UDUPI, उडुपी :- Shree Krishna Matt and KOLLUR, कोल्लूर :- Shree Mookambika Devi Temple

उडुपी :- नारायण अवतार परशुरामजी  द्वारा निर्मित 8 मोक्ष क्षेत्र में से एक ( Udupi :- one of the eight centers of salvation created by Parshuarmjee , Incarnation of Lord Narayana ( Vishnu).

नमस्कार मेरे घुमक्कड़ साथियों, काफी लोगों के उत्साहपूर्वक आग्रह के बाद, मैं अपनी घुमक्कड़ी का विवरण हिंदी भाषा में लेकर आया हूँ। हिंदी लिखना मेरे लिए इतना आराम-दायक नहीं है जितनी की अंग्रेजी, फिर भी कोशिश करूँगा की आप लोगों के सामने खरा उतरू। मेरे लिए भक्ति और लोक-कल्याण से श्रेष्ठ कर्म कुछ नहीं है। इसलिए मैं हमेशा भगवान और उसकी कथाएँ आप सबके मध्य बाँटने के साथ-साथ जहाँ-जहाँ जिस-जिस स्थल पर उन्होंने लीला की उन महत्त्वपूर्ण स्थानों का वर्णन करने का प्रयास करूँगा। वैसे तो भगवान सभी जगह पर उपस्थित ही है।

हमारे अन्दर हमारी आत्मा में भी है, लेकिन हम इन इन्द्रियों द्वारा उसे पहचान नहीं पाते है। इसलिए भगवान की खोज में हम चलते जाते है, जहाँ पर वे स्वयं शरीर धारण करके लीला करने आ जाते है।ऐसी ही जगह पर मैं आपको आज ले चलूँगा जहां पर स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने लीला की थी, माधवाचार्य को लेकर, उस जगह का नाम है उडुपी, कर्नाटक

Welcome Readers and fellow Ghumakkars . For me there is no better work than doing Bhakti and goodness to mankind . That is why I come up with stories and legends of Almighty God and places where he has taken Avtaar ( incarnation) .

Well God is everywhere even inside us in form of our inner soul, but we can’t recognise him through the senses  we have.  So we try to find the places where he has taken an avatar. Today I am going to take you the place where Lord Krishna along with  JagadGuru Madhavachraya has performed his Leela. The name of the place is Udupi, Coastal Karnataka. 

उडुपी परशुराम जी के निर्मित 8 मुक्ति क्षेत्रों में से एक है। बाकी 7 क्षेत्र है- कोंकण, मंगलौर, सुब्रमण्य, शंकरनारायण, कोल्लूर, कोटेश्वर और गोकर्ण।

Udupi is one of the eight Mukti kshetras derived by Lord Parshurama. Rest are Konkan, Mangalore, Subramanya, Shankarnarayana, Kollur, Koteshwar and Gokarna.

और मंदिर के दर्शन कराने से पहले, मैं बताना चाहता हूँ कि किसी भी मंदिर या तीर्थ स्थान पर आप अगर जाते हो तो उसके पीछे एक कथा विशेष जरूर होती है। तीर्थ स्थान की छोडिये आपके घर में भी जो छोटा सा मंदिर है जिसमें आपने आपके इष्ट देव या देवी की मूर्ति स्थापित  है, उसके पीछे भी एक छोटी सी कथा तो होती ही है, वह होगी आपकी भक्ति की………………….

And yaa, before going to have glimpse of Lord, I would like to tell that behind any temple or holy place there is a story or legend behind it. Forget Holy Places , even there is a small story behind the temple or Photo of Jesus or Makkah  placed at home  and that is story of your devotion and faith.

इसलिए जब कोई मंदिर जाए तो उसकी कथा जरूर जान कर जाना चाहिए, इससे आपके पुण्य दुगने हो जाते है। और अगर नहीं मालूम होता है तो उधर के रहने वाले स्थानीय व्यक्ति से अवश्य पूछ ले कि इस मंदिर की क्या महिमा है …………………….

That is the reason always try to find out what is legend behind that place.

Booking.com

 और अब चलते है, उडुपी के कृष्ण मठ की कथा की ओर इससे पहले मैं आपको जगद्गुरु माधवाचार्य के बारे में कुछ बताना चाहूँगा……………………….

Before going to Temple I will tell you something about Jagadguru Madhavacharya.

