मांडू दर्शन भालसे परिवार के संग

प्रिय मित्रों,

इतना तो आप जान ही चुके हैं कि दि. 14 फरवरी को मैं सहारनपुर से अपने बैंक की इन्दौर और धार शाखाओं के ’निरीक्षण-परीक्षण’ के लिये निकला था और 15 फरवरी को सुबह इन्दौर पहुंचा। बसंतपंचमी को धार में सांप्रदायिक तनाव हो जाने के कारण मुझे धार में प्रवेश की अनुमति नहीं मिली तो मैं इन्दौर में ही ठहर गया। अगले दिन यानि 16 फरवरी शनिवार को बैंक के बाद मैं अपने एक स्टाफ सदस्य के साथ बस से घाटाबिल्लोद के लिये निकला क्योंकि हमारा सर्वप्रिय भालसे परिवार वहां मेरी प्रतीक्षा में था। भरत मिलाप का दृश्य भी आप देख चुके हैं, अगले दिन यानि, 17 फरवरी को हम सब मुकेश भालसे की कार में मांडू में सपरिवार पिकनिक मनाने के लिये सुबह 9 बजे के लगभग निकल पड़े।

मांडू, मांडवगढ़, शादियाबाद, City of Joy – कई सारे नामों से प्रसिद्ध इस ऐतिहासिक दुर्ग नगरी के बारे में मेरी पूर्व जानकारी लगभग शून्य ही थी पर नन्दन झा ने ई-मेल के माध्यम से मुझे प्रेरित किया था कि धार तक जाकर भी यदि मांडू नहीं देखा तो “उनसे बुरा कोई न होगा!” मुकेश भालसे मांडू दर्शन पहले भी कर चुके थे पर दोबारा जाने के लिये भी जबरदस्त उत्साह में थे। वह जितने जोर-शोर से मांडू दर्शन के लिये मुझे प्रोत्साहित कर रहे थे, उसे देख कर मैं भी मांडू देखने के लिये उत्सुकता के मारे मरा जा रहा था।

DSC_2822जब एक नितान्त ’अपरिचित’ भालसे परिवार ने नितान्त अपरिचित सेजवाया – धार – मांडू मार्ग पर ले चलने के लिये, मेरे लिये नितान्त अपरिचित शेवरले स्पार्क कार की चाबियां (और अपनी जान) मेरे हाथों में सौंप दी तो मैं अपनी उत्सुकता को काबू में रखते हुए, सामान्य गति से कार ड्राइव करते हुए मांडू की ओर बढ़ चला। कार में, जैसा कि नितान्त स्वाभाविक ही है, शिव स्तुति की सी.डी. चल रही थी क्योंकि संपूर्ण भालसे परिवार भगवान शिव का परम भक्त है। (इन्दौर को भी भगवान शिव की ही नगरी माना जाता है।) सेजवाया से जरा सा चलते ही (जहां मुकेश मुझे अपने साथ मंदिर लेकर गये थे), बायें ओर को रास्ता जा रहा था जो धार के लिये था। सड़क कहीं बहुत शानदार तो कहीं-कहीं ऐसी कि गढ्ढों में से सड़क ढूंढ-ढूंढ कर निकालनी पड़े। धार शहर में प्रवेश से कुछ पहले ही बाईं ओर को जाने के लिये एक संकेतक मिला जिस पर लिखा था – City of Joy! बाईं ओर जा रही इस सड़क पर आगे बढ़े तो सड़क पर कई किमी दूर तक रोड़ियां यानि, नुकीले पत्थर बिछे हुए देख कर मेरा दिल मुकेश जी की कार के लिये जार-जार रोने लगा। इन पत्थरों के ऊपर से कार लेजानी पड़ेगी, यह कल्पना ही मेरे लिये असह्य थी। मैने कहा भी कि छोड़िये, घर वापिस चलते हैं। पर मुकेश ने सीट की अदला-बदली कर के स्टीयरिंग खुद संभाल लिया और उन पत्थरों पर ही गाड़ी दौड़ा दी। संभवतः दो किमी चल कर सामान्य सड़क आई तो मुझे भी एहसास हुआ कि मैं इतनी देर से कुंभक प्राणायाम की मुद्रा अपनाये हुए था। श्वास की गति सामान्य हुई तो मैने अपने कैमरे को बैग से निकाल लिया। इस स्थान से मांडू लगभग 28-30 किमी दूर था। मैने सड़क पर दो-एक स्थान पर फोटो खींचने के लिये गाड़ी की गति धीमी करने के लिये कहा तो मुकेश ने गाड़ी रोक दी और कहा कि निश्चिंत होकर फोटो खींचिये पर ये ध्यान रखिये कि मांडू में इतनी फोटो खींचने को मिलेंगी कि बस! ऐसा न हो कि आपका मैमोरी कार्ड और बैटरी वहां पहुंचने से पहले ही निबट लें।

