कालका-शिमला पर्वतीय रेल – एक अद्भुत सफ़र

घुमक्कड़ी की शुरुआत तो हमने धार्मिक यात्राओं से ही की थी, लेकिन जब से घुमक्कड़ तथा अन्य वेब साईटों पर यात्रा वर्णन पढने का शौक लगा तभी से पर्वतीय पर्यटन स्थलों पर जाने के लिये हमेशा ललचाते रहते थे लेकिन लंबे समय तक ऐसी कोई योजना बन नहीं पाई।

फिर जब घुमक्कड़ पर रितेश गुप्ता जी की मनाली की श्रंखला आई, उसने मुझे इतना प्रभावित किया की मैने उस श्रंखला की एक एक पोस्ट को चार पांच बार पढा और हमने मन ही मन पक्का निर्णय कर लिया की अब तो पहाड़ों पर जाना ही है।

मुझे याद है जब घुमक्कड़ की ओर से नंदन जी ने मेरा फोन पर साक्षात्कार (इंटरव्यु) लिया था तो मुझसे एक प्रश्न किया गया था की आप ने अब तक पर्वतों की सैर क्यों नही की तो मैने उन्हे बताया था की मेरी हमसफ़र कविता जी को ठंड बहुत ज्यादा लगती है और वे सामान्य से थोड़ी सी भी ज्यादा ठंड को बर्दाश्त नहीं कर पाती हैं, चुंकी मुझे पहाड़ों के मौसम की जानकारी नहीं थी और मैं सोचा करता था की वहां बारहों महीने सुबह शाम हर समय बस ठंड ही ठंड लगती रहती है।  मेरे इस जवाब पर नंदन जी ने मुझे बताया की ऐसी बात नहीं है की पहाड़ों पर हमेशा ही ठंड लगती है, वहां भी धूप निकलती है और खास कर गर्मियों में तो दिन में तेज धूप निकलती है और गर्मी होती है, उनकी इस बात से मेरे हिमाचल जाने के निर्णय को और बल मिला, खैर वहां जाने के बाद हमने भी अनुभव किया की नंदन जी बिल्कुल सही कह रहे थे।

सैर के लिये तैयार टीम

सैर के लिये तैयार टीम

2013 की मई के महीने में जब इंदौर में जबर्दस्त गर्मी शुरु हुई तो एक गर्म दोपहर को कविता के मन में किसी ठंडी जगह जाने की इच्छा जाग्रत हुई और उन्होंने मुझे उसी समय औफ़िस फोन लगाया और अपनी कुल्लु-मनाली जाने की इच्छा जाहीर की, सुनकर मुझे तो बहुत ज्यादा खुशी हुई लेकिन अगले ही पल ये खुशी फ़ीकी पड़ गई क्योंकी उस समय कुछ नहीं हो सकता था, इतने कम समय में ट्रैन, होटल आदी का आरक्षण मिलना, लगभग असंभव था अत: उस समय मन को मारना पड़ा लेकिन 2014 मई के लिए ये टूर पक्का हो गया।

2014 में फ़रवरी से ही मैने हिमाचल के लिये तैयारी शुरु कर दी थी। कालोनी के एक सह्कर्मी मित्र पिछले ही वर्ष युथ होस्टल एसोसिएशन ओफ़ इंडीया के फ़ैमिली एडवेंचर कैंप में शामिल होकर मनाली जाकर आए थे, और उन्होने जो युथ होस्टल के कैंप के अनुभव बताए थे वे बड़े सुखद थे अत: मैंने भी ये निर्णय लिया की हम लोग भी युथ होस्टल की सदस्यता लेकर उनके कैंप में ही जायेंगे (युथ होस्टल के बारे में विस्तार से इस श्रंखला की पोस्ट-3 में जानकारी देने की कोशिश करुंगा)। निर्णय होते ही फ़टाफ़ट युथ होस्टल की सदस्यता ली तथा ट्रैन एवं शिमला में होटल का रिजर्वेशन करवा लिया।