जगद्गुरु माधवाचार्य :- जगद्गुरु माधवाचार्य भक्ति संचार के काल में एक बहुत बड़े और महत्त्वपूर्ण दार्शनिक और तत्वज्ञानी थे। उनका जनम करीब 1238 ई० में उडुपी के नजदीक एक छोटे से गाँव में हुआ। वह वैष्णव धर्म के जाने-माने गुरु थे और उन्होंने स्वयं आपनी बद्री यात्रा में नारद, वेद व्यास तथा अंत में स्वयं नारायण के दर्शन किये थे. आदि शंकराचार्य, निम्बकाचार्या, वल्लभाचार्य और चैतन्य महाप्रभु के साथ साथ उनको भी जगद्गुरु का खिताब मिला है। अब चलते है मंदिर निर्माण की कथा की ओर.

Jagadguru Madhavacharya:- Jagadguru Madhavacharya is a one of the most  important philosopher is bhakti movement. He was born in 1938 in a viilage near Udupi. He is important Teacher in Vaishnav Sampradaya ( Path). In his Yatra to Badrinath he had darshan of Sage VedVyaas, Narad Muni and finally Lord Narayan . Along with Adi Shankaracharya,Nimbakacharya,Vallabhachraya, and Chaitanya Mahaprabhu he is called “ JagadGuru.” Now Lets go to the Legend of this Temple Creation.

उडुपी श्री कृष्ण मंदिर की कथा:- 13 वी शताब्दी के मध्य में जब सोमनाथ और द्वारका पर मुसलमान शासकों ने आक्रमण किया तो एक भक्त और नाविक भगवान श्री कृष्ण की मूर्ति गोपीचंदन से लड़ा कर अपनी नाव में दक्षिण की ओर चला गया. जब वो कर्नाटक की ओर पहुँचा तो एक भयंकर तूफ़ान आने लगा। नाव मालपे ( उडुपी के बाजू में समुद्री गाँव)  के नजदीक आई। जहाँ पर जगदगुरु माधवाचार्य ध्यान लगा कर बैठे थे।

उन्होंने अपने योग ज्ञान से पूरी नाव को तूफानी समुद्र से बचाया। वह भक्त अपने केसरी वस्त्र को लहरा-कर जगद्गुरु की शरण में आया और कहा की उन्हें क्या चाहिए।  तो माधवाचार्य ने भगवान् की मूर्ति माँगी और उसे उडुपी में स्थापित कर दिया।

इस मंदिर की एक और कथा है १६  वी सदी में एक भक्त था उसका नाम कनकदास था| वह भगवान् का शुद्र भक्त था। लेकिन मंदिर के पंडित उसे अन्दर आने नहीं देते थे, क्योंकि वह नीची जाती का था। तो वह मंदिर के पीछे की दीवार से ही हाथ जोड कर भक्ति करता था। उसका भाव इतना शुद्ध और प्रबल था कि स्वयं भगवान कृष्ण ने उसे दर्शन दिए और फिर मंदिर की पीछे वाली दीवार में एक छेद केवल उसके लिए बना दिया। अब उस स्थान पर ( पीछे वाली दीवार पर ) कनकदास के नाम पर एक गोपुरम है और जिस खिड़की ( भगवान ने बनाया हुआ छेद ) से हम दर्शन करते है उसे कनकनकिंदी कहते है।

Durring the attacks of Somanth and Dwarka by Muslim Kings in 13th century , A devotee and Sailor took original idol of Lord Krishna covered with Sandalwood ( Gopi Chandan) in his ship and sailed towards Southern Direction. The ship was caught in a terrible storm while sailing in the western coast of Malpe.

When the meditating Sri Madhvacharya sensed this by his ‘aparoksha’ or divine jnana (knowledge), he got the ship safely to the shore by waving the end of his saffron robe and quietening the storm. The pleased captain of the ship offered Sri Madhvacharya anything in the ship in return. Sri Madhvacharya asked for the sandlewood peice containing the statue of Sri Krishna. Later as the story goes, Sri Madhvacharya took it to the lake, purified it and installed it in the Matt.

