Mt. Abu – Sunset Point – Nakki Lake

December 22, 2012 By:

मित्रों, अभी तक आप पढ़ चुके हैं कि हम सहारनपुर से चल कर गाज़ियाबाद और फिर एयर डेक्कन के विमान से नई दिल्ली से उदयपुर पहुंचे ।  एयरपोर्ट से ही पांच दिनों के लिये एक टैक्सी ली जो हमें पांच दिनों में उदयपुर और माउंट आबू घुमा कर वापिस एयरपोर्ट पर ही छोड़ने वाली थी ।  शाम को ब्रह्मपोल के पास पिछोला झील के तट पर हमने होटल वंडर व्यू पैलेस में ठहरने का निश्चय किया और फिर शाम को सहेलियों की बाड़ी देखने गये, लौट कर आमेट हवेली के अंबराई रेस्टोरेंट में शाही अंदाज़ में भोजन किया ।  अगले दिन सुबह अंबा माता और जगदीश मंदिर के दर्शन करने के बाद हम उदयपुर से माउंट आबू के लिये निकल पड़े और दोपहर को ज्ञान सरोवर में आकर ठहर गये ।  ज्ञान सरोवर प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय का ही एक विशाल परिसर है जो माउंट आबू में स्थित है।   आइये, अब आगे चले चलते हैं !

सूर्य को हाथों में थाम लेने की चाह !

सूर्य को हाथों में थाम लेने की चाह !

शाम को साढ़े चार बजे हसीन का फोन आया कि वह और टैक्सी घूमने चलने के लिये तैयार हैं अतः हम पन्द्रह मिनट में अपनी बिल्डिंग के गेट पर आ जायें!  पहले Sunset Point पर चलेंगे और फिर नक्की लेक के आस-पास घूम सकेंगे!  मैने महिलाओं को बोल दिया कि सूर्य देवता सूर्यास्त के लिये हमारी प्रतीक्षा नहीं करने वाले हैं अतः मेक अप में ज्यादा समय व्यर्थ करना समझदारी नहीं होगी। बस, चल पड़ो !  बिना समय व्यर्थ किये हम टैक्सी में बैठे और ज्ञान सरोवर से, पता नहीं किस – किस सड़क से होते हुए उस बिन्दु पर पहुंच गये जहां से Sunset Point के लिये पैदल या बग्घी में जाना होता है।  लगातार चढ़ाई थी, पैदल चलने का हम चारों का ही मूड नहीं था अतः मन को ये बहलाते हुए कि पैदल पहुंचते पहुंचते तो सूर्यास्त हो जायेगा, दो बग्घी कर ली गईं और तीन – तीन लोग हमें धकेलते हुए Sunset Point पर ले गये।  रास्ते में उबले हुए भुट्टे खरीद कर टाइम-पास का जुगाड़ किया गया। अंत्याक्षरी के बारे में तो दुनिया जानती ही है कि समय बिताने की सामर्थ्य उस से बेहतर और किसी चीज़ में नहीं है, पर मूंगफली और भुट्टे भी समय बिताने के लिये उत्तम पदार्थ हैं।

जैसा कि अक्सर पहाड़ों पर व अन्य पर्यटन स्थलों पर खतरा रहता है, यहां भी फैंसी ड्रेस वाले हमारे पीछे पड़ गये कि राजस्थानी ड्रेस में फोटो खिंचवा लो जी!  एक बन्दे ने जब मेरी नाक के ठीक नीचे अपनी फोटो एल्बम घुसाई तो मैने उसे अपना कैमरा दिखाया कि भाई, हम तो खुद ही,  रिश्ते में तुम्हारे बाप लगते हैं !  तुम हमारी क्या फोटो खींचोगे ?  लाओ, हम तुम्हारी ही फोटो खींच दें। पर वह भी कम नहीं था ।  बोला, ड्रेस पहन कर आप अपने ही कैमरे से फोटो ले लो जी!  श्रीमती जी ने कहा कि चलो, जब इतना कह रहा है तो एक ड्रेस पहन लेती हूं, फोटो खींच लो !  यादगार रह जायेगी।

आगे बढ़े तो पहाड़ की चोटी पर ढेरों लोग ऐसी व्यग्रता से आसमान को निहार रहे थे जैसे जिन्दगी में कभी सूर्यास्त न देखा हो!  उनकी देखा देखी हमने भी व्यग्रता दिखानी शुरु कर दी।  मैने ऐसे ऐसे पोज़ बना कर फोटो खींचना शुरु किया कि बाकी सब लोगों ने भी हमारी देखादेखी वैसी ही हरकतें करनी शुरु कर दीं।

हमारी बग्घी को सनसेट प्वाइंट तक लेजाते एक दम्पत्ति !

