Udaipur

Udaipur Diaries – The City of Lakes

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We left our home at around 11.20 p.m. and our first stop was “Mardeshwar Temple” , Palikhanda, a place  located adjacent to high way itself. We decided to take blessings of “Lord Shiva” to start the journey. It was around 1.15 pm we left for our next planned stop “Shamlaji Temple”. We were at “Shamlaji” around 2.50 pm. After having darshan in the temple, we took a bit longer break here for some refreshment. I am avoiding writing historical details of this two temples as authentic information is easily available on web and there is no point writing it again. We left shamlaji at around 3.30 curiously waiting to reach our final destination.

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Trip to the magnificent city of lakes- Udaipur

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Rajasthan with its rich culture, grand palaces and forts has always been one of the most coveted regions aspired by Mughals and later by British. The story of Udaipur and Chittorgarh are no less. Udaipur was built by the valiant Sisodia king of the Rajputs, Maharana Udaisingh in 1553. It was the historic capital of the kingdom of Mewar. Udaipur succeeded Chittorgarh which was besieged and taken over by the Mughals. After 1818 it became a British princely state. Udaipur is popularly known as the “City of Lakes” with its numerous lakes major ones being the Fateh Sagar Lake, Pichola Lake, Swaroop Sagar Lake, Rang Sagar Lake and Doodh Talai Lake besides others. The city is flanked with ethereal gardens and mountain ranges.

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Udaipur Diaries Continues …Part-2

Udaipur Diaries Continues …Part-2

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We left “Sajjangarh” at around 2.15 p.m. for “City Palace”. On the way we wanted taste rajasthan variety snack and ballubhai rightly stopped and one of very famous food chain joint JBM. Never forget to try Dal Kachori and Pyaj Kachori here, it’s affordable with great taste. At around 3.15 we were at “City Palace”. Entry tickets for city palace is Rs.330/- (which includes entry for must recommended visit to museum). Believe me at first sight I was wondering why to pay so much for palace, but once we were inside felt it’s worth.

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Memories of Mewar (III): Udaipur, City of Lakes and Palaces.

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After visiting the Kumbhalgarh Fort, Ranakpur, the Krishna Temples at Kankroli and Nathdwara, and the Sajjan Garh Palace, we were now on the last leg of our trip to Mewar, Rajasthan, and had two full days to take in the beauty of Udaipur, the City of Lakes and Palaces. This beautiful city is also sometimes referred to as the ‘Venice of the East’, ‘Most Romantic City of India’ and ‘The Kashmir of Rajasthan’.

Udaipur was the capital of the kingdom of Mewar, ruled by the Sisodia clan of Rajputs. The founder of Udaipur was Maharana Udai Singh II, father of Maharana Pratap. Udaipur was founded in 1559, when a hermit blessed the king and asked him to build has palace at a spot on the east ridge of the Pichola Lake. In 1568, the Mughal emperor Akbar captured Chittaurgarh, and Udai Singh moved the capital to the site of his new residence, which became the city of Udaipur. As the Mughal empire weakened over the years, the Sisodia Maharanas recaptured most of Mewar district. Udaipur remained the capital of the state, which became a princely state of British India in 1818.

After India’s independence in 1947, the Maharaja of Udaipur acceded to the Government of India, and Mewar was integrated into India’s Rajasthan state.

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Memories of Mewar (II): Kankroli, Nathdwara, and Sajjan Garh (Udaipur).

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The temple of Shrinathji at Nathdwara is among the most sacred places of worship for the followers of Lord Krishna. The idol is made of black stone and is said to have been brought here from Mathura in 1669 to protect it from the marauding Moguls under Aurangzeb’s rule.

The temple opens its doors to the public for worship seven times a day for just about half an hour each, and there is a huge crowd always waiting to rush in. Inevitably there is some pushing and jostling and you barely get a minute for darshan before you are pushed out to the exit, just like in a Mumbai local train. This makes the whole experience quite unpleasant, and the temple authorities should take the initiative to organise it in a better way. Some touts promise to get you in through the VIP channels, but they only serve as paid guides, and can do nothing when the push becomes a shove.

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उदयपुर – झीलों तथा महलों का शहर……..

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इस श्रंखला की पिछली पोस्ट में मैने आपलोगों को नाथद्वारा स्थित भगवान श्रीनाथ जी की गौशाला, लाल बाग तथा एकलिंग जी के बारे में बताया था उम्मीद है पोस्ट आप सभी को पसंद आई होगी। एकलिंग स्वामी जी के दर्शन करने, मन्दिर में स्थित अन्य छोटे मंदिरों के दर्शन करने तथा कुछ समय मंदिर में बिताने के बाद हम लोग मंदिर के सामने रोड़ से ही एक जीप में सवार होकर उदयपुर की ओर चल पड़े।

