Uttarkashi

केदारताल यात्रा- वापस दिल्ली के लिए

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अगली सुबह हमारे कहने के मुताबिक होटल स्टाफ ने हमे पाँच बजे उठा दिया। नहा धो कर हम अपना सामन लेकर टैक्सी स्टैंड स्टैंड पहुँच गए। वहां ऋषिकेश के लिए जीप लगी हुई थिस लेकिन हम ही पहली सवारी थे। जब तक सवारी पूरी न हो जाये मतलब ही नहीं बनता की जीप चले। वहीँ एक टेम्पो ट्रवेलेर भी खड़ा था जो देहरादून जा रहा था।  उसमे कई सवारियां बैठी हुई थी और उम्मीद थी की वो पहले चलेगा। ड्राइवर से बात की तो पता चला की पहले भी चलेगा और जितनी देर हमे ऋषिकेश पहुँचने में लगेगी उससे डेड घंटे पहले ही वो हमे देहरादून पंहुचा देगा। फिर सोचना  क्या था, हम टेम्पो ट्रवेलेर में सवार हो गए और गाडी फुल होते ही  देहरादून के ओर चल पड़े जहाँ से मुझे वापस दिल्ली की गाड़ी पकड़नी थी। केदारताल यात्रा लगभग समाप्त हो चुकी थी और ये मेरी सबसे यादगार यात्राओं में से एक रही…

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केदारताल यात्रा – भोज खड़क – केदार खड़क – केदार ताल

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19 जून 2017 – कपिल ने बताया की भोज खड़क से केदार खड़क के बीच दूरी ज्यादा नहीं है लेकिन रास्ता काफी दुर्गम है। पहले दो घंटे तो रास्ता कल जैसा ही खड़ी चढाई वाला था लेकिन कोई ख़ास परेशानी नहीं हुई। कुछ और आगे बढ़ने पर हम एक ऐसी जगह पर पहुंचे जहाँ पर कोई रास्ता ही नहीं था। भूस्खलन से रास्ता गायब हो गया था। अब हमे एकदम नीच केदार गंगा तक जाना था जहाँ से रास्ता ढूंढ़ने की कोशिश करनी थी। नीचे पहुँच कर समझ में आया की पानी में उतर कर ही आगे बड़ा जा सकता है। एक तरफ केदार गंगा का हड्डियों को जमा देने वाला पानी था और दूसरी तरफ ऊपर पहाड़ी से पत्थर गिर रहे थे।

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केदारताल यात्रा – गंगोत्री से भोज खड़क

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अगली सुबह यानि 18 जून 2017 को नींद तो छै बजे ही खुल गयी थी लेकिन ठण्ड के कारण रजाई से बहार निकलते निकलते सात बज गए। तब तक कपिल भी हमारे कमरे में आ गया और फटा फट सामान बांधने में हमारी मदद करने लगा। ठीक आठ बजे हम फॉरेस्ट ऑफिस पहुंचे और परमिट की एंट्री करवाई  तथा कैंपिंग चार्जेज़ और गार्बेज चार्जेज़ जमा करवा के वापस अपने कमरे पे सामन उठाने पहुँच गए। ट्रेक शुरू करने से पहले फॉरेस्ट डिपार्टमेंट वाले गार्बेज चार्जेज लेते हैं जो की ट्रेक के दौरान आपके द्वारा फैलाये गए कूड़े कटकर के लिए होते हैं।  ये चार्जेज रिफंडेबल होते हैं अगर आप ट्रेक से वापस आने के बाद अपना सारा कूड़ा वापस लेके आये हों तो। सारी तैयारियां पूरी होने के बाद हम अपने सफर पर निकल पड़े जो की सूर्य कुंड को पार करके शुरू से ही खड़ी चढाई से शुरू होता है।

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केदारताल यात्रा – दिल्ली से गंगोत्री