हमारी बग्घी को सनसेट प्वाइंट तक लेजाते एक दम्पत्ति !

Route from Sunset Point to Nakki Lake

Route from Sunset Point to Nakki Lake

सूर्यास्त होगया तो मैने कहा कि चलो, खेल खतम, पैसा हज़म !  अब यहां से पैदल ही नीचे चलेंगे। लुढ़कते – लुढ़कते हम नीचे पहुंचे और टैक्सी में बैठ कर नक्की लेक की ओर चल दिये।  इससे पहले मैं 2003 और 2005 में भी माउंट आबू गया था।  वर्ष जून 2003 में तो नक्की लेक सूखी हुई मिली थी और उसमें हज़ारों मज़दूर पुरुष और महिलाएं तसले सिर पर लिये हुए घूम रहे थे।  (उस समय की खींची हुई एक फोटो भी सौभाग्य से मिल गयी है जो अपने पाठकों के सौभाग्य के लिये संलग्न किये दे रहा हूं ।)  परन्तु सौभाग्य से इस बार नक्की में भरपूर पानी था और नावों में लोग सवारी कर रहे थे।  हमने भी एक नाव ले ली जिसे पैडल बोट कहते हैं । बेचारे दो पुरुष पैडल मारते हुए नाव को आगे बढ़ाते हैं और पीछे दो बीवियां आराम से झील का नज़ारा देखती हुई चलती हैं।  संभवतः एक घंटे तक हम नक्की में यूं ही पैडल मारते घूमते रहे।  इस नक्की लेक के बारे में बहुत प्रचलित किंवदंती, जो अक्सर पढ़ने को मिलती है वह ये है कि देवताओं ने एक खूंखार राक्षस से बचने के लिये नख से धरती में झील बना डाली थी ।  यही नहीं, नक्की झील को लेकर एक और रोमांटिक कहानी रसिया बालम की भी चली आ रही है जिसने एक राजकुमारी से विवाह की लालसा में एक रात में ही आधा किलोमीटर लंबी और चौथाई किमी चौड़ी और २०-३० फीट गहरी झील खोद डाली थी।  हे भगवान, कैसे – कैसे राजा होते थे उस जमाने में!  मुनादी करा दी कि जो कोई एक रात में नक्की झील खोद देगा, उससे अपनी बिटिया का ब्याह रचा दूंगा ! सौभाग्य से इस झील को खोदने के बाद भी रसिया बालम फिर भी कुंवारा ही रहा क्योंकि राजा की घोषणा को रानी ने वीटो कर दिया।  राजा को रानी से डांट पड़ी सो अलग!

nakki lake without water

सूखी हुई नक्की झील में कार्य करते मज़दूर

 

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नक्की तट पर सुकून के दो पल !

नक्की झील में बोटिंग

नक्की झील में बोटिंग

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नक्की झील के तट पर स्थित फव्व्वारा

नक्की झील माउंट आबू के हृदय स्थल में स्थित है और यहां का प्रमुखतम आकर्षण है। माउंट आबू के बाज़ार मुख्यतः नक्की झील के आस-पास ही केन्द्रित हैं।  बात सही भी है, जब सारे टूरिस्ट नक्की पर ही आने हैं तो दुकान कहीं और खोलने का क्या लाभ?  एक और बड़ी विशेष जानकारी जो विकीपीडिया से प्राप्त हुई है, वह ये कि 12 फरवरी 1948 को यहां पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की अस्थियां विसर्जित की गई थीं और गांधी घाट का निर्माण किया गया था।  पर मुझे याद नहीं पड़ता कि हमने नक्की झील पर कहीं गांधी घाट के दर्शन किये हों!    सॉरी बापू !  अगली बार जायेंगे तो ऐसी गलती पुनः नहीं होगी!  नक्की झील के आस-पास के एक रेस्टोरेंट में भोजन लेकर (कहां, ये याद नहीं !  भोजन कैसा था, ये तो कतई याद नहीं)।  हम लोग वापिस ज्ञान सरोवर में आ पहुंचे और अपने – अपने कमरों में नींद के आगोश में समा गये।  (किसी इंसान के आगोश में समाने की तो वहां अनुमति भी नहीं थी !)

