December 31, 2012
By: Sushant Singhal
Category: 02 February, 03 March, 04 April, 10 October, 11 November, 12 December, Cities, Forts, Hills, Historical, Hotel, Mount Abu, Nature, Udaipur, Uncategorized, Weekend-Delhi, Weekend-Mumbai
प्रिय मित्रों,
आप जान ही चुके हैं कि हम सहारनपुर से कार से दिल्ली और फिर दिल्ली से वायुयान से उदयपुर पहुंचे, रात्रि में उदयपुर में वंडर व्यू पैलेस में रुके, अगले दिन अंबाजी माता मंदिर, जगदीश मंदिर के दर्शन करते हुए माउंट आबू में ज्ञान सरोवर आ पहुंचे। शाम को sunset point और नक्की झील घूमे, अगला पूरा दिन भी दिलवाड़ा मंदिर, गुरु शिखर, अनादरा प्वाइंट, पीस पार्क आदि घूमते फिरते रहे, ब्रह्माकुमारी केन्द्र के विभिन्न परिसरों के दर्शन करते हुए शाम को पुनः नक्की झील पर आगये। रात को ज्ञान सरोवर में ही रुके और सुबह पांच बजे पुनः उदयपुर के लिये प्रस्थान किया और दस बजे उदयपुर में प्रवेश किया।

भारतीय लोक कला मंडल उदयपुर में कठपुतली शो
अब हमारे पास आज का दिन यानि ३० मार्च, ३१ मार्च और १ अप्रैल बाकी बचे थे। १ अप्रैल को शाम को पांच बजे हमारी वापसी उदयपुर एयरपोर्ट से होनी थी। हमारे विचार से इतना समय उदयपुर घूमने के लिये पर्याप्त था। फिर भी ऐसा लगता है कि हमने काफी सारे दर्शनीय स्थल या तो छोड़ दिये या फिर देखे होंगे तो हमें वहां की कुछ विशेष मनोरंजक स्मृति आज शेष नहीं है। खैर, उदयपुर दर्शन का शुभारंभ हुआ – भारतीय लोक कला मंडल से जो फतेह सागर लेक के निकट ही एक बाज़ार में स्थित है। जब बाबूराम ने प्रवेश द्वार पर टैक्सी रोकी और कहा कि ये एक म्यूज़ियम है, इसे देख आइये और वापसी में टैक्सी पार्किंग में आ जाइयेगा तो मैने आधे सोते – आधे जागते, (संक्षेप में कहें तो ऊंघते हुए) अपने परिवार को जगाया और कहा कि चलो, म्यूज़ियम देख लो तो वे बड़े बे मन से अंगड़ाई लेते हुए टैक्सी में से निकले और टिकट खरीद कर भारतीय लोक कला मंडल नामक म्यूज़ियम में घुसे! सच कहूं तो हमारे इन तीनों ही सहयात्रियों को लोक कलाओं में कोई विशेष रुचि नहीं थी और ये सब देखने के लिये मरा मैं भी नहीं जा रहा था। (more…)
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December 22, 2012
By: Sushant Singhal
Category: 02 February, 03 March, 04 April, 05 May, 06 June, 09 September, 10 October, 11 November, 12 December, Hills, Mount Abu, Nature, Religious, Roads, Udaipur, Uncategorized
मित्रों, अभी तक आप पढ़ चुके हैं कि हम सहारनपुर से चल कर गाज़ियाबाद और फिर एयर डेक्कन के विमान से नई दिल्ली से उदयपुर पहुंचे । एयरपोर्ट से ही पांच दिनों के लिये एक टैक्सी ली जो हमें पांच दिनों में उदयपुर और माउंट आबू घुमा कर वापिस एयरपोर्ट पर ही छोड़ने वाली थी । शाम को ब्रह्मपोल के पास पिछोला झील के तट पर हमने होटल वंडर व्यू पैलेस में ठहरने का निश्चय किया और फिर शाम को सहेलियों की बाड़ी देखने गये, लौट कर आमेट हवेली के अंबराई रेस्टोरेंट में शाही अंदाज़ में भोजन किया । अगले दिन सुबह अंबा माता और जगदीश मंदिर के दर्शन करने के बाद हम उदयपुर से माउंट आबू के लिये निकल पड़े और दोपहर को ज्ञान सरोवर में आकर ठहर गये । ज्ञान सरोवर प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय का ही एक विशाल परिसर है जो माउंट आबू में स्थित है। आइये, अब आगे चले चलते हैं !