केदारताल यात्रा – दिल्ली से गंगोत्री

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जिस नंबर पर आप संपर्क करना कहते हैं वो अभी स्विच ऑफ है या नेटवर्क छेत्र से बहार है… ऋषिकेश में शुबह के 4:30 बज रहे थे और मेरी इस यात्रा के साथी प्रशांत ने मुझे यहीं मिलना था लेकिन उसका फ़ोन स्विच ऑफ आ रहा था। मै दिल्ली से 16 जून की रात को चला था और प्रशांत देहरादून से आकर रात बिताने के लिए ऋषिकेश में किसी होटल में ठहरा हुआ था और सुबह हम दोनों को मिलकर उत्तरकाशी की ओर रवाना होना था। प्रशांत ने मुझे रात को ही बता दिया था की वो किस होटल में ठहरा है लेकिन मुझे होटल का नाम याद नहीं था, बस इतना याद था की होटल त्रिवेणी घाट के पास है। अब समझ में नहीं आ रहा था की क्या किया जाए। सुबह सुबह सड़क पर एकदम सन्नाटा था और मै इधर उधर टहल कर टाइम पास करने लगा की तक़रीबन बीस मिनट बाद मेरे फ़ोन की घंटी बजी, देखा की प्रशांत का ही फ़ोन है। मै प्रशांत के बताये हुए रस्ते पे चल पड़ा और कुछ ही मिनटों में उसके होटल के कमरे में पहुँच गया।

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दिल्ली से दयारा बुघयाल की सैर

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हम २:३० दोपहर को दयारा बुघयाल पहुच गए. हर तरफ सफेद रंग बिखरा था. बहुत ज्यादा बर्फवारी हो रही थी. रूफटोप के नीचे हम आराम कर रहे थे एंव आगे की रणनीति सोच ही रहे थे कि हमने देखा कि एक विदेशी पर्यटक , ३0 की उम्र , अकेले, हमारे थोडे बाद ही दयारा पहुचा है. स्पैन के उस बन्दे से १५-२०मिनट तक भिन्न भिन्न मुददो पर बात हुई जैसे मोदी,वीजां ,स्पैन का मौसम,लेह – लदाख आदि। घूमने का असली मकसद ही नई- नई जगह देखना और लोगौ को जानना है.

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Char Dham Yatra – Gangotri

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Water started to flow down the hill crossing road (damaging it) from multiple points. The turns were muddier and appeared slippery. All of a sudden a silenced atmosphere appeared in the car, everybody was quite including our music player. I could able to sense their tension but said nothing or not even reacted, just concentrated on road. By 6 pm, we started to look for a good place to spend night, as it was too much for the day. We stopped in small village, Dharali, some 18 km before Gangotri and so did the rain. There were around max 20-25 houses, all lodges, I guess and couple of restaurants. After taking 15-20 minutes rest, we came out for sightseeing, as the river Bhagirathi and mountains behind her were marvelous. After roaming for an hour we came back to the village and had our dinner. At the start of the trip only we have decided that we will have dinner no later than 8 pm and will sleep (try to) by 9 or 9:30 max. This will give us enough sleep before getting up again early next morning. I made it very clear that by any means we should be on road by 6 am, keeping IST in mind.

Stats:
From Haridwar to Dharali – 265 km; time taken – 12 hrs; breaks – 3 (15+30+60 mins)
Road condition – Excellent/ Good (occasionally bad patches 2-3 km each)
Tip:
1. There were two roads from Chamba for uttarkashi, I believe I took the long one, but in google maps the another one, which is also the NH seems around 20 km less.
2. Do not rely on mapmyindia GPS device in these parts, they are not properly updated. And the coordinates will always confuse the device as you will be rotating up/down the hills.

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Bamsaru Khal Trek

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In the morning, view outside our tents  was spectacular. We saw snow capped Mountains all around , took some pics, but after 15-20 Min  Mist covered the valley and mountains were not visible. We were supposed to start early , but got  late, we finished our breakfast by 8:30AM and started  walking towards Gidara.

From Dayara one black dog started walking with us , we thought it will go away after sometime but it  remained  with us till the end of trek. The Dog was too hairy, and resembled a  bear , got scared of him twice, he also had a bad habit  of crossing  the path when there was a difficult climb or narrow path.

