दो प्रकार की व्यंजन-श्रेणी ऐसी है, जो हाल के दशक में पूरे भारत में फैल गयीं है. बनाने की सहजता, थोड़ी सस्ती और खाने वालों में विभिन्नता का अहसास दिलाने वाली ये दोनों व्यंजन-श्रेणियां लोगों में बहुत प्रसिद्ध हैं.

भुट्टे का कीस

भुट्टे का कीस

लोगों का आना-जान बढ़ता ही जा रहा था. तरह-तरह के व्यंजनों की सुगंध उन तंग गलियों में एक-दूसरे से मिल कर एक मस्त वातावरण बना रही थी. जिधर देखो लोग-बाग खाने की ही बात कर रहे थे और अपने-अपने प्लेट को हाथों में पकड़ कर खाने का स्वाद चख रहे थे. वह एक निराला दृश्य था क्योंकि वहाँ कोई दर्शनीय स्थल नहीं था, पर सभी उपस्थित लोग खाने-पीने की एक अदृश्य धागे से जुड़े हुए थे. उस वक़्त हमारी नज़र मध्य प्रदेश के व्यंजनों को तलाशकर रही थी. तभी मैंने एक दुकान देखा जहाँ मिल रही थी “भुट्टे की कीस”. भुट्टे को कद्दुकश करके, उसके पेस्ट को घी में पका कर बनाया गया यह नमकीन व्यंजन खाने में लाजवाब लगता है. बेचनेवाला दुकानदार मगर बड़ा स्वार्थी निकला. काफ़ी मिन्नतें करने के बाद उसने बताया कि यह व्यंजन बनता कैसे है. वो भी तब, जब मेरे बगल में खड़ी एक भद्र महिला भी मेरे आग्रह के साथ जुड़ गयीं.

गराडू

गराडू

भुट्टे की कीस का मैं अभी स्वाद ही ले रहा था कि मेरी नज़र एक और व्यंजन पद पड़ी, जिसका नाम “गराडू” था. गराडू एक प्रकार का स्वीट पोटैटो (कंद) है, जिसे काट कर उबाल लिया जाता है. उबले हुए गराडू को घी में तल कर दूकान में रखा रहता है. जैसे ही किसी ने आदेश दिया, उसे फिर से तल कर, मसाला लगा कर पेश किया जाता है. शकरकंद तो थोड़ी मीठी होती है, पर गराडू थोडा नमकीन और अंत में एक मिठास लिए हुए था.

दही-भल्ले

दही-भल्ले

तभी कहीं से “दही-भल्ले” की सुगंध हवा में तैरती हुई आ गयी और मैं दही-भल्ले का स्वाद चखने को आतुर हो उठा. सुगंध के सहारे चलते-चलते मैं पहुंचा “जोशी दही-बड़ा हाउस”. यहाँ के दही-बड़े इंदौर में सबसे प्रसिद्ध हैं. सुना है कि इस दूकान के मालिक दही-बड़ों को हथेली पर ले कर हवा में उछाल देते थे और दही-बड़ों के नीचे आने पर उन्हें फिर से पकड़ कर खरीदार को देते थे. और इस पूरी प्रक्रिया में दही-बड़ा का एक भी भाग या मसाले का एक भी अंश जमीन पर नहीं गिरता था. उसी दूकान के एक दीवाल पर फ्रेम से टंगे “द टाइम्स ऑफ़ इंडिया” के १८ जून १९९९ को छपे लेख में यही लिखा हुआ था. परन्तु उस दिन उस दूकान पर उनका लड़का बैठा था, जिसने दही-बड़े उछालने और पकड़ने की कला में अभी पारंगत नहीं हुआ था. वहां के दही-बड़े का साइज़ बहुत बड़ा था और खासियत उनके दही में भी थी, जो खालिस मलाई-युक्त दूध से बनी थी. लोग-बाग़ बड़े चाव से दही-बड़े खरीद कर खा रहे थे. उनकी दूकान में उनके नाम के अनुरूप ही भीड़ भी थी. दही-बड़ा ऐसा कि मुहँ में जाते ही घुल जाए.

