Dev Bhoomi Uttarakhand

मेरी चारधाम यात्रा यमुनोत्री

मेरी बहुत समय से उत्तराखण्ड-यात्रा की इच्छा थी और बीतते समय के साथ आशंका बलवती होती गई कि इस अतृप्त इच्छा के साथ ही, इस संसार से कहीं विदाई ना हो जाये। 11 फरवरी 2011 को मेरे जीवन के 60 वर्ष पूरे हो जायेंगे। सन 2004 में डॉक्टर ने मेरे हृदय-दौर्बल्य की स्थिति स्पष्ट करते हुए बी.पी. नियमन आदि के लिए कुछ दवाएँ रोज लेने की हिदायत की थी। ऋषिकेश, यमुनोत्री, उत्तरकाशी, गंगनानी, हर्षिल, गंगोत्री, गुप्तकाशी, गौरीकुण्ड, केदारनाथ, त्रिजुगीनारायण, बद्रीनाथ, देवप्रयाग आदि स्थानों की आध्यात्मिक विशेषता व प्राकृतिक सौन्दर्य के विवरण ‘इंटरनेट’ के साथ उत्तरांचल सरकार द्वारा उपलब्ध ‘ब्रोशर्स’ व अक्सर दैनिक भाष्कर मे प्रकाशित खुशवंतसिंह के लेखों के पठन-मनन से ‘देव-भूमी’  उत्तरांचल के प्रति मेरा आकर्षण बढता ही गया। यह निर्विवाद सत्य है कि आध्यात्मिक दृष्टि से देव-भूमि उत्तराखण्ड पृथ्वी का श्रेष्ठतम स्थान है। यहाँ श्रीरामजी ने ब्रह्महत्या दोष निवारण के लिए देवप्रयाग को चुना। तप-साधना के लिए विष्णु जी का प्रिय स्थल बद्रीनाथ है। शंकरजी पूरे उत्तराखंड मे विचर रहें हैं। हमारे करीबन सभी ऋषि-मनीषियों ने सात्विक साधना के लिए इस क्षेत्र को विशेष उपयुक्त पाया और आज भी अनेक वहां साधना-रत हैं।

इस वर्ष 2010 की बरसात में उत्तराखण्ड में काफी नुक्सान हुआ विशेषकर सड़कों की हालत बहुत खराब हो गई, जगह-जगह दूर तक पहाड़ ही सड़कों पर गिर पड़े जैसे गर्मियों में राजस्थान में रेत के टीले सड़कों/रेल-पटरियों पर स्थानांतरित हो जाते हैं। परंतु दोनों की स्थितियों में विनाश और उसके दुरुस्त होने की दुरूहता में कोई साम्य नहीं है, उत्तराखण्ड में महीनों लग जायेंगें सुगम आवागमन व्यवस्था बहाल करने में। उत्तराखण्ड तीर्थ-यात्रा को पुराने जमाने से ही कठिन जोखिमभरे रास्तों के कारण अंतिम यात्रा के रूप मे जाना जाता रहा है।

प्रकृति जनित विनाश के इस कठिन दौर में किसी और के जीवन को  जोखिम में शामिल नहीं करने की इच्छा के कारण, मैं अकेला ही अपनी ‘अल्टो’ पर जयपुर से 14-अक्टूबर-2010 को रवाना हो गया। सूर्यास्त के समय हरिद्वार पहूंचकर ‘शांतीनिकेतन’ में रात्री विश्राम के लिए वहाँ के समन्धित स्टाफ से मुझे पूरा सहयोग मिला। साधकों व यात्रियों की आहार-पूर्ति के लिये यहाँ पर दो विशाल कैण्टीन हैं। खाना, नाश्ता, चाय, दूध इत्यादि की शुद्ध व उचित मूल्य पर उपलब्धता यहाँ की विशेषता है। 15-अक्टूबर-2010 की सुबह जल्दी ही तैयार होकर मैं शांतीनिकेतन के अवलोकन तथा अल्पाहार के लिए कमरे से बाहर आया। बडा ही आल्हादित करने वाला सुन्दर वातावरण था, यज्ञ-वेदी की धूम से वातावरण आच्छदित था। चारों तरफ गेरुए वस्त्रों से सुशोभित जीवात्माएं कार्यक्रमों को अंजाम दे रहीं थी, प्रवचन चल रहा था, योग साधना कार्यक्रम सम्पन्न हो चुका था, बडा ही जीवंत शांतीमय वातावरण था। कैण्टीन खुलने पर मैंने गुजराती ढोकले, गुलाबजामुन, गर्म जलेबी व दूध का नाश्ता किया। भीगे चने-मोठ-मूंगफली दाने के दोने, प्रज्ञा-प्रसाद के लड्डू, तली मूंगफली के पैकेट रास्ते के लिए गाड़ी में रख लिये जो बाद में बहुत ही उपयोगी साबित हुए। यमुनोत्री के लिए मैनें खड़ी चढाई वाले