In the 16th century, during Sri Vaadiraja ‘s rule, Kanakadasa, an ardent believer of God, came to Udupi to worship Lord Krishna. He was not allowed inside the temple since he was from a lower caste. Sri Krishna, pleased by the worship of Kanakadasa created a small hole in the back wall of the temple and turned to face the hole so that Kanakadasa could see him. This hole came to be known as KanakanaKindi

अब चलते है हम लोग हमारी घुमक्कड़ी की ओर- मेरा और मुकेश का परिवार सुबह 5:40 पर उडुपी रेलवे स्टेशन पर पहुँच गया। फिर हमने मंदिर तक ऑटो कर लिया, जिसने हमसे 100 रू चार्ज किये| नहाने और फ्रेश होने के लिए मंदिर ट्रस्ट की धर्मशाला कुछ 100 रू में बुक कर ली। फिर नहा-धो कर हम दर्शन करने के लिए चल दिए।

Now Lets go to our travelogue. At 5.40 am we reached Udupi Station and straight away we caught the auto rickshaw which took us to Udupi temple charging us Rs. 100. For bathing and getting fresh we booked  temple Dharamshala for 2 hours which charged us RS. 100.

Then after getting fresh we to take darshan.

चलिए अब  दर्शन करते है चित्रों द्वारा. Lets see the photos .

श्री कृष्ण मंदिर :- मुख्या द्वार, Shree Krishna Matt :- Main door

यह गोपुरम कनकदास की याद में बनाया गया है।

This Gopuram was made in memory of Kanakdaas.

कनकदास गोपुरम, Kanakdaas Gopuram

कनकदास गोपुरम , Kanakdaas Gopuram

इस खिड़की में 9 छेद है। हर एक छेद एक गृह के लिए है, इसे नवग्रह खिड़की और (कनकनकिंदी)भी कहा जाता है। हमें भगवान श्री कृष्ण के दर्शन इसी खिडकी से करने होते है।

This big window has 9 sub windows . This window is called Navgraha( Nine Astrological ) Planets Window and Kanakanakindi also. You have to take darshan of Lord Krishna via this window.

कनाकनाकिंदी खिडकी जिसे नवग्रह खिडकी भी कहते है. यहाँ से भगवान के दर्शन होते है. Navgraha window also called Kanakindi . From here we can have darshan of Lord Krishna

Photo Credits :– The above image is taken from the official website of Mangalorean times ( English Kannada News Portal )

http://www.mangaloreantimes.com/2012/sode-seer-ascends-paryaya-peetha/#comment-2249

Written permission is given Mr. R. K. Bhat,  owner of this photo .

हमेशा मेरी पूरी  कोशिश रहेगी की आपको भगवान् की मूर्ती के दर्शन कराऊ, आगे भगवान् की मर्जी…………………….

अब भगवान श्री कृष्ण के दर्शन बाल रूप में कीजिये। यह वही मूर्ति है जो द्वारका से लाई गयी है।

Now have darshan Of Lord Krishna’s Moorti in different decorations which I try my level best to post.

 

भगवान श्री कृष्ण की मूर्ती की अलग अलग सजावट के दर्शन

Photo Credits :-  The written permission of the images added above are taken from respective owners

1) Rajaraman Nagarajan 2) www.interessantes.at  3) Jnanamoorthy Bhat

नीचे कुछ चित्र मंदिर के आजू-बाजू तथा मंदिर के अंदर के है। Below are few pictures nearby the Temple.

मंदिर के परिसर  में कविताजी एक सुंदर शंख के साथ , Kavita jee in temple premises.

भगवान का रथ जब जन्मास्टमी में जुलूस निकलता है . Chariot of Lord during procession

कानदास गोपुरम के पास मेरा और मुकेश का परिवार  ( मुकेश फोटो खीच रहा है ) . Mine and Mukesh’s family

उडुपी मंदिर में पंचमुखी हनुमान की मूर्ती , Five Faced Hanuman in Udupi temple

उडुपी श्री कृष्ण मंदिर के सामने शिव शंकर जी के दो मंदिर और है। जिसे अनंतेश्वारा मंदिर और चंद्रमौलेश्वर मंदिरकहा जाता है। इन दोनों मंदिरों के दर्शन उडुपी के मंदिर से पहले किये जाते है। फिर उडुपी श्री कृष्ण मंदिर के दर्शन किये जाते है। चंद्रमौलेश्वर यानी सोमनाथ, यहाँ के लोगों का यह कहना है कि चन्द्रमा ने शिव भगवान की पूजा यहाँ पर की थी. तो चलो मंदिर के दर्शन करते है।

In front of Udupi Shree Krishna Matt There are two temples of Lord Shiva. It is a practice to visit Lord Shiva’s temple first and then visit Shree Krishna temple. The Shiva temples are called Ananteshwara and Chandramauleshwara temple.People here say that The Moon God did penance here for Lord Shiva to get rid of sins . Lets have visit to these temples.