युथ होस्टल कैंप में हमारा 4 रात तथा 5 दिन (19 से 23 मई) का पैकेज था तथा यह कैंप कुल्लु तथा मनाली के बीच पतलीकुहल कस्बे के पास एक स्थान पर ब्यास नदी के किनारे लगा था, जहां रहकर हम मनाली तथा उसके आसपास के स्थान घुम सकते थे, लेकिन मैने इस यात्रा को विस्तार देते हुए इसमें शिमला को भी जोड़ लिया और निर्णय लिया की हम लोग पहले अपने तरिके से शिमला घुमकर 19 तारिख को कैंप में शामिल हो जाएंगे, अत: 16 मई को रतलाम से अम्बाला के लिए स्वराज एक्स्प्रेस में सवार हो गए, ट्रैन का समय शाम 06.05 का था। ट्रैन आई और अपने तय समय पर चल पड़ी।

सुबह आठ बजे के लगभग ट्रैन अम्बाला पहुंची, हमें यहां से कालका पहुंचना था तथा वहां से कालका-शिमला टोय ट्रैन से शिमला। अम्बाला में दो घंटे के इन्तज़ार के बाद हमें कालका के लिये ट्रैन मिली जिसने हमें 11 बजे कालका पहुंचा दिया जहां से टोय ट्रैन (हिमालयन क्विन) 12.10 बजे थी।

अम्बाला रेल्वे स्टेशन

अम्बाला रेल्वे स्टेशन

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अम्बाला से कालका की ओर

जितनी उत्सुकता हमें हिमाचल घुमने की थी उतनी ही इस ट्रैन में सफ़र करने की भी थी क्योंकी वर्षों से इस विश्व विरासत ट्रैन तथा इसके रूट के बारे में पढते सुनते आ रहे थे।

कालका रेल्वे स्टेशन

कालका रेल्वे स्टेशन

कालका शिमला रेलवे का इतिहास:-
शिमला को रेल लिंक से जोड़ने का प्रस्ताव नवम्बर,1847 में प्रस्तुत किया गया जोकि भारतीय  उप महाद्वीप मुम्बई- थाने के मध्य प्रारंभ प्रथम रेलगाड़ी से भी 6 वर्ष पूर्व दिया गया था। इस पूर्वानुमान के दो दशक के भीतर शिमला को सरकारी तौर पर ब्रिटिश इंडिया की  ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किया गया तथा इस क्षेत्र में टेलीग्राफ सुविधा पहुंचने के साथ गर्मियों के दौरान लगभग एक चौथाई आबादी इस छोटे शहर की तरफ रूख करने लगी। 19वीं शताब्दी के अंतिम दौर में इस लाइन का कार्य जब पूरी तरह से आरंभ हुआ, विश्व के इस क्षेत्र के साधन सम्पन्न लोगों के लिए रेल यात्रा का आकर्षण निरंतर बढ़ता गया ।

ब्रिटिश शासन की ग्रीष्मकालीन राजधानी शिमला को कालका से जोड़ने के लिए 1896 में दिल्ली अंबाला कंपनी को इस रेलमार्ग के निर्माण की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। समुद्र तल से 656 मीटर की ऊंचाई पर स्थित कालका (हरियाणा) रेलवे स्टेशन को छोड़ने के बाद ट्रेन शिवालिक की पहाड़ियों के घुमावदार रास्ते से गुजरते हुए 2,076 मीटर ऊपर स्थित शिमला तक जाती है। 24 जुलाई 2008 को इसे युनेस्को द्वारा विश्व धरोहर घोषित किया गया।

