Agra

Road Review : Delhi-Kanpur-Lucknow

By

Having completed the big road drive (Delhi – Jaisalmer- Jodhpur – Delhi in 4 days) on previous weekend, we were high on driving!

The distance from Delhi to Lucknow is approximately 500 km by road. The standard route is Delhi – Hapur – Moradabad – Rampur- Bareilly – Shahjahanpur- Sitapur – Lucknow. Another new route that is becoming popular is the Delhi – Kanpur – Lucknow route. Some of my friends tried this route few months back and said that it is fast as it’s a 4 lane road but longer than the standard route by about 50 km. We decided to take the longer and the faster one.

Read More

आगरा का मनकामेश्वर मन्दिर

By

आगरा में भगवान शिव जहाँ स्वयं आये थे कहते हैं कि आगरा के मनकामेश्वर मन्दिर में स्थित शिवलिंग की स्थापना स्वयं भगवन शिव ने की थी जब भगवान श्री कृष्ण मथुरा में जन्म ले चुके थे. पौराणिक दृष्टि इस मंदिर का इतिहास लगभग साढ़े पांच हजार वर्ष पुराना हमें द्वापर युग की याद दिलाता है, जब भगवान शिव कैलाश पर्वत से इस स्थल पर आये थे.

Read More

वाह ताज – खूबसूरती और प्रेम का अनोखा संगम

By

सुबह सुबह साड़े पांच बजे नींद खुल गयी एवं पत्नी का मूड एक बार फिर ताज देखने का हुआ…हलकी ठण्ड में पैदल ही पहुच गये और आश्चर्यचकित हो के देखते क्या है की सिर्फ हम गिने चुने दो चार भारतीय थे और लगभग पांच सात सौ की संख्या में विदेशी पर्यटक…हर देश के …कही से इंग्लिश भाषा सुनाई दे रही थी तो कही कोई गाइड स्पेनिश या जर्मन भाषा में इन पर्यटकों से बात कर रहा था…पता चला की लगभग सभी विदेशी सुबह ही यहाँ आते है भारतीय भीड़ से दूर और ये सुझाव उन्हें गाइड और होटल वाले देते है…पिछले दिन भी विदेशी पर्यटक काफी थे पर आज ऐसा लगा की हम लोग विदेश घुमने आये है …इतने अधिक विदेशी एक साथ एक ही जगह पे भारत में कही नही देखने को मिलते..

Read More

Golden Triangle – Agra, Fatehpur Sikri

By

We then decided that we should go around Agra a bit like visiting Red Fort. So, we took a Tonga to go to Red Fort. We enjoyed the ride and Tonga wallah obliged by letting us take pictures with Tonga. Red Fort was another revelation with so many stories about it. We had hired a guide who was telling us all the places where Shahjahan lived or exiled, where his daughters lived, mosque, sheesh mahal, bombshell damage etc. Soon, it was dusk and there were lot of birds circling the fort and its courtyard. We imagined how it would have been for Shahjahan watching his beloved Taj Mahal and the Yamuna while in exile.

Read More

हिंदुस्तान का नाज़, यक़ीनन ताज….