अनंतेश्वारा शिव मंदिर :- श्री कृष्ण मंदिर के सामने, Ananteshwara temple in front of Udupi temple

अनंतेश्वारा मंदिर के भीतर दीप , Inside Ananteshwara temple

चंद्रमौलेश्वर मंदिर, Chandramauleshwar Temple

पूरा समूह मुझे छोडके , Full group besides me.

चंद्रमौलेश्वर मंदिर के भीतर भगवान स्कन्द की भव्य पेंटिंग , beautiful painting of Lord Kathikeyan in Chandramauleshwar temple

उडुपी मंदिर के परिसर  में गीता मंदिर, Inside Udupi Temple , Gita Mandir

कनकदास गोपुरम के सामने हम दोनों की धरम पत्नी – सोनाली और कविताजी, Sonali and Kavitajee in front of Kanadaas Gopuram

पूरा परशुराम क्षेत्र , Coastal Karnataka

फिर हम आपको उडुपी का वर्ल्ड प्रसिद्ध खाना खिलाते है, डोसा, मेदु वडा, इडली, पूरी और फिर उनकी बहुत स्वादिस्ट चटनी और सांभर।

Then we had the world famous Udupi food. Dosa, Idli, medu wada , poori are some of the varieties along with sambhaar and chutney.

उडुपी की स्वादिष्ट होटल के स्वादिष्ट पकवान – मेदु वडा , इडली ,पूरी आदि, Delicious Udupi food. Idli, Medu wada , poori etc.

और वर्ल्ड फेमस डोसा , संभार और चटपटी चटनी , and world famous dosa , sambhaar and chutney

कोल्लूर :- श्री मुकाम्बिका देवी, भगवान परशुरामजी के मोक्ष क्षेत्रों में देवी का क्षेत्र

आज हमें मुर्डेश्वर किसी भी हालत में पहुँचना था। और उससे पहले हमें कोल्लूर में मुकाम्बिका माता के दर्शन करने थे। तो हम जल्दी जल्दी उडुपी बस अडडा जा पहुँचे और कोल्लूर के लिए बस पकड़ ली। कोल्लूर एक छोटा हिल स्टशन है जो उडुपी से 80 किमी दूर है| हमारे उडुपी के दर्शन कुछ 9:00 बजे तक हो गए थे, फिर हम निकल पड़े कोल्लूर की ओर। हमें डायरेक्ट बस मिली उडुपी बस स्टैंड से 10:00 बजे, हम कोल्लूर पहुँच गए 12:00 बजे|

हमने फ्रेश होने के लिए बस स्टैंड में ही एक रूम बुक कर लिया जो हमें केवल 60 रु में मिला था। फ्रेश होकर हम चल पडे मुकाम्बिका देवी के दर्शन करने।

Kollur :- Shree Mookambika Devi , One of the Eight salvation Centers Created by Lord Parashuram.

Today we had to reach Murdeshwar any how. And before that we had to reach Kollur, Mookambika Temple.Then we went to Udupi Bus Stand and caught the bus to Kollur.Kollur is a small Hill station around 80 km from  Udupi.

We had our darshan around 9.00 am and then we proceeded towards Kollur.We got direct bus from Udupi bus station at around 10.00 am. We reached Kollur at 12.00 noon. For getting fresh we hired a room  in bus stand itself for arounfd 60 Rs. And  after getting fresh We went to darshan of Mookambika devi.

कोल्लूर जाते वक्त कुन्दपुरा शहर में बस स्टैंड पर एक दूकान , During journey to Kollur one shop in Kundapura

नारियल काटते वक्त एक दूकान की महिला संकृति के साथ, while cutting coconut Sanskriti with a Lady.