देहरादून-मसूरी की बजाय चम्बा का रास्ता चुना जो ज्यादा कठिन साबित हुआ। ऋषिकेश में पेट्रोल लेकर मुनी की रेती, नरेन्द्रनगर का अवलोकन करते हुए धीरे-धीरे चलता जा रहा था। मलबे से अटे पड़े रस्ते को दुरुस्त करने में संलग्न किसी ऑफिसर ने चम्बा तक जाने के लिए लिफ्ट मांगी, रास्ते में उनसे जानकारी मिली कि पिछले विनाश के दिनों में उन्होंने रात-दिन एक करके रास्ता बहाल किया था, केदारनाथ के रास्ते श्रीनगर के पास पहाड़ से अभी भी पत्थर गिर रहे हैं, सम्भवतया रास्ता चालू हो गया होगा अन्यथा इसी रास्ते से वापिस लौटना पड़ेगा। चम्बा के पास सुरकण्डा देवी के मन्दिर की काफी मान्यता है। यह चम्बा से 20 कि.मी.दूर है। धरासू होते हुए बड़कोट में मैने रात्री विश्राम लिया। बाजार मे जानकारी लेकर खाने के लिए होटल को चुना परंतु खाना पेट भरने जैसा ही था। 16-अक्टूबर-2010 की सुबह शीघ्र ही तैयार होकर नीचे आया तो होटल के कमरे की चाभी मुझे व्यक्ति को जगाकर देनी पड़ी। सयानाचट्टी, हनुमानचट्टी होते हुए मैं 11 बजे के आस-पास जानकीचट्टी पहुंच गया। हनुमानचट्टी से कुछ आगे एक लड़का मेरे साथ हो लिया था जो जानकीचट्टी में किसी होटल में नौकर था। होटल के सामने गाड़ी पार्क कर जब मैं जाने लगा तो होटलवाले ने पुकारकर गाड़ी हटाने के लिए कहा अन्यथा 50 रु.पार्किंग चार्ज लगेगा। होटल में ठहरने पर ऐसा कोई चार्ज नहीं होगा जानकर मैंने कहा कि आते वक्त रात्री मैं यहीं गुजारकर जाऊंगा, अन्यथा जो चार्ज होगा मुझे देना है। यहां से पैदल 5 कि.मी.चढाई का रास्ता है। खच्चर उपलब्ध थे परंतु मन में पैदल चलने की भावना थी कि मेरी गाड़ी जब इतने दुर्गम रास्ते से आई है तो मुझे भी 5 कि.मी.का परिश्रम तो करना ही चाहिए। बैग में एक चद्दर बिछाने की व एक ओढने की, गीता का छोटा संस्करण, तौलिया-बनियान-अण्डरवियर-गमछा तथा एक जोड़ी पैण्ट-शर्ट लेकर मैं चल पड़ा। उस दिन दशहरा था और साथ आये लडके ने भी नौकरी पर जाने से पहले यमुनोत्री जाने की इच्छा कर मेरे बैग को ले मेरा पथ प्रदर्शक बन साथ हो लिया। मेरी सांस फूलने से आधे कि.मी.में ही दो तीन बार विश्राम के लिए रुकने पर, मेरा साथ छोड़ते हुए जाने के लिए अनेक बार कहने पर अंतत: उसने मान लिया। अपनी शारीरिक स्थिति अनुसार मैं धीरे-धीरे चलता रहा, थकावट बढती रही व रुकने की बारम्बारता तथा विश्राम का समय भी बढता रहा। चार कि.मी. के पश्चात उपर जाने वाला सम्भवत: मैं आखिरी यात्री रह गया था। वापिस लौटने वाले कई यात्री मिले जिन्होंने चढते समय मुझसे वार्तालाप किया था। अन्धेरा होता जा रहा था। किसी जगह विश्राम में ज्यादा समय रुकने पर कोई एक कुत्ता आगे रास्ते से वापिस आया और मेरे पास आकर मेरे पैर से अपने शरीर को रगड़ने लगा। मैं उससे “बातें करते हुए” उठकर चल पड़ा। बाकी का रास्ता मैने इसी प्रकार तय किया, मेरे रुकने पर वह वापिस आकर बैठ जाता और चलने पर चल पड़ता। यमुनोत्री के पास एक पुल को पार करने के बाद ही मन्दिर  हैं। पुल पर पहुंच कर लक्ष्य-प्राप्ति की संतुष्टि के साथ यमुनाजी व प्रकृति का कुछ क्षण अवलोकन बड़ा ही शांतीदायक था। अन्धेरा हो चुका था। किसी ने बताया कि अब तो कुण्ड भी खोला जा चुका है, जिसमें नहाकर ही यमुनाजी की पूजा करने की मान्यता- परिपाटी है। यमुनाजी