दो फीट छह इंच की इस नैरो गेज लेन पर नौ नवंबर, १९०३ से आजतक रेल यातायात जारी है। कालका-शिमला रेलमार्ग में 103 सुरंगें और 869 पुल बने हुए हैं। इस मार्ग पर 919 घुमाव आते हैं, जिनमें से सबसे तीखे मोड़ पर ट्रेन 48 डिग्री के कोण पर घूमती है।

कर्नल बड़ोग की आत्महत्या की रोचक कहानी:-
सभवत: इस मार्ग में निर्मित सुरंगें व पुल इस लाइन को और अधिक महत्व देते है। सभी सुरंगें 1900 और 1903 के बीच बनी है और सबसे लम्बी सुरंग बड़ोग सुरंग है जोकि 1 कि.मी. से अधिक  लम्बी है। इस सुरंग के पिछे भी एक रोचक कहानी है, अंग्रेजों ने इस रेल ट्रैक पर जब काम शुरू किया तो एक स्थान पर एक बड़ी पहाड़ी की वजह से ट्रैक को आगे ले जाने में दिक्कतें आने लगीं, एक बार तो हालात यह बन गए कि अंग्रेजों ने इस ट्रैक को शिमला तक पहुंचाने का काम बीच में ही छोड़ने का मन बना लिया, फ़िर एक अंग्रेज ईंजिनीयर कर्नल एस. बड़ोग को इस कार्य के लिये नियुक्त किया गया। कर्नल बड़ोग ने अपने उच्च अधिकारियों से प्रशंसा पाने तथा कार्य को आसानी से तथा कम समय में पुर्ण करने की गरज से एक युक्ति अपनाई उन्होनें यह निर्णय लिया की पहाड़ी के दोनों सिरों से एक साथ खुदाई की जाएगी और फिर एक स्थान पर दोनों तरफ़ की सुरंगों के सिरे मिल जाएंगे और काम आसानी से तथा कम समय में पुरा हो जायेगा।

बड़ोग अपनी  अभीयांत्रिकिय गणनाओं के आधार पर मजदुरों को खुदाई के दिशा निर्देश देते रहे, लेकिन ईश्वर को कुछ और ही मंजुर था, उनकी सारी गणनाएं विफ़ल हो गईं और कई प्रयासों के बाद भी दोनों तरफ़ की सुरंगों के छोर आपस में नहीं मिल पाए। अत्यधिक प्रयास करने के बाद यह माना गया कि सुरंग के दोनों सिरे आपस में नही मिल पाएंगे। इस विफलता के लिए इंजीनियर कर्नल बड़ोग को जिम्मेदार ठहराया गया तथा दंड्स्वरूप उन पर 1 रूपये का जुर्माना किया गया। विफ़लता के दंश, बदनामी तथा कुंठा से परेशान होकर तथा कार्य की असफलता से हतोत्साहित होकर बड़ोग ने उसी अधुरी सुरंग के अंदर जाकर पहले अपने प्रिय पालतु कुत्ते तथा बाद में अपने आपको गोली मार ली। इसके पश्चात इस स्थान एवं स्टेशन तथा गांव का नाम उनके नाम पर बड़ोग रखा गया।

आज भी वर्तमान सुरंग से 1 कि.मी. ऊपर घने ओक एवं पाइन से घिरी इस असफ़ल सुरंग को देखा जा सकता है। कहते हैं की कर्नल बड़ोग का भूत आज भी यदा कदा इस पुरानी सुरंग के आसपास घुमते हुए दिखाई दे जाता है। कर्नल बड़ोग की आत्महत्या के बाद नई सुरंग का निर्माण कार्य उसी पहाड़ी पर एक किलोमीटर दुर अन्य स्थान पर मुख्य अभीयंता एच.एस. हैरिंगटन के पर्यवेक्षण में पुन: प्रारंभ किया गया जो पुर्णत: सफ़ल हुआ और आज ट्रैन इसी सुरंग से होकर गुजरती है।