Getting Pakode for the journey to Mandu.

Getting Pakode for the journey to Mandu.

Some temple on our way to Mandu.

Some temple on our way to Mandu.

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ये भी खा कर देख लिये जायें?

ये भी खा कर देख लिये जायें?

कुछ किमी आगे बढ़े तो एक स्थान पर कई सारी कारें खड़ी हुई दिखाई दीं। सड़क के बाईं ओर विशालकाय चट्टानें और उनके बीच में खाई ! बड़ा मनोरंजक दृश्य था। कार रोक कर हम भी बाकी लोगों की तरह चट्टानों और खाई के मध्य झांक-तांक करने लगे। मुकेश ने तो धनुष – बाण भी हाथ में ले लिये पर निशाना कैसा लगाया, यह उनसे ही पूछियेगा। पन्द्रह – बीस मिनट तक सारे निशाने गलत-सलत लगा कर हम एकलव्य को शर्मिन्दा करते हुए थोड़ा सा ही आगे बढ़े तो बाईं ओर डायनासोर के कुछ मॉडल इत्यादि भी दिखाई दिये जो पन्द्रह-बीस फीट ऊंचे रहे होंगे। निश्चय ही, यह बच्चों के लिये कोई पार्क रहा होगा। पर हमारी कार में बैठे बच्चों ने भी लक्ष्य से भटकने में कोई रुचि नहीं दिखाई अतः हम सीधे चलते चले गये। मांडू नज़दीक आने लगा तो हमें थोड़ी – थोड़ी दूरी पर लगभग 15 से 20 फीट वर्गाकार भूमि पर लगभग इतनी ही ऊंचाई वाली गुम्बद नुमा आकृतियां दिखाई देने लगी थीं जिनके बारे में हमारे गाइड महोदय, यानि मुकेश भालसे ने बताया कि पुराने जमाने में संदेश को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने के लिये इनका उपयोग होता था। जहां तक मुझे याद है, उन्होंने बताया था कि हर 200 फीट पर यह भवन बने हुए हैं और ये संदेशों को आदान-प्रदान करने के लिये रिले स्टेशन हुआ करते थे। जैसे माइक्रोवेव टॉवर सिग्नल रिपीट करती हैं, इन रिले स्टेशन में मौजूद संदेश वाहक बिना अपनी जगह से हिले, संदेश को आगे रिले कर दिया करते थे।

Remains of a relay station.

Remains of a relay station.

One more gate for entry into Mandu.

One more gate for entry into Mandu.

One of 12 gates permitting access to Mandu Fort. The roof has gone.

One of 12 gates permitting access to Mandu Fort. The roof has gone.

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मांडू जाने के लिये सर्वश्रेष्ठ समय मानसून के बाद का बताया जाता है क्योंकि उस समय वहां का प्राकृतिक सौन्दर्य अपने सर्वोत्तम निखार पर होता है। ढेरों झरने और प्राकृतिक जल – प्रपात चालू हो जाते हैं। बकौल जहांगीर (अरे वही, अपने बादशाह जहांगीर!), “हरे भरे दूर्वादल और वनपुष्पों में बिखरे प्रकृति के असीम सौन्दर्य को व्यक्त करने की शक्ति मेरे शब्दों में नहीं है, प्रत्येक पहाड़ी और घाटी, प्रत्येक ढाल और मैदान उनसे आच्छादित है, वर्षा ऋतु में मांडू के समान जलवायु वाला सुहावना अन्य कोई स्थल मेरे देखने में नहीं आया। अभी तक जो कुछ मैने देखा है, वह मांडू के सौन्दर्य का एक छोटा सा अंश मात्र ही है।” जब बादशाह जहांगीर के मांडू के बारे में इतने उत्तम विचार पढ़ने को मिलते हैं तो आप सहज ही कल्पना कर सकते हैं कि मांडू कैसा रहा होगा। मांडू में इंजीनियर के रूप में कार्य करते रहे आर.बी. देशपांडे लिखते हैं –