By

तकरीबन तीन घंटे की स्मूथ ड्राइव के बाद आगरा शहर में दिशा निर्देशो का पीछा करते हुए हम लोग होटल मधुश्री के सामने आकर खड़े हो गए. यमुना एक्सप्रेसवे से बाहर निकल कर जब आप आगरा शहर में प्रवेश करते है तो नाक की सीध में चलते चले जाने से एत्माददुल्ला के मकबरे (किले) की तरफ जाने वाले रस्ते पर एक टी पॉइंट आता है जिसमे यह होटल बिलकुल कोने पर ही बना हुआ है और इस होटल से दो मार्ग जाते है पहला आपको रामबाग, मथुरा, दिल्ली की तरफ ले जाता है और दूसरा मार्ग एत्माददुला और ताज महल की तरफ ले जाता है। इस होटल की एक बात मुझे और अच्छी लगी की आगरा की भीड़ से आप बचे भी रहेंगे और शांति भी बनी रहेगी अन्यथा जैसे-२ आप शहर के भीतर बढ़ते चले जाते है बेतहाशा ट्रैफिक और गन्दगी के ढेर आपको परेशान करते रहते है. और एक बात जिसकी हमे बहुत आवश्यकता थी वो थी कार पार्किंग जिसका बंद गलियो वाले रास्तो पर मिलना बहुत ही कठिन कार्य लग रहा था और एक पल को तो हमे लगा की कहीं हम इस भूल भुलैया में ही घूमते हुए न रह जाये। होटल के प्रांगण में कार पार्किंग का पर्याप्त स्थान मिल जाने के कारन एक मुसीबत तो हल हो चुकी थी और अब बारी थी उस जोर के झटके की जो धीरे से लगने वाला था अर्थात कमरे का किराया। होटल के अंदर स्वागत कक्ष में उपलब्ध प्रबंधक साहब ने बताया की यह होटल अधिकतर बिजनेस मीटिंग्स के लिए ही बुक रहता है जिसमे फॉरेन डेलीगेट्स आकर ठहरते है अतः आपको एक कमरा मिल तो जायेगा किन्तु चार्जेज लगेंगे पूरे पच्चीस सौ रूपए। अब मरता क्या न करता, आगरा के भीतर घुसकर ट्रैफिक से जूझने और कमरा ढूंढने की हिम्मत तो नहीं हो रही थी अतः महाशय को एडवांस में रूम चार्जेज का भुगतान करने के बाद अब हम लोग निश्चिंत होकर ताज देखने के लिए अपनी आगे की योजना बनाने लगे. वैसे यहाँ एक बात और बताना चाहूंगा की साफ़-सफाई और सुविधा की दृष्टि से होटल में कोई कमी नहीं थी, कार पार्किंग के अलावा अलमारी, सोफ़ा, एक्स्ट्रा पलंग, कलर टीवी, एयर कंडीशनर, संलग्नित बाथरूम, फ़ोन व् फ्री वाईफाई जैसे तमाम विकल्प मौजूद थे.

Read More

ताज़महल : सिसकती आहों की आख़िरी पनाहगार

By

मेट्रो शहरों में बढ़ते ट्रेफिक के दबाव, सडकों की बदतरीन हालत, महंगाई, सरकारी नियमों और बेतरतीब फैलते शहरों ने इसे हम से छीन कर अतीत के गर्त में पहुंचा दिया है, मगर यहाँ इसे फिर से जीने का एक मौका मिला है, एक-एक कर सारे उस पर सवार हो जाते हैं और फिर बच्चों द्वारा समवेत स्वर से “ चल मेरी धन्नो !” के कालजयी उद्गोश के साथ तांगे वाला चल पड़ता है और मै मसूद रांणा के उस गीत को याद कर रहा हूँ

“तांगे वाला नित खैर मंगदा, तांगा लहौर दा होवे पांवे चंग‌्ग दा”

(वैसे लाहौर और झंग वर्तमान में पाकिस्तान में हैं) और इस गाने में तांगे वालों की मेहनत, जानवर और सवारी के लिए उनका प्यार, और उनकी मुफलिसी (तंगहाली) को बहुत अच्छी जुबान दी गयी है | जीवन का कोई भी क्षण क्यूँ ना हो, हमारे फिल्म संगीत ने हर अवसर के लिए बेहतरीन गीत दिए हैं और अब इंटरनेट ने ऐसे दुर्लभ गीतों को एक बार फिर से सुनने का मौका ! खैर, तांगे की सवारी में सब इतना मग्न हो गये हैं कि जब तांगे वाला आवाज लगता है, “लो जी पहुंच गये…” तो एक निराशा सी होती है अरे इतनी जल्दी, कोई और लम्बा रास्ता नही था…? एक पल को तो जैसे भूल ही गये कि हम तांगे की सवारी करने नही, ताज़महल देखने आये हैं !