बड़ोग स्टेशन

बड़ोग स्टेशन

वर्तमान बड़ोग सुरंग

वर्तमान बड़ोग सुरंग

पुरानी असफ़ल सुरंग

पुरानी असफ़ल सुरंग

लगभग सौ वर्ष पूर्व, यह दुर्गम क्षेत्र जहां पर मामूली कृषि कार्य किया जाता था, में उस समय कुछ परिवर्तन आया जब स्टीम द्वारा चलने वाले पाइल ड्राइवरों,फावड़ों,सुरंग खोदने वाले उपकरणों सहित कर्मचारियों को देखा गया। कालका-शिमला रेलवे लाइन का निर्माण संसार के सबसे चुनौतीपूर्ण इंजीनियरिंग कार्यों में से था क्योंकि जब यह पूर्ण होगा तो यह 96.54 कि.मी. पर्वतीय ट्रैक को कवर करेगा और कालका से 640 मीटर अति उष्णता से अधिक ठंड वाले क्षेत्र में स्वास्थ्यवर्ध्दक शिमला की ओर 2,060 मीटर की ऊंचाई तक जाएगा।

इस लाइन की उस समय निर्माण लागत 1,71,07,748 रूपये थी। इस लाइन को बनाना जितना मंहगा था इसका अनुरक्षण भी उतना ही मंहगा। टिनी कोचों के साथ टाँय ट्रेन कटी हुई झाड़ियों और तिरछी छतों के बीच से होकर गुजरती हैं। इस मार्ग में यात्रा करने का अपना ही सुखद अनुभव है और पर्वतीय क्षेत्र की इस यात्रा के प्रत्येक मोड़ पर एक नया अध्याय जुड़ता है। जैसे-जैसे गाड़ी आगे बढ़ती है, पार्श्व में इंजन की सीटी के साथ गाड़ी की आवाज गूंजती रहती है। यह लाइन भूरी पहाड़ियों, बांस, कैक्ट्स एवं उभरी हुए चट्टानों से होती हुई अलपाइन के वृक्षों के बीच से गुजरती हुई हिमालय की तलहटी तक पहुंचती है। लाइन के साथ-साथ झाड़ियां तथा पाइन वृक्ष बीच-बीच में दिखाई पड़ते है। लम्बी यात्रा के दौरान मनोहारी दृश्य निरंतर दिखते रहते है, शिमला से पहले के कुछ किलोमीटर यह ओक और रोडोडेंड्रन के घने जंगलों से होकर गुजरती है।

पहाड़ों का सीना चीरकर बनाया गया यह पर्वतीय रेल मार्ग सचमुच देखने लायक है, जीवन में कम से कम एक बार इस ट्रैन में बैठकर स्थापत्य कला के बेजोड़ नमुने इस रेल मार्ग का अनुभव हर किसी को अवश्य लेना चाहिये। 15 से 20 किलोमीटर प्रति घंटा की कछुए की रफ़्तार से चलने वाली इस ट्रैन में बैठकर आप हिमाचल के प्रारंभिक पर्वतों को करीब से तथा इत्मीनान से निहारने का मौका पा सकते हैं। यह ट्रैन कालका से शिमला के 96 किलोमीटर के सफ़र को 6 से 7 घंटे में तय करती है। वैसे टैक्सी या बस के द्वारा भी कालका से शिमला मात्र 3 घंटे में पहुंचा जा सकता है लेकिन फिर भी शिमला जाने वाले हर पर्यटक की इच्छा इसी ट्रैन से शिमला जाने की होती है और जिसे इस ट्रैन का टिकट मिल जाता है वह अपने आप को भाग्यशाली समझता है। मैनें भी इस रुट की एक टोय ट्रैन हिमालयन क्विन में रिजर्वेशन करवा लिया था।