साबूदाना की खिचड़ी

साबूदाना की खिचड़ी

दही-बड़ा खाते-खाते मैं अन्य लोगों के चेहरों का मुआइना भी करे जा रहा था. कितने संतोष से वे सब दही-बड़ों पर चटकारे ले रहे थे. वाकई पुराने लज़ीज़ खानों का जवाब नहीं. परन्तु जैसा कि मैंने पहले लिखा था इंदौर शहर अपने-आप में एक छोटा मुंबई की खासियत लिए हुए है. उसकी छाप इन गलियों में भी दिखती थी. पाव-भाजी, दाबेली, बड़ा-पाव, सैंडविच, हॉट-डॉग इत्यादि की भी कई दुकानें थीं. तरह-तरह के सैंडविच, जैसे, पनीर-मसाला, चीज़-चटनी सैंडविच इत्यादि वहां बन रहे थे. बेकरी के आइटमों के बात की जाये तो उन गलियों में क्रीम-रोल, पेस्ट्री, पिज़्ज़ा और बर्गर इत्यादि भी दिखे. अब आप खुद देख लीजिये कि होलकर के जमाने के पारंपरिक खानों के साथ साथ समय ने कितना कुछ बदल दिया था. उसी गली में कई गुजराती व्यंजन भी मिल रहे थे, जैसे कि बेसन-दही से बने खमण और दही की मथ कर बना छाछ. २० रुपये की खमण और १० रुपये की छाछ खाईये और प्रसन्न हो जाइए. यदि और पेट भरना चाहते हैं तो उस गली में साबू-दाने की खिचड़ी भी मिलेगी २० रुपये प्लेट की दर से. साबू-दाने की खिचड़ी कई लोग बहुत पसंद करते हैं क्योंकि यह हलकी और सुपाच्य है, गरिष्ठ पकवानों से बिलकुल अलग.

फ्रूट सलाद

फ्रूट सलाद

यदि आपकी जिह्वा में चटकीले खाने की ख्वाहिश हो उठे, तो वहां इन्दोरी पोहे, समोसा, कचोरियाँ, चाट और पानी-पूरी का भी भण्डार था. पानी-पूरी तो एक ऐसा व्यंजन है, जिसके पूरी में भरने-वाले मसाले को बदल-बदल कर पानी-पूरी के कई फ्लेवर तैयार किये जा रहे थे. गरम-गरम समोसा-कचोरी तो हमेशा-से लोगों का दिल जीतते आयीं हैं. और तरह-तरह से बनने वाले चाट का तो कहना ही क्या. एक ही जगह पर खाने की इतने विविध प्रकार देख कर पूरा मन इतराने लगा. क्या खाएं और क्या न खाएं? गुजराती, मध्य परदेशी, महाराष्ट्रियन, चाइनीज़, दक्षिण भारतीय खाने के बारे में तो मैंने बहुत लिखा. पर यदि कोई मुझसे पूछे कि फल खाने वालों का क्या होगा? तो मैं उनसे यही कहूँगा कि भाइयों यह गली बड़ी मस्त है. यहाँ “फ्रूट-सलाद” के भी कई ठेले थे. सेव, केले, अमरुद, अनानास, चीकू, संतरे, तरबूज से बना सलाद मैंने भी चखा. वाकई ताजे फलों से बना था.

सर्राफ़ा की गलियों में खाने आ आनंद

सर्राफ़ा की गलियों में खाने आ आनंद

फरसन, आलू-चिप्स, मिक्सचर इत्यादि की भी दुकानें वहां मौजूद थीं. एक और भारतीय व्यंजन है, “चना-जोर-गरम”. जिसने भी इसका खस्ता स्वाद चख रखा हो, वे इस नाचीज़ से दिखने वाले आइटम की विशेषता से वाकिफ होंगे. आम-तौर पर चना-जोर-गरम बनानेवाला उसमें नीम्बू का रस मिलाता है ताकि खटास के साथ स्वाद बढ़े. यहाँ इंदौर में मैंने देखा कि खटास बढ़ाने के लिए उसके साथ कच्चे आम के कतरे डाले जा रहे थे. सच्च में मुहँ में पानी आ गया. पर अब तक इतना कुछ खा चुका था कि अब और कुछ खाना असंभव था. इसीलिए ललचाई नज़र से चना-जोर-गरम को देखते हुए मैं आगे बढ़ गया.