श्री कोल्लूर देवी मुकाम्बिका की कथा:– बहुत सदियों पहले की बात है, वहाँ कौमासुर नाम का एक राक्षस हुआ करता था। कौमासुर ने भगवान शिव की तपस्या करके बहुत सी शक्तियाँ प्रदान करने वाले वर माँग लिए। और वर प्राप्त करने के बाद त्राहि-त्राहि मचाने लगा। सप्तऋषियों ने उसके संहार प्रार्थना शुरू कर दी, तो उसके गुरु शुक्राचार्य ने उसे बता दिया के सारे ऋषि उसके अंत के लिए प्रार्थना कर रहे है।

तो फिर उसने शिव की तपस्या शुरू कर दी जिससे इस बार वह और शक्तिशाली बन जाये, लेकिन जब भोलेनाथ इस बार प्रकट होते है तो वाग देवी ( भाषण भावना की देवी ) यह सोच कर की कौमासुर और तबाही मचा देगा, उसे गूंगा बना देती है। वह भगवान शिव के सामने कुछ बोल ही नहीं पाता। गूंगा कौमासुर फिर उस क्षण से मूकासुर कहलाने लगता है। फिर कोला ऋषि के आग्रह से आदि शक्ति महादेवी सारे देवताओं की शक्ति एक साथ एकत्रित करती है और मूकासुर के साथ युद्ध आरम्भ करती है। मूकासुर को मारकर उसे मोक्ष प्रदान करती है। तब से देवी कोल्लूर में वास करती है।

देवी एक स्वयम्भू शिवलिंग रुप में से प्रकट हुई थी, इस लिए देवी का रूप शिवलिंग के रूप में है। आईये अब मंदिर के दर्शन करते है। मंदिर के अंदर गर्भग्रह में पुरुषों को शर्ट/कमीज उतारनी पड़ती है। पाजामा या पेंट लूँगी पर कोई पाबन्दी नहीं है।

Legend of Kollur Mookambika Devi:- Long ago when a demon called Kaumasura obtained a boon from Lord Shiva was reigning pompously, Kodachadri became the hiding place for all the gods and divine beings who became helpless against his harassment. While the Saptarishis were engaged in prayers and poojas to bring about the end of demon kaumasura, Guru Shukracharya enlightens him about his impending death at the hands of a woman.

Learning this, kaumasura performs an austere penance t please Lord Shiva. When Lord pleased with his prayers, appears before him and asks him to name the boon that he wishes, Vagdevi, the Goddess of speech senses that this could lead to a greater devastation and makes him speechless. The dumb Kaumasura then becomes unable to verbalise his wishes and then onwards he is called Mookasura. Soon after, on the request of Kola Rishi, the goddess creates a mystical power by bringing together the individual powers of all the gods who had assembled.

This Divine Power wages war on Mookasura and brings about his destruction, thereby granting him salvation. The place where devi killed Mookasura is known as “Marana Katte”. Since that day, the Goddess has resided at this holy place Kollur by the name Mookambika, fulfilling the wishes of all her devotees. Now Lets do darshan of Kollur Mookambika devi. Inside the sanctrum wearing shirt is not allowed.

श्री मुकाम्बिका मंदिर का मुख्या द्वार के सामने मुकेश  , In front of Shree Mookambika temple.

गर्बग्रिहा के अंदर , Insdie the sanctrum

श्री मुकाम्बिका देवी और स्वयम्भू शिवलिंग , Devi Mookamvika and Shivalinga

देवी मुकाम्बिका का प्रसाद :- एक बात तो रह ही गयी थी कि कोल्लूर मुकाम्बिका देवी मंदिर की बात यह है यहाँ जो भी भक्त दोपहर 12:30 से 2:30 के बीच में आता हो, उसे देवी के प्रसाद का लाभ मिलता है वह भी मुफ्त में| वरना आज कल हर जगह प्रसाद के लिए भी पैसे देने पड़ते है| उसमें भी मुनाफा देखा जाता है।

यहाँ का प्रसाद सम्पूर्ण भोजन के रूप में आदमी की भूख को तृप्त करता है। हम दोनों के परिवार ने सच्चे मन से तृप्त होकर इस प्रसाद का सेवन किया था। बहुत ही स्वादिष्ट प्रसाद था, पहलें केले के पत्तों के बिछाने का आरम्भ होता है, फिर उन पत्तों पर पानी मारा जाता है साफ़ करने के लिए, फिर दो पुरुष चावल की गाडी लेकर चावल परोसते है, चावल के बाद आती है सांभर की बारी, चावल के ऊपर सांभर परोसने के बाद प्रसाद का सेवन शुरू कर सकते है।