सूर्य-पुत्री हैं और किंन्विंदिति है कि सूर्य भगवान ने अपनी पुत्री यमुना को दहेज में अपनी एक रश्मी दी जिससे यमुनाजी की एक धारा गर्म प्रवाहित होकर जिस कुण्ड में गिरती है उसे “सूर्यकुण्ड” कहते हैं। पूजा-अर्चना सामग्री में चावलों की एक पोटली भी होती है जिसे इसमें डालते हैं। वे शीघ्र ही पक जाते हैं और यही यमुनाजी का प्रसाद है। पुजारी ने बताया कि पोटली में पके चावलों को सुखाकर ले जाना चाहिये, अधपके चावल शीघ्र सूख जाते हैं, इसकारण वे पोटली के चावलों को पूरा नहीं पकाते हैं। घर पर खीर बनाते वक्त उसमें इसके एक-दो दाने डालने से ही उसमें यमुनाजी की कृपा का समावेश हो जाता है। कहते है कि जय मुनी ने ज्ञान से भरे एक हजार श्लोकों की रचना की परंतु नीरस ज्ञान का, बिना आस्था कोई भी मनन नहीं करेगा, यह विचारकर उन्होंने आस्था व स्नेह-प्रेम की देवी यमुनाजी का आह्वान किया। यमुनाजी का पानी पी कर वृन्दावन की गोपियाँ जीवनपर्यंत श्रीकृष्ण के प्रति इतनी आस्थावान व प्रेम से पगीं रहीं कि उनके मथुरा से नही लौटने के उपरांत भी श्रीकृष्ण के प्रति उनकी आस्था में तनिक भी कमी नहीं आई और श्रीकृष्ण, वे तो ज्ञानियों में श्रेष्ठतम माने जाते हैं।

सूर्यकुण्ड का पानी एक बड़े कुण्ड मे आता है जहां ठण्डे पानी की एक धारा को मिलाकर स्नानयोग्य तापमान पर कर लिया जाता है। यह कुण्ड ऊपर से खुला हुआ नहीं है। अन्धेरा होने पर कुण्ड को खाली कर पुन: भरने के लिए डाट लगादी जाती है। सीढीयों में कुण्ड के खाली होने का पानी बह रहा था। मैं उपर जाकर सूर्यकुण्ड के पास स्थित यमुनाजी की प्रस्तर शिला के पास बैठ गया। नीचे प्रवाहित गर्म पानी के कारण आसन गर्म था। पास ही एक पुजारी सन्ध्यावदन कर रहे थे। पाँच-पाँच पुजारियों के तीन ग्रुप में वहां करीबन पन्द्रह पुजारी थे। एक बुजुर्ग पुजारी ने पास आकर वार्तालाप प्रारम्भ किया – कहाँ से आये हैं, अकेले ही हैं, अब तो रात आपको यहीं रुकना पड़ेगा,  हमें कैसी तकलीफ-परेशानी, रात का खाना-परसाद हमारे साथ ही लीजियेगा, आप हमारे मेहमान हैं, सुबह आपके पास जो बैठे हैं वे ही पूजा करवा देंगें आदि आदि। कुछ फिट दूरी पर यमुनाजी के नव-निर्मित मन्दिर में आरती शुरु हो गई थी और हमसब वहाँ आरती में शामिल हो गये। आरती के पश्चात मन्दिर-प्रांगण में एक जगह की ओर इशारा कर उनहोंने कहा कि आप यहां पर सो जाईयेगा, पास पड़े बिस्तरबन्द में से एक रजाई निकाल कर दे देंगें। हम सब यहीं पर सोते हैं। परंतु कुछ ही देर में अन्य पुजारियों की गढवाली भाषा में कुछ प्रतिक्रियायें सुनी जिनके लहजे से महसूस हुआ कि वे मेरे विषय में बातें कर रहे हैं और मेरे वहाँ पर सोने में उन्हें एतराज है। खाने में उनका मुख्य खाद्य चावल-दाल तथा पतले फुल्के थे। रसोई में चुल्हे के सामने बैठकर प्रसाद पाकर बड़ी तृप्ति मिली, यद्यपि कुछ पुजारियों के विरोध से उद्वेलित मन संकुचित हो व्यवहार कर रहा था। विरोध मेरे हितार्थ ही हो रहा था, यह मैने दूसरे दिन जाना। खाने के पश्चात वही बुजुर्ग आये और कहने लगे आपके लिए नीचे कमरे की चाभी प्राप्त करली है चलिए आपको दिखा देता हूँ। मन्दिर से कुछ सीढीयाँ उतर एक बड़ा कमरा था जिसमें पूरे फर्श पर दरी बिछी थी और एक बिस्तरबन्द पड़ा था। सेंटर-टेबल और कुर्सियों को एक तरफ करने पर पांच-छ: व्यक्तियों के सोने लायक जगह निकल आई। पूरी बिजली व्यवस्था ठप्प होने के कारण टॉर्च व मोबाईल की रोशनी ही सहायक थी। मैं शीघ्र ही नींद के आगोश मे चला गया। 