तय समय पर ट्रैन कालका से चल पड़ी। यह एक पांच डिब्बों की छोटी सी चेयर कार ट्रैन थी जिसमें शीशे की बड़ी बड़ी खिड़कीयां विशेष रुप से पर्यटकों के द्रष्यावलोकन के लिये लगाई गईं हैं ताकी यात्री बाहर के खुबसूरत नज़ारों को बिना परेशानी के देख सकें।

पहली बार पहाड़ों पर जा रहे थे अत: मन में दो बातों की उत्सुकता थी की पहली यह की पहाड़ कब तथा कहां से शुरु होंगे और दुसरी यह की ठंडा मौसम कहां से शुरु हो जाएगा, क्योंकी कालका तक तो जमीन प्लेन ही थी और जबर्दस्त गर्मी भी लग रही थी।

खिलौना रेलगाड़ी

खिलौना रेलगाड़ी

कालका स्टेशन से चलने की तैयारी में

कालका स्टेशन से चलने की तैयारी में

थोड़ी सी पेट पूजा

थोड़ी सी पेट पूजा

खिलौना रेल अंदर से...

खिलौना रेल अंदर से…

शिमला पहुंचने का उत्साह...

शिमला पहुंचने का उत्साह…

शिमला पहुंचने का उत्साह... चल पड़ी रेल पहाड़ों की ओर...

चल पड़ी रेल पहाड़ों की ओर…

ट्रैन कालका स्टेशन से निकलकर शहर से होते हुए जा रही थी तभी कुछ दुरी तय करते ही अनुभव हो गया की पहाड़ कालका शहर से ही शुरु हो जाते हैं और कालका से निकलते ही ठंडी हवा के झोंके भी शुरु हो गए, खैर हम तो यह सोचकर ही रोमांचित हुए जा रहे थे की हम टोय ट्रैन में बैठकर शिमला जा रहे हैं।

कालका के बाद ट्रैन लगातार उंचाई पर चढती जा रही थी, न ढलान न समतल सिर्फ़ चढाई। मन में ढेर सारा रोमांच, हिमाचल में होने का एह्सास, छोटी सी खिलौना रेलगाड़ी, सुहावना मौसम, ठंडी हवाओं के झोंके, खुबसूरत वादियां, घुमावदार ट्रेक, हर दो मिनट के बाद एक सुरंग तथा कई सारे पुल, छोटे छोटे तथा सुंदर रेल्वे स्टेशन जो की आम रेल्वे स्टेशनों से एकदम अलग थे, आकर्षक तथा मनमोहक डिज़ाईनों में बने स्टेशन भवन सब कुछ इतना अच्छा लग रहा था जैसे ये हकीकत न होकर कोई सपना हो।

हमलोग तथा ट्रैन में सवार सभी सहयात्री इस सफ़र का भरपूर आनंद ले रहे थे, हर कोई इन अनमोल नज़ारों को अपने कैमरों में कैद कर लेना चाहता था, फोटोग्राफ़ी की तो जैसे होड़ लगी हुई थी। अभी तो शिमला दूर था, सोच रहे थे यहीं इतना सुंदर लग रहा है तो शिमला कैसा होगा?

पिछे छुटता कालका....

पिछे छुटता कालका….