ताज़महल के प्रवेश द्वार के आगे लोगों की लम्बी कतारें लगी हुई हैं, जिन्हें देख कर लगता है कि अंदर प्रवेश पाने में ही कम से कम एक घंटा लग जायेगा, पर हमारा गाईड हमारा तारनहार बन कर सामने आता है, “मेरे पीछे आइये, जल्दी से …” और ना जाने किन-किन गलियों और रिहाईशी इलाकों से हमे गुजारता हुआ पांच- सात मिनट में ही एक ऐसे गेट के आगे ले जाता है, जहाँ अपेक्षाकृत बहुत ही कम लोग हैं, पास ही कई ऐसी छोटी-छोटी सी दुकानें हैं, जो रंग-बिरंगी टोपियों से लेकर ताज़ के प्रतिरूप और आगरे का मशहूर पेठा तक बेच रहें है | हमारा गाईड हमे कहता है कि शू कवर जरूर ले लें, दस रुपैये प्रति जोड़े के हिसाब से सबके लिए कवर और कुछ टोपियों भी ले ली जाती हैं, ताज़महल के अंदर जाने के लिए प्रवेश टिकट 20 रू की है, और जब तक हमारी ये छोटी सी खरीदारी पूरी हो, हमारा गाईड खुद ही टिकटें ले आता है | आँतक के इस दौर में, मुख्य प्रवेश द्वार से कुछ पहले ही सबकी सामान सहित तलाशी ली जाती है, और फिर सिक्योरिटी वालों के पूरी तरह संतुष्ट हो जाने पर, आपको हवाले कर दिया जाता है उन लम्हों के, जिन्हें देखने, सुनने, और महसूस करने का अनुभव, अब से केवल आपका और केवल आपका ही होगा !

Read More

आगरा: ताज की तरफ वाया सिकंदरा (अकबर का मकबरा)

By

मुगलों के बनवाए कुछ मकबरे तो वाकई इतने बुलंद और आलीशान हैं कि आपको उनकी मौत से भी रश्क हो जाता है | इस काल की जितनी भी मुख्य इमारतें हैं, उनमे कुछ ना कुछ ऐसा जरूर है, जिस से आप उनकी भवन-निर्माण कला के मुरीद हो जाएँ, इस मामले में ये मकबरा भी आपको एक ऐसा नायाब पल देता है, जब आप, (चित्र में लाल घेरे वाले) पत्थर पर खड़े होकर जो भी बोलते हैं, वो इस के हर हिस्से में सुनाई देता है यानी कि आज के दौर का Public Address System. और आप हैरान तो तब रह जाते हैं जब इस स्पॉट से दो फुट दायें–बाएं या आगे-पीछे होने पर. आपकी आवाज केवल आप तक ही रह जाती है |

सदियों से, जो मौत इतनी डरावनी और भयावह समझी जाती रही है कि कोई अपनी मरजी से उसके पास तक नही जाना चाहता, उसे याद तक नही करना चाहता, ऐसे में उसकी यादगार को कायम रखने के लिए इतने भव्य और आलीशान मकबरों का निर्माण, वाकई कमाल की बात है |

मिर्ज़ा ग़ालिब का एक शेर इस मौके पर बेसाख्ता ही याद आकर लबों पर एक हल्की सी मुस्कान बिखेर देता है –

“ मत पूछ, के क्या हाल है मेरा तेरे पीछे?, सोच के क्या रंग तेरा, मेरे आगे ! “

मिस्त्र के पिरामिड और ये मकबरे, ऐसा नही, कि मौत को कोई चुनोती देते हों या मौत पर इंसान की जीत का परचम फहराते हों, पर हाँ इतना जरूर है कि इन्हें देखने के बाद मौत इतनी भी बदसूरत नजर नही आती! बहरहाल सूरज अपना जलवा दिखाने को बेकरार हो रहा है, और घड़ी की सुईयां भी सरपट भाग रही हैं, ऐसे में हम फैसला करते हैं कि हमें अपनी ऊर्जा ताजमहल के लिए भी बचा कर रखनी है | अत:, हम जल्दी से अकबर के मकबरे को अपनी यादों में समेट, मुगलिया सल्तनत के एक बेताज बादशाह को उसकी फराखदिली और पंथ-निरपेक्षता के लिए उसे अपना आखिरी सलाम देते हुए, एक और मकबरे, ताजमहल को देखने आगरा की और कूच कर देते हैं…..