17-अक्टूबर-2010 । अचानक दरवाजे की “सांकल” को तेज आवाज में खटखटाना सुन, अर्धचेतना में मैनें प्रतिउत्तर दिया कि ‘हाँ-भई मैं आ रहा हूँ’ परंतु मोबाईल तलाश कर उसकी रोशनी में दरवाजा खोलने पर पाया कि वहां कोई नहीं है। मोबाईल स्क्रीन पर देखा तीन बजकर कुछ मिनट हुए हैं। सोचा कि सुबह जगाने वाले दरवाजा खुड़खुड़ाते होंगे। परंतु अभी चार भी नहीं बजे यह विचारकर मैं दुबारा लेट गया। फिर मन में विचार आया कि घर पर तो हमेशा देर तक सोना चलता ही रहता है यहाँ दर्शन करने आया हूँ तो ब्रह्म-मुहूर्त में चेतना प्राप्त कर आलस्यवश पुन: सोने की चेष्टा नहीं करनी चाहिये और मैं मोबाईल-रोशनी मे कमरे के पास ही रक्खे शौचालय-केबिन में निवृत हो, पेस्ट कर, कमरे से कपड़े एकत्रित कर कुण्ड की तरफ चल पड़ा। कुण्ड कितना गहरा है मुझे पता नही था इसकारण सीढीयों पर छाती जितने पानी में रुककर मैने आराम व तसल्ली से देवस्थान में जिन तीन (स्वयं, माता व पत्नि) कुलों का स्मरण करते हुए डुबकीयाँ ली जातीं हैं और देव स्मरण करते हुए जो भी स्तुतीयाँ-श्लोक मुझे याद थे मैनें श्रद्धा व आनन्द के साथ लिये और बनियान तौलिया आदि वस्त्र वहीं सूखने के लिये डाल, कमरे में आ अपनी कुछ अन्य श्वास-प्रश्वास व योगासन क्रियायें कीं और शवासन में लेट गया। अचानक वैदिक ऋचाओं को सुन तन्द्रा टूटी कि अरे मै यमुनाजी की आरती में शामिल होने से वंचित हो गया। देवी की आरती के पश्चात संस्कृत श्लोकों का सम्मिलित रूप से सस्वर दीर्घ पाठ किया जाता है। इसी का अनुमान कर मैं त्वरित गति से मन्दिर की ओर दौड़ा परंतु देखा कि मन्दिर प्रांगण में सभी पुजारी सोये हुये हैं। मैं यह सोचकर कि यह तपोस्थली है पास  किसी आश्रम में पण्डितजन पाठ कर रहे होंगे, सूर्यकुण्ड के पास पिछले दिन वाले आसन पर बैठ गया। कुछ देर पश्चात पुजारीजी भी आ गये और सन्ध्यावदन करने लगे तो मैनें इजाजत ली कि आप सन्ध्या कर लें तबतक मैं कुछ घूम आता हूँ, फिर आप मुझ से पूजा सम्पन्न करा दीजीयेगा। दुकानवाले अपनी दुकान सजा रहे थे, होटलवाले चुल्हे जला अन्य तैयारी कर रहे थे। मैनें कईयों से सुबह किसी जगानेवाले का जिक्र किया परंतु ऐसा किसी की भी जानकारी मे होने से सबने इनकार किया। नजदीक में काली-कमलीवाले का आश्रम था जिसमें कोई भी रुका हुआ नही था क्योकि सीजन जा चुका था और गुजरी प्राकृतिक आपदा के कारण जो कुछ यात्री अपेक्षित होते थे वे भी अब नगण्य हो चुके थे। ज्यों-ज्यों नकारात्मक उत्तर मिलता  गया मेरी उत्कण्ठा और बढती गई। अंतत: पूजा के पश्चात पुजारी के बताने पर कि यहाँ सुबह ब्रह्ममहूर्त में देवगण माँ यमुनाजी की आरती-स्तुति करते हैं मुझे झटका सा लगा कि यह तो मैं उत्तराखण्ड ट्यूरिज्म की पुस्तिका/ब्रॉशर में पढ चुका हूँ और मुझे अपनेपर ग्लानी मिश्रित कोफ्त हुई कि भाग-दौड़ करने की बजाय मैं क्यों नही आत्मसात करते हुए उनकी स्तुति सुनता रहा। विचारों के झंझावत के समय अन्य युवा-पुजारी ने प्रसाद (खाना) पाकर ही जाने की बात कही और मैं रुक गया। प्रसाद तैयार होने में कुछ समय की देरी