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बोट से नक्की झील में झिलमिलाते प्रकाश का एक दृश्य

अरे हां !  नक्की झील में बोटिंग करने के बाद हम पार्किंग पर आये तो हमारे ड्राइवर का चेहरा बहुत बुझा हुआ था।  अपनी आदत के विपरीत वह हंसी-मज़ाक भी नहीं कर रहा था।  मैने पूछा, क्या हो गया तो उसने बताया कि वह बहुत शर्मिन्दगी महसूस कर रहा है, पर उसे अपनी सास की तबियत बहुत खराब होने के कारण वापिस उदयपुर जाना पड़ रहा है।  हमारी तो हालत खराब !  हमने पूछा कि हमारा क्या होगा तो इस पर वह बोला कि आप लोगों का बाकी टूर बिल्कुल ऐसे का ऐसा ही चलता रहेगा।  एक दूसरी टैक्सी कल सुबह आप लोगों के लिये यहां हाज़िर हो जायेगी। उसका प्रबंध तो उसने कर दिया है अतः हमें उसकी चिन्ता करने की तो कतई आवश्यकता नहीं है पर वह अपनी सास को लेकर बहुत चिन्तित है और हो सकता है कि उसके उदयपुर पहुंचने से पहले ही वह अल्लाह को प्यारी हो जाये।  भाई साहब ने कहा कि इन दो दिनों में हमें तुम्हारा स्वभाव बहुत अच्छा लगा है।  तुम्हारी गाड़ी भी बिल्कुल ठीक – ठाक है।  दूसरा आदमी पता नहीं कौन हो, कैसा हो?  उसकी गाड़ी का भी पता नहीं, कैसी हो!  यह सुन कर हसीन ने जो बात कही, वह मैं जीवन भर भुला नहीं पाऊंगा !  वह बोला, “सर जी, आपको अगर मैं अच्छा लगा हूं तो दूसरा आदमी जो कल से आपके साथ रहेगा वह तो और भी अच्छा लगेगा।  उसका नाम बाबूराम है।  उसकी गाड़ी तो सिर्फ छः महीने पुरानी है।  आपको उसके साथ कोई भी तकलीफ नहीं होगी। वैसे भी वह आपके ही धर्म का है। मैं तो मुसलमान हूं।  सच तो ये है कि उदयपुर में आपको एक भी टैक्सी वाला खराब नहीं मिलेगा !  उदयपुर की यही तो खासियत है।  यहां के सब लोग आपको अच्छे और भले ही मिलेंगे।“  वाह, क्या बात कही थी उसने !   हसीन का अपने शहर और अपने शहर वासियों के प्रति यह सम्मान का भाव मुझे अन्दर तक छू गया।

ज्ञान सरोवर का प्रवेश द्वार !

ज्ञान सरोवर का प्रवेश द्वार !

माउंट आबू में घूमते हुए ये प्रतिमा कहीं दिखाई दी थी।

माउंट आबू में घूमते हुए ये प्रतिमा कहीं दिखाई दी थी।

कच्ची सब्ज़ी और फल आदि के लिये रैक

कच्ची सब्ज़ी और फल आदि के लिये रैक

रसोई में दाल सब्ज़ी आदि बनाने हेतु लगाई गई मशीनें

रसोई में दाल सब्ज़ी आदि बनाने हेतु लगाई गई मशीनें

नई जगह, नया कमरा, नया बिस्तरा !   सुबह जल्दी आंख खुल गई तो हम ज्ञान सरोवर में प्रातःकालीन कक्षा में पहुंच गये जो वहां के बड़े सभागार में नित्य होती है।  इस प्रातःकालीन कक्षा में योग और स्वास्थ्य पर एक चिकित्सिका बहिन का वचन था जो हमें बहुत उपयोगी लगा।  वहां से लौट कर आये, नहाये – धोये।  ज्ञान सरोवर में हर किसी को श्वेत परिधान में देखते देखते हम इतने अभ्यस्त हो गये थे कि सुबह श्रीमती जी और बड़ी दीदी जब अपने अपने कमरे से बाहर निकलीं तो एक दूसरे को देख कर हंस पड़ीं !  दोनों ने ही श्वेत परिधान धारण किये हुए थे।  दोनों ने आज के लिये सफेद सूट छांटने का एक ही कारण बताया – यहां सब महिलायें बिल्कुल चकाचक सफेद साड़ी पहने रहती हैं तो उनके बीच में रंग बिरंगे कपड़े पहने हुए घूमना विचित्र सा लग रहा था ।  अतः सोचा कि जहां तक संभव हो सके, हम भी सफेद कपड़े ही पहन लें।