Read More

A Weekend Trip to Agra

By

Next day we checked out of hotel to visit Taj, and as we were approaching Taj Mahal, a number of people stopped our car seeing the Delhi number plate, and tried to lure us on some pretext or other. Some said, “Bauji, Taj Mahal se 4 km tak koi parking nahi hai, main apki car bhi park kara dunga aur auto se le chalunga” -“Sir, there is no parking within 4km of Taj Mahal, I will get your car parked and take you there in the auto”. We overheard all those guys and parked our car at Shilpgram parking, buy tickets from the counter, hired a battery cab in just Rs 10, that dropped us close to Taj. Battery operated cabs hop between authorized Taj parkings and Taj Mahal.

Reaching there, we were welcomed by a long queue of tourists getting restless to see one of the Seven Wonders of the World. The guards were checking the entry tickets of each visitor and randomly asking for identity proofs of tourists (There was no standard rule for checking authenticity of individuals). Soon after entering, there were rooms made of red sandstone which used to be the rooms of guest of the Shah Jahan, made in almost the same manner as the ones in Fateh Pur Sikri. After entering a huge gate, the sight of marvel made of white marble got visible. The Taj is magnificiently built structure of equal dimensions from all four side and even its distance from the mosque at both its sides are at same length. The entire dimensional symmetry of this architectural marvel is a treat for viewer’s eyes.

Read More

इन्दौर पहुंच गये हम!

By

खाना खाने के बाद मैने तो लंबी तान ली और ये तीनों महिलाएं न जाने क्या – क्या गपशप करती रहीं। राजा की मंडी (आगरा) स्टेशन आया तो अपने घुमक्कड़ भाई रितेश गुप्ता की याद आई। उनसे सच्ची-मुच्ची वाली मुलाकात तो आज तक नहीं हो पाई पर फेसबुक पर गप-शप अक्सर ही होती रहती है। मैने उनको इस ट्रेन से जाने के बारे में सूचना नहीं दी हुई थी पर फिर भी न जाने किस आशा में, प्लेटफार्म पर उतरा, कुछ पल चहल-कदमी की और फिर वापिस ट्रेन में आ बैठा। बाहर अंधेरा होने लगा था और खिड़की से कुछ दिखाई नहीं दे रहा था, अतः सामने वालों पर ही ध्यान केन्द्रित किया। सोचा, बच्चों को कुछ ज्ञान की बातें बताई जायें। घुमक्कड़ का ज़िक्र शुरु कर दिया और बताया कि अगर उन्होंने वह वेबसाइट नहीं देखी तो समझो ज़िन्दगी में कुछ नहीं देखा। वहीं बैठे – बैठे रितेश, मनु, जाट देवता, डी.एल. अमितव, नन्दन, मुकेश-कविता भालसे, प्रवीण वाधवा आदि-आदि सब का परिचय दे डाला। रेलवे को भी कोसा कि लैपटॉप नहीं चल पा रहा है, वरना उनको घुमक्कड़ साइट भी दिखा डालता।

रात हुई, खाना खाया, कुछ देर किताब पढ़ी, फिर सामान को ठीक से लॉक करके और कैमरे वाले बैग को अपनी छाती से लगा कर सो गया। ग्वालियर में उतर कर अंधेरे में अपने मोबाइल से एक-दो फोटो खींचने का भी प्रयत्न किया पर कुछ बात कुछ बनी नहीं। सुबह पांच बजे आंख खुली और ट्रेन लगभग 7 बजे इन्दौर स्टेशन पर आ पहुंची।

Read More

ताजमहल- बेपनाह मोहब्बत की अनमोल निशानी ……………

By

साथियों, इस श्रंखला की पिछली पोस्ट में मैंने आपलोगों को अपनी वृन्दावन यात्रा तथा वहां के अनुभवों के बारे में बताया था। वृन्दावन से लौट…

Read More