While on the trek an idea popped up that we should also visit “Dodital” ( Lord Ganeshji Birthplace ). Dodital situated at a distance of 30 km from Dayara Bugyal, is also popular among tourists. Going there meant an  extension of 2 More days , which we could not  afford. Hence all  agreed to keep walking towards Gidara.

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Dayara Bugyal – Part1/2

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We finally started at 5:45 AM and straight hit the road to Gangotri. The twists and turns were churning my stomach and sleep was dozing me off. I got woken up couple of times due to being thrown away by swerves. The journey up was not very exciting. There was no river following our route as Bhagirathi (or Ganga) comes into picture only near Tehri. There was lot of haze due to which mountains and landscape was not looking great. The road was broken at many places due to landslide and due to dryness, there was lot of dust blowing from passing vehicles. The mountain face also looked scarred at many places due to debris from landslide and construction spreading over it. The weather was unnaturally very hot and devoid of moisture because of which loose earth of rubble was flying & getting all over you. Finally the river was seen with muddy color but very less flow. The reduced flow turned out was due to ice having started to melt only now and river would be in full flow in June.

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अनजान सफ़र :  गंगोत्री – श्रीनगर – पौड़ी – यात्रा का समापन

अनजान सफ़र : गंगोत्री – श्रीनगर – पौड़ी – यात्रा का समापन

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“मंदिर का निर्माण एक पवित्र शिला पर हुआ है जहां परंपरागत रूप से राजा भागीरथ, महादेव की पूजा किया करते थे। यह वर्गाकार एवं छोटा भवन 12 फीट ऊंचा है जो शीर्ष पर गोलाकार है जैसा कि पहाड़ियों के मंदिरों में सामान्यतः रहता है। यह बिल्कुल समतल, लाल धुमाव के साथ सफेद रंग का है जिसके ऊपर खरबूजे की शक्ल का एक तुर्की टोपी की तरह शीखर रखा है।

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अनजान सफ़र : उत्तरकाशी – गंगोत्री – गौमुख

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गंगोत्री हिंदुओं के पावन चार धामों मे से एक है इसका धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व सभी को आलौकिक करता है धार्मिक संदर्भ के अनुसार राजा सगर ने देवलोक पर विजय प्राप्त करने के लिये एक यज्ञ किया यज्ञ का घोडा़ इंद्र ने चुरा लिया राजा सगर के सारे पुत्र घोड़े की खोज में निकल पडे.

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अनजान सफ़र : दिल्ली – यमुनोत्री – उत्तरकाशी

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जानकारी मिली की पहले यमनोत्री जाओ फिर गंगोत्री फिर बद्रीनाथ और केदारनाथ. श्याम को वो सज्जन भी आ गए जो मसूरी से पैसे लाये थे, अच्छा ये बता दूँ की उत्तराखंड मे बसे तडके निकाल पड़ती है कियु की रूट लम्बा होता है, पता चला की सुबह ३.३० बजे की  बस है यमनोत्री की, और अभी टिकिट खिड़की बंद हो गयी है और सुबहे ३.०० बजे खुलेगी, अब रात काटने के लिए एक होटल मे १५० रूपए  मे कमरा लिया और सुबहे २.३० बजे सो कर उठा, फटाफट मुह हाथ धो कर सीधे बस अड्डे पंहुचा, यात्रा का समय होने के कारण बहुत भीड़ थी पता चला की यमनोत्री की बस पूरी फुल है पैर रखने की भी जगह नहीं है, तो सोच मे पड़ गया की क्या करू अगर ये बस छूट गयी तो फिर टाइम से यमनोत्री नहीं पहुच पाउँगा  (आप को ये बताना जरूरी है की मैं गढ़वाल से तो हूँ पर पौड़ी गढ़वाल से, और मुझे टिहरी और चमोली गढ़वाल के बारे मे कुछ भी नहीं पता नहीं है.)

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