थी। मैं कुण्ड में पुन: उतर गया। वहाँ रहने वाले सभी पुजारी, दुकानदार, खच्चर वाले ज्योंही समय मिलता है कुण्ड की ऊपरी सीढीयों पर पानी में आ खडे होते हैं। चारों तरफ हिमाच्छादित पहाड़ों व यमुनाजी के हिमशीतल जल की ठण्ड में इसमें खड़े होने से बड़ा आराम मिलता है। मैं काफी देर तक कुण्ड में रहा। इन प्राकृतिक गर्म धाराओं का बड़ा ही चिकित्सकीय महत्व है। शरीर की कई व्याधियाँ नष्ट हो जाती हैं। गंगनानी के पाराशर कुण्ड में मुझे एक व्यक्ति मिला जो हरियाणा से अपनी पत्नी के किसी रोग को दूर करने के लिए तीन दिन से वहीं पर रुका हुआ था, दिन में कई बार कई घण्टों तक वे कुण्ड के गर्म पानी में ही रहते थे। दिल्ली के पास सोहना तावडू के गर्म कुण्ड के पास तो सुना है कि रिहायसी कमरों से ‘अटैच’ उस गर्म पानी की सुविधा के साथ बाथरूम तक उपलब्ध करा दिये गये हैं। मैं दांई ओर के जबड़े से चबा नहीं पाता था, मुझे पता ही नहीं चला कि कब और कहाँ मुझे इसके दर्द से मुक्ती मिली, 10 दिन की यात्रा के पश्चात जयपुर वापिस पहूँचने पर ज्ञान हुआ कि अब मैं दोनों जबड़े काम में ले रहा हूँ। दोपहर के खाने में मोटे चावल और दाल थी, रोटी वे रात के खाने में ही बनाते हैं। यमुनाजी को बड़ी श्रद्धा से प्रणाम कर जीवन पर्यंत ना भूलने वाली याद के साथ मैं धीरे-धीरे नीचे की ओर अग्रसर हुआ। जानकीचट्टी से करीब डेढ कि.मी.पहले दिल्ली के एक पहुंचे हुए गद्दीनशीन बाबा, जिनके अधिकार क्षेत्र में दिल्ली का रामलीला ग्राउण्ड भी है, दिल्ली में रामलीला का आयोजन भी जिनके द्वारा ही किया जाता है, उनके एक चेले ने राममन्दिर बनाने के संकल्प के साथ डेरा डाला हुआ था। कुछ सुस्ताने के लिये मैं वहां रुका। वे वहां “राममन्दिर वाले बाबा” के नाम से प्रसिद्ध हैं, इसी नाम से जाने जाते हैं। जाते समय भी मैं वहाँ कुछ क्षण रुका था। तब अखण्ड रामायण का पाठ चल रहा था। आज बाबाजी प्रसाद बांट रहे थे। दिल्ली की नामी व मँहगी दुकान के पैकिंग डब्बे, उनकी/उनके चेलों की समृद्धता को दर्शा रहे थे। ऑलम्पिक गेम्स में सौंपी गई कुछ जिम्मेदारियों के निर्वहन के लिये अपने गुरूजी के बुलावे पर दिल्ली गये हुए वे उस दिन सुबह ही लौटे थे। उनसे जानकारी मिली कि किस प्रकार उन्होंने जरूरतमन्द विद्यार्थियों का चयन कर संस्कृत विद्याध्ययन के लिए बाहर भेजा और उन्हीं में से कुछ को अखण्ड रामायण पाठ के लिये बुलाया था। पाठ-समापन के समय उनके दिल्ली में होने से उनकी विदाई-दक्षिणा नहीं हो पाई थी जिसे उन्होंने मेरे द्वारा यह कहते हुए सम्पन्न कराई कि उनका पंथ तिलक इत्यादि की इजाजत नही देता और मेरा ब्राह्मण होना इस कार्य का सुयोग है। स्थानीय करीब-करीब सभी व्यक्तियों से उनका सम्पर्क था। बहुतों के परिवारों तक उनकी जानकारी थी और इसकारण यात्रीयों के कम होने के उपरांत भी उनके पास लोगों का आना-जाना अनवरत जारी था। मुझे उनहोंने रात वहीं पर रुकने के लिए कहा। उन्हें ध्यान था कि राजस्थान नम्बर की एक अल्टो नीचे होटल के सामने खड़ी है और आश्वस्त किया कि होटल-मालिक प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं, विधानसभा चुनाव भी लड़ चुके हैं यद्यपि चुनाव के वक्त उनके द्वारा शराब-वितरण के प्रति विरोध के कारण व्यवहार में उनसे कटुता उत्पन्न