चावल और सांभर दो बार परोसे जाते है। जो एक आम मनुष्य को पेट भरने के लिए काफी है। उसके बाद वह लोग एक रस वाली मिठाई परोसते है और फिर छाछ। यह सब खाने के बाद केवल नींद आती है। हम लोगों ने प्रसाद के सेवन के बाद कुछ देर वहाँ पर शापिंग की, संस्कृति ने एक अंग्रेजी स्टाइल की सफ़ेद टोपी ली। हम लोगों ने कुछ खाने पीने का सामान भी लिया था।

Prasad of Shree Mookambika Devi :- whoever visits temple of Kollur Mookambika devi from 12.30 to 2.30 gets free Prasad of Mookambika devi. Whereas Nowadays even Prasad is charged. Even profits are calculated there. But here a devotee gets Prasad in form of whole lunch which is enough for a normal person. Our families enjoyed and were satisfied  with this Prasad. First of all banana leaves are served. We have to clean that with water and then dry it.

After that a car full of rice comes and serves you rice.And then sambhaar  is poured on it. This happens twice and is very delicious, fresh and hot. Then they serve some liquid sweet dish. And finally buttermilk. Then we did some shopping there. Sanskriti took a foreign styled hat and we took some eateries.

हम लोग प्रसाद लेते वक्त, while taking Prasad

सबसे पहले पाने से केले के पाते को धोते है, first wash banana leaves

फिर पानी सूखते है, then dry up

गाडी में रिस परोसते वक्त ली गयी तस्वीर, rice served in car

चावल और स्वादिस्ट संभार का प्रसाद केले के पत्तों पर, Delicious rice and sambhaar on banana leaves

चन्दन की लड़की से बना देवी के जुलूस में निकलने वाला रथ. sandalwood chariot

अंदर मंदिर के समूह में, inside the temple complex

देवी को मंदिर के चारों तरफ घुमाते है मंदिर बंद करने से पहले, A procession O fdevi travelling outside the sanctrum

 हमने जो दो मंदिर में आपको दर्शन कराये , श्री कृष्ण मंदिर, उडुपी,और श्री मूकाम्बिका मंदिर , कोल्लूर , यहापर कोई भी पंडित आपके पीछे नहीं लगता पूजा पाठ और अभिशेख के लिए. Here in Udupi and Kollur no priest or Brahmin comes and pitches for pooja or abhishekh.

हायवे पर मुर्डेश्वर का गेट :- यहाँ से मुर्डेश्वर २ किमी अंदर है समुद्र को छूकर, Murdeshwar Gate .

फिर हम 2:30 बजे निकल पड़े मुर्डेश्वर की ओर। बस पकड़कर बैंदूर पहुँच गए, जो 27 किमी दूर है, और फिर उधर से मुर्डेश्वर। बैंदूर से हमें मुर्डेश्वर के लिए बस मिली जो करीब  ४० किमी की दूरी पर है ।

Then at 2.30 pm we moved towards Murdeshwar. First we caught bus to Byndoor ( 27 kms) and then towards Murdeshwar. We get bus to Murdeshwar ( 40 kms) via Byndoor.

उडुपी मंगलोर से कुछ ६० किमी की दूरी पर है जो हायवे द्वारा अच्छी तरह से जुडा हुआ है. आपको बस सुविधाओ की कमी नहीं मिलेगी.

मुंबई , दिल्ली, बंगलोर और चेन्नई से सीधी ट्रेन है. दिल्ली से हज़रत निजामुद्दीन – त्रिवेंद्रम राजधानी एक्सप्रेस ( १२४३२) और मंगला लक्षदीप एक्सप्रेस ( १२६१८) है जो उडुपी रेलवे स्टेशन पर रूकती है ..

Udupi is 60 kms from Mangalore well connected with highways and with good bus frequencies.There are direct Trains from Mumbai ,Delhi, Chennai and Bangalore.From Delhi Trivandrum Rajdhani Express (12432) and Mangala lakshyadeep Express ( 12618) run and stop at Udupi railway station.

मुर्डेश्वर में आपको अगली पोस्ट में ले चलूँगा। जिसकी एक अलग ही महिमा है। तब तक के लिये ………………..जय भोले नाथ………….. जय श्री कृष्ण…………………………

I am going to take you to Murdeshwar which has its own Legend. till then  Jai Bholenath and Jai Shree Krishna………………………..