सूर्य को हाथों में थाम लेने की चाह !
शाम को साढ़े चार बजे हसीन का फोन आया कि वह और टैक्सी घूमने चलने के लिये तैयार हैं अतः हम पन्द्रह मिनट में अपनी बिल्डिंग के गेट पर आ जायें! पहले Sunset Point पर चलेंगे और फिर नक्की लेक के आस-पास घूम सकेंगे! मैने महिलाओं को बोल दिया कि सूर्य देवता सूर्यास्त के लिये हमारी प्रतीक्षा नहीं करने वाले हैं अतः मेक अप में ज्यादा समय व्यर्थ करना समझदारी नहीं होगी। बस, चल पड़ो ! बिना समय व्यर्थ किये हम टैक्सी में बैठे और ज्ञान सरोवर से, पता नहीं किस – किस सड़क से होते हुए उस बिन्दु पर पहुंच गये जहां से Sunset Point के लिये पैदल या बग्घी में जाना होता है। लगातार चढ़ाई थी, पैदल चलने का हम चारों का ही मूड नहीं था अतः मन को ये बहलाते हुए कि पैदल पहुंचते पहुंचते तो सूर्यास्त हो जायेगा, दो बग्घी कर ली गईं और तीन – तीन लोग हमें धकेलते हुए Sunset Point पर ले गये। रास्ते में उबले हुए भुट्टे खरीद कर टाइम-पास का जुगाड़ किया गया। अंत्याक्षरी के बारे में तो दुनिया जानती ही है कि समय बिताने की सामर्थ्य उस से बेहतर और किसी चीज़ में नहीं है, पर मूंगफली और भुट्टे भी समय बिताने के लिये उत्तम पदार्थ हैं।
जैसा कि अक्सर पहाड़ों पर व अन्य पर्यटन स्थलों पर खतरा रहता है, यहां भी फैंसी ड्रेस वाले हमारे पीछे पड़ गये कि राजस्थानी ड्रेस में फोटो खिंचवा लो जी! एक बन्दे ने जब मेरी नाक के ठीक नीचे अपनी फोटो एल्बम घुसाई तो मैने उसे अपना कैमरा दिखाया कि भाई, हम तो खुद ही, रिश्ते में तुम्हारे बाप लगते हैं ! तुम हमारी क्या फोटो खींचोगे ? लाओ, हम तुम्हारी ही फोटो खींच दें। पर वह भी कम नहीं था । बोला, ड्रेस पहन कर आप अपने ही कैमरे से फोटो ले लो जी! श्रीमती जी ने कहा कि चलो, जब इतना कह रहा है तो एक ड्रेस पहन लेती हूं, फोटो खींच लो ! यादगार रह जायेगी। (more…)
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December 16, 2012
By: Sushant Singhal
Category: 01 January, 02 February, 03 March, 04 April, 05 May, 06 June, 10 October, 11 November, 12 December, Best Time, Cities, Hills, Historical, Hotel, Mount Abu, Nature, Religious, Roads, Udaipur, Uncategorized
नमस्कार मित्रों, जैसा कि आपको ध्यान ही होगा, हम सहारनपुर से 27 मार्च की सुबह उदयपुर के लिये निकले थे। गाज़ियाबाद तक कार तक, फिर नई दिल्ली से उदयपुर तक एयर डेक्कन के विमान से ! पांच दिन तक उदयपुर और माउंट आबू घुमाने के लिये हमें मिला हसीन नाम का एक टैक्सी चालक जिसने हमें ब्रह्मपुरी पोल में वंडर व्यू पैलेस से परिचित कराया जहां हमें अपने मनपसन्द कमरे मिले। शाम को हमें सहेलियों की बाड़ी दिखाई, रात को हमें अंबराई रेस्टोरेंट पर ले जाकर छोड़ा जहां हमने राजपूती आन-बान-शान से डिनर लिया और अपने होटल में आकर सो गये। अब आगे !