हो गई थी। मन्दिर के पास बने एक बड़े कमरे मे चुल्हे के पास तापते हुए उनसे बाबाओं के भण्डारे-आयोजन, प्रथा आदि के बारे में काफी जानकारी मिली जो मेरे लिए सर्वथा नईं थी, उनका भी एक अलग ही संसार-समाज है। उनका सपना कि वहां एक भव्य राम मन्दिर बने की, लक्ष्य-प्राप्ति के लिये ही उनका सारा ध्यान-प्रयत्न केन्द्रित था। रात्री में पास ही एक अन्य कमरे में विश्राम कर 18-अक्टूबर-2010 की सुबह चलने के लिये तैयार हुआ तो उन्होंने कहा कि मैं कुछ देर रुक जाऊँ जब तक कि वे भी तैयार हो जाते हैं। वे भी साथ चलने का प्रोग्राम बना रहे हैं क्योंकि उनका गैस-सिलेण्डर खाली हो गया है और बड़कोट से आगे से उन्हें उसे भरवाकर लाना पड़ेगा। जयपुर से चलने के पश्चात मैंने कोई भी नियमित दवा नहीं ली थी और अब मैं कुछ भारीपन महसूस कर रहा था। दवा कार मे होने से मैने कहा कि मैं होटल पहूँचकर इंतजार करता हूं। आप आज आये तो ठीक अन्यथा रात मैं होटल में रुक जाऊँगा और कल साथ चल चलेंग़ें। करीबन पौन कि.मी.चलने पर याद आया कि रात कमरे में यमुनाजी का चावल-प्रसाद जो सूखने के लिए डाला था वह मै भूल आया हूं। चढाई चढने की कल्पना कर ईच्छा की कि जाने दूँ परंतु मन नहीं माना और मैं वापिस जाकर प्रसाद को लेकर आया। फिर भी बाहर सूखने डाले दोनों बनियान, अण्डरवीयर व दोनों गमछे वहीं पर भूल आया। कार से मैने दवा ली। होटल-मालिक के बेटे की सहायता से टायरों में हवा चेक की। ट्यूबलेस टायर फिट करवाने के पश्चात मैनें गाड़ी में एक फुट-पम्प रख लिया था जिससे कि इमर्जेंसी में गाड़ी को रिपेयर-स्टेशन तक तो ले जाया जा सके। बाबाजी का जिक्र करने पर बहुगुणाजी का व्यवहार अनमना सा हो गया। मैनें उन्हें सौ रु. का नोट दिया कि वे पार्किंग के 50 काट लें तो उनहोंने 50 वापिस देने की बजाय कहा कि तीन दिन के 150 होते हैं, 50 उनहोंने छोड़ दिये। इसी समय बाबाजी आ गये और मैं बिना किसी प्रतिउत्तर के उनको साथ ले रवाना हो गया। बड़कोट से देहरादून के रास्ते नौगाँव से सिलेण्डर ले उन्हें बड़कोट छोड़ते हुए मैं उत्तरकाशी के रास्ते चला। ब्रह्मखाल-धरासू मोड़ के बीच बहुत ही खराब रास्ता है जिसे आते समय मैं अनुभव कर चुका था इसकारण रात्री-विश्राम मैने ब्रह्मखाल में लिया। 19-अक्टूबर-2010 की सुबह होटल मालिक के छोटे भाई को धरासू छोड़ते हुए डूण्डा में खरीदारी के लिये रुका। यहां गर्म कपड़ों की अच्छी दुकानें हैं। परंतु क्रेडिट-कार्ड यहां चलते नहीं, ए.टी.एम.मशीनें यहाँ काम कर नहीं रही थी इसकारण मैं केवल एक शॉल, एक लेडीज-कोट व कुछ टोपियां ही ले पाया। मुझे यात्रा-अंत तक मलाल रहा कि मैं लेडीज-कोट सब के लिये नहीं ले पाया यद्यपि दुकानदार चेक एक्सेप्ट करने के लिये राजी था परंतु वह मेरे पास नहीं था। उत्तरकाशी में साईन-बोर्डों से चमचमाते बाजार व टेक्सीयों की रेलमपेल से लग रहा था कि मैं किसी महानगर से गुजर रहा हूं। भटवाड़ी, गंगनानी व उसके बाद हर्षिल, धाराली, लंका, भैरों घाटी का रास्ता बड़ा ही दर्शनीय व सुकूनभरा था। गंगा के विशाल पाट के बगल से गुजरती सड़क बरबस रुकने के लिये बाध्य करती थी। भैरों घाटी में भैरोंजी के दर्शन कर चाय पी तब तक अन्धेरा हो चुका था। काली-कमली आश्रम में रुकने के लिये इनकार किये जाने पर मैं गंगोत्री के लिये चल पड़ा। गंगोत्री में बाजार में गाड़ी पार्क करने के पास ही कमरा मिल गया। खाना यहाँ ठीक था। 