( यह पोस्ट मेरे द्वारा लिखी जरूर गयी है , लेकिन इसकी वर्तनी का  सुधार हमारे  जाट देवता संदीप पंवार ने  किया है , तो मेरी तरफ से उनको बहुत बहुत धन्यवाद………..)

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  • SilentSoul

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  • sarvesh n vashistha

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  • D.L.Narayan

    ????? ???, ????? ????? ???? ??? ???? ???? ???? ???? ?? ????? ?? ???? ??? ???? ???, ??? ?? ??? ? ???? Since the Rathods were accompanied by the Bhalses on this tour, maybe this should have been a bilingual post with Mukesh/Kavitaji writing in Hindi. ????? ?? ???, great pictures and lots of useful information. Hope that you will be writing about your trip to Murudeshwar soon.

    I just cannot understand why men are not allowed to cover their upper body in many temples. I suspect that the reason is to know the caste since only upper caste males are allowed to wear a sacred thread (????). I think it is high time such practices were discarded.

    Permit me to make a small clarification. Saint Madhvacharya’s name is spelt incorrectly; the correct way to write his name is ?????????? and not ??????????. Though many sages are called Jagadgurus, the three main Jagadgurus are Adi Shankaracharya, Ramanujacharya and Madhvacharya, the founders of Advaita (monism), Vishistaadvaita (qualified monism) and Dvaita(dualism). It is interesting to note that all Vaishnavaite traditions accept the authority of either Ramanuja or Madhva, Shaivites are followers of Adi Shankara.

    • wow , Dl ji , what a beautiful information about Madhvacharya . Thnx

    • DL , From this posts onwards i had already decided that my posts will be bilingual. The english version of the story will be added soon in this story itself.

      Thanks for correcting me on Saint Madhavacharya’s part and yaa I forgot Shree Ramanujacharya who is again a very great Guru of Hindu Philosophy .

      And allow me to make one correction that even Vaishnavites follow Adi Shankara. And I think Major Vaishnavites follow Adi Shanakara. Monism itself says everything is one ……………..

      • D.L.Narayan

        Vishal, Hindus are generally receptive to all forms of divinity and there is no bitterness or antagonism. For example, Sufi saints like Chishti and others are revered to this day. Having said that, it should be noted that there has been a lot of clashes between Vaishnavaites and Saivaites over the ages. Though this is not the forum for philosophical discussions, I shall briefly explain why I said that Vaishnavaites do not accept the authority of Adi Shankara.

        At the philosophical level, there are irreconcilable differences which cannot be easily understood by the lay devotee. To simplify matters, it can be said that Sankara said that Gyana can lead to salvation, the Vaishnavaites insist that Bhakti or devotion is the only way to Moksha or liberation. These distinctions are however limited to Brahmins and other Hindus are not rigid about either dieties or philosophies.

        The followers of Shankara are called the Smartas and they do not make a distinction between Shiva and Vishnu since for them the entire universe is nothing but a manifestation of the Paramatma and it is only under the effect of Maya that the Jeevatma and the Paramatma appear to be separate.

        The followers of Ramanuja are called Srivsaishnavas (or Iyengars in Tamil Nadu). They believe that Vishnu is the Supreme Soul and the Jeevatma and Paramatma are identical at an absolute level, they are different as far as human existence is concerned. The followers of Madhvacharya believe in Dwaita and they reject the concept of identity between the Jeevatma and the Paramatma.

        Vaishnavaites are very orthodox and are particular about totally avoiding any connection with Shaivism. Traditionally, Hindus invoke Ganesha before starting any work. The Vaishnavas do not; they invoke Vishwaksena, the Vaishnavaite remover of obstacles. Even the dhwajasthambs (flag posts) of Vaishnavaite temples are different and they sport vertical tilaks on the forehead while Shaivaites wear horizontal stripes. They even avoid Saivaite names like Chandrashekhar, Uma, Parvati, Vinayak or Kartikeya.

  • parveen kumar

    vishal sir, great visit with great information. i also visit udupi 3 years back, but on a business trip. on that time, no knowledge of these temples. grat sir, lage raho, par chandan ki lakdi ka rath banao, ladki ka nahi.

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  • parveen kumar

    @ NO SIR, PURANA TO KUCHH YAD NAHI HAI. NEW VISIT KABHI HOGI TO KOSHISH KARUNGA.
    @ D L – TRULY GREAT INFORMATION

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  • One of the most exhaustive writings in a travelogue on Udupi temple. The photos too were excellent. Waiting for Murdeshwar trip details. How is your new Sony W 360 camera, shaping up?