“यह कल्पना ही की जा सकती है कि 350 सालों तक मानवीय तिरस्कार और काल के थपेड़े सहने के बाद इस दुर्ग और इसके महलों व भवनों की क्या दुर्दशा हो चुकी होगी। जब पन्द्रहवीं शताब्दी में मांडवगढ़ दुर्ग अपने पूरे यौवन पर था पर उसमें क्या – क्या था? 12000 एकड़ भूमि पर 560 कृषि योग्य भूखंड, 370 बगीचे, 200 कुएं, 780 नहरें व तालाब, 200 बाज़ार वाली सड़कें, 1500 आवासीय भवन, 200 अतिथिगृह, 260 हमाम, 470 मस्जिदें और 380 महल।

मांडू नगरी के भव्य स्वरूप का कुछ- कुछ अंदाज़ कर पा रहे हैं आप? एशिया का सबसे बड़ा दुर्ग कहलाने का सौभाग्य मांडवगढ़ को ही प्राप्त है जो पूर्व से पश्चिम की ओर 8 से 9 किमी और उत्तर से दक्षिण की ओर 6 से 7 किमी में फैला हुआ है। संपूर्ण दुर्ग की परिधि लगभग 23 किमी है जो विध्याचल पर्वत के दक्षिण छोर पर समुद्रतल से 633.7 मीटर ऊंचाई पर स्थित है। वैसे मैने यह ऊंचाई खुद नहीं नापी है, पर हमारी कार को काफी चढ़ाई चढ़ते हुए दुर्ग में प्रवेश करना पड़ा था अतः मुझे लगता है कि इतनी ऊंचाई वाली बात सही ही होगी। पहाड़ी रास्ते पर कुछ ’द्वार’ भी दिखाई दिये पर जिस दीवार पर यह दरवाज़े बनाये गये होंगे, वह अधिकांशतः लुप्त हो चुकी थी। बताया जाता है कि मांडू में प्रवेश हेतु ऐसे 12 प्रवेश द्वार हुआ करते थे। अवश्य होंगे, पर हमें तो एक कमानी दरवाज़ा, एक भंगी दरवाज़ा और शायद एक आध और दरवाज़ा दिखाई दिया। 25 से 30 फीट ऊंची दीवार से सुरक्षित दुर्ग के बाहर जो जंगल था वह बाघ, शेर, चीते जैसे हिंस्र पशुओं का आवास स्थल था और ये हिंस्र पशु राजा-महाराजाओं और बादशाहों और बेगमों के लिये शिकार की प्रेक्टिस करने का सुअवसर प्रदान किया करते थे। शिकार की प्रेक्टिस के नाम पर याद आया, मांडू में हमें एक अशर्फी महल मिला था जो मूलतः एक संस्कृत विश्वविद्यालय था और छ्टीं-सातवीं शताब्दी में महाराजा हर्षवर्द्धन द्वारा बनाया गया था। अगर आपको यकीन न हो तो चीनी यात्री ह्वेनसांग से पूछ लीजिये, जिसने इस महाविद्यालय की स्थापना में महाराजा हर्षवर्द्धन की सहायता की थी। बिड़ला विलेज ग्रुप में की गई खुदाई में मिले ताम्रपत्र से इस तथ्य की भी पुष्टि होती है कि गोविन्द भट्टाचार्य इस विश्वविद्यालय के कुलपति रहे हैं।