20-अक्टूबर-2010 की सुबह गंगोत्री-स्नान के लिये मन्दिर, भागीरथी शिला होते हुए घाट पर पहुंचा। घाट पर नहाते कोई नहीं मिला। किनारे पर पानी छिछला था जिसमें डुबकियाँ नहीं ली जा सकती और बहाव बहुत तेज था। किनारे से जरा भी आगे जाना खतरनाक था। दूर किसी घाट पर मुझे दीवार दिखाई दी, कुछ गहरे तथा कम बहाव की आशा में मैं वहां गया और स्नान की तैयारी की। अपेक्षित गहराई वहां भी नही मिली, बहाव भी तेज ही था। कमर से नीचे तक पानी में किसी प्रकार पैर जमाकर एक डुबकी ली, हिम-शीतल पानी के कारण मस्तिष्क में अन्धेरा सा छा गया, दूसरी में बेहोशी सी महसूस होने लगी। कुछ दूरी पर गेरुएवस्त्रधारी एक बाबा के साथ आठ-दस विदेशी आते हुए नजर आये, बाबा से नजर मिलने पर उन्होंने हाथ हिला मेरा उत्साहवर्धन किया। विदेशियों को भी जैसे वे बता रहे हों कि देखो आम भारतीयजन की गंगाजी में इतनी आस्था है कि स्वास्थ्य के लिये प्राकृतिक प्रतिकूल स्थिति में भी वे यहाँ डुबकी लेना अपना परम कर्तव्य समझते है­, अपना अहोभाग्य समझते हैं कि उन्हें यहाँ यह करने का मौका मिला। आत्मिक बल पर मैने तीसरी डुबकी ली, गिरने से सम्हलते हुए कपड़े बदलने लगा तब तक वे विदेशी भी वहां आ गंगाजी मे उतरने लगे परंतु कोई एक भी डुबकी नहीं लगा सका। मेरे सुझाव कि ‘स्प्रिंकल सम वाटर ऑन योर हेड एण्ड बॉडी’ को मानकर उन्होंने हमारी आस्था के प्रति अपना आदरभाव प्रदर्शित किया। मुझे अब उतनी ठण्ड महसूस नहीं हो रही थी। गंगा किनारे करीबन आधे घण्टे बैठकर ध्यान स्तुति करके मन को अतीव शान्ती मिली। मन्दिर में गंगाजी के दर्शन किये। भगीरथ शिला पर बैठकर प्रार्थना की। बोतलों में गंगाजी का पावन जल लिया और कुछ नाश्ता कर रवाना हुआ। भैरोंघाटी में चाय पी, हर्षिल में सेव खरीदे जो कि बहुत ही रसीले थे और गंगनानी में आकर महर्षि पाराशर कुण्ड में काफी देर तक स्नान कर ऋषि के मन्दिर में मानसिक ध्यान की चेष्टा की। मेरा ऋषि-गोत्र पाराशर है और मुझे यहाँ अपने पूर्वजों के प्रति प्रार्थना करने में बड़ी शांती व प्रसन्नता का आभास हुआ। उत्तरकाशी से करीबन आठ कि.मी.पहले शिवानन्द आश्रम का बोर्ड देखकर मैं आश्रम में गया और स्वामीजी के सानिध्य में कुछ दिन बिताने की सम्भावना के लिये उनसे पूछा जिसे उनहोंने सहृदयता पूर्वक स्वीकार कर मेरे लिये एक तीन बेडरूम का अपार्टमेण्ट खुलवा दिया, उस वक्त शायद यही खाली होगा। स्वामी प्रेमानन्द सरस्वतीजी बड़े ही ज्ञानी व सरलमना महात्मा हैं। आश्रम की दिनचर्या में सुबह विष्णु सहस्रनाम का पाठ, नौ बजे नाश्ता। फिर किसी ग्रंथ का विस्तारसहित व्याख्या-विवेचन- परिचर्चा के साथ पठन। ग्रंथ के पूरे पठन में वर्षों लग जाते हैं। इस समय श्रीविष्णुसहस्रनाम ग्रंथ का पठन हो रहा था। 