टमाटर ही टमाटर

टमाटर ही टमाटर

नाश्ते का समय हो गया था अतः हम सब विशालकाय रसोई और भोजन कक्ष की ओर चल पड़े।  रास्ते में ज्ञान सरोवर की संचालिका बहिन जी मिलीं जिनसे कल आते ही परिचय हुआ था।  पूछने लगीं कि यहां कोई असुविधा तो नहीं हो रही है?  रात को सर्दी तो नहीं लगी?  आज कहां – कहां घूमने जायेंगे? आदि आदि ! जब हमने उनको बताया कि आज दिन भर माउंट आबू का स्थानीय भ्रमण करना है तो उन्होंने कहा कि अपने ड्राइवर से कहियेगा कि दोपहर १ बजे के लगभग वह आपको पांडव भवन ले आये ताकि आप उस समय वहां भोजन भी कर लें और पांडव भवन भी देख लें।  उनका ये अपनेपन का व्यवहार हमारी दोनों महिलाओं को भी बहुत अच्छा लगा।  हम लोग उस पहाड़ी रास्ते पर धीमे – धीमे बात करते करते भोजन कक्ष में पहुंच गये और वह एक अन्य बहिन जी के साथ बात करते हुए एक अन्य कक्ष की ओर चली गईं!

नाश्ता करके हम रसोई आदि की आश्चर्यजनक व्यवस्था देखते-भालते वापिस अपने कमरों की ओर आये तो हमें एक बिल्कुल नयी इंडिका टैक्सी और सांवला सा एक व्यक्ति हमारी प्रतीक्षा करते हुए मिले।  पूछा तो उसने बताया कि उसका नाम बाबू है और अब आने वाले तीन दिनों तक वह ही हमारे साथ रहेगा।  कमरे बन्द करके हमने टैक्सी से कहा कि माउंट आबू में जो कुछ भी देखने लायक है, वह सब आज देखेंगे और बीच में १ बजे पांडव भवन भी पहुंचना है क्योंकि हमें दोपहर का खाना वहीं पर खाना है।  शाम को दोबारा नक्की झील पर ही चलेंगे, बाज़ार घूमेंगे और रात को ज्ञान सरोवर में ही रुकेंगे और सुबह पांच बजे यहां से उदयपुर के लिये वापसी करेंगे।

About Sushant Singhal

Sushant Singhal has written 33 posts at Ghumakkar.

घुमक्कड़ी मुझे प्रिय है पर परिवार के साथ जैसी आराम तलबी वाली घुमक्कड़ी की जा सकती है, वही कर सकता हूं। ऊबड़ - खाबड़, खतरनाक, पहाड़ी रास्तों पर मोटर साइकिल लेकर निकल पड़ना इज़ नॉट माय कप ऑफ टी ! जहां भी जाता हूं, उस स्थान को, वहां के निवासियों को समझने की भी चेष्टा रहती है। घुमक्कड़ी के दौरान मेरा कैमरा मेरा सबसे विश्वसनीय साथी है। बहुत ज्यादा यात्राएं करने के लायक समय नहीं मिल पाया है ऐसे में उदयपुर, माउंट आबू, कश्मीर, मुंबई, हैदराबाद, गोवा, लखनऊ की यात्राओं के अतिरिक्त बताने लायक मेरे पोर्टफोलियो में कुछ नहीं है। लेखन और फोटोग्राफी मुख्य अभिरुचि हैं। पेशे से बैंकर हूं जहां मुझ पर मानव-संसाधन विकास विभाग, स्टाफ प्रशिक्षण केन्द्र और विपणन विभाग (HR, Staff Training Centre and Marketing departments) के सुचारु संचालन का दायित्व है। जन्म - देहरादून वर्ष 1958. पत्नी अध्यापन करती हैं, बड़ा पुत्र सॉफ्टवेयर इंजीनियर है और आजकल U.K. में है, छोटा अभी MBBS करके आगे की पढ़ाई कर रहा है।