अंबाजी माता मंदिर, उदयपुर ! हर रोज़ आयेंगे यहां !
सामान टैक्सी में लाद कर हम होटल के रिसेप्शन पर आये और पुनः अपनी बुकिंग नोट कराई कि ३० मार्च को शाम को आयेंगे और १ अप्रैल को सुबह चैक आउट करेंगे और हमें ये ही कमरे पुनः चाहियें। वहां से चल कर सबसे पहले अंबा जी माता मंदिर पहुंचे! होटल से संभवतः पांच मिनट के सफर के बाद ही, उदयपुर के एक शांत इलाके में स्थित इस मंदिर के दर्शन कर मन को बहुत अच्छा लगा। मंदिर में अधिक भीड़ नहीं थी, पुजारी जी के नखरे भी नहीं थे। हमने जो प्रसाद मंदिर के बाहर एक दुकान से लिया था, वह वास्तव में हमारी उपस्थिति में ही अंबा माता जी को अर्पित किया गया। हमारी श्रीमती जी तो यह देख कर बहुत तृप्त और धन्य हो गई अनुभव कर रही थीं। आम तौर पर बड़े – बड़े विख्यात मंदिरों में हमें यही अनुभव होता है कि वहां श्रद्धालुओं को धकियाया जाता है, पैसे वालों की पूछ होती है, दर्शन के लिये भी पैसे मांगे जाते हैं। जो प्रसाद चढ़ाया जाता है, वह कुछ ही घंटों में पुनः मंदिर के बाहर स्थित दुकानों को बेच दिया जाता है। मंदिरों में भगवान के दर्शन कम और व्यावसायिकता के दर्शन अधिक होते हैं तो मन उदास हो जाता है। श्रीमती जी ने तो निश्चय कर लिया कि माउंट आबू से लौट कर जितने दिन उदयपुर में रुकेंगे, हर सुबह इस मंदिर में दर्शनार्थ आया करेंगे। (more…)
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December 13, 2012
By: Sushant Singhal
Category: 01 January, 02 February, 03 March, 10 October, 11 November, 12 December, Best Time, Udaipur, Uncategorized
हम सहारनपुर से गाज़ियाबाद, गाज़ियाबाद से नई दिल्ली एयरपोर्ट और फिर एक नन्हें से जहाज में उदयपुर पहुंच कर होटल तक कैसे पहुंचे – यह विवरण आप पढ़ ही चुके होंगे। अब आगे !

हमारे होटल की टैरेस से लेक पैलेस
शाम के छः बज रहे थे और हमारा महिलावर्ग ’सोलह सिंगार’ करके उदयपुर भ्रमण के लिये पूरी तरह तैयार था। रिसेप्शन से इंटरकॉम पर संदेश आया कि ड्राइवर महोदय आ गये हैं और हम नीचे आ जायें। हम सब अपनी इंडिका टैक्सी में लद कर घूमने चल पड़े! टैक्सी से स्थानीय भ्रमण में मुझे एक दिक्कत अनुभव होती है और वह ये कि हम जिस शहर में घूम रहे होते हैं, उसके भूगोल से काफी कुछ अपरिचित ही रह जाते हैं। किसी शहर को ठीक से समझना हो तो स्टीयरिंग आपके हाथ में होना चाहिये तब आपको किसी स्थान का भूगोल समझ में आता है। अगर कहीं से मोटरसाइकिल या स्कूटर किराये पर मिल सके तो घूमने का सबसे बढ़िया और मजेदार तरीका वही है। परन्तु हमने तो पांच दिनों के लिये टैक्सी कर ली थी और मेरी पत्नी सहित सभी सहयात्रियों की प्राथमिकता सुविधापूर्ण यात्रा थी जिसमें कार के शीशे बन्द करके वातानुकूलित हवा खाना सबसे महत्वपूर्ण था। ऐसे में मैने तो हल ये निकाला था कि जहां भी मौका लगे, अकेले ही पैदल घूमने निकल पड़ो! घरवाले अगर होटल में आराम फरमाना चाहते हैं तो उनको होटल में ही रहने दो, अकेले ही घूमो मगर घूमो अवश्य । अस्तु!