12 बजे दिन का खाना। शाम को चाय। छ: बजे रात्री-खाने के पश्चात स्वामीजी द्वारा हारमोनियम के साथ शिव-सहस्रनाम पाठ व स्तुति, धारावाहिक रामचरितमानस के कुछ अंश का पठन, हनुमानचालिसा का पाठ, श्रीरामचन्द्रजी की स्तुति आदि के पश्चात स्वामीजी द्वारा किसी के भी प्रश्न का निवारण। फिर रात्री विश्राम। नाश्ते व दिन के खाने के मध्य समय में जो परिचर्चा सहित व्याख्या होती है उसमे अन्य जगह रहने वाले अनेक साधनारत ज्ञानपिपासु व्यक्ति भी शामिल होने आते हैं। यह ईंगित करता है ज्ञानवान स्वामीजी से कुछ ज्ञान प्राप्त करने व अपने प्रश्नों के उत्तर पाने में उन सरलहृदय महात्मा के सहयोग का। तीसरे दिन सुबह श्रीविष्णुसहस्रनाम पाठ के पश्चात मैनें गृहस्थ के लिये गुरु की महत्ता व उनके प्रति कर्तव्य-कर्म के विषय मे चर्चा के साथ उनसे गुरु बनने की प्रार्थना की तो उनहोंने कहा कि ऐसे रस्ते चलते किसी को गुरु नहीं बनाया करते, पहले सोच-विचार के साथ योग्य गुरु की खोज की जाती है। गुरु बनाने के बाद गुरु में कमियाँ नही देखी जाती, वे जो भी आदेश दें पूरी श्रद्धा के साथ उसे पूरा करना पड़ता है, चाहे वह कितना भी दोषपूर्ण लगे। खोज के विषय में मैने प्रतिकार किया कि वेदांती-ज्ञानी किसी चीज का गुह्यतम से अति-गुह्यतम अर्थ विचारते रहते हैं परंतु किसी के लिये क्या उसे सरल रूप में स्वीकारना ही यथेष्ठ नहीं होता ! जैसे जल की अति-गुह्यतम विवेचना क्रम में ऑक्सीजन-हाइड्रोजन-गैस, हाइड्रोजन-बम, विस्फोट के साथ विनाश अंतिम क्रम निचोड़ होगा और इसे सरल भाव में लें तो जल जीवन-सुधा है, इसके बिना प्राणी जीवित नहीं रह सकता। उनसे फिर भी नकारात्मक भाव ही मिला। फिर मैनें विचार किया कि महात्माओं से कभी बहस नहीं करनी चाहिये, तपस्या से उनकी वाणी पवित्र हो जाती है, वे वचन-सिद्ध हो जाते हैं। गृहस्थ के लिये उनके कथन का पालन ही कर्तव्य है। उनसे बहस करना या मीन-मेख निकालना सर्वथा वर्जित है। आश्रम में श्री गौरहरी मिश्रा जी (Retd.Principal Chief Conservator of Forest, Orissa) से मुलाकत हुई। वे सपत्नी 15 दिन शिवानन्द आश्रम ऋषिकेश बिताकर कुछ समय यहां स्वामी प्रेमानन्द सरस्वतीजी के सानिध्य में रहने के लिये आये हुए थे। 22-अक्टूबर-2010 को उत्तरकाशी में दर्शनीय स्थलों के प्रति जिज्ञासा में स्वामीजी ने कहा कि वहाँ तो केवल विश्वनाथजी हैं और गाइड के रूप में अपने एक अनुचर को साथ भेज दिया। जिन्होंने श्रीगौरहरीजी, उनकी पत्नी तथा मुझे बड़ी श्रद्धा के साथ श्रीविश्वनाथजी व अन्य निकटस्थित मन्दिरों में दर्शन कराया। श्रीविश्वनाथ-मन्दिर परिसर में स्थित शक्तिस्तम्भ के विषय में बताया कि इसके जमीन में गड़े छोर का कोई भी पता नहीं लगा पाया है। ऑफ-सीजन के कारण हमें दर्शन-स्तुति-ध्यान में बड़ी सुगमता रही। यहाँ भी ICICI-Bank-ATM-Card  से पैसे निकालने की कोशिश निष्फल रही। ICICI-Bank  का ATM-Card  किसी अन्य बैंक की ATM मशीन पर ‘डिक्लाइन’ हो जाता है और मुझे ‘दण्डस्वरूप’ 28 रुपये प्रति कोशिश के लिये और बर्दास्त करने पड़ते हैं।  स्वामीजी से अनुमति ले 23-अक्टूबर-2010 की सुबह मैं वहां से केदारनाथ के लिये रवाना हुआ। हलकी बून्दाबान्दी हो रही थी, स्वामीजी ने स्वयं गेट खोलते हुए आशिर्वचन कहे और श्रीगौरहरीजी मुझे ‘विश’ करने नंगे पाँव ही आ गये। उनकी सहृदयता व स्नेह ने मुझे अन्दर तक भिगो दिया जिसे मैं अब भी महसूस करता हूँ।

11 Comments

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  • Nandan says:

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  • Sharma Shreeniwas says:

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