चलती का नाम गाड़ी

चलती का नाम गाड़ी

पिछे छुटता कालका

पिछे छुटता कालका

घुमावदार सड़क

घुमावदार सड़क

कोटी स्टेशन तथा पिछे से झांकती सुरंग

कोटी स्टेशन तथा पिछे से झांकती सुरंग

मुसाफ़िरी का लुत्फ़

मुसाफ़िरी का लुत्फ़

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मुसाफ़िरी का लुत्फ़

ट्रैन के समानांतर सड़क

ट्रैन के समानांतर सड़क

ट्रैन से दिखाई देता एक पहाड़ी गांव तथा साथ साथ चलती सड़क

ट्रैन से दिखाई देता एक पहाड़ी गांव तथा साथ साथ चलती सड़क

सनवारा स्टेशन

सनवारा स्टेशन

सनवारा स्टेशन

सनवारा स्टेशन

विश्राम के क्षण

विश्राम के क्षण

घने जंगलों तथा पहाड़ों से गुजरती ट्रैन

घने जंगलों तथा पहाड़ों से गुजरती ट्रैन

ट्रैन रुकी और फोटोग्राफी शुरु

ट्रैन रुकी और फोटोग्राफी शुरु

सुहाना सफ़र और ये मौसम ह्सीं

सुहाना सफ़र और ये मौसम ह्सीं

सुहाना सफ़र और ये मौसम ह्सीं

सुहाना सफ़र और ये मौसम ह्सीं

एक अन्य स्टेशन

एक अन्य स्टेशन

बड़ोग

बड़ोग

ट्रैन से दिखाई देता सोलन शहर

ट्रैन से दिखाई देता सोलन शहर

आखिर शिमला पहुंच ही गए

आखिर शिमला पहुंच ही गए

कालका शिमला रेल्वे के मध्य आनेवाले स्टेशनों की सुची :

  0 किमी      कालका
  6 किमी      टकसाल
11 किमी      गुम्मन
17 किमी      कोटी
27 किमी     सनवारा
33 किमी     धर्मपुर
39 किमी     कुमारहट्टी
43 किमी     बड़ोग
47 किमी     सोलन
53 किमी     सलोगड़ा
59 किमी     कंडाघाट
65 किमी     कनोह
73 किमी     कैथलीघाट
78 किमी     शोघी
85 किमी     तारादेवी
90 किमी     टोटु (जतोग)
93 किमी     समर हिल
96 किमी     शिमला

इस खुबसूरत सफ़र का आनंद उठाते हुए शाम करीब 6.30 पर हम शिमला रेल्वे स्टेशन पर पहुंच गए. आगे की कहानी पढने तथा शिमला दर्शन के लिये इन्तज़ार किजीए अगले रविवार का……

आभार: जानकारी तथा कुछ चित्रों के लिये (www.ambalarail.com, wikipedia and google)

29 Comments

  • AJAY SHARMA says:

    Mukesh Bhai,
    So finally to the hills & what a great debut. Actually you were lucky to get a reservation in Himalayan Queen. I tried it so many times but always in vain however, by your courtesy I finally enjoyed the ride. While driving upto Shimla, the train often comes in scene & its mere sight is so sensational, you & kids must have had a great time enjoying the ride.

    As usual your log is very refreshing and informative. Too many photos make the log more meaningful. It is actually needed to fix too many genuine photos to improve the charm of a travelogue. Well done & keep going. Waiting to read your experience at the YHAI Camping expedition, eagerly.

    Keep traveling
    Ajay

    • Mukesh Bhalse says:

      Ajay ji,
      Thank you very much for your sweet words. It’s great to see your comment on my debut post after a couple of months. YHAI camp experience was awesome…..

      Thanks.

  • Naresh Sehgal says:

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  • h.l. singh says:

    pleased to read…. waiting for next..

  • Ritesh Gupta says:

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    • Mukesh Bhalse says:

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  • santosh kumar says:

    Very Interesting………..waiting for next

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    I think, Toy Train (Himalay Queen) time is 12.10.

    • Mukesh Bhalse says:

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  • Dear Mukesh Bhai,

    Great Photography and a beautiful write up. You refreshed the memories of my Honeymoon train journey by Shivalik Express from Kalka to Shimla. It was a great and memorable journey.

    Thank you for sharing this. I will wait for your coming log. Hope the same will be published before 06.07.2014. I will be on my Amarnath Yatra and summer tour to Ladakh from 06.07.14 to 20.07.14.

    • Mukesh Bhalse says:

      Dear Anupam,

      Thanks you very much for your lovely comment and words of appreciation. In our coach also there were 2-3 honeymoon couples and they were enjoying the beauty of surroundings and their togetherness.