    • Dear Venkatt ,

      Thanks for your wonderful comment………………

      I have schduled Murudeshwar on 9th Of May . Sorry No earlier Dates were available. Sony W 360 is nice but when i used 16 Megapixels then size of photo is upto 6 MB which is huge and then while posting i have to reduce and thereby quality gets reduced a bit. You can see for yourself above.

  • Harish Bhatt

    Hello Vishal Ji, Man mantra mugda ho gaya aapka yeh post pad ke. Maine to kewal Udupi khane ke bare me suna tha par aapne jo wahan ke madiron aur unki gatha ke bare me lika hai wah sab pad kar babhu aanand aya…Aap chahe Hindi me likhen ya English; aapka andaze bayan bahut hi nirala hota hai… Mai koi bahut zaada dharmik aadmi nahi hoon par aapka post padne ke baad man me ek bahut sundar bhakti bhaao jaag utha…Dhanyawad Udupi ke darshan karane ke liye…

    • Thanks Harish jee for your lovely comments ……………

      So finally your one of your friend Inaam is coming with the post…………..

      • Harish Bhatt

        Yes, Vishal Ji…Inam bhai has written about his side of the 24 hours in Ranthambore…

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  • Kavita Bhalse

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  • I was waiting for this story for a while, Vishal.

    Many thanks for sharing such beautiful tale about Udupi. And then the comments, esp from DL, is adding further beauty to the whole thing.

    You have been a great encouragement for everyone. Take Care.

    • Thanks Nandan ………………

      I hope so I remain to fulfill the expectations from you people…………………..

  • Mukesh Bhalse

    Vishal,
    Your endeavor of writing in Hindi is really appreciable, receive my heartiest congratulations for your first Hindi post. The post is simply mesmerizing. Write up and photography both are excellent.

    You possess a unique style of narrating and presentation and I am highly impressed with this. To be on a tour with you was really a great experience for all of us and we’ll cherish these memories forever.

    Waiting for the next part of this series.

    • Thanks ……………for your lovely comments…………………

      you were the first one to encourage me to write in hindi…………………..

      And yes you wait for the next part because I am going to show you what you must have not seen in Murudeshwar………………………

  • Sanjay Kaushik

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  • Sanjay Kaushik

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  • Mukesh Bhalse

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  • Dear Vishal,

    Great story and a really nice place too. The story of the idol of Bhagwaan Krishna turning around to face backwards is truly amazing.

    Will look forward to the next part eagerly…

  • Nikhil Bhat

    Dear Vishal

    Thanks for sharing the beautiful story about Upipi and Sripad Madhavcharya. I will share through my comment some important teachings about Madhavcharya (Pls. see below)

    Renunciation, devotion and direct cognition of the Lord through meditation lead to the attainment of salvation. The aspirant should equip himself with the study of the Vedas, control of the senses, dispassion and perfect self-surrender, if he wants to have the vision of the Lord. These are some of the important teachings of Madhvacharya, the renowned exponent of the dualistic school of philosophy.

    Every follower of the Madhva school should have a firm belief in the Pancha-bhedafive real and eternal distinctionsviz.,
    The distinction between the Supreme Being and the individual soul, between spirit and matter, between one Jiva and another Jiva, between the Jiva and matter, between one piece of matter and another. The phenomenal world is real and eternal. The worship of Vishnu consists in (i) Ankana, marking the body with His symbols, (ii) Namakarana, giving the names of the Lord to children and (iii) Bhajana, singing His glories.
    Madhvacharya laid much stress on constant practice of the remembrance of God (Smarana). He says, “Form a strong habit of remembering God. Then only it will be easy for you to remember Him at the moment of death”. Madhva pointed out that when the Lord incarnated, no Prakrita Deha or material body was put on by Him. He prescribed a rigorous kind of fasting to his followers.

    Haribol

    Nikhil

  • Thanks Nikhil for your Kind words and knowledge which you have given us……………………….

    It was indeed a treat for me to have such a great friend like you……………………

    Naam Smarana and remembrance are the best way to do bhakti and attain purification and salvation ……….. .

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  • Nice post , enjoyed reading it. Pics says most of the story.

    • Thanks Viragjee…………………………….