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भगवान एकलिंग जी दर्शन

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लालबाग, श्रीनाथ जी मंदिर ट्रस्ट के द्वारा बनवाया एक सुन्दर उद्यान है जहां कई तरह के फ़ुलों के पौधे, बच्चों के लिये झुले तथा मनोरंजन के अन्य साधन हैं, यानी सुकुन के कुछ पल बिताने के लिये इस उद्यान में सब कुछ है और छायाचित्रकारी के लिये तो यह उद्यान अति उत्तम है। जब हम यहां पहुंचे तो उस समय यहां हमारे अलावा और कोइ नहीं था, क्योंकि यह बाग दोपहर के बाद ही खुलता है। इस उद्यान में जी भर कर फोटोग्राफी करने के बाद हम अपने ऑटो में सवार होकर अपने अगले पड़ाव यानी गौशाला की ओर बढे।

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Photography : Practical Tips and Tricks

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This is true of every ghumakkar. If Vishal Rathore, DL, Amitava, Ritesh, Manu, Abhee, Jat Devta, SS, Praveen Wadhwa, Nirdesh, Vipin, Mala, Devasmitha and Sushant (or any of the rest of authors here) were wandering together in a city or village with our cameras on our shoulders, each of us would aim at different objects and would shoot from different angles and for different reasons. It hardly matters whether we own a DSLR or a mobile phone as far as selection of our subjects is concerned. Well, here are a few things which I have learnt in photography in all these years. May be you would find them interesting and useful.

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Ride to Rajasthan – Ahmedabad to Udaipur

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Last night I and all of us had switched off all alarms and put our phones on silent, as we could not afford any disturbance…. 08:00 am … oh … we need to get ready to move ahead, we were still 260 kms from Udaipur … but on second thought, we had covered 700 kms on day 1 … so 250 kms …. Huh … EASY !!! BUT …. Yeah … the but’s of the second day start …

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Nathdwara-Bagaur Haveli-Return from Udaipur

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उदयपुर अपनी जिन झीलों के कारण विश्व प्रसिद्ध है उनमें फतेह सागर झील भी एक है। अगर आप सोच रहे होंगे कि फतेह सागर झील का निर्माण महाराणा फतेह सिंह ने किया होगा तो आप सरासर गलत हैं। इस कृत्रिम झील का निर्माण 1678 में महाराणा जय सिंह ने किया था। पर बाद में महाराणा फतेह सिंह ने इसका विस्तार किया और यह झील उनके नाम को समर्पित हो गई। उदयपुर के उत्तर-पश्चिम में और पिछोला झील के उत्तर में स्थित यह झील जयसमंद झील के बाद दूसरी कृत्रिम झील है जिसका निर्माण निश्चय ही उदयपुर को रेगिस्तानों के लिये प्रसिद्ध राजस्थान को सूखे से बचाने के लिये किया गया होगा। ढाई किमी लंबी, डेढ़ किमी चौड़ी और साढ़े ग्यारह मीटर तक गहराई वाली इस झील के मध्य में स्थित तीन टापुओं में से सबसे बड़े टापू पर नेहरू पार्क है। इस पार्क में जाने के लिये नाव का सहारा लिया जाता है। इन झील को पानी तीन मार्गों से मिलता है और एक मार्ग का उपयोग मानसून के दिनों में पानी की अधिकता से निपटने के लिये किया जाता है ताकि झील में से फालतू पानी को निकाला जा सके।

दूसरे वाले टापू पर सुन्दर सुन्दर से पानी के फव्वारे लगाये गये हैं और तीसरे टापू पर नक्षत्रशाला (solar observatory) है। हम लोग सिर्फ नेहरू पार्क तक ही सीमित रहे जिसमें नाव की आकार का एक रेस्टोरेंट भी बनाया गया है। लोग बताते हैं कि वहां पर एक चिड़ियाघर भी है, जिसकी अब मुझे याद नहीं है। हो सकता है उस समय वह न रहा हो या उसमें जानवर न होकर सिर्फ चिड़िया ही हों !

नेहरू पार्क से आप चाहें तो बोटिंग के मजे ले सकते हैं। वहां पर बहुत तेज़ भागने वाले हॉण्डा वाटर स्कूटर भी थे जिस पर जाट देवता जैसे पराक्रमी घुमक्कड़ झील की परिक्रमा कर रहे थे। वैसे यदि आप उस स्कूटर की सवारी करना नहीं जानते तो भी कोई दिक्कत नहीं है। उनका आपरेटर आपको ड्राइविंग सीट पर बैठा कर खुद सारे कंट्रोल अपने हाथ में ले लेता है। आप यदि स्टीयरिंग भी ठीक से नहीं पकड़ सकते तो मेरी तरह से आप भी इन सब झंझटों से दूर ही रहें।