पता नहीं, किधर – किधर को घुमाते फिराते हुए, और उदयपुर की शान में कसीदे पढ़ते हुए हमारे टैक्सी चालक हसीन महोदय ने जब टैक्सी रोकी तो पता चला कि हम सहेलियों की बाड़ी पर आ पहुंचे हैं। हसीन ने अपने यात्रियों के लिये गाइड के रूप में सेवायें प्रदान करना अपना पावन कर्तव्य मान लिया था अतः सहेलियों की बाड़ी के बारे में हमें बताया कि ये फतेह सागर लेक के किनारे पर स्थित एक आमोद गृह है जहां महारानी अपनी 48 सखियों के साथ जल विहार और किल्लोल किया करती थीं । आज कल जैसे पति लोग अपनी पत्नी को एक मीडिया फोन लाकर दे दिया करते हैं ताकि वह वीडियो गेम खेलती रहे और पति भी सुकून और शांति भरे कुछ पल घर में गुज़ार सके, कुछ-कुछ ऐसे ही 18 वीं शताब्दी में उदयपुर के महाराणा संग्राम सिंह ने अपने घर को संग्राम से बचाने के लिये अपनी महारानी और उनके साथ दहेज में आई हुई 48 युवा परिचारिकाओं के मनोरंजन के लिये सहेलियों की बाड़ी बनवा कर दे दी थी। यह एक विशाल बाग है जिसमें खूबसूरत फव्वारे लगे हुए हैं । फतेह सागर लेक इसकी जलापूर्ति करती है। हम जब यहां पर पहुंचे तो सूर्यास्त हो चुका था। बाग में कृत्रिम प्रकाश में हमें सहेलियों की बाड़ी का बहुत विस्तार से अध्ययन करने का मौका तो नहीं मिला पर कुछ बड़े खूबसूरत से फव्वारे वहां चल रहे थे जिनके बारे में विश्वस्त सूत्रों से यानि विकीपीडिया से ज्ञात हुआ है कि ये फव्वारे rain dance का आभास देने के लिये बाद में महाराणा भोपाल सिंह ने इंग्लैंड से मंगवाये और यहां पर लगवाये थे। (more…)
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December 06, 2012
By: Sushant Singhal
Category: 02 February, 03 March, 04 April, 05 May, 10 October, 11 November, 12 December, Best Time, Cities, Historical, Rajasthan, Udaipur, Weekend-Delhi
“सुनो जी! उदयपुर घूमने चलने का मूड है क्या?”
“कमाल है! भूत के मुंह से राम-राम! आज तुम घूमने की बात कर रही हो! सब खैरियत तो है?”
“हवाई जहाज से चलेंगे!”
“अब मुझे चिंता होने लगी। श्रीमती जी के माथे पर हाथ रख कर देखा कि कहीं बुखार वगैरा तो नहीं है, पर माथा भी सामान्य लग रहा था ! “आखिर चक्कर क्या है? आज तुम्हें क्या हो गया है? मुंगेरीलाल के ऐसे हसीन सपने क्यों दिखा रही हो?
“क्यों? हवाई जहाज से जाने में क्या दिक्कत है अगर सिर्फ एक रुपये टिकट हो?”

छोटा सा ही सही, पर है तो जहाज ही !