खैर, इस संस्कृत विश्वविद्यालय का नाम अशर्फी महल क्यों कर पड़ गया, इसके बारे में मैने दो कहानियां सुनी हैं – एक उस गाइड के मुंह से जो मुकेश भालसे ने मांडू दर्शन कराने के लिये तय किया था। उस गाइड के अनुसार, “मुगल बादशाह जहांगीर की बेगम बहुत ज्यादा प्रेगनेंट थी और अशर्फी महल की सीढ़ियां चढ़ने में आनाकानी कर रही थी । इसके लिये बादशाह ने प्रत्येक सीढ़ी पर चढ़ने के लिये बेगम पर अशर्फी लुटाने का वायदा किया। अशर्फी के लालच में बेगम अपनी प्रेगनेंसी को भुला कर सीढ़ियां चढ़ती चली गई।” दूसरी कहानी आर. बी. देशपांडे अपनी पुस्तक “Glimpses of Mandu: Past and Present” में उद्धृत करते हैं, जो वास्तव में बादशाह जहांगीर की मुंह जबानी है –

On Monday, the 23rd of Ispandad the last month of the Persian year, when one quarter of the day had passed, I mounted my elephant, and in good fortune and under kindly influences, made my happy entry into the Fort of Mandu. About an hour (three ghadis) later, I entered the quarters which had been prepared to receive me. During my passage across the hill top, I scattered Rs. 1,500. Before my arrival, Abdul Karim the Engineer, had been sent by me to repair the building of the former kings of Mandu. While my fortunate standards were at Ajmer, Abdul Karim repaired such of the old Mandu buildings as were fit to be repaired and built others. ……”

Regarding his shooting expedition he says, “On the 4th of the first month of Farwardah (16th March) the watchman of the chase brought word that they had marked down a lion near the Sagar Lake which is a construction of the ancient Hindu rulars of Mandu. I mounted and proceeded towards the Lake. When the lion broke over, he attacked and wounded ten or twelve of the Abadis and other men of my retinue. In the end, I brought him down with three gun shots and saved God’s creatures from his evil. On the 22nd of the same month (3rd April 1617), the watchman brought news of a tiger. I mounted forth with and despatched him with three bullets. On the 7th of Adi Bihishet (18th April, 1617) the watchman brought word that they had marked down four tigers. At one O’ clock in the afternoon I started for the place with Nur Jahan Begum. Nur Jahan asked my leave to shoot the tigers with her gun. I said, “Be it so.” In a trice she killed these four tigers with six bullets. I had never seen such shooting. to shoot from the back of an elephant, from within a closed Howdah, and bring down with six bullets four wild beasts, without giving them an opportunity of moving or springing is wonderful. In acknowledgement of this capital marksmanship, I ordered a thousand Asharfis (Rs. 4,500) to be scattered over Nur Jahan and granted her a pair of ruby wristlets worth a lakh of rupees.”

Asharfi Mahal or Sanskrit Vishwavidyalaya?

Asharfi Mahal or Sanskrit Vishwavidyalaya?

खैर जी, हमें क्या ! नूर जहां बहुत ज्यादा प्रेग्नेंट थीं या शेर-चीतों का शिकार करती घूम रही थीं, ये तो वे ही जानें पर इतना अवश्य है कि आज की तारीख में इसे अशर्फी महल के नाम से ही जाना जाता है और यह जामी मस्जिद के ठीक सामने स्थित है जहां हमने अपनी कार खड़ी की थी। कार खड़ी करने के बाद हमने सबसे पहले जिस विशाल भवन में प्रवेश किया उसे जामी मस्जिद के नाम से जाना जाता है। इस मस्जिद नामक भवन का निर्माण भी परमार हिन्दू शासकों द्वारा कराया गया बताया जाता है जिसे बाद में जबरदस्ती मस्जिद का रूप दे दिया गया। परन्तु इतना अवश्य है कि प्रत्येक मस्जिद में वजू़ करने के लिये स्थान होना आवश्यक है जो यहां कहीं नहीं था। ऐसा प्रतीत होता है कि मुग़ल बादशाह जब अपने पिता और भाइयों की हत्या करने और उनका राज्य हड़पने से फुरसत अनुभव करते थे तो बीच – बीच में उनके भीतर स्थापत्य कला के प्रति भारी भरकम प्रेम उमड़ पड़ता था। पिछले कुछ वर्षों में हमारे उत्तर प्रदेश में जितने स्मारक बनवाये गये, जितनी मूर्तियां लगवाई गईं, उसे देखते हुए यह स्वाभाविक प्रतीत होने लगा है कि कुछ शासकों में क्रूरता और अपने नाम को इतिहास की पुस्तकों में शामिल कराने के लिये भवन बनवाने की प्रवृत्ति एक साथ पायी जाती है। अस्तु ! हमारा गाइड हमें जामी मस्जिद के बारे में जो कुछ बताता रहा उसका लब्बोलुबाब भी यही था कि ये जामी मस्जिद वास्तव में मस्जिद नहीं है और न ही यहां कभी भी नमाज़ अता होने का कोई एतिहासिक प्रमाण है।

Jami Masjid as viewed from the road.