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Udaipur Vintage Cars

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इस गाड़ी का तकनीकी नाम है GLK21 ! वाह, बड़ाई सोणा नाम है! सन्‌ 1924 के दिनों के तो इंसान भी आज कल मुश्किल से ही मिलते हैं, ये बेचारी तो कार है। वर्ष 2000 के आस-पास मेवाड़ घराने के मन में ये खयाल आया कि हम अपनी कारों की एक प्रदर्शनी क्यूं ना लगा दें। कम से कम प्रवेश टिकट के पैसों से ड्राइवर की तनखाह तो निकलेगी! तो फिर यह खयाल भी हाथ के हाथ आया कि कार देखने के लिये लोग तो तब आयेंगे जब कार बढ़िया हालत में हों । ऐसे में अपने जीवन के फाइनल बसंत देख रही इस कार को पुनः युवा बनाने का अभियान शुरु हुआ। Hofmanns of Henley, UK की राय ली गई और उनके तकनीकी निर्देशन में गाड़ी के एक-एक अंग का प्रत्यारोपण शुरु हुआ। गाड़ी के पहिये न्यू ज़ीलेंड से मंगाये गये। गीयर बक्से की मरम्मत के लिये इंग्लैंड की उसी कंपनी के इंजीनियर आये जिन्होंने इसे बनाने की ज़ुर्रत की थी। यह कुछ ऐसा ही था कि शादी के स्वर्णजयंती वर्ष में कोई व्यक्ति अपने श्वसुर को पत्र लिख कर कहे कि आपकी सत्तर साल की बिटिया का ब्लड transfusion होना है, जरा आकर सहायता करें। जैसे श्वसुर अपने दामाद को “ना” नहीं कर पाते ऐसे ही Hofmanns of Henley कंपनी के श्रीयुत्‌ ग्राहम ने भी मना नहीं किया और गाड़ी के रेडियेटर और गीयर बाक्स को बिल्कुल नये जैसा बना कर दे दिया। धन्य हैं मेवाड़ के महाराणा और धन्य हैं इंग्लैंड के इंजीनियर ! आज ये गाड़ी उदयपुर की सड़कों पर पूरी शान से दौड़ती है। आपको शायद मालूम हो कि रॉल्स-रॉयस कार की सबसे बड़ी पहचान उसका रेडियेटर ही होती है जिसका डिज़ाइन आज तक भी नहीं बदला। O & M विज्ञापन एजेंसी के मालिक ने एक बार लिखा था कि इस गाड़ी को जब बनाया जाता है तो इसकी बॉडी पर stethescope लगा-लगा कर देखा जाता है कि इसमें कहीं कोई आवाज़ तो नहीं आ रही है! पांच बार प्राइमर और नौ बार पेंट का कोट चढ़ाया जाता है, अन्दर कहां, क्या, कैसे चाहिये – यह सब आपकी फर्माइश के हिसाब से बनाया जाता है। ऐसा नहीं कि जो कंपनी वालों को पसन्द आया, लगा दिया। इतना ही नहीं, गाड़ी की हैड लाइट के एंगिल, direction, focus वगैरा सारे समायोजन ड्राइवर अपने आस-पास लगाये गये लीवर से ही कर सकता था। जे हुई ना कुछ बात !

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Exploring Udaipur City Palace

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आगे बढ़े तो छत से झांकने पर एक और प्रांगण दिखाई दिया। बताया गया कि यहां रवीना टंडन की शादी हुई थी। जरूर हुई होगी, हमें तो निमंत्रण मिला नहीं था शादी का, हमारी बला से! सच पूछो तो रवीना शादीशुदा है या कुंवारी है – हमें इसमें भी कोई रुचि नहीं है। हमारे लिये तो हमारी अपनी श्रीमती जी ही रवीना, ऐश्वर्या, माधुरी, सीता, सावित्री, गार्गी, विद्योत्तमा, तिलोत्तमा सब कुछ हैं। (यह लाइन मैने उनको पढ़वाने के लिये ही लिखी है!)

सिटी पैलेस को समझना हो तो आप कुछ कुछ यूं समझें कि ये एक लंबाई में बनाया हुआ महल-कम-दुर्ग-कम-होटल-कम-संग्रहालय है। अगर आप 49,999 रुपये तथा उस पर विलासिता कर यानि luxury tax और VAT दे सकते हैं तो आप फतेह प्रकाश पैलेस या शिव सागर पैलेस होटल में से किसी एक होटल में एक रात रुक भी सकते हैं। अगर आप सोनिया गांधी के दामाद हैं और रातोंरात अरबपति बन चुके हैं तो आप अपने बच्चों का विवाह भी इन HRH Heritage hotels में से किसी एक में आयोजित कर सकते हैं। पर अगर आप 30 रुपये में सिटी पैलेस म्यूज़ियम देखने आये हैं तो आप शानदार हवेलियां देखिये, कमरों में सजाये हुए पंखे, बिस्तरे, मूढ़े आदि देखिये, अद्‍भुत वास्तुकला देखिये, अंग्रेज़ पर्यटकों को निहारिये, 200 रुपये कैमरे के लिये देकर फोटो वगैरा खींचिये और संकरी गली से बाहर निकल लीजिये।

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