तुमने आज कहीं भांग-वांग तो नहीं पी ली है गलती से? तुम तो बिल्कुल प्रेक्टिकल जीवन जीने में यकीन रखती हो! फिर ऐसी बातें कैसे करने लगी हो?”
अरे, आप भी बस! असल में बड़ी दीदी का फोन आया था। वह कह रही हैं कि उदयपुर घूमने चलते हैं ’बाई एयर’! उनके बेटे ने कहा होगा कि एयरलाइंस एक – एक रुपये के टिकट दे रही हैं। सिर्फ टैक्स देना होता है जो करीब 1200 बैठता है। एक टिकट 1201 का पड़ता है! ट्रेन के टिकट से भी सस्ता! आपको तो घूमने जाने में कोई दिक्कत है ही नहीं! मैने तो हां कह दी है, मार्च एंड में चलेंगे अगर टिकट कंफर्म हो गये तो!”
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January 03, 2012
By: Ritesh Gupta
Category: 01 January, 02 February, 03 March, 10 October, 11 November, 12 December, Historical, Hotel, Religious, Udaipur, Weekend-Delhi
नमस्कार दोस्तों !
तारीख २९ जून २०११ दिन बुधवार था । मैंने अपने पिछले धारावाहिक लेख “माउन्ट आबू” में लिखा था की कैसे हमने अपने दो दिन माँ अम्बाजी, माउन्ट आबू और उसके आस पास के दर्शनीय स्थल की सैर करने में बिताये थे और दो दिन पता ही नहीं चले की कब ख़त्म हो गए । आज हमारे सफ़र का तीसरा दिन था, और तय कार्यक्रम के अनुसार आज हम लोगो को आज माउन्ट आबू से उदयपुर का सफ़र तय करना था ।
हम लोग सुबह ६ बजे ही उठ गए, आज की सुबह भी पिछली सुबह की तरह ठंडी थी । खिड़की से बाहर झाँका तो देखा की पूरा शहर सुनसान था, कोई भी चहल कदमी नहीं थी । हम लोग जल्दी – जल्दी उठकर तैयार हुए, चाय – नाश्ता किया, सारा सामान समेटा और गेस्ट हाउस वाले का हिसाब किया । ८ बजे के आसपास हम लोग गेस्ट हाउस के बाहर बस स्टैंड जाने के लिए नीचे सड़क पर आ गए और बस स्टैंड तक सामान ले जाने के लिए हाथ से धकलने वाली गाड़ी वाले से ४० रुपये किराये पर गाड़ी तय की और हम लोग ने आपना सारा सामान गाड़ी में लगाया और बच्चो को भी उसमे बैठा दिया और बाकी लोग बस स्टैंड तक पैदल ही चल दिए । १० मिनिट में हम लोग बस स्टैंड पंहुच गए । रिम झिम – रिम झिम हलकी फुलकी बारिश भी शुरू हो गयी और ठंडी हवा भी चल रही थी, जिससे ठण्ड और भी बढ़ गयी ।
उदयपुर जाने वाली बस, स्टैंड पर पहले से खड़ी हुई थी, बस में हम लोगो ने अपना सामान लगाया और पहले से आरक्षित की हुई सीटो पर बैठ गए । कुछ समय (लगभग ९:१०) बाद बस बस चल दी । रास्ते में बस वाले ने कई होटलों और गेस्ट हाउस से अपनी बुक की गई सवारियों बस में बैठाया जिसके कारण बस को अपने गंतव्य स्थान को चलने में थोड़ी देर हुई ।
माउन्ट आबू से उदयपुर की दूरी लगभग 185 किलोमीटर हैं । उदयपुर जाने का रास्ता आबू रोड से होकर जाता हैं, आबू रोड से उदयपुर एक चार लाइन के राष्ट्रीय राजमार्ग १४ पिडवारा तक और पिडवारा से राष्ट्रीय राजमार्ग ७६ से सीधा जुड़ा हुआ हैं । यह दूरी बस के द्वारा तय करने में लगभग ३.५ से ४ घंटे का समय लगता हैं
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