Jami Masjid as viewed from the road.

Buy tickets for Jami Masjid from here.

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Car Parking area near Jami Masjid / Asharfi Mahal.

Car Parking area near Jami Masjid / Asharfi Mahal.

Imagine how green it would be during monsoon!

Imagine how green it would be during monsoon!

DSC_2940 2931 2935जामी मस्जिद में घूमते हुए हमें एक सीक्रेट सा रास्ता दिखाई दिया जो होशंगशाह के मकबरे की ओर जाता है। हम इसमें से निकल कर जामी मस्जिद के ठीक पीछे स्थित होशंगशाह के मकबरे की ओर चल पड़े। अनेक कबूतरों और चमगादड़ों से अटे पड़े इस मकबरे में दो-तीन कब्र बनी हुई थीं। बताया जाता है कि होशंगशाह ने जामी मस्जिद और इस मकबरे का निर्माण किया था पर वह ये निर्माण पूरा नहीं कर सका। इस अधूरे कार्य को पूरा किया ग्यासशाह खिलजी ने जिसको मांडू का सर्वश्रेष्ठ मुगल शासक माना जाता है। वह जहां भी आक्रमण करता था, वहां की सुन्दर महिलाओं को अपने हरम की शोभा बना लिया करता था। सर्वश्रेष्ठ शासक होने की सबसे बड़ी पहचान ये बताई जाती है कि उसने अपने हरम में 15000 बेगम रखी हुई थीं। महिलाओं में उसकी रुचि पागलपन की हद तक थी। उसकी स्वयं की सुरक्षा के लिये 500 तुर्की और 500 अरब अंगरक्षिकायें पुरुषवेश में रहती थीं। इस महान सुल्तान की मृत्यु शरबत में जहर देकर की गई थी और ये 1000 अंगरक्षिकायें उसकी रक्षा करने में असमर्थ रही थीं। कहा जाता है कि जहाज महल, हिंडोला महल वगैरा उसके द्वारा ही बनवाये गये थे।

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This building houses Late Hoshang Shah.

This building houses Late Hoshang Shah.

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होशंगशाह के मकबरे से बाहर आते ही पता चला कि होशंगशाह तो एक उपाधि है जो अलाप खां ने धारण की हुई थी। ये अलाप खां महोदय दिलावर खां के पुत्र बताये जाते हैं। दिलावर खां की मृत्यु के पीछे उसके पीछे अलाप खां का ही हाथ मानते हुए गुजराज के शासक मुज़फ्फरशाह ने होशंगशाह को बन्दी बना लिया था पर कुछ समय बाद मुक्त भी कर दिया था। मैने जब मुकेश से इस मकबरे की तारीफ की तो उन्होंने कहा कि अभी रूपमती के महल में चलते हैं, वह आपको और अधिक सुन्दर लगेगा। रास्ते में हमारी कार के आगे एक सजी – धजी महिला को जाते देख कर मैने पूछा कि रूपमती यही है क्या? मेरे इस प्रश्न को सुन कर कार में मौजूद चारों भालसे ने जोरदार ठहाका लगाया । शिवम ने मेरे ज्ञानकोष में वृद्धि करते हुए कहा कि रूपमती यहां कहां से आई, वह तो मर गई ! अचकचा कर मैने पूछा, “कब?” पता चला कि सैंकड़ों साल पहले! मुकेश और कविता के श्रीमुख से रूपमती और बाज बहादुर का किस्सा सुनते सुनते हम रानी रूपमती के महल तक जा पहुंचे जो मांडू के दृष्टिकोण से कुछ ज्यादा ही ऊंचाई पर बना हुआ है। इसे रूपमती पैवेलियन कहा जाता है और यहां खड़े होकर रूपमती नित्य नर्मदा नदी को अपने श्रद्धा सुमन अर्पित किया करती थी !