33 Responses to “Mt. Abu – Sunset Point – Nakki Lake”


  1. SilentSoul says:

    थोड़ा लेट हो गया अत: continuity बनाने के लिये पिछला लेख दुबारा पढ़ना पढ़ा. मांउट आबू जाने का तो कभी मन नही किया पर रीतेश और फिर आपका आलेख पढ़ कर इसे भी विश-लिस्ट में डाल दिया. उदयपुर जाने का प्रोग्राम फाइनल था पर पहले तो रेलवे की टिकट नही मिली, फिर नंदन की सलाह पर बस से जाने का निर्णय किया पर दिल्ली के मशहूर मच्छरों ने प्रोग्राम वीटो कर दिया और 8 दिन बिस्तर पर रह कर वापिस आईसलैड आ गया. अब आपका लेख पढ़ कर पता लग रहा है कि क्या मिस कर दिया.

    ब्रह्म-कुमारियों की दादी जी यहां नवम्बर में आई थी व उनसे व्यक्तिगत मुलाकात हुई, इनकी एक शिवानी टीवी पर आती है और शायद पहली महिला है जो आध्यत्म में इतनी गहरी जानकारी रखती है.

    अपने कमरों में नींद के आगोश में समा गये। (किसी इंसान के आगोश में समाने की तो वहां अनुमति भी नहीं थी !)— क्यों ???

    • प्रिय साइलेंट सोल,

      इससे पहले कि मच्छर हमें काट सकें, हमें मच्छरों को काट खाना चाहिये ! सो मारे सो मीर ! उदयपुर – माउंट आबू संभवतः आपको भी अच्छे लगेंगे ! वैसे मैं कुएं का मेंढक हूं ! ज्यादा जगह देखी ही नहीं, जो देखीं सो उनमें उदयपुर मुझे बहुत प्रिय लगी।

      वर्ष 2003 में माउंट आबू में एक शिविर में भाग लेने के लिये सहारनपुर सेवा केन्द्र ने मुझे आमंत्रित किया था। पहले दिन, पहले सत्र में पहला – पहला बौद्धिक एक ऊषा बहिन जी का हुआ! उनकी वक्तृता के हम सभी दीवाने हो गये और जब अगले सत्र में और कोई महिला बौद्धिक के लिये आकर बैठीं तो हमें बड़ी निराशा हुई क्योंकि हम तो ऊषा बहिन जी को ही सुनना चाहते थे। पर जब उन्होंने बोलना शुरु किया तो लगा कि ये तो शायद ऊषा बहिन जी से भी दो कदम आगे हैं। जैसे उदयपुर में सारे टैक्सीवाले बढ़िया हैं, वैसे ही ब्रह्माकुमारी मुख्यालय माउंट आबू में सारे के सारे वक्ता एक से एक हैं। शिवानी बहिन भी बहुत विद्वान हैं परन्तु उनसे जूनियर हैं जिनको हम वहां पर सुनते थे।

      आपके तीन प्रश्नवाचक चिह्न के उत्तर में मैं यही कहूंगा कि ब्रह्मचर्य ब्रह्माकुमारी परिसर में रहने की पहली शर्त है। वह तो यह चाहते हैं कि पुरुष और महिलाएं एक कमरे में सोयें ही नहीं ! शायद हमारी ऊम्र का लिहाज कर गये इसलिये हम पर ऐसा बंधन चस्पां नहीं किया। आगे हमारी ईमानदारी !!! :D

      • D.L.Narayan says:

        “वैसे मैं कुएं का मेंढक हूं ! ज्यादा जगह देखी ही नहीं”….It is not necessary to travel a lot, it is more important to observe and analyse. Immanuel Kant, the great German philosopher who defined the limits of human reasoning, never travelled more than 100 kilometres from Konisberg, his birthplace. You belong to the category of individuals who do not need to travel to know the world.

        • Dear DL,

          If I am ever approached by our Prime Minister requesting me to suggest a Public Relations Man of highest calibre, I would recommend your name. :D I am afraid, you are spoiling me by saying such a lovely things about me.

  2. D.L.Narayan says:

    Thanks, Sushant, for giving us yet another enjoyable post.

    I liked Haseen’s honesty but I do not agree with his comment that religion matters (वैसे भी वह आपके ही धर्म का है). What matters is how good that person is, not his religious beliefs. It also felt great that the people of Shergaon still remember and value their association with the great Maharana Pratap. Sad that they are not giving enough prominence to their association with Mahatma Gandhi.

    The picture of reaching out for the sun reminded me of Lord Hanuman who tried to swallow the sun in his childhood. As always, there is plenty of humour but what I liked most was your comment about embracing sleep since other types of embracing were proscribed in the Gyan Sarovar.

    Above all, I liked the gateway to Gyan Sarovar proclaiming that it is an academy “for a better world”. How thought provoking. Shouldn’t everything that humans do ultimately have that aim in mind? For a better world. Ghumakkari too is striving to make the world a better place since it opens our minds, expands our vision and transforms us into better human beings.

    • Thank u DL for quick response and liking the post.

      I am not being able to schedule my posts in quick succession because bookings have already been done upto January end. So, continuity is lost even for me sometimes. (This is FAO SilentSoul !).

      I feel that after Mahatma’s departure, there are many who use Gandhi’s name for their electoral fortune. Some have even adopted it as their surname even though there is absolutely nothing in history to connect them to Gandhi’s bloodline. However, there are no true followers of Mahatma. I have seen an organisation that has adopted many of Mahatma’s principles in letter and spirit but ironically, the organisation is charged of assassination of Mahatma by those who claim to be Mahatma’s disciples but in their heart of hearts were glad to find him suddenly liquidated one bright sunny morning.

      I had securely held her when my wife was reaching out to Sun. What use of me she would have been with a Hanuman-like chin? :D

      Gyan Sarovar has 18 wings based on different professions. They truely feel that all vocations are equally important and each of us can contribute in his own way in the task of nation building. Therefore, they organise seminars on regular basis for media, engineers, doctors, scientists, transporters, businessmen, industrialists, students etc. etc. They are trying their best to secure a better world for the coming generations. They do not encourage blind faith. Instead, they want deliberations, exchange of ideas but not in the manner as we see in Vidhan Sabha and Sansad. No uprooting of mikes, slogan-shouting, beating while exchanging views! :D Even if one disagrees with them, they would want it be said sweetly and in a dignified manner.

    • This is what Haseen had thought (that we would feel more comfortable with a driver belonging to our own religion) but Babu proved to be a neutral person. He didn’t try to mix up with us too much nor did we. He just did his job well. Was neither a great company nor a nuisance.

  3. JATDEVTA says:

    सुसांत अरे नहीं फ़िर से डाँट पड़ेगी बाप्पू कहेंगे कि मेरे लाड़ले छोरे का नाम बिगाड़ दिया। चलो जी सुधार करते है सुशान्त जी ठीक है ना अब तो, लेख तो पूर्व के लेखों की तरफ़ मस्त, अपनी स्टाईल में बिन्दास लिखते हो।

    एक बात समझ नहीं आयी कि जब आप लुढकते-लुढ़कते नीचे तक आये थे तो ज्यादा चोट-खरोंच जैसा कुछ हुआ तो नहीं था।

    आखिर में सबसे जरुरी बात आपने कांग्रेस पार्टी के पिता मोहनदास कर्मचन्द गाँधी को राष्ट्रपिता लिखा है, शायद आपको पता ना हो कि भारत सरकार ने एक आरटीआई के जवाब में कहा है ऐसी कोई उपाधी इन्हें नहीं दी गयी है।

    • हे जाट देवता जी,

      सबसे पहली बात तो ये कि अब मेरे बाप्पू इस दुनिया में नहीं हैं अतः अब तो मैं आप मित्र लोगों के सहारे ही हूं ! आप मुझे जिस नाम से भी पुकारना चाहो, पुकारो – वह कुछ नहीं कहेंगे! लुढ़कते हुए हम जरूर आये थे जैसा कि ढलवां सड़क पर तेजी से चलते हुए लगता है पर थे हम अपने पैरों पर ही। अतः चोट-खरोंच तो आपकी शुभकामना के कारण कुछ नहीं आये।

      राष्ट्रपिता की उपाधि सरकार ने भले ही न दी हो, मैने तो दे ही दी है। आपको जाट देवता की उपाधि कौन सा भारत सरकार ने दी है? है ना?

  4. D.L.Narayan says:

    ” आपको जाट देवता की उपाधि कौन सा भारत सरकार ने दी है? “……वाह सुशांत जी, तुस्सी ग्रेट हो। मैंने सोचा था की जाट देवता का मुकाबला करना मुश्किल ही नहीं, ना मुमकिन है। आप ने तो अनहोनी को अनहोनी कर दिया है।

    • D.L.Narayan says:

      अनहोनी को होनी कर दिया।..sorry for the error.

      • JATDEVTA says:

        नाराय़ण जी आपने बिल्कुल सही कहा, सुसान्त जी ने तो अनहोनी को होनी कर दिया है क्योंकि सुसान्त जी ने अपने जन्म लेने से पहले ही गाँधी को राष्ट्रपिता बना दिया था। (वाह सुशांत जी, तुस्सी ग्रेट हो। नाराय़ण जी की लाईन कोपी पेस्ट)
        गाँधी को पहली बार, आजादी वाले दिन या उनकी मौत वाले दिन यह उच्चारण कर बोला गया था। अगर किसी को इस बारे में कुछ और जानकारी हो तो जरुर बताये।

        • D.L.Narayan says:

          संदीप जी, मोहनदास करमचंद गाँधी को हमारी सरकार से या संविधान से राष्ट्रपिता का खिताब नहीं मिला। उनको यह खिताब पहली बार सन 1944 में नेताजी सुभास चन्द्र बोस ने दिया था। अगर आप पूछेंगे की सुभास बोस को नेताजी किसने बनाया, तो मुझे कहना पड़ेगा की वोह शख्स खुद गांधीजी थे।

        • धन्यवाद शंदिप, शुक्र है कि आपने एक लाइन DL के कमेंट से कॉपी कर के पेस्ट कर दी ! कम से कम एक बार तो मेरा नाम सही लिखा गया ! अब जब तक आप मेरा नाम सही लिखना नहीं सीख लेंगे, आपका नाम शंदिप ही रहेगा। यह इस दुर्वासा ऋषि का वचन है।

        • शंदिप, आपने शायद कहीं पढ़ा या सुना हो, लोगों को मरणोपरांत भी उपाधियां दी जाती हैं ! खास तौर पर परमवीर चक्र का तो मुझे याद है, यह उपाधि बहुत लोगों को मरणोपरांत मिली है। कैप्टन हमीद की कहानी तो हमने स्कूल की किताब में भी पढ़ी थी। ऐसे में मैं महात्मा गांधी को उनके मरणोपरांत राष्ट्रपिता की उपाधि क्यों नहीं दे सकता? फिलहाल मैं तो जिन्दा हूं ही ना ?

  5. Surinder Sharma says:

    Sushant Ji,

    Your writing so good. Very informative information about Bramhkumari. I just saw Abu Road station, Tea and Rubery was famous there. Will waiting for your next post.

    Regards

    • Dear Sharma Ji,

      Thanks for liking the post. Much more is to come. Please do maintain your gracious company. What is Rubery?

      • Surinder Sharma says:

        माफ़ी चाहूँगा, रबड़ी इंग्लिश में ठीक पढ़ा नहीं गया . रबड़ी दूध को गरम करने पर बनती है, जरा रस मलाई ट्राई करें।

        धन्यवाद

        • Dear Surinder Sharma Ji,

          Wow! Rabri ! Ras Malai !!! ये ही तो अंग्रेज़ी की वीकनेस है ! रबड़ी लिखो तो राबड़ी देवी भी पढ़ा जा सकता है। हां जी, हमें मालूम है कि रबड़ी दूध को पका पका कर बनती है और अगर गैस बन्द करनी भूल जाओ तो कुछ ही देर में मावा बन जाती है। बाकी बातें बाद में, पहले रसमलाई खाकर आता हूं !

  6. Ritesh gupta says:

    nice post & pics too. I have remember every moment of my journey..,,
    tnx

  7. Ritesh gupta says:

    have you seen Dilwara temple, Guru Shikhar & Arbuda maa temple?

  8. Manish Kumar says:

    क्या आप गुरु शिखर नहीं गए? माउंट आबू के सबसे हसीन नज़ारे तो वहीं से दिखाई देते हैं।

  9. सुशांत जी

    इस बात अपर तो कोई शक नहीं कि आपका वर्णन बहुत ऊंचे स्थर पर है . फूट दूत कर लिखना तो कोई आपसे सीखे साहब. दूसरी बात क्या आप गुरुशिखर और देलवाडा मंदिर नहीं गए. मैं कुछ १९८६ या ८७ में गया था जब में केवल १० साल का था. लेकिन आज भी मुझे बराबर यह दोनों जगह याद है क्यूंकि दोनों जगह कि बात ही कुछ और है . देलवाडा जैसी हस्तकला मैंने आज तक नहीं देखी कही भी इन २५ सालो में .

    • प्रिय विशाल,

      आपको और घुमक्कड़ पर अन्य मित्रों को मेरे पोस्ट अच्छे लगते हैं, यह विचार ही तो मुझे प्रेरित करता है कि आगे भी लिखता रहूं। आपकी इस बार की सीता माता वाली पोस्ट तो वाकई गज़ब है। कहां – कहां से ढूंढ कर लाते हो आप ऐसे दर्शनीय स्थल। सीता माता का चित्र और उनके चेहरे पर उदासी देख कर तो वाकई मन न जाने कैसा हो उठा।

      आप हिन्दी किसी विशेष टूल की सहायता से लिख रहे हो क्या?

      • google se likhtaa hoon kyun sir jee ??

        • Dear Vishal,

          Greetings of the day. I asked this simply because google cannot fully understand the exact characters to be used in forming a word. After all, it is a machine + software.

          If I don’t know how to spell ‘physical’, I may end up writing fizzikal. For ‘quality’ I could use ‘kwaliti’ and so on…. Every language has its own stardardised forms of spellings and a software has to be extra-ordinarily brilliant like a human being to understand all these intricacies.

          I use Google Hindi Input Transliteration + Baraha 7.0 to make my keyboard bilingual. So, in case, you do wish to write in Hindi, you may try these. Baraha 7.0 (freeware is no more available but I may be able to send the zip file to you if email software doesn’t block it.)

          • Sushant jee

            anyways I hate writing in hindi as it is very tedious for me to write . my spellings are also not so accurate and nowadays I am busy so I write very fast and am not bothered what I have written is correct or not. Only the meaning should be understood by the person to whom it is written that is all. That is my goal.
            Thanks

    • Dear Vishal,

      “Anyways I hate writing in Hindi as it is very tedious….” I am afraid “hate” is a very strong word which we should not use for expressing our feelings for a language. I remember my school days when upto 9th standard, I “hated” English. My late father, sensing my difficulties, took extra pains to teach me English. Within a few months, the feeling of “hate” was replaced with feelings of “love”. :D

      Sushant

  10. सुशांत जी आप के लेख पड़ता हूँ तो लगता है आप सामने बैठ कर ही मुझे बता रहे हैं इतना बढ़िया और रोचक लिखा है आपने यह पोस्ट।
    नक्की झील के पानी के बगैर फोटो देख कर मैं हैरान हूँ, क्योके मैं जब भी गया हूँ वह पानी से लबालब भरी थी। सूर्यास्त को हाथ से पकड़ने की फोटो अध्भुत है।

  11. Mukesh Bhalse says:

    सुशांत जी,
    बहुत सुन्दर लेख तथा उम्दा तस्वीरें ……………..मैं तो हमेशा से ही आपके लेखन का मुरीद रहा हूँ अतः आपकी प्रशंसा करना तो सूरज को दिया दिखाने जैसा है।

    बहुत खूब …………..

  12. Nandan Jha says:

    सुशांत जी ,
    हसन के बिछड़ने पर दुःख है, क्या हुआ सासू माँ का ? उनकी शुक्रगुजारी की दुआ करते हुए यही कहूँगा की हसन जैसे सभी टैक्सी वाले हो जाए तो हम लोग कहीं से कहीं पहुँच जायेंगे (इस लाइन का लिटरेरी मतलब न निकलें वरना अर्थ का अनर्थ हो जाएगा, फिग्रतिव मतलब पढ़ें) ।

    आप जब लेख की शुरुआत करतें हैं तो थोडा सा सन्दर्भ देतें हैं, इससे पढने वालों को बहुत सुविधा रहती है । शायद सभी लेखकों को इससे लाभ होगा । अस्तु । लेख के बारे में मेरे विचार मुकेश भाई से सहमत है ।
    12 बजे का स्लॉट सम्पादकीय मंडल के पास है, तो अगर डेट्स की दिक्कत है तो मुझे संपर्क करें, मेरी अन्दर सेटिंग हैं । जय हिन्द ।

  13. Nirdesh says:

    Dear Sushantji,

    The post brings back memories from my visit to Mount Abu this February.

    It is a joy to read your travelogues.

    I hope you got to see the unbelievable Dilwara Temples.



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