चना-जोर-गरम

चना-जोर-गरम

पूरी गली लोगों के भीड़ से भरी थी. सबका एक ही मकसद था. कई प्रकार के व्यंजनों को चखना. ऐसा लगता था मानों सभी खाने के शौकीन एक ही स्थान पर आ पहुंचे हों. पर खाने के बाद कुछ पीने की भी तलब होती है. अब पेय पदार्थों की बात करें, तो उस गली में क्या-क्या नहीं था. आप कई फ्लेवर में बनी मीठी लस्सी पी सकते थे. बादाम इत्यादि डाला हुआ शिकंजी पी सकते थे. साधारण नीम्बू-पानी भी वहां था और छाछ के बारे में तो मैं पहले भी लिख चुका हूँ. यदि निकोटिन की कमी महसूस हो तो वहां कोल्ड-काफी, गर्म-काफी और चाय का भी इन्तेजाम था. मिनरल वाटर तो बहुतायत से उपलब्ध थे. पर जिस पेय-पदार्थ ने आकर्षित किया, उसका नाम था “कोकोनट क्रश”. नारियल के दूध में कई फ्लेवर डाल कर और बर्फ के टुकड़े मिला कर क्रश किये यह पेय पदार्थ बेमिसाल था.

कोकोनट क्रश

कोकोनट क्रश

भारतीय सभ्यता में खान-पान के बाद पान खिलाने की भी परंपरा रही है. पानों में लखनवी, बनारसी, मगही, बंगाली पान इत्यादि बहुत प्रसिद्ध हुए हैं. पर चाँदी के वरक लगे “इन्दोरी पान” भी किसी से कम नहीं. इस निराली गली में आईये, पारंपरिक और आधुनिक दोनों प्रकार के स्ट्रीट-फ़ूड का आनंद लीजिये और फिर एक इन्दोरी मीठा पान. आपकी शाम ऐसी कटेगी, जैसी पहले कभी नहीं कटी हो. ऐसा लगता है कि मानों इंदौर को “स्ट्रीट-फ़ूड कैपिटल ऑफ़ इंडिया” का दर्जा मिलना चाहिए.

इन्दोरी पान

इन्दोरी पान

इन गलियों में कार चलाना और पार्किंग करना एक समस्या हो सकती है. परन्तु खाने के शौकीनों के लिए तो ऐसी कोई कठिनाईयां अपारगम्य तो नहीं होतीं हैं. बस पार्किंग मिलते ही, पैदल ही चल पडतें हैं चमकदार बत्तियों से जगमगाती आनंददायक और मनभावन गलियों की तरफ. इसीलिए यदि आप इंदौर आयें और कम-से-कम एक शाम का समय आपके पास हो, तो एक बार जरुर खाने-के-खजाने से भरी इन गलियों का लुत्फ़ जरुर उठाइए.

4 Comments

  • Ankit Saxena says:

    Muh me pani aa gaya… Bus isse jyada aur kya kahu… Abhi office me hu…. Jaldi ghar jake nikalta hu kuch khane ke liye…

  • Arun Singh says:

    ???? ???? ????? ?? ???? ???? ?????? ???? ??? ?? ?????? ?? ? ???? ???? ?? ????? ?? ?? ??????? ?? ?? ??????? ?????????? ?? ???? ????? ?? ????? ?? ???????? ?? ???? ???? ?? ??? ??? ??? ?? ????-????? ????? ?? ????? ???? ?? ??? ???? ????????

Leave a Reply

Your email address will not be published.