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रानी रूपमती के सौन्दर्य की अनुपम छटा के बारे में और उसकी संगीत निपुणता के बारे में बहुत कुछ लिखा और पढ़ा जा चुका है। मालवा के अंतिम सुल्तान बाज बहादुर ने तो स्वरसाम्राज्ञी रूपमती के साथ प्रणय प्रसंगों में अपनी प्रजा को ही भुला दिया था। उन दोनों के प्रेम और फिर मौत द्वारा एक दूसरे से अलग हो जाने के दर्दनाक किस्से मालवा के लोक जीवन का अभिन्न अंग हैं। सन्‌ 1599 में अहमद उल-उमरी, तुर्कमान ने बाजबहादुर और रूपमती के बारे में जो कुछ लिखा है, उसके कुछ अंश :

I, Ahmed-ul-Umri, Turkoman, chanced to visit parts of Malwa, to see other marvellous cities of Hindustan and to hear tales of wonder therein. Of these tales astounding, one is that of Baz-Bahadur and Rupmati, which betell in Mandu. ……….
In this province is a city of singular beauty, called Sarangpur. The good prince, Shuja’at Khan, gave Mandu in Jagir to his son, Bazid Khan, known also by the name of Baz-Bahadur. In that city lived a Brahman with whom Baz Bahadur was joined in friendship, and his name was Jadu Rai. One day, it befell that Jadu Rai made great feast and did honour to Baz Bahadur, who went to his house and was taken captive in a net of beauty. At the feast, his eyes first fell upon the face of her whose beauty and goodness crowned her queen of the world of charm, wherein she rivalled the houris of Paradise, and thence, did he return in distress and perturbation. Fifteen were the years of that dainty fair, when at the altar of her eyebrows the throne of sovereignty was offered in sacrifice. Moreover, did he learn that beyond her gift of beauty, she was endowed with a sweet temper and intelligence. ………….

“Six months passed by and Shuja’at Khan took his way to the world of non-existence and Baz Bahadur became the jewel of the throne of Malwa. His first act was to summon Jadu Rai to his court at Mandu. To him he gave land and much gold, and Sarangpur, on condition that he cause Rupmati to enter his harem, and her father, himself, gave his daughter in marriage to Baz Bahadur. The magic of her love held Baz Bahadur in such enchantment that he passed his days in her company and made over the affairs of his kingdom to his ministers. Rupmati was herself a poetess and an expert in the art of music. Her perfection in this art so ravished Baz Bahadur that he permitted the Government of his kingdom to dance at her finger tips. Many an hour they passed in daliance and amorous intoxication. So much so, that Baz Bahadur was all but lost to the world, and lived solely for the love of Rupmati. …….

रानी रूपमती का अंत कैसे हुआ….

Then, retiring to her bedchamber she took poison of powdered diamond. Now Adham Khan burning with desire, showed his face at the door of the palace and desired permission to enter; when he reached the bridal chamber, he found the fair lady asleep. He made signs to all to go and himself took her hand and sought to awaken her from sweet slumber. When he perceived that the bird of the soul had taken flight, he angrily summoned others and sought for the secret history of her mysterious end. The women of the palace told the tale of the last night, and the thwarted tyrant found no other way open than to return with his desire unattained. He seized a chance damsel and went back to the Mogul camp.

Such is the miserable end of this strange story, which began in love and happiness and ended in sorrow and grief. Rupmati died, but she died a martyr to faithfulness and an example to the sect of lovers. Verily women hold a rank in love where to men cannot attain.

Amir Khusro saith, “Khursu, in love rival the Hindu wife. For the dead’s sake she burns herself in life.”
Lady, fear not thou the sorrow of this world. Thy trials are over. The song of thy faithfulness will warm the hearts of men till doomsday, and on the story of thy end, the eyes of all lovers will ever drop a tribute of tears.

“Seek not on earth my grave when life depart
My sepulchre is every faithful heart”.