      Best of luck for your Amarnath Yatra, may you get the darshan of almighty. Sorry for getting delayed in replying.

      Thanks.

  • Nandan Jha says:

    Long time Mukesh. Very happy to see your post on hills and after reading it, I faintly remember the conversation we had. Glad that you made it to hills and I can only say that you are going to keep coming back at it, such is the charm.

    When we took this train, it was more like a regular old-world train. I think there are multiple trains and the this one looks more suited for tourists with bigger windows.

    Didn’t know about Barog though we frequented a close-by place few years back. A relative had a house in Subathu and that was a big enough excuse to head out. You wont believe that I have not been to Himachal (if I do not count a special visit I did in 2013 July/Aug) for close to 4 years. I have not been to the Himalayan Expressway, Oh…

    Thanks again Mukesh for the lovely write-up.

    I think we could have optimized on the number of photos. One of them (leaving Kalka behind) seems like a duplicate. When you make the time-change of the train, please also review the pictures.

    When do we get to read the next part ?

    • Mukesh Bhalse says:

      Nandan,
      Thank you very much for the comment. Yes we finally made it, and you are right now fond of the hills and keep on talking about those snow capped mountains and that unforgettable charm of Himachal.

      I have already made necessary corrections in the post and also I am trying my best to reduce the photos from next post.

      Thanks,

  • Sandeep Bhatia says:

    Wow, makes me remember my many journeys by this train. Amazing

  • Avtar Singh says:

    Hi ????? ??

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    • Mukesh Bhalse says:

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  • rajesh priya says:

    Wah mukesh bhai wah Maza as gaya aur romanchit ho utha Jab revival hota hai purani yaado ka to romanchit Hona swabhavik hai.ek Baat main bhi Share karna chahunga kalka me kalka mail k aane ke baad mt. Shivalik train khulti hai.uske baad dusri train hai.us me ek ladies coach bhi lagta hai.puri train bhari thi aur mera reservations nahi that tabhi 2lady aaee aur lady coach guard se kahkar khulwaya.Maine wife aur bachcho ko bithaya par guard mujhe baithne nahi de raha tha tab mere request par mujhe soghi tak lady coach me baithne ki anumatee dee par main shimla tak usi me chala gaya.bahut achchha tour that ab jaa raha hoon aage padhne.

    • Mukesh Bhalse says:

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  • Umashankar Panchal says:

    MUKESH BHALSEJI

    NAMSTE,
    MAI UMSHANKAR PANCHAL ,98 KALANI NAGAR, INDORE ME RAHTA HU
    MUJHE BHI GHUMNE KA BAHUT SHOK HAI. MAIN BHI FAMILY KE SATH 11,MAY,2008 KO SHIMLA,KULLU MANALI KI YAATRA PER GAYA THA. AAPKA BLOG PAD KAR PHIR SE SHIMLA,KULLU MANALI GHUMNE KI ICHCHHA HO RAHI. MANLI BAHUT HI SUNDER HILL STATION HAI MAN KARTA THA KUCHH DIN AUR RUKNA CHAHIYE THA.PL.APKA MOBILE NO.
    DEEJIYE.

    MY MOBILE NO.9826420109

  • Mukesh Bhalse says:

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  • Pawan Nirban says:

    Dear Mukesh ji,

    I’m from Indore. It was indeed a great pleasure to read your blog. I was casually searching some info about Simla-Kullu-Manali tour & found your descriptive blog. Thanks for sharing such a interesting info in detail. Also thanks for introducing me with YHAI. I’ve submitted my application yesterday through on-line portal. I’ve noted down your mobile number & would like to call you once. In fact I’d like to meet you by this week end if possible.

    Thanks once again.

    Pawan Nirban

  • Nitin pure says:

    bhalse ji aapka number chahiye tha aapse baat krna thi bahut hi khubsurat varnan kiya aapne trip ka mja aagya

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