हरिद्वार और देहरादून का तूफानी दौरा
Table of contents for हरिद्वार - देहरादून
- हरिद्वार और देहरादून का तूफानी दौरा
कुछ वर्ष पहले की बात है, शाम को लगभग छः बजे बैंक से लौटा तो घर में घुसते ही बातचीत कुछ इस ढंग से शुरु हुई –
श्रीमती जी - “बच्चों की एक दिन के लिये हरिद्वार घूमने की इच्छा है।“
मैं – “कब ?”
बड़ा बेटा – “आज ही चलें?” शनिवार है, कल की छुट्टी है, कल शाम तक वापिस आ जायेंगे!”
मैं – पर इतनी जल्दी सब कुछ कैसे होगा?”
श्रीमती जी – “अगर आपको चलने में कोई दिक्कत नहीं है तो इंतज़ाम भी हो ही जायेगा। आपको तो कोई परेशानी नहीं है ना?”
मैं – “पर वहां रात को ठहरेंगे कहां? शनिवार है, बहुत भीड़ होगी। रात को ठहरने की भी जगह नहीं मिलेगी।“
छोटा बेटा – “हरिद्वार में तो हज़ारों होटल, धर्मशाला, आश्रम हैं, कहीं न कहीं जगह मिल ही जायेगी!”
श्रीमती जी – “बच्चों का बहुत मन है तो बना लेते हैं प्रोग्राम !”
मैं – “देख लो, अगर आधा घंटे में निकल सकें तो ठीक है, वरना रात को निकलना ठीक नहीं रहेगा।“
बड़ा बेटा – “फिर मैं गाड़ी बाहर निकाल लूं?”
मैं – “गाड़ी तो निकल जायेगी पर पहले जाने की तैयारी तो कराओ! अटैची – सूटकेस में सामान लगाना नहीं लगाना है क्या?”
छोटा बेटा – “हुर्रे ! अटैची तो गाड़ी में पहले से ही रख दी है हमने !” आपकी ही इंतज़ार कर रहे थे!”
मैं – “क्या मतलब ? बिना मुझसे पूछे ही? अगर मैं मना कर देता तो?”
श्रीमती जी – “घूमने जाने के लिये आप मना कर दें ! हो ही नहीं सकता ! आधी रात को भी कहीं घूमने जाने को कह दूं तो नींद में उठ कर ही चल दोगे!” बस, इसी विश्वास से हमने सब सामान गाड़ी में पहले से ही रख रखा है। चलो, उठो ! अब मुंह फाड़े हमें क्या ताक रहे हो? कुछ चाय-कॉफी चाहिये तो दे देंगे, वरना गाड़ी बाहर निकालो और चलो !” इतना कह कर तीनों एक दूसरे को देख कर अर्थपूर्ण ढंग से मुस्कुराये और फिर खीसें निपोर दीं ! मुझे लगा कि मेरा परिवार मेरी नस-नस से वाकिफ़ है। (more…)