मांडू प्राकृतिक सौन्दर्य और मानव की सृजनात्मक शक्ति का अद्‌भुत मिश्रण ही है। वहां हमने क्या – क्या देखा, कहां – कहां घूमे, इसके बारे में एक पोस्ट में सब जानकारी दे पाना मुझे असंभव ही लग रहा है। अतः आगे की कहानी फिर सुनाई जायेगी, इस आश्वासन के साथ फिलहाल विदा लेना चाहूंगा।

25 Comments

  • Surinder Sharma says:

    Very Interesting. Thanks

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  • Ashok Sharma says:

    very good post.good pics.Had heardthe story of rani Roopmati and Baj Bahadur,but not in this detail.

  • enjoyng the series of post on Mandu.

  • Rakesh Bawa says:

    Sushant Ji, Namaskar. Frankly speaking if one compare Mandu to your flawless and gem studded writing, Mandu comes second, Sir. Quite agree with Naresh Ji that Mandu seems to be overrated somewhat.To me it seems similar to as ChittorGarh in pattern and area.

    • Dear Rakesh Bawa Ji,

      Thank you for your kind words. In order to understand and appreciate the beauty of a place, we need some extended period. I could not write properly about Mandu so as to justify its existence because I could not understand it fully. For example, Baz Bahadul ka Mahal, Rani Rupati ka Mahal didn’t seem to me palaces at all. I didn’t find any room worthy of a king or a queen. There were large corridors in the Rupmati Pavillion but I didn’t see any bed rooms, guest rooms, kitchens there. True, it is said that Rani Rupmati used to visit this place everyday to have ‘darshan’ of Narmada river because she didn’t accept any food before paying her tributes to the Narmada. But was such a huge structure built for this purpose only? I seriously doubt it.

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  • Nirdesh Singh says:

    Hi Sushantji,

    Initially I thought you had missed seeing Jahaj Mahal but then realised there is another post coming.

    When I was there, it was beginning of rains. Mandu is best enjoyed during monsoons when mist rolls in and you can catch Jahaj Mahal’s reflection in the pools.

    I loved the place and want to go again.

    Loved the post and the book excerpts. I missed seeing Hoshang Shah Tomb and Asharfi Mahal since I started from the other end and was completely tired by then.

    Enjoying the series.

    • Hi Nirdesh Ji,

      1st thing 1st ! Describing a historical monument is beyond my capability. I would have loved description of all those lovely places of Mandu coming from your pen. 2ndly, I do feel that Mandu can’t be explored and appreciated in just a few hours even if one has got a car at one’s disposal.

      When I reached Mandu, I didn’t know anything about that place. Mukesh Bhalse also mentioned this to me, “Sushant Ji, you should have come to Mandu after learning its history” and he was perfectly right. We had been to Jahaj Mahal, Neelkanth Temple, Ram temple, Rani Rupmati Pavillion, Baz Bahadur Mahal, Reva Kund etc. but understanding the architectural beauty from a historian’s point of view is not my cup of tea. :)

      There are so many conflicting pieces of information coming from different sources that I can’t decide which one to consider authentic. However, the excerpts from the tiny booklet seemed to me worth relying.

      Thanks anyway for coming to this post.

      • Nirdesh Singh says:

        You are right Sushantji,

        Just like Hampi, Mandu also needs 2-3 days to fully explore and absorb.

        I just spent about 4 hours. It felt incomplete and therefore I did not write about it. I want to go when the tanks are full and see everything again including the gates of the city.

        I do not like to photograph people and sometimes wait for the annoying people to move out of the frames.

        I think Roopmati Mahal was a military watch post to look around for invaders.

        Did you see the Dinosaur Park when you drive from Mandu towards Dhar? The small photo in the corner of this reply is from there!

        And then again, to do justice to Mandu will require at least 5000 words and 40 photos.

  • Vipin says:

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  • Saurabh Gupta says:

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  • Ritesh Gupta says:

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  • Amitava Chatterjee says:

    I read your post few days back but due to my inability to read fluently, it took sometime for me to read the post again tonight (those two years in school, when we read Sanskrit in class VII & VIII, always come to my rescue, though partially).

    Anyway, coming to the post, a very good post again, supported by some nice pictures. There will always be conflicting information about any historical places and it is always difficult to recreate history by us. I think there are few more post on Mandu as well…I remember coming across a post on Mandu by Nandan some time back…it is good to know such places and if we also have a chance to visit Indore…we will definitely visit this place.

  • Nandan Jha says:

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  